भारतीय रक्षा मंत्री का आतंक पर पूरी तरह अवांछित बयान

संपादकीय
24 मई 2015

यूं तो पाकिस्तान को आंखें दिखाना हिन्दुस्तान में, हिन्दुस्तान के खिलाफ हमलावर जुबान में कुछ बोलना पाकिस्तान में नेताओं को पसंदीदा काम है, लेकिन कल भारत के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के एक बयान को लेकर पाकिस्तान की जो प्रतिक्रिया आई है उससे बैठे-ठाले एक जुबानी जंग शुरू हो गई है। भारतीय रक्षा मंत्री ने भारत में हो रही आतंकी घटनाओं को लेकर कहा कि आतंकवादियों के माध्यम से ही आतंकवादियों का सफाया किया जा सकता है।  पर्रिकर ने कहा था कि कई चीजें हैं, जिन पर मैं यहां वाकई बात नहीं कर सकता। लेकिन पाकिस्तान ही क्यों, कोई दूसरा देश भी मेरे देश के खिलाफ कुछ साजिश रच रहा है तो हम निश्चित रूप से कुछ सक्रिय कदम उठाएंगे। उन्होंने हिंदी मुहावरा कांटे से कांटा निकालना का भी इस्तेमाल किया और पूछा कि आतंकवादियों को समाप्त करने के लिए भारतीय सैनिकों का इस्तेमाल क्यों किया जाए? 
पाकिस्तान ने इस पर कहा कि उनके इस बयान से भारत के आतंकवाद में शामिल होने की आशंका की पुष्टि होती है। विदेश मामलों पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के सलाहकार सरताज अजीज ने कहा कि यह बयान केवल यह जाहिर करता है कि पाकिस्तान में हो रही आतंकवादी गतिविधियों में भारत शामिल है। यह पाकिस्तान की आशंकाओं की पुष्टि करता है। उन्होंने कहा कि पहली बार ऐसा होगा कि किसी निर्वाचित सरकार का कोई मंत्री किसी दूसरे देश या उसके सरकार से इतर तत्वों से पनपने वाले आतंकवाद को रोकने के नाम पर उस देश में आतंकवाद के इस्तेमाल की खुलकर वकालत करता हो। 
आज भारत में आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस बात पर खुश होगा कि भारत के रक्षा मंत्री ने पाकिस्तान को आंखें दिखाईं। और वे लोग भी खुश होंगे जो मानते हैं कि सरहद पार करके पाकिस्तान पर कब्जा कर लेना चाहिए। लेकिन आज की दुनिया की हकीकत यह है कि किसी भी देश से तनाव अपने देश के लोगों के पेट काटकर ही निभाया जा सकता है। भारत और पाकिस्तान के बीच सर्द सरहदों पर हर बरस सैकड़ों जवान बिना गोलियों के भी मारे जाते हैं। और हथियारों के सौदागर इन दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ाकर दोनों तरफ का फौजी बजट जितना बढ़वा देते हैं, उनसे इन दोनों देशों के गरीब बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, अस्पतालों में दवाईयां नहीं हैं, शहरों में कचरा नहीं उठ पा रहा है, और गरीब लोग नर्क या जहन्नुम सी जिंदगी जी रहे हैं। इसलिए आंखें तरेरने का काम जब राजधानियों में होता है, तो उसके दाम पूरे देश की गरीब जनता चुकाती है। 
हमारा यह मानना है कि भारतीय रक्षा मंत्री का यह बयान उनकी कूटनीतिक कमसमझ को ही जाहिर करता है। उन्होंने अधिक न कहने की बात कहते हुए भी जितनी बात कही है, वह बात भी पूरी तरह अवांछित है। अगर कोई देश दूसरे देश में अघोषित रूप से आतंक को बढ़ावा देता भी है, और बहस के लिए यह मान लेते हैं कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही एक-दूसरे की जमीन पर आतंक को बढ़ा रहे हैं, तो भी  यह बात सरकार में बैठे हुए लोग कभी भी खुलकर कहने से बचेंगे। आतंक की बात हो, आतंक के मुकाबले आतंक को, फौज के मुकाबले किसी और रास्ते को इस्तेमाल करने की बातें बहुत समझदारी की नहीं हैं। और यह भी हो सकता है कि भारत में मोदी सरकार में बैठे बहुत से लोग इस बयान की वाहवाही करें, क्योंकि उनको इसके दूरगामी नतीजों का अंदाज नहीं हैं, और विदेश नीति की समझ की कमी भी इसके पीछे हो सकती है। 
इस सरकार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रात-दिन पूरी दुनिया का फेरा लगाकर भारत के नाम की जो वाहवाही करवाना चाहते हैं, वह तो ठीक है, लेकिन उनके साथ के मंत्री अंतरराष्ट्रीय संबंधों में समझ की जो कमी दिखा रहे हैं, उसका फायदा उन देशों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मिलता है जिनके खिलाफ भारतीय मंत्री या नेता ऐसे बयान देते हैं। दूसरी बात यह कि भारत सरकार और भारत के नेताओं को यह याद रखना चाहिए कि दूसरे देशों में जो भारतवंशी बसे हुए हैं, उनकी जान, और उनका कारोबार, रोजगार सब कुछ भारत से उठे हुए ऐसे बयानों से खतरे में पड़ जाते हैं। भारतीय रक्षा मंत्री का यह बयान भारत के पाक-विरोधी लोगों को लुभावना लग सकता है, लेकिन इससे भारत का आतंक के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय नजरिया कमजोर साबित होता है।

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