अभिजीत जैसे लोगों के बहिष्कार की जरूरत

संपादकीय
07 मई 2015

सलमान खान को कैद होने के बाद मुम्बई फिल्म उद्योग के लोग उनके समर्थन में टूट पड़े हैं। लेकिन इनमें सबसे आगे रहे एक मध्यम दर्जे के गायक अभिजीत, जिन्होंने फुटपाथ पर सोने वालों को कुत्ता कहते हुए कहा- कुत्ता रोड पे सोएगा, तो कुत्ते की मौत मरेगा। रोड गरीब के बाप की नहीं है, मैं भी बेघर था लेकिन कभी सड़क पर नहीं सोया। इस बयान से असहमति रखने वाले फिल्म कलाकारों ने भी कई ऐसे निकले जिन्होंने सलमान खान के जुर्म को पूरी तरह अनदेखा करते हुए कहा कि यह सलमान जैसे कलाकार के साथ ज्यादती है, और सलमान देशद्रोही तो है नहीं, वगैरह-वगैरह। 
वैसे तो विचारों की आजादी का हक हर किसी को है, और हर किसी को यह हक है कि वे कुत्तों को गाली की तरह इस्तेमाल करें, और फिल्म उद्योग से पैसा कमा चुके अभिजीत को यह हक बनता है कि वह फुटपाथ पर सोने वाले गरीबों को कुत्ता कह सके, और उनको कुचलने को जायज ठहरा सके। पैसे वालों को कई तरह के हक रहते हैं, और फिल्म उद्योग में जिस बड़े पैमाने पर काला-सफेद पैसा कमाया जाता है, उसके मुताबिक वहां के लोग काली जुबान से गरीबों को गाली दे सकते हैं। लेकिन इस बात को हम महज फिल्म उद्योग तक क्यों सीमित रखें? बात इनसे परे भी तमाम पैसे वाले लोगों तक है जिनके मन में आमतौर पर गरीबों को लेकर हिकारत दिखती है, और वे गरीबों को बोझ मानकर चलते हैं। यह वही तबका है जो कि महानगरों और बाकी शहरों में भी अपनी बड़ी-बड़ी गाडिय़ों को फुटपाथ पर चढ़ाकर खड़ा करता है, और यह जाहिर है कि अगर वहां पर गरीब बेघर सोने लगेंगे, तो करोड़पतियों की गाडिय़ां कहां खड़ी होंगी? एक घटिया और गंदी सोच गरीब और कुत्ते इन दोनों पर एक साथ हमला कर रही है, और यह ताकत की हिंसा है। 
दूसरी तरफ जो लोग सलमान के जुर्म को अनदेखा करके इस सजा को गलत, नाजायज, या गैरजरूरी बता रहे हैं, वे भी बड़ी-बड़ी गाडिय़ों में घूमने वाले लोग हैं, और उनको भी नींद में कुचले जाने का खतरा नहीं है। जब जिंदगी महफूज हो, तो सोच बदल जाती है। ताकतवर तबके का यह हिंसक-प्रदर्शन भयानक है, और बताता है कि जिन गरीबों के पैसों से फिल्मी सितारे इस आसमान तक पहुंचते हैं, उनके लिए हिकारत को वे किस तरह अपना हक समझते हैं। लेकिन यह कोई नई बात नहीं हैं। इसी फिल्म उद्योग के एक संगीत निर्देशक और गायक अनु मलिक को गैंगस्टर बन चुके दाऊद इब्राहिम की तारीफ में उनके जन्मदिन पर नाच-नाचकर गाते हुए पूरी दुनिया ने देखा है। अनगिनत गायक और फिल्मी सितारे दाऊद जैसे कातिल के दरबार में भीड़ बनकर जाते रहे हैं। जनचर्चा यह है कि अपराध की दुनिया का बहुत सा पैसा इस उद्योग में लगता है। ऐसे में अगर इंसाफ से इस उद्योग के कुछ या अधिक लोगों को नफरत हो जाती है, तो उसमें अनहोनी कुछ नहीं है।
गरीब, और कुत्ता, इन दोनों में से एक भी शब्द अपमानजनक नहीं है। कोई गरीब है तो उसका एक मतलब यह भी है कि वह मुजरिम नहीं है। मुजरिम बन जाने पर तो फुटपाथ पर सोने की बेबसी नहीं रहती। दूसरी बात कुत्ता एक वफादार इंसान होता है, और वह अपनी नस्ल के दूसरों पर दारू पीकर गाड़ी नहीं चढ़ाता। तीसरी बात अभिजीत जैसे बेवकूफ को यह भी समझ आनी चाहिए कि अगर फुटपाथ पर गाड़ी चढ़ाना किसी का हक है, तो उस पर सोना उससे बड़ा हक है। यह हिंसक-मूर्ख अपने आपको इस बकवास से एक अभूतपूर्व नफरत का शिकार बना चुका है, और हिन्दुस्तान में अगर लोगों को इंसाफ का साथ देना है, तो ऐसे लोगों की फिल्मों, और उनके कार्यक्रमों का बहिष्कार करना चाहिए। 

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