यह राम नरेश यादव की लोकतंत्र विरोधी बेशर्मी

5 मई 2015
संपादकीय
मध्यप्रदेश के अतिचर्चित व्यापम घोटाले में एक दिग्गज आरोपी वहां के राज्यपाल राम नरेश यादव के आरोपी बेटे की तो कुछ हफ्ते पहले मौत हो गई, लेकिन गमगीन राज्यपाल जमानत और रहम के लिए अदालत में खड़े थे। आज उन्हें अदालत से इस आधार पर रियायत मिली है कि राज्यपाल के संवैधानिक पद पर बैठे हुए किसी व्यक्ति के खिलाफ ऐसे किसी जुर्म में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अब पहली खबरों में इसे एक बड़ी राहत बताया जा रहा है कि उनके खिलाफ दर्ज जुर्म अब धरा रह जाएगा। 
जिन लोगों को यह बात राहत की लगती है, उन्होंने लोकतंत्र की गौरवशाली परंपराओं को नहीं समझा है। लोकतंत्र पेशेवर चोरों की तरह कानून से लुकाछिपी का धंधा नहीं है। यह उदार परंपराओं के गौरव का नाम है। जिस राज्यपाल का बेटा व्यापम घोटाले में आरोपी रहते गुजर गया, और जो राज्यपाल खुद उसी राज्य की पुलिस की अदालती-निगरानी वाली जांच में आरोपी करार दिया गया था, वह राज्यपाल आज राजभवन के संवैधानिक दर्जे को आड़ बनाकर अपनी चमड़ी बचाते दिख रहा है। यह धंधा लोकतंत्र के गौरव का न होकर, संवैधानिक रियायत के शर्मनाक बेजा इस्तेमाल का है, और यह मिसाल दूर तक काम आएगी। यह दर्जा राम नरेश यादव को जिंदगी भर के लिए नहीं मिला है, और हो सकता है कि उनका कार्यकाल खत्म होने के बाद उन्हें फिर कटघरे में खड़ा कर दिया जाए। लेकिन सवाल यह है कि ऐसी शर्मिंदगी वाले आरोपों के चलते हुए एक आदमी किस बेशर्मी से राजभवन में डटा रह सकता है, यह लोकतंत्र में एक बहुत बुरी मिसाल है।
राम नरेश यादव हो, या उनकी जगह कोई और, जांच दल के ऐसे नतीजों के चलते हुए सबसे पहले उनको अपनी वह कुर्सी छोडऩी थी जो कि उनको राज्य का संवैधानिक मुखिया होने के नाते मिली है। यह मुखिया कुर्सी छोडऩे के बजाय उसके पीछे जाकर इस तरह छुप गया है, जिस तरह से कोई पेशेवर मुजरिम पुलिस को देखकर किसी पेड़ या दीवार के पीछे छुप जाता है। यह बात भी हमारी समझ से परे है कि इस राज्यपाल को केंद्र सरकार में इन आरोपों के चलते हटाया क्यों नहीं? बहुत से राज्यपाल मोदी सरकार के इस एक साल के भीतर बिना किसी जुर्म के भी हटाए गए, और कई राज्यपालों के लिए तो उत्तर-पूर्व का एक राज्य काले पानी की सजा के लिए अंगे्रजों के अंडमान की तरह इस्तेमाल किया गया, और हटाए जाने वाले राज्यपालों को वहां भेजा गया। सार्वजनिक जीवन का तकाजा यह है कि ऐसी संवैधानिक रियायत इस्तेमाल करने वाले आरोपी कुनबे के इस जिंदा सदस्य को राजभवन से बाहर करना चाहिए। कोई अगर खुद इतना बेशर्म रहे कि वह कुर्सी छोडऩे तैयार ही न हो, तो देश के संविधान ने केंद्र सरकार को ऐसी बाहुबली कानूनी-ताकत भी दी है जो कि राम नरेश यादव को उठाकर राजभवन के बाहर फुटपाथ पर बिठा सके। इस काम में देर नहीं करनी चाहिए, और संविधान का ऐसा बेजा इस्तेमाल लोकतंत्र विरोधी बेशर्मी है।

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