अकेले और मुसीबत में रह गए बच्चों की तलाश और मदद हो

25 मई 2015
संपादकीय

छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल इलाके सरगुजा में पिता से भटक गए एक बच्चे की भूख-प्यास से मौत के बाद वहां के जिला प्रशासन ने पूरे जिले में अकेले, बेसहारा रह गए बच्चों की तलाश शुरू की है, और ऐसे दर्जनों बच्चे मिले हैं, जिन्हें सरकारी संरक्षण गृह भेजा जा रहा है। एक मामला ऐसा मिला है जिसमें पिता ने मां की हत्या कर दी, और जेल चले गया, और तीन छोटे-छोटे बच्चे बेसहारा रह गए। हर हादसे के बाद कुछ सबक लिए जा सकते हैं। सरगुजा में एक बच्चे की मौत के बाद अगर दर्जनों दूसरे बच्चों को बचाया जा सकता है, तो वहां के इस मामले से प्रदेश के बाकी जिलों में भी सरकार को ऐसे बच्चों की तलाशी करवाना चाहिए जिनके मां-बाप जेल में हैं, या किसी और वजह से जो बच्चे अकेले रह गए हैं। 
एक दूसरे किस्म के मामले में सुप्रीम कोर्ट पूरे देश की राज्य सरकारों को कटघरे में ला चुकी है कि बच्चों और महिलाओं की तस्करी के मामलों में राज्य सरकारें क्या कर रही हैं? इनमें छत्तीसगढ़ का नाम भी है, और इसी सरगुजा के इलाके से सबसे अधिक बच्चों और लड़कियों को देश के महानगरों में ले जाकर काम पर लगाया जाता है, बंधुआ मजदूर बना दिया जाता है, बेच दिया जाता है, या वेश्यावृत्ति में लगा दिया  जाता है। ऐसे बहुत से मामले सामने आने पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी में राज्य सरकारों से काम करवाना शुरू किया है, और लगातार जवाब मांग रही है। जो बच्चे किसी भी वजह से घर छोड़कर निकल जाते हैं, या अकेले रह जाते हैं, वे मुजरिमों के हाथों भी चढ़ जाते हैं, नशे की लत में पड़ जाते हैं, और उनका यौन शोषण होने का खतरा भी भयानक रहता है। ऐसा भी नहीं है कि सरकारी संरक्षण गृह में वे सुरक्षित रहते हैं, क्योंकि छत्तीसगढ़ में ही जगह-जगह स्कूलों के छात्रावासों में लड़कियों से बलात्कार और देह शोषण के मामले सामने आए हैं। अभी भारत में इस बात को लेकर समझ और संवेदनशीलता कम है कि लड़कियों के अलावा कम उम्र लड़कों का भी देह शोषण होता है। लोग इस बात को मंजूर करने से कतराते हैं। 
राज्य सरकार को सभी तरह के मुसीबतजदा, अकेले रह गए, भूखे या कुपोषण के शिकार बच्चों का पता लगाकर उनके लिए जरूरी इंतजाम करना चाहिए। इसके साथ-साथ जितने संरक्षण गृह हैं, उनकी निगरानी के लिए भी आसपास के भले और प्रमुख लोगों की ऐसी गैरराजनीतिक कमेटी बनानी चाहिए जो कि वहां के बच्चों की मदद भी कर सके, और वहां होने वाली ज्यादती या भ्रष्टाचार पर नजर भी रख सके, उसे रोक भी सके। सरकार का अपना अमला आमतौर पर संवेदना खोने लगता है, और ऐसे में समाज के लोगों से मदद लेने की जरूरत रहती है। 
सरगुजा में यह पहल अच्छी हुई है कि जेलों में बंद कैदियों के बच्चों का पता लगाकर उनकी मदद की जाए, क्योंकि ऐसे मां-बाप के बच्चे जरूरतमंद तो रहते ही हैं, समाज में उनका शोषण होने का खतरा भी बहुत बड़ा रहता है। इस राज्य में कम से कम अनाज को लेकर ऐसी हालत नहीं है कि कोई बच्चा या कोई बड़ा भूख से मरे। सरगुजा में यह मामला जंगल में भटककर मरने का है, लेकिन ऐसी नौबत भी आने से रोकने के लिए सरकार और समाज दोनों को मिलकर कोशिश करनी चाहिए। राज्य सरकार हर जिले में ऐसा अभियान शुरू करे। 

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