सोशल मीडिया पर आती बातें जनभावना की पूरी तस्वीर नहीं

संपादकीय
21 मई 2015

लोकतंत्र में सोशल मीडिया ने लोगों को अपने दिल-दिमाग की बातें कहने का ऐसा मौका दिया है कि प्रिंट मीडिया, और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दोनों ही सोशल मीडिया पर नजर रखते हैं, और वहां से विचारों को चुनकर उन पर खबरें बनाते हैं। एक वक्त था जब अखबारों में पाठकों के पत्र, या संपादक के नाम पत्र जैसे कॉलम हुआ करते थे, और फिर धीरे-धीरे उसका चलन कई भाषाओं या देश-प्रदेश में कम होने लगा, क्योंकि डाकिये के मार्फत आने वाली चि_ियां पुरानी होने लगती थीं, और टीवी के आने से लोगों को खबरें जल्द भी मिलने लगीं, और वे जल्द ही बासी भी होने लगीं। लेकिन अब अपने छोटे से मोबाइल फोन से भी छोटे और बड़े सभी किस्म के लोग गिने-चुने शब्दों में अपनी बात पोस्ट करके पुराने और परंपरागत मीडिया में भी खासी हलचल मचा देते हैं। आज प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में किसी का काम भी बिना सोशल मीडिया पर नजर रखे नहीं चलता। लेकिन इस नौबत के कुछ किस्म के खतरे भी हैं। 
एक तो यह कि सोशल मीडिया पर आने वाली प्रतिक्रियाओं को लोकतंत्र में प्रतिनिधि-प्रतिक्रिया मानने की गलती कुछ लोग कर बैठते हैं। दरअसल जिन लोगों को बड़ी भारी नकारात्मक या आलोचनात्मक बात कहनी होती है, वे सोशल मीडिया पर उतने ही अधिक सक्रिय होते हैं। दूसरी तरफ ऐसे समर्थक और भक्तजन भी खासे सक्रिय होते हैं, जो कि अपने नेता, या अपनी पार्टी, संगठन, की बातों को आगे बढ़ाना चाहते हैं, फैलाना चाहते हैं। लेकिन अब तक ऐसा कोई संचार-औजार नहीं बन पाया है जिससे कि यह अंदाज लग सके कि नफरत करने वालों, और मोहब्बत करने वालों की गिनतियों के बीच मौन लोग कितने हैं, और वे किस तरफ हैं। फिर एक बात यह भी है कि भाड़े के ऐसे बहुत से टट्टू दोनों किस्म के तबकों को हासिल हैं, जो कि मामूली सी संचार-साजिश से एक बड़ी दूसरी ही तस्वीर सोशल मीडिया पर पेश कर सकते हैं, कि नापसंद या पसंद करने वाले लोग कितने अधिक हैं।
अब जब सोशल मीडिया की प्रतिक्रियाओं को लोग जनता की प्रतिक्रिया मानकर अपनी राय ढालने लगते हैं, तो फिर भाड़े के टट्टुओं की मेहनत से एक बड़ी झूठी तस्वीर बनती है। और अखबारों के पुराने जमाने में लोगों की प्रतिक्रिया जिस तरह से बहुत कम मिल पाती थीं, और उसे आंकना भी मुश्किल रहता था, उससे बिल्कुल अलग आज सोशल मीडिया पर लोग बहुत खुलकर कहते हैं, और खूब कहते हैं। लेकिन उनकी प्रतिक्रिया को जनता के इंटरनेट तक पहुंच वाले, सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों की प्रतिक्रिया ही मानना ठीक होगा। अभी भी भारत जैसे देश में आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया पर किसी प्रतिक्रिया को पोस्ट करने से दूर ही है। ऐसे में सोशल मीडिया पर बहुमत का रूख उतना ही सही होता है जितना कि किसी सौंदर्य स्पर्धा में जीतने वाली युवती को देश की सबसे खूबसूरत युवती मान लेना। वह दरअसल सभी प्रतिस्पर्धियों में से सबसे अधिक सुंदर होती है। गांव-देहात तक बिखरी सुंदरियों की गिनती और उनसे तुलना ऐसे मुकाबलों में नहीं होती। इसलिए सोशल मीडिया पर अभी जो प्रतिक्रिया देखने मिलती है, उसे जमीनी हकीकत के पैमाने पर उस अनुपात में ही देखना चाहिए, जिस अनुपात में आबादी का कोई हिस्सा यहां पर सक्रिय है। 
आज भारत में सोशल मीडिया के रूख को लेकर लोग अपनी पसंद के विचारों को छांट लेते हैं, और उनको आगे बढ़ाकर जनता के विचार साबित करने में लग जाते हैं। जनता के विचार का एक छोटा हिस्सा ही इंटरनेट पर है, और उन विचारों में से भी अपनी पसंद के विचारों को छांटकर लोग उसे जब जनभावना बताते हैं, तो वह एक गलत तस्वीर रहती है। लेकिन क्या लोग इतनी बारीकी से विश्लेषण पसंद करते हैं? 

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