कुर्सी से हटने के बाद ही खुलासे का हौसला क्यों?

संपादकीय
26 मई 2015

देश के एक बड़े अफसर रहे, और बाद में दूरसंचार नियामक आयोग के अध्यक्ष बने प्रदीप बैजल की एक किताब सामने आई है जिसमें उन्होंने यह सनसनीखेज आरोप लगाया है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें 2जी घोटाले में साथ न देने पर उन्हें (बैजल को) नुकसान की बात कही थी। 2जी घोटाले पर केन्द्रित उनकी यह नई किताब मनमोहन सिंह पर एक अभूतपूर्व तोहमत लगा रही है, और लोग इस बात पर हैरान भी हो रहे हैं, कि एक वरिष्ठ सरकारी अफसर रहते हुए प्रदीप बैजल ने उस वक्त इस चेतावनी या धमकी के बारे में अपनी सरकारी जिम्मेदारी पूरी क्यों नहीं की? और आज जब देश की राजनीतिक सत्ता बदल गई है, तब बरसों बाद जाकर वे इन बातों को सार्वजनिक क्यों कर रहे हैं, या ऐसी बातें क्यों लिख रहे हैं? 
वैसे तो हम समकालीन इतिहास लिखने के हिमायती हैं, और हमारा मानना है कि सार्वजनिक पदों पर, महत्व के पदों पर जो लोग भी रहते हैं, उन्हें अपनी बातों को लिखना ही चाहिए। लेकिन सरकारी या संवैधानिक पदों पर रहने वाले लोगों को अपने पद पर रहते हुए ही, उस ओहदे के साथ जुड़े हुए कामकाज को प्रभावित करने वाली बातों को लिखना चाहिए, किसी किताब में नहीं, सरकारी कागजात में, फाईलों पर, और जरूरत पडऩे पर सतर्कता एजेंसियों को, और अदालत को भी। अगर देश के सबसे बड़े दर्जन भर अफसरों में भी यह हौसला नहीं रहेगा कि वे प्रधानमंत्री के खिलाफ जाने वाली बातों को सरकारी रिकॉर्ड पर रख सकें, तो फिर यह देश की नौकरशाही की एक कमजोरी और खामी ही कही जाएगी। जो लोग सरकारी पदों पर इतने ऊपर तक पहुंचे हुए रहते हैं कि नौकरी छोडऩे पर भी जिनके जीने में कोई दिक्कत नहीं होती, और मरने तक जो पेंशन पा सकते हैं, उन लोगों को तो हौसला दिखाना ही चाहिए। 
न सिर्फ केन्द्र सरकार में बल्कि कई प्रदेशों में भी अपने कार्यकाल के दौरान ही बहुत से अफसर अपने ऊपर के नेताओं या बड़े अफसरों के गलत हुक्म मानने से इंकार भी कर देते हैं, और सरकारी रिकॉर्ड में उन बातों को ले भी आते हैं। हमारे पाठकों को याद होगा कि कई बरस पहले जब अर्जुन सिंह केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री थे तब उनके मंत्रालय के एक संयुक्त सचिव ने फाईल पर यह लिखा था कि अर्जुन सिंह की बेटी वीणा सिंह आकर उनसे मिली थीं, और देश भर की स्कूलों में दोपहर के भोजन की जगह कारखानों में बने बिस्किट देने की सिफारिश की थीं। हर बरस 13 हजार करोड़ से अधिक का जो कारोबार बिस्किट कंपनियां झटकना चाहती थीं, उनकी सिफारिश लेकर, उनके लिए लॉबिंग करने अर्जुन सिंह की बेटी उन्हीं के मंत्रालय पहुंची थीं। इस बात को सरकारी फाईल पर जिस अफसर ने दर्ज किया था, उसके मुकाबले प्रदीप बैजल बड़े अफसर थे। और उनको मनमोहन सिंह से अगर ऐसी कोई धमकी मिली थी, तो इस बात को उन्हें न सिर्फ फाईल पर लिखना था, बल्कि केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त और अदालत को भी इस बारे में बताना था। लेकिन जहां तक हमारी याददाश्त साथ देती है, प्रदीप बैजल ने पहली बार आज ऐसी कोई बात अपनी किताब में लिखकर लोगों के सामने रखी है, और यह मानो मोदी सरकार के एक बरस पूरा होने पर तमाम कांग्रेस-विरोधियों को प्रदीप बैजल का तोहफा है। 
इस देश में अलग-अलग ओहदों पर बैठे हुए लोगों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई जाती है। सरकारी अफसरों को भी गोपनीयता की शर्त नौकरी के साथ-साथ मिलती है। अब ऐसे में सूचना के अधिकार का बड़ा सीमित मतलब रह जाता है। होना तो यह चाहिए कि सूचना पाने का जनता का हक, सूचना देने की सरकारी जिम्मेदारी में बदलना चाहिए। होना यह भी चाहिए कि सरकारी कामकाज में जब कोई एक व्यक्ति अपने मातहत को कोई जुबानी निर्देश दे, तो उसकी रिकॉर्डिंग करने की छूट भी रहनी चाहिए, ताकि जुबानी निर्देशों के बाद कोई उससे मुकर न सकें। फिलहाल अगर बात को हम प्रदीप बैजल की किताब पर खत्म करें, तो ऐसी बात की आज कोई विश्वसनीयता नहीं है। कुर्सी पर रहते हुए लोगों को मुंह खोलने की हिम्मत रहनी चाहिए। 

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