दिल्ली में टकराव निहायत गैरजरूरी, पूर्ण राज्य बने

19 मई 2015
संपादकीय

दिल्ली का हाल बेहाल। प्रधानमंत्री दुनिया भर में घूम-घूमकर कहीं मंगोलियाई सारंगी बजा रहे हैं, तो कहीं किसी देश का नगाड़ा पीट रहे हैं। और इधर घर में दिल्ली की राज्य सरकार को वहां के उपराज्यपाल पीट रहे हैं, और केंद्र सरकार मजा ले रही है। दिल्ली की संवैधानिक व्यवस्था को न जानने वालों को यह मुश्किल से समझ आएगा कि वहां का मुख्यमंत्री पुलिस को काबू नहीं करता, सरकार के बहुत से दूसरे कामकाज को भी काबू नहीं करता। दिल्ली के कई मामलों में उपराज्यपाल के मार्फत केंद्र सरकार का काबू रहता है, और पिछले चुनाव में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की पार्टी ने इस शहर-प्रदेश में झाड़ू लगाकर भाजपा को बाहर निकाल फेंका था, उसके चलते दोनों पार्टियों के बीच रिश्ते सांप-नेवले से बेहतर न होने थे, और न हैं। नतीजा यह है कि दिल्ली राज्य और केंद्र सरकार के बीच की संवैधानिक व्यवस्था का नाम लेकर दोनों सरकारों के बीच किसी झगड़ालू सास-बहू जैसे टकराव चल रहे हैं, और आज शाम मामला राष्ट्रपति तक जा रहा है, कल तक संविधान-विशेषज्ञ वकील सुप्रीम कोर्ट इसे ले जा सकते हैं।
दरअसल दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग बहुत दशकों से चली आ रही है, और यहां तब भी टकराव जारी रहता है जब केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार रहती है। यह नौबत देश के लिए और इस प्रदेश के लिए बिल्कुल ठीक नहीं है, जहां पर की राज्य के मुख्यमंत्री एक बहुत ही टकरावपरस्त अरविंद केजरीवाल हैं, और जहां पर केंद्र चला रही भाजपा अपनी जिंदगी की शायद सबसे शर्मनाक शिकस्त झेलकर इस राज्य की विधानसभा में हाशिए के भी किनारे पर पहुंची हुई है। लोकतंत्र में यह नौबत बिल्कुल ठीक नहीं है, और बिना देर किए दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने का काम करना चाहिए। इससे हो सकता है कि अगले कुछ बरस अरविंद केजरीवाल और उनके आम आदमी पार्टी के हाथ मजबूत हों, लेकिन केंद्र सरकार को यह याद रखना चाहिए कि सन 2000 में जब तीन नए राज्य बने थे, तो छत्तीसगढ़ में गैरभाजपाई सरकार बनी थी। उस वक्त देखा जाए तो केंद्र में एनडीए की सरकार थी, और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक किस्म से छत्तीसगढ़ में कांगे्रस की सरकार के साथ यह राज्य बनाया था।
दिल्ली की स्थिति को जो लोग एक अलग किस्म की जटिल राष्ट्रीय राजधानी की स्थिति बताते हैं, और पूर्ण राज्य के दर्जे के खिलाफ हैं, उनका भरोसा भारत के संघीय ढांचे में कुछ कम है। दिल्ली सरकार वहां की पुलिस को काबू नहीं कर सकती यह सोचना केंद्र सरकार के एक घमंड के अलावा और कुछ नहीं है। किसी भी राज्य की सरकार हर किस्म का काम कर सकती है, और दिल्ली शहर की सरकार से दस-दस गुना बड़े प्रदेश इस देश की निर्वाचित सरकारें चला रही हैं। एक राज्य के साथ ऐसा संवैधानिक टकराव ठीक नहीं है, और जितने भारी बहुमत से केजरीवाल मुख्यमंत्री बने हैं, और भाजपा जिस कदर मटियामेट हुई है, उसे देखते हुए उस राज्य में मुख्यमंत्री को नीचा दिखाने की कोशिशें मोदी सरकार को ही नीचा दिखा रही हैं, और उनकी सरकार और पार्टी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

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