मोदी की अपील, नक्सलियों को सोचने की जरूरत

संपादकीय
09 मई 2015
बस्तर के अपने पहले दौरे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नक्सलियों से हिंसा का रास्ता छोडऩे की अपील की। उन्होंने लोगों से कहा कि जिस तरह नक्सल बाड़ी और पंजाब में रक्त की धाराएं बहनी बंद हुई, उसी तरह बस्तर में भी जरूर हिंसा बंद होगी। उन्होंने नक्सलियों से कहा कि वे कम से कम दो-चार दिन के लिए अपने कंधे से बंदूक नीचे रखकर पीडि़त परिवार के बच्चों से मिल लें। आपकी गोलियों से पीड़ा पाने वाला आपकी जिंदगी बदल सकता है। हिंसा से कभी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि निराश होने की जरूरत नहीं है। बस्तर में भी नक्सलवाद बंद होगा। उन्होंने कहा कि यहां के नक्सलियों के मन में भी मानवता जागेगी। प्रधानमंत्री ने कहा कि हिंसा का कोई भविष्य नहीं है, शांति के मार्गों का ही भविष्य है। आपकी गोलियों से पीड़ा पाने वाला ही आपकी जिंदगी बदल सकता है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ अगर नक्सलवाद से मुक्त हो जाए, तो वह हिन्दुस्तान का नंबर एक का राज्य हो सकता है। छत्तीसगढ़ हिन्दुस्तान का भविष्य भी बदल सकता है।
प्रधानमंत्री की बातें नक्सलियों से महज बंदूक से बात करने का विचार रखने वालों से बहुत हटकर है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह पहले भी नक्सलियों से बातचीत का इरादा कई बार जाहिर कर चुके हैं, और आज प्रधानमंत्री ने जिस तरह नक्सलियों से समाज और लोकतंत्र की मूलधारा में लौटने की अपील की है, उसके बाद इस मोर्चे पर कुछ और कोशिशें होनी चाहिए ताकि खूनखराबा खत्म हो। इतने बरसों में छत्तीसगढ़ में यह साबित हो चुका है कि सरकार तो खत्म नहीं की जा सकती, लेकिन लोकतंत्र के खिलाफ हिंसा खत्म हो सकती है। इसी राज्य के उत्तरी सिरे पर सरगुजा में नक्सल हिंसा पूरी तरह खत्म हो गई है। कोई वजह नहीं है कि बस्तर में यह खत्म न हो सके। सरकार की ताकत बहुत अधिक होती है, यह एक अलग बात है कि छत्तीसगढ़ के राज्य बनने के बाद पन्द्रह बरसों में राज्य और केन्द्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस और भाजपा ने किसी फौजी ताकत का इस्तेमाल नक्सल इलाकों में नहीं किया है। और ऐसा न करना एक समझदारी थी क्योंकि फौजी ताकत बहुत से बेकसूरों को मारती है। 
बस्तर में प्रधानमंत्री जिस कारखाने के शिलान्यास करने आए हैं, उसमें बहुत से लोगों की जमीनें जाएंगी। लेकिन किसानों या आदिवासियों की जमीनें गए बिना न तो भिलाई इस्पात संयंत्र बना था, न ही कोई बांध बनता है, और न ही नहरें या सड़क। इसलिए भूमि अधिग्रहण को लेकर देश में जो भी बहस चल रही है, किसानों के भले के लिए जो भी प्रावधान लागू किए जा सकते हैं, उन सबके साथ-साथ भूमि अधिग्रहण एक मजबूरी भी रहती है, और सरकारी कारखाने के लिए या सार्वजनिक कामकाज के लिए किसानों की तकलीफदेह बेदखली एक मजबूरी भी हो सकती है। क्या कोई छत्तीसगढ़ में बीएसपी के बिना आज की तस्वीर की कल्पना कर सकते हैं? इसी तरह बस्तर में जब एक बड़ा सरकारी इस्पात कारखाना बन जाएगा, तो न सिर्फ वहां के लौह अयस्क की बर्बादी बचेगी, उसे बस्तर के बाहर मिट्टी के मोल बेचना बचेगा, बल्कि वहां के लोगों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रोजगार भी बहुत मिलेगा। किसी क्षेत्र का विकास उद्योगों के बिना एक सीमा तक तो हो सकता है, लेकिन जहां पर खनिज हैं, वहां पर विकास की सबसे अधिक संभावनाएं स्थानीय जमीन पर कारखाने लगाने से है। और जब यह कारखाना किसी निजी उद्योग का न होकर सरकार का हो, तो उसकी कमाई भी जनता के खजाने में ही जाएगी। 
लेकिन इस एक भूमिपूजन से न तो बस्तर में बात पूरी हो रही है, और न ही कारखाने के सरकारी होने से जनता के पूरे हक मिल जाते हैं। लोगों को वहां के स्थानीय आदिवासियों के हकों के लिए लडऩा जारी रखना पड़ेगा। सत्ता से आसानी से कुछ नहीं मिलता है, लेकिन फिर भी छत्तीसगढ़ में सरकार से लोगों को आसानी से ही बहुत से चीजें मिल जाती हैं। हम उम्मीद करते हैं कि बस्तर के औद्योगिक विकास से प्रदेश और देश का जो भला होगा, उसका एक जायज हक बस्तर के उन लोगों तक जाएगा जिनकी जमीनें अभी शिलान्यास हो रहे कारखानों या परियोजनाओं में जाएंगी। बस्तर के आर्थिक विकास से भी वहां नक्सल हिंसा खत्म होने की एक संभावना खड़ी होगी। 

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