बच्चा चोरी के शक में लोगों को मारना महज घटनाएं नहीं एक पूरी राष्ट्रीय सोच का सुबूत

संपादकीय
28 मई 2015

छत्तीसगढ़ में जगह-जगह बेकसूर लोगों को मारा जा रहा है कि वे बच्चा चुराने वाले हैं। अब तक दर्जन भर से अधिक ऐसे मामले हो चुके हैं जिनमें से एक में तो राजधानी रायपुर में ही मारा गया है, और अब मारने वाली भीड़ से दर्जनों लोग पता नहीं कितनी जिंदगी जेल में काटेंगे। लेकिन यह सिलसिला थम नहीं रहा है, और एक के बाद दूसरे शहर में लोग बच्चा चोर के शक में बेकसूरों को पीट रहे हैं। कहीं रोजगार ढूंढते मजदूर शक का शिकार हो रहे हैं तो कहीं विचलित और विक्षिप्त लोग मारे जा रहे हैं। चूंकि भीड़ की हिंसा और मार के शिकार लोग महत्वपूर्ण नहीं हैं, गरीब और फटेहाल हैं, इसलिए इसके खिलाफ किसी संगठित तबके ने अभी तक कोई आवाज नहीं उठाई है। जो मारा गया है, और जो पिट रहे हैं, वे किसी एक धर्म या जाति के नहीं हैं, किसी एक राजनीतिक दल या सामाजिक संगठन के नहीं हैं, इसलिए ऐसी बेकसूर जिंदगियों के पक्ष में खड़ा होने के लिए किसी के पास वक्त भी नहीं है। 
लेकिन इससे दो बातें साबित हो रही हैं, एक तो यह कि लोग बहुत तेजी से अफवाहों के शिकार होकर अपने शक को जानलेवा बनाने में हिचक नहीं रहे हैं। दूसरी बात यह कि पुलिस या सरकार पर से, अदालत पर से लोगों का भरोसा घट चला है, और वे कानून अपने हाथ में लेने को एक आसान समझ रहे हैं, शायद बेहतर रास्ता भी समझ रहे हैं। यह प्रदेश, और बाकी देश भी, किस तरह अफवाहों का शिकार हो सकता है, यह देखना हो, तो कुछ दशक पहले गणेशजी के दूध पीने को याद करना पड़ेगा जब सरकारी दफ्तर छोड़-छोड़कर लोग शहर में ढूंढ-ढूंढकर गणेश प्रतिमाओं को दूध पिला रहे थे। तब से लेकर अब तक देश में शिक्षा तो बढ़ गई है, लेकिन अक्ल बढऩे का कोई सुबूत नहीं हैं। लोग अभी भी अंधविश्वास के वैसे ही शिकार हैं, जैसे कि वे गणेश प्रतिमा के सामने थे। गणेशजी के दूध पीने के दशकों बाद इस देश को कभी कोई निर्मल बाबा बेवकूफ बनाता है, तो कभी आसाराम जैसे लोग भक्तों की बच्चियों से बलात्कार के मामले में जेल पहुंचते हैं। अंधविश्वास है कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा। अभी-अभी हमने इसी पेज के लिए लिखा था कि शक का इलाज तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं था, लेकिन अंधविश्वास का इलाज तो दवाओं के देवता धन्वंतरि के पास भी नहीं था। 
देश की सोच को धर्मान्धता के आधार पर, एक अस्तित्वहीन इतिहास के झूठे राष्ट्र गौरव के आधार पर, अवैज्ञानिकता के आधार पर, और कट्टरता, पाखंड के आधार पर जिस तरह से कमजोर बनाया जा रहा है, उसी का नतीजा है कि लोग पुलिस और अदालत पर भरोसे के बजाय कानून को हाथ में लेने पर भरोसा अधिक कर रहे हैं। इंसानी मिजाज ऐसा नहीं हो सकता कि वह कुछ मामलों में अंधविश्वासी हो, कट्टर हो, और कुछ दूसरे मामलों में वह वैज्ञानिक नजरिए का हों। इसलिए जब समाज की लोकतांत्रिक, न्यायसंगत, तर्कसंगत, और वैज्ञानिक सोच को कमजोर किया जाता है, तो वह अलग-अलग कई शक्लों में हिंसक हो जाती है, क्योंकि लोकतंत्र पर उसका अधिक भरोसा नहीं रहता। ऐसे लोग दूसरों के हक और अपनी जिम्मेदारी को मानने और समझने के बजाय अपने हक और दूसरों की जिम्मेदारी को हिंसा की हद तक ले जाते हैं। आज इस देश में बहुत से साम्प्रदायिक और धर्मान्ध नेता जिस तरह के अवैज्ञानिक और अलोकतांत्रिक बयान दे रहे हैं, उससे समाज की सोच बर्बाद हो रही है। इसके बुरे नतीजे अभी खुलकर सामने नहीं आ पाए हैं, लेकिन किसी दिन ऐसी ही अफवाहों पर भरोसा करके जब लोग किसी दूसरे धर्म, या किसी दूसरी जाति के लोगों को मारना शुरू करेंगे, तो उसके जवाब में एक संगठित जवाबी हिंसा उठ खड़ी होगी। और उस वक्त भारतीय समाज की खोई हुई वैज्ञानिक सोच को रातों-रात वापिस लाना मुमकिन भी नहीं होगा। समाज की सोच सागौन की पेड़ की तरह होती है, जो कि धीरे-धीरे पनपते हुए, विकसित होते हुए, पचीस-पचास बरस में जाकर काम की हो पाती है। और समाज के भीतर अंधविश्वास तो बांस की तरह पनपता है जो कि देखते ही देखते आसमान छूने लगता है। हमको बांस को ऐसी मिसाल में इस्तेमाल करते हुए तकलीफ हो रही है, लेकिन यह बयां करने का आसान रास्ता सूझ रहा है। इस देश के समझदार लोगों को वैज्ञानिक सोच और लोकतांत्रिक न्यायप्रियता कायम रखने के लिए सरकारों और राजनीतिक दलों से परे जाकर मेहनत करनी पड़ेगी। जिनको यह काम मुश्किल लगता है, उनको याद रखना चाहिए कि सैकड़ों बरस पहले जब कोई अदालत नहीं थी, कोई संसद नहीं थी, कोई मानवाधिकार आयोग नहीं थे, तब एक अकेले कबीर ने जिस हौसले के साथ पाखंड पर वार किया था, आज कोई उतना वार करे, वैसा वार करे, तो उस पर राजनीतिक दल, सरकारें, और धर्म के ठेकेदार चढ़ बैठेंगे। लेकिन अकेले कबीर ने उस वक्त जो काम किया था, आज तरह-तरह की कानूनी मदद के रहने पर कुछ और लोगों को भी वैसा काम करना सोचना चाहिए। 

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