कुदरती तबाही देखते हुए वैकल्पिक बसाहट जरूरी

3 मई 2015
संपादकीय

नेपाल के भूकंप से हुई तबाही लगातार खबरों में है, और अभी वहां झटके आना बंद हुए भी नहीं हैं। इस भूकंप के पहले भी नेपाल बदहाल अर्थव्यवस्था से गुजर रहा था, और अब वहां के बारे में कुछ सोचें, तो आस्तिक बनकर यह मान लेना ही एक रास्ता दिखता है कि अब वहां का भगवान ही मालिक है। हालांकि ईश्वर ने वहां पर अपने अधिकतर मंदिरों को उसी तरह बचा लिया है, जिस तरह सारी तबाही के बीच भी दो बरस पहले उत्तराखंड की बाढ़ में केदारनाथ ने अपने-आपको बचा लिया था। ईश्वर के ये तौर-तरीके देखकर इंसानों के लिए यह और भी जरूरी हो जाता है कि कुदरत की मार से बचने के लिए वे अपने-आपको अधिक संभालकर रखें। 
भारत में हर बरस बाढ़ में करोड़ों लोग नुकसान झेलते हैं, और बेघर, बेदखल हो जाते हैं। कश्मीर में जैसी बाढ़ लोगों को याद नहीं पड़ती थी, वैसी बाढ़ कश्मीर में आई, और वह तबाही हफ्तों तक खबरों में रही। बिहार से लेकर असम तक बहुत से इलाके भारी बाढ़ में घिरते और डूबते हैं। दूसरी तरफ समंदर के किनारे के ओडिशा जैसे इलाके तूफान का शिकार होते हैं। न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में प्राकृतिक विपदाओं की अलग-अलग किस्में नुकसान पहुंचाती हैं, और इनमें से अधिकतर को रोका नहीं जा सकता। लेकिन सवाल यह उठता है कि धरती और कुदरत की असीमित ताकत के सामने इंसान करे तो क्या करे? 
एक बात तो यह बहुत जरूरी है कि कुदरत को एक रहमदिल या समझदार मानकर चलने के बजाय उसकी सीमाओं को समझना चाहिए। धरती और उसके आसपास के मौसम के अपने तौर-तरीके हैं। वे इंसानी जिंदगी के हिसाब से नहीं चलते। इंसानों को ही यह चाहिए कि वे कुदरत के खतरों को तौलते हुए ही उसके बीच अधिक से अधिक हिफाजत से जीने की कोशिश करें। जिन इलाकों में भूकंप का खतरा अधिक है, उन इलाकों में लोगों को बसना ही पड़े, तो उनके मकान ऐसे रहने चाहिए जैसे कि भूकंप वाले जापान ने बनाने सीख लिए हैं। और फिर बाढ़ वाली नदियों के किनारों से दूर रहना भी सीखना चाहिए, समुद्री तूफान से बचने के लिए उससे दूर बसना भी आना चाहिए। दुनिया के सबसे विकसित देशों में से एक अमरीका में भी हर बरस दर्जनों बार बवंडर आते हैं, और वे भारी तबाही छोड़ जाते हैं। मौसम की कोई भविष्यवाणी बर्बादी को पूरी तरह नहीं रोक पाती। किसी भी देश में बसाहट को लेकर सरकार की एक ऐसी राष्ट्रीय नीति की जरूरत है जिसमें प्रदेशों की सीमाओं से परे यह देखा जाए कि हिफाजत के साथ लोगों को कहां बसाया जा सकता है, कैसे बसाया जा सकता है। आज भारत सरकार के पास यह एक बड़ी संभावना थी कि देश की प्राकृतिक विपदाओं को ध्यान में रखते हुए सुरक्षित वैकल्पिक बसाहट तय की जाती, लेकिन स्मार्ट सिटी की संभावित लिस्ट अगर देखें, तो उसमें सिर्फ शहरी पैमानों को ध्यान में रखा गया है, आधुनिक विकास और कारोबार को ध्यान में रखा गया है, देश के प्राकृतिक विपदाओं वाले इलाकों के विकल्प की कोई सोच देश की इस सबसे बड़ी शहरी योजना में नहीं है, और इससे परे भी राष्ट्रीय स्तर पर भूकंप-बाढ़ जैसे खतरों के हिसाब से कोई वैकल्पिक बसाहट योजना नहीं है। 
हर बर्बादी के बाद सरकार और समाज में लोगों को जिंदा रहने के लिए कुछ मदद कर पाते हैं, लेकिन प्रकृति के खतरों को देखते हुए बसाहटों की जगह, उनके तौर-तरीके बदलने होंगे, और बाढ़ जैसे बुनियादी तौर पर इंसानों के खड़े किए हुए खतरों को घटाने के लिए नदियों की क्षमता बढ़ाने, मिट्टी को रोकने जैसे काम करने होंगे, वरना तबाही के बाद राहत में ही पूरी जिंदगी गुजर जाएगी।

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