संपन्न देशों और लोगों की ओर बढ़ते विपन्न मजदूर

04 मई 2015
संपादकीय
दुनिया भर के देशों से योरप पहुंचने के लिए समंदर का रास्ता चुनकर, या हवाई जहाज के चक्कों के साथ चिपककर पहुंचने वाले लोगों की कहानियां रोज खबरों में आती हैं। इन देशों की संपन्नता दुनिया भर के गरीबों और कामगारों को खींचती है, इसके साथ-साथ इन देशों में दूसरे देशों के लोगों को शरणार्थी या प्रवासी का दर्जा देकर कुछ समय तक रखने और जीने-खाने देने का कानून भी है। जिस तरह पूरे हिन्दुस्तान के लोगों को मुम्बई की फिल्म इंडस्ट्री खींचती है, उसी तरह अफ्रीका से लेकर टर्की तक के लोगों को योरप खींचता है। 
अभी-अभी की ताजा खबर है कि इटली ने हजारों लोगों को डूबने से बचाया जो कि मोटरबोट पर सवार होकर योरप में किसी किनारे गैरकानूनी तरीके से पहुंचने के फेर में थे। हर महीने ऐसी कई बोट डूब जाती हैं, और सैकड़ों लोग मारे भी जाते हैं। कुछ महीनों पहले की तस्वीरों वाली भयानक खबर थी कि किस तरह सामान लाने ले जाने वाले लोहे के कंटेनरों में पैक होकर सैकड़ों लोग ब्रिटेन पहुंचे थे, और किस तरह उसमें से बहुत से लोग मरणासन्न हालत में थे। कुल मिलाकर बात यह है कि दुनिया में अलग-अलग हिस्सों में बंटी हुई संपन्नता और विपन्नता, संचित और वंचित, इन दोनों का फासला एक तबके के लिए आराम के लिए जरूरी है, और दूसरे तबके के लिए काम के लिए जरूरी है। आज गरीबों के बिना दुनिया के अमीर देशों का काम तो चलता ही नहीं, हिन्दुस्तान जैसे देश में उच्च-मध्यम वर्ग के लोग भी कामगारों के बिना घर नहीं चला पाते। गरीब नौकर-नौकरानी के बिना अमीर लोगों की जिंदगी दुश्वार हो जाती है। 
पूरे दुनिया के स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ या देशों के किसी दूसरे अंतरराष्ट्रीय संगठन को एक पहल ऐसी करनी चाहिए कि संपन्नता के इर्द-गिर्द विपन्न लोगों के कामकाज के लिए एक कानूनी तरीका निकल सके, और गैरकानूनी तरीके से मौत का खतरा उठाते हुए लोग न पहुंचें। दो दिन पहले की ही रायपुर रेल्वे स्टेशन की एक तस्वीर याद पड़ती है जिसमें महाराष्ट्र से आए हुए सैकड़ों तेन्दूपत्ता-मजदूर बस्तर जाने के लिए ट्रेन से उतरे हैं। हर बरस कई बार इसी रेल्वे स्टेशन पर ओडिशा से आन्ध्र मजदूरी के लिए जाते हुए सैकड़ों मजदूरों की भीड़ कई-कई दिनों तक आते-जाते दिखते रहती है। छत्तीसगढ़ के मजदूर काम करने के लिए हिमाचल से लेकर लद्दाख तक जाते हैं, और यहां के गांवों में तो लोग अपनी झोपड़ी के किवाड़ तक मिट्टी थोपकर बंद करके जाते हैं। 
अमरीका में भी मैक्सिको से लेकर क्यूबा तक के लोग गैरकानूनी तरीके से घुसने की कोशिश करते हैं, और वहां पहुंचने के बाद कानूनी दर्जा न मिलने की वजह से वे कारोबार और कारखानों में नजरों से दूर पिछवाड़े के काम करते हैं जिसमें न उनको पूरी मजदूरी मिलती और न ही मजदूरों वाला कोई हक मिलता। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन को ऐसे में एक अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए और सरहदों के आरपार आते-जाते लोगों के हक के लिए रास्ते निकालने चाहिए। जिस तरह आज मुम्बई में उत्तर भारत से आए हुए लोगों को कुछ उग्र और आक्रामक संगठनों की नाराजगी झेलनी पड़ती है, उसी तरह का हाल कुछ दूसरे संपन्न देशों में विपन्न देशों से आए हुए अकुशल मजदूरों को झेलना पड़ता है। इसलिए हम लगे हाथों अपनी एक पुरानी सलाह यहां फिर दुहरा रहे हैं कि कानूनी रूप से भी किसी दूसरे देश में जाकर काम करने के लिए किसी भी दूसरे देश के मजदूर को अपने हुनर को बेहतर बनाना होगा, अपने व्यवहार को सुधारना होगा, दूसरे देशों की संस्कृति को समझना होगा, और उनकी जुबान सीखनी होगी। जो देश संपन्न हैं, वे अधिक और बेहतर उत्कृष्टता भी चाहते हैं। अधकचरे कामकाज से वे संतुष्ट नहीं होते। इसलिए भारत जैसे देश में जो लोग भी दूसरे देश किसी भी काम के लिए जाना चाहते हैं, उन्हें अपने आपको बेहतर बनाना होगा, तभी उनके लिए बाहर काम निकल सकेगा, और कानूनी रूप से वे बाहर जा सकेंगे। 

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