आईआईटी में यह लड़ाई महज विचारों की आजादी की लड़ाई नहीं है, बल्कि...

संपादकीय
30 मई 2015

मद्रास आईआईटी के छात्रों को एक संगठन पर वहां के मैनेजमेंट ने कार्रवाई की है क्योंकि दलित छात्रों का यह संगठन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना कर रहा था। इस संगठन की मान्यता खत्म कर दी गई है। और इसे लेकर केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी और कांग्रेस पार्टी के बीच काफी बहस छिड़ी हुई है। लेकिन राजनीतिक दलों से परे एक जो गंभीर बात उठ रही है, वह यह कि क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत आईआईटी जैसे संस्थान के बालिग हो चुके छात्र-छात्राओं को प्रधानमंत्री की आलोचना का हक नहीं है? 
अभी एक अमरीकी मीडिया संस्थान ने भारत के, और भारत में काम कर रहे विदेशी लोगों में से चुनिंदा आधा दर्जन लोगों से मोदी सरकार के एक साल के कामकाज पर उनकी राय ली थी। नंबरों के आधार पर नतीजा यह निकला अभिव्यक्ति की आजादी पर मोदी सरकार को सबसे कम नंबर मिले, दस में से शायद तीन, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मोर्चे पर मोदी को सबसे अधिक नंबर मिले। यह बात देश के उदार विचारधारा के लोगों के बीच, बुद्धिजीवी कहे जाने वाले तबके के बीच, सामाजिक संगठनों के लोगों के बीच जोरों से उठ रही है कि मोदी सरकार के आने के बाद से आलोचना को बर्दाश्त करना कम हो गया है, और लोग मुंह खोलने में डरने लगे हैं। लेकिन हम मद्रास आईआईटी के इस मुद्दे को लेकर बहस को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की तरफ ले जाने के बजाय इसके एक दूसरे पहलू पर बात करना चाहते हैं जो कि आज बहस में किनारे कर दिया गया है। 
यह वही मद्रास शहर है जहां पर हाईकोर्ट के वकीलों ने मोदी सरकार, और भाजपा के राज्यों द्वारा जगह-जगह गोमांस पर रोक को बढ़ावे के खिलाफ हाईकोर्ट के अहाते में ही गोमांस का भोज करके विरोध किया था। उनका कहना था कि एक सवर्ण हिन्दू सोच को भारत के बाकी लोगों पर लाद  दिया जा रहा है, या कानून बनाकर उसे जुर्म बनाया गया है। अभी केन्द्र सरकार ने पूरे देश के लिए ऐसा कोई कानून नहीं बनाया है लेकिन भाजपा और उससे जुड़े संगठनों की ऐसी सोच बार-बार आक्रामक तरीके से सामने आ रही है। आईआईटी के दलित छात्रों का यह संगठन देश के बाकी तमाम दलित लोगों की तरह इस बात पर विचलित चले आ रहा है कि किस तरह भाजपा की राज्य सरकारें हर जगह पर गोमांस और इससे जुड़े कारोबार को दंडनीय अपराध बना चुकी हैं, और एक सनातनी ब्राम्हणवादी हिन्दू सोच देश के बाकी तबकों पर लादी जा रही है। 
बात सिर्फ इस बात की नहीं है कि आईआईटी छात्रों के किसी संगठन की मान्यता खत्म कर रहा है। बात यह है कि इस संगठन के लोग जिस तबके के हैं, उनके बुनियादी अधिकार किस तरह देश भर में खत्म किए जा रहे हैं। मान्यता को खत्म करने की यह कार्रवाई अदालत में ठहर नहीं सकेगी, और ऐसा करके आईआईटी ने मोदी का कोई भला नहीं किया है, बल्कि मोदी के लिए एक नई फजीहत खड़ी की है। जिस अमरीका के साथ संबंधों को लेकर मोदी आज खबरों में है, उस अमरीका में भारत के आईआईटी से पढ़कर जाकर हजारों लोग काम कर रहे हैं, और उस अमरीका में गोमांस कोई मुद्दा नहीं है। अमरीका में काम करने वाले लोग इस आजादी का सम्मान करना सीख जाते हैं कि लोग अपनी-अपनी पसंद का खाएं। जिनको वहां भी शाकाहारी रहना है, वे शाकाहारी रहते हुए भी गोमांस खाने वाले लोगों के साथ उदारता से रहना सीख जाते हैं। भारत के भीतर इस तरह की दकियानूसी कार्रवाई पूरी दुनिया में इस देश के लोगों की आजादी की हालत को बहुत कमजोर साबित करेगी। यह लड़ाई सिर्फ मोदी की आलोचना की लड़ाई नहीं है, यह देश में दलित तबके के विचलित होने की लड़ाई है, और वह आईआईटी जैसे प्रतिबंधों से ठंडी पडऩे वाली नहीं है।
और यह तब हो रहा जब आज प्रधानमंत्री मोदी अंबेडकर की 125वीं सालगिरह मनाने की कमेटी की अध्यक्षता कर रहे हैं। इस मौके पर क्या वे अंबेडकर के दलित अनुयायियों की भावनाओं को भी जानना चाहेंगे, या गरीब मांसाहारी लोगों के मुंह का कौर छीनने के लिए सनातनी कानून बढ़ाते चलेंगे?

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