अधिकतर आबादी के लिए पढ़ाई यानी कुंजिका-गाईड

संपादकीय
31 मई 2015
स्कूली परीक्षाओं के नतीजों, और कॉलेज के इम्तिहानों के इस दौर में आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने मन की बात में इम्तिहान में नाकामयाब होने वाले बच्चोंं का हौसला बढ़ाया। दूसरी तरफ अमरीका से आई एक खबर बताती है कि किस तरह वहां पिछले साल आठ हजार से अधिक चीनी छात्र-छात्राओं को कॉलेज से निकाल दिया गया क्योंकि वे नकल कर रहे थे, या लापरवाह थे, पढऩे-लिखने में कमजोर थे, या इसी तरह की कुछ और बातें थीं। भारत में अगर अमरीका जैसे पैमाने को लागू किया जाए, तो आधे लोगों को स्कूल-कॉलेज से निकाल देना पड़ेगा। लेकिन दूसरी तरफ अगर स्कूल-कॉलेज में पढ़ाने वालों का इम्तिहान लिया जाए, तो शायद उनमें से भी आधे लोगों को निकाल देना पड़ेगा। लोगों को याद होगा कि अभी दो हफ्ते पहले ही जम्मू-कश्मीर में एक स्कूल-शिक्षक को गाय पर निबंध लिखने को कहा गया, और वह कुछ भी नहीं लिख पाया। इंटरनेट पर ऐसे कई वीडियो तैरते हैं जिनमें उत्तर भारत की किसी स्कूल की शिक्षिका एबीसीडी के 26 अक्षर भी नहीं लिख पातीं, या मामूली सा जोड़-घटाना भी नहीं लिख पाती। देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति का नाम भी शायद आधे शिक्षकों को पता नहीं होगा। 
लेकिन केन्द्र और राज्य सरकारें इस बात से बेफिक्र हैं कि शिक्षा का स्तर कहां जा रहा है। सरकारी ढांचा कितना इस्तेमाल हो रहा है, किताबों का क्या हाल है, शिक्षकों के अपने ज्ञान का क्या हाल है? पढ़ाने की डिग्री देने वाले जो कोर्स हैं, वैसे बीएड या एमएड जैसे कोर्स महंगी रिश्वत लेकर हाजिरी देने और इम्तिहान में पास करवाने का ठेका लेते हैं। सबकी जानकारी में, राज्यों की राजधानियों से लेकर देश की राजधानी तक हर किसी को यह मालूम है कि पढ़ाने की पढ़ाई के नाम पर कैसी जालसाजी चलती है, और फर्जी तरीके से डिग्री पाकर लोग सरकारी नौकरियां पा लेते हैं, और शहरों से दूर अगर पोस्टिंग हुई, तो लोग गांव के किसी बेरोजगार को अपना काम ठेके पर दे देते हैं, और खुद शहर में रहकर तनख्वाह लेते रहते हैं। 
भारत में प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा के बाद के शोध कार्य कर का स्तर इतना नीचा और इतना कमजोर है, कि यहां की अधिकतर आबादी पढऩे के बाद दुनिया के विकसित और सावधान देशों के मुकाबले रोजगार के बाजार में कहीं नहीं टिक सकती। जिन लोगों को यह लगता है कि भारतवंशी लोग पूरी दुनिया पर छाए हुए हैं, उनको भारत की आबादी के अनुपात में दुनिया के देशों में गए हुए भारतीयों को देखना चाहिए कि वे कितने गिने-चुने हैं। और फिर बहुत से देशों में तो हिन्दुस्तानी लोग महज मजदूर की तरह जाते हैं, और बंधुआ की तरह रहते हैं। अमरीका और योरप के देशों में जाकर कामयाब काम करने वाले जो हिन्दुस्तानी हैं, उनसे अधिक संख्या में कामयाब लोग बड़े छोटे-छोटे देशों से निकलकर दुनिया भर में जाते हैं। 
स्कूलों से लेकर कॉलेज की पढ़ाई तक आज जो हाल है, वह परीक्षा-केन्द्रित है। बच्चों को एक के बाद दूसरे इम्तिहान के लिए तैयार किया जाता है, एक के बाद दूसरे मुकाबले के लिए तैयार किया जाता है, लेकिन ज्ञान को लेकर किसी को फिक्र नहीं है।  छात्र-छात्राओं की गरीब आबादी पाठ्य पुस्तकों के बजाय कुंजिकाओं और गाईड के सहारे परीक्षा पास करती हैं, और पैसे वाली आबादी कोचिंग सेंटरों में जाकर खर्च करके। अब पिछले एक बरस से केन्द्र सरकार के पढ़ाई वाले मानव संसाधन मंत्रालय में एक के बाद एक कई ऐसे फैसले हो रहे हैं, जो शिक्षा को और बुरा करने जा रहे हैं। खुद सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर यह बात जोर पकड़ रही है कि मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी की समझ बड़ी सीमित है। 
स्कूल-कॉलेज, खासकर कॉलेज की किताबों के बाजार को देखें, तो वहां पर गरीबों के बीच प्रचलित पाठ्यक्रमों की किताबें बिकना बंद हो चुकी हैं, और छात्र-छात्राओं के बीच सिर्फ कुंजिकाओं और गाईड का चलन रह गया है। सिर्फ उन्हीं के सहारे इम्तिहान की तैयारी उतनी ही आम बात है जितनी आम बात हिन्दुस्तानियों का पान-गुटखा खाना है। अब कॉलेजों से नीचे स्कूलों में भी यही हालत बिखरती जा रही है। लेकिन इस व्यापक मुद्दे पर इस थोड़ी सी जगह में चर्चा करते हुए हम यह भी याद दिलाना चाहते हैं कि देश भर में शिक्षा का जो हिस्सा, स्कूल-कॉलेज के कामकाज का जो हिस्सा राज्य सरकारों के जिम्मे आता है, उनमें भी बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के चलते हुए पढ़ाई प्राथमिकता की सूची में आखिर में आती है। स्कूल-कॉलेज के जिन पहलुओं पर मोटा खर्च हो सकता है, और मोटी कमाई हो सकती है, वे पहलू सबसे अधिक महत्व पाते हैं। कतरा-कतरा इन कई बातों को मिलाकर एक बड़ी निराशाजनक तस्वीर बनती है, और यह तस्वीर किसी भाषण से, मन की किसी बात से सुधरने वाली नहीं है। आज भारत के अधिकतर लोगों के लिए बेहतर पढ़ाई-लिखाई के लिए कोई बड़ा उत्साह नहीं रह गया है। आबादी का एक छोटा हिस्सा ही पढ़ाई के बाद उसका कोई फायदा पा रहा है, और यह एक बड़ी फिक्र की बात है। 

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