मोदी का एक बरस, और विपक्षी कांग्रेस का एक बरस

संपादकीय
20 मई 2015

मोदी सरकार के एक बरस पूरे होने के पहले से कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने देश भर में उस पर हमले करना शुरू कर दिया है। यह एक सेहतमंद लोकतंत्र की पहचान होती है कि विपक्ष सरकार की खामियों पर नजर रखे और उन्हें जनता के सामने गिनाकर सरकार को कटघरे में बनाए रखने की कोशिश करे। दूसरी तरफ सरकार की भी यह जिम्मेदारी होती है कि वह अपनी कामयाबी जनता को गिनाए। फिलहाल बात कांग्रेस पार्टी की है जिसे दस बरस की सत्ता के बाद भाजपा ने बड़ी शर्मिंदगी वाली बेदखली थमाई और जिसे विपक्ष का दर्जा भी पाने नहीं दिया। 
कांग्रेस एक ऐसे आक्रामक तेवर में है, जिसमें उसके पांवों तले जमीन नहीं है। कोई भी सरकार कुछ न कुछ मुद्दों पर नाकाम रहती है, और मोदी सरकार की खामियां निकालने में भी कोई बड़ी खूबी की जरूरत नहीं है, लेकिन खुद कांग्रेस के हाल को देखें तो पिछले आम चुनाव में उसकी जो बेइज्जती हुई, और जिस तरह से वह राजपथ से उठाकर फुटपाथ के किनारे कर दी गई, उस पर तो इस एक बरस में कोई चर्चा तक नहीं हुई। इस पार्टी में हो सकता है कि कोई ऐसी कमेटी बनी हो, जिसमें सत्तारूढ़ परिवार के वफादार लोगों ने मुखिया पर से शिकस्त की तोहमत हटाकर पार्टी के तमाम लोगों के बीच बांट दी हो, लेकिन उससे परे इस पार्टी ने क्या किया? एक-एक कर राज्य भी इसके हाथ से निकले चले जा रहे हैं, और केन्द्र तो मानो पूरी तरह खिसक ही चुका है, संसद में यह पार्टी प्रमुख विपक्षी दल भी नहीं रह गई, और देश में अब भी अपने वफादार रह चुके वोटरों के सामने कांग्रेस ने यह साफ नहीं किया है कि ऐसी चुनावी शिकस्त का वह क्या मतलब निकाल रही है। उसने यह भी उजागर नहीं किया है कि इस हार के लिए इसके पहले के दस बरस की कौन सी बातें जिम्मेदार थीं, और कौन से कुकर्म ऐसे थे जिनसे कि मतदाता नाराज थे। इस पार्टी से यह तो उम्मीद भी नहीं की जाती कि वह अपने मुखिया परिवार पर कोई आंच आने दे। 
जब चारों तरफ ऐसे सवाल खड़े हों, और बिना किसी जवाब के यह पार्टी सीधे आगे बढ़ जाना चाहती हो, तो वह इसका अधिकार तो है, लेकिन देश के लोगों का भरोसा ऐसे में लौट सकेगा, इसमें हमको भरपूर शक है। लोकतंत्र में कुनबे से बाहर भी एक जवाबदेही होती है। और राहुल गांधी खुद हफ्तों तक देश को बिना बताए जिस तरह से गायब रहकर लौट आए, उस रूख में भी जनता के प्रति एक हिकारत लगे या न लगे, एक बेफिक्री तो लगती है। किसी पार्टी का मटियामेट हो जाने के बाद उठकर खड़ा होना महज अपने हाथ में नहीं होता, वह जनता के हाथ में होता है। और जनता से यह उम्मीद करना कि वह नेहरू-गांधी परिवार के वारिसों को अपनी किस्मत मानकर चले, अपनी नियति मानकर चले, यह ठीक नहीं है। ऐसा मानकर चलना शायद ही कारगर हों। 
कांग्रेस पार्टी को अपने पुराने ढर्रे से निकलकर जनता के बीच भरोसा कायम करने के तौर-तरीके इस्तेमाल करने पड़ेंगे। हम कुछ अरसा पहले कांग्रेस के सिलसिले में यह भी लिख चुके हैं कि कांग्रेस को यह भी सोचना चाहिए कि वह पार्टी को बचाना चाहती है, या उसके पारिवारिक वारिस को। क्या एक पार्टी की जिम्मेदारी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी से अधिक नहीं होती है? आज भाजपा और एनडीए के तेवरों और तौर-तरीकों के खिलाफ किसी भरोसेमंद के उठकर खड़े होने पर विपक्ष की बड़ी संभावनाएं हैं। लेकिन यहां पर सबसे अहमियत वाला शब्द, भरोसेमंद, है। कांग्रेस आज घर बैठी पार्टी के बजाय एक सक्रिय पार्टी दिख रही है। लेकिन वह शायद इस उम्मीद में है कि जनता अगले चुनाव के आने तक यूपीए की दस साल की सरकार के कामकाज, और कांग्रेस पार्टी के गलत कामों को भूल जाएगी। हो सकता है कि यह असल जिंदगी में सच भी हो, लेकिन हमारा मानना है कि कांग्रेस को ऐसी उम्मीद से परे भी जनता के प्रति जवाबदेही का जिम्मा निभाना चाहिए। 

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