नकवी के पाकिस्तान भेजने के बयान पर मोदी के ही एक और मंत्री का समझदारी का बयान

संपादकीय
27 मई 2015

केन्द्र सरकार के एक अतिबड़बोले केन्द्रीय मंत्री, जो कि लंबे अरसे से भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता भी रहे हैं, मुख्तार अब्बास नकवी ने पिछले दिनों एक बड़ा हिंसक बयान दिया कि जिन लोगों को गोमांस खाना है वे पाकिस्तान चले जाएं। इसके पहले भी मोदी सरकार और भाजपा के कुछ लोग कभी मुसलमानों को, तो कभी मोदी के आलोचकों को पाकिस्तान चले जाने की सलाह देते आए हैं। मुख्तार अब्बास नकवी के सामने भाजपा के भीतर के कुछ मुस्लिम नेताओं पर लागू यह बेबसी लागू है कि उन्हें भाजपा के प्रति वफादारी दिखाने के लिए पाकिस्तान को तो गालियां देनी ही पड़ती हैं, कई बार वे भाजपा के हिन्दू नेताओं के मुकाबले भी अधिक आक्रामक होकर देश के मुसलमानों को गद्दार कहते हैं, पाकिस्तान जाने को कहते हैं। आज इस पर लिखने की जरूरत इसलिए लगी कि इसी मोदी सरकार में केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री किरेन रिजिजू ने नकवी के बयान के जवाब में आज खुलकर सार्वजनिक रूप से कहा है कि वे गोमांस खाते हैं और उनको कौन रोक सकता है। उन्होंने काफी लंबी बात नकवी के बयान के जवाब में कही है, और हम तो कई बार इसी जगह भाजपा सरकारों और मोदी सरकार के लिए यह सलाह लिख चुके थे कि खान-पान को लेकर देश में इस तरह की सनातनी आक्रामकता से देश के अल्पसंख्यक तो मूलधारा से कटेंगे ही, देश के हिन्दू समाज के भी करोड़ों ऐसे लोग हैं जिनको गोमांस खाने से कोई परहेज नहीं है, और ऐसे लोगों में उस दलित और आदिवासी समाज के करोड़ों लोग शामिल हैं जो कि सनातनी हिन्दुत्व हिंसा के चलते हुए ही हिन्दू समाज को छोड़-छोड़कर कहीं बौद्ध हुए, कहीं मुस्लिम हुए, और कहीं ईसाई हुए।
हमारी बात तो एक असहमत विचारधारा की बात कहकर खारिज की जा सकती थी, लेकिन आज मोदी सरकार के भीतर के ही एक अधिक गंभीर और एक अधिक वजनदार मंत्री किरेन रिजिजू ने नकवी को जिस तरह से खुलकर जवाब दिया है, वह जवाब देश के दर्जन भर से अधिक राज्यों की आबादी के एक बड़े हिस्से की तरफ से भी है, और हिन्दू समाज के करोड़ों लोगों की तरफ से भी है। लोगों के खान-पान को लेकर उन पर इस तरह से हमले, और इस तरह की बंदिशें लोकतांत्रिक नहीं हैं। गाय काटने या गोवंश के बाकी पशुओं को काटने को जिस तरह से गो-वध करार देकर एक भावनात्मक उन्माद खड़ा किया जाता है, उससे तो रहा-सहा हिन्दू समाज और बिखर जाएगा। एक तरफ तो मोदी सरकार और भाजपा के सबसे करीब का वैचारिक संगठन, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ लगातार दलितों और आदिवासियों को दूसरे धर्मों से हिन्दू धर्म में लाने को वापिसी कहते हुए उसमें लगा हुआ है, संघ परिवार के विश्व हिन्दू परिषद जैसे दूसरे संगठन सार्वजनिक रूप से बयान दे रहे हैं कि छुआछूत को खत्म करके हिन्दू समाज से निकले हुए लोगों को वापिस लाकर जोड़ा जाना चाहिए, या जो लोग हिन्दू समाज के भीतर छुआछूत झेल रहे हैं, उन्हें सुरक्षा देनी चाहिए। लेकिन ऐसे बयान एक तरफ, और दूसरी तरफ गोवंश के पशुओं को काटने के खिलाफ, उनको बेचने के खिलाफ, उनका मांस खाने के खिलाफ जिस तरह के उन्मादी कानून बन रहे हैं, वे भयानक हैं। 
महाराष्ट्र में आज गाय-बैल के बेचने पर रोक लगा दी गई है, और वहां का किसान जब भुखमरी में खुद खुदकुशी कर रहा है, तो गाय-बैल को न वह बेच पा रहा है, न उन्हें मारकर खा पा रहा है। वह महज अपनी जान दे रहा है। देश की ग्रामीण पशु-अर्थव्यवस्था धार्मिक उन्माद का शिकार हो रही है, और केन्द्र सरकार से लेकर उन्मादी राज्य सरकारों तक, किसी के पास इस बात का इलाज नहीं है कि करोड़ों लोग इन प्रतिबंधों से जिस तरह बेरोजगार हुए हैं, क्या वे हिन्दुस्तान के रहने वाले हैं, या नहीं? और क्या उन्हें नकवी की जुबान में पाकिस्तान भेज देना चाहिए? दूसरी बात यह कि इस धर्म निरपेक्ष देश में किसी एक धर्म के एक तबके की धार्मिक मान्यताओं के आधार पर बाकी पूरे देश के खान-पान की स्वतंत्रता के अधिकार को किस तरह कुचला जा सकता है? हमको पूरा भरोसा है कि ऐसे टुकड़ा-टुकड़ा प्रादेशिक कानून सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर निश्चित ही खारिज हो जाएंगे। लेकिन तब तक भाजपा को यह समझ लेना चाहिए कि ऐसे कानून हिन्दू समाज के अब तक बचे हुए हिस्से को भी चूर-चूर करके रख देंगे। और देश के अल्पसंख्यक तबके मोदी सरकार और भाजपा से बुरी तरह कट जाएंगे। फिलहाल तो मोदी मंत्रिमंडल के ही एक सदस्य ने नकवी को जो जवाब दिया है, वह सवाल सरकार को बेजुबान कर गया है।

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