भाजपा के एक कामयाब राज्य में भाजपा के एक कामयाब प्रधानमंत्री का आगमन

8 मई 2015
संपादकीय

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के छत्तीसगढ़ आने पर उनके कार्यक्रम तो पहले से तय और औपचारिक सरकारी कार्यक्रम हैं, लेकिन इस मौके पर यह नया राज्य प्रधानमंत्री से बहुत कुछ उम्मीद भी करता है। जिस तरह बिहार या पश्चिम बंगाल केंद्र से विशेष आर्थिक पैकेज मांग रहे हैं, उस तरह की नौबत तो छत्तीसगढ़ की नहीं है, लेकिन यहां की मौजूदा संपन्नता के चलते भी इस नए राज्य के ढांचागत विकास के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। मध्यप्रदेश का हिस्सा रहते हुए छत्तीसगढ़ मेले में भटकते हुए मिले अनाथ बच्चे की तरह था, जिसके हक के लिए छत्तीसगढ़ से भोपाल जाकर मुख्यमंत्री बने लोगों ने भी कुछ नहीं किया था। यह तो कुदरत की देन है कि इस प्रदेश की जमीन के नीचे कोयला है, लोहा है, सीमेंट के लिए पत्थर है, इसलिए यहां अलग राज्य बनने के बाद भी न सिर्फ काम चलते रहा, बल्कि नए बने हुए तीनों प्रदेशों में सबसे अधिक तरक्की इसी एक प्रदेश ने की। 
अब राज्य के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दोनों के एक ही पार्टी के होने की वजह से जहां काम में आसानी हो सकती है, वहीं पर यह एक बड़ी सार्वजनिक-राजनीतिक चुनौती भी रहेगी कि किसी भी कमी या नाकामयाबी के लिए राज्य और केंद्र एक-दूसरे को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकेंगे। ऐसे में इन दोनों ही पक्षों को पूरी मेहनत करके, और हर संभावना को टटोलकर इस राज्य को उसका हक भी दिलाना होगा, और इसके विकास की संभावनाओं को टटोलना भी होगा। अभी तक यह राज्य स्कूल-कॉलेज, एक एम्स, एक एयरपोर्ट, एक कारखाना, इससे ही खुश होते आया है। लेकिन यह छत्तीसगढ़ सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती है कि केंद्र सरकार के अलग-अलग विभागों के तहत जिन योजनाओं और जिन नई सोच के लिए बजट की संभावना निकल सकती है, उनके लिए कल्पनाशीलता के साथ काम करे। परंपरागत काम एक सीमा तक काम आते हैं, उनके बाद एक कल्पनाशीलता ही आगे की ऊंचाई तक ले जा सकती है।
डॉ. रमन सिंह की अगुवाई में छत्तीसगढ़ में भाजपा ने तीन विधानसभा चुनाव जीते, तीन लोकसभा चुनावों में लगभग सारी सीटें जीतीं, और पंचायत-म्युनिसिपल के चुनावों में तीन बार बड़ी कामयाबी पाई। ऐसे में आगे के चुनावों में इससे और ऊपर जाना लगभग नामुमकिन किस्म का है। गरीबों के जनकल्याण की, और उन्हें सीधा फायदा देने की जितनी योजनाएं हो सकती हैं, वे लगभग लागू की जा चुकी हैं। ऐसे में राज्य के लिए कुछ ऐसे बड़े काम करने की जरूरत है जिसके लिए केंद्र सरकार से बड़ी मंजूरी की जरूरत हो। छत्तीसगढ़ के सामने आज यह बड़ी चुनौती है कि अपने अलग-अलग इलाकों के लिए ऐसी अलग-अलग योजनाएं सोचे, और फिर उनको मंजूरी दिलाने के लिए प्रधानमंत्री से सहयोग ले।
आज नरेन्द्र मोदी बिना किसी चुनावी माहौल के, जनता के बीच आने की किसी मजबूरी के बिना, प्रधानमंत्री के एक सामान्य प्रवास के तहत आ रहे हैं, और ऐसे में उनके सामने किसी लुभावनी घोषणा करने की मजबूरी नहीं है। लेकिन उन्हें यह ध्यान देना होगा कि दशकों की जिस आर्थिक और सामाजिक विषमताओं के चलते हुए, शोषण के चलते हुए बस्तर में नक्सल हिंसा ने पैर जमाए, उन विषमताओं को केंद्र और राज्य मिलकर किस तरह दूर कर सकते हैं। ऐसा तजुर्बा अगर कामयाब रहता है तो वह देश के आधा दर्जन दूसरे नक्सल प्रभावित राज्यों में भी काम आएगा। फिलहाल नरेन्द्र मोदी एक बड़े कामयाब विजेता की तरह छत्तीसगढ़ पहुंच रहे हैं, और उनकी पार्टी भी भारी उत्साह में है। ये दोनों ही जिस ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं, वहां बने रहने के लिए बहुत सा जनकल्याण करना पड़ेगा।

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