एक्टिविस्ट को जर्नलिस्ट मानने की चूक न करें

22 जून 2015


मध्यप्रदेश में कल एक पत्रकार के अपहरण के बाद उसकी हत्या की खबर है, और पहली खबर में आई जानकारी के मुताबिक वहां के खनिज माफिया ने यह हत्या की है जिसके खिलाफ यह पत्रकार अदालत में मुकदमा लड़ रहा था। इसके पहले उत्तरप्रदेश में एक पत्रकार को जलाकर मारने के बाद एक मंत्री पर यह तोहमत है कि उसने पुलिस भेजकर इस पत्रकार को जलवाया क्योंकि इसने सोशल मीडिया पर इस मंत्री के खिलाफ कुछ लिखा था। अब वह मंत्री इसके बाद से लगातार फरार चल रहा है, पुलिस में उसके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज है, मरने वाले पत्रकार ने आखिरी बयान में उसका नाम बताया है, और पत्रकार का गरीब परिवार एक पेड़ के नीचे धरना देते टीवी की खबरों में दिख रहा है। इस हादसे के दो दिन बाद ही उत्तरप्रदेश में एक दूसरे पत्रकार के बारे में एक खबर आई कि उसे मोटरसाइकिल से बांधकर घसीटा गया। एक खबर छत्तीसगढ़ के भाटापारा से दो दिन पहले ही आई है कि वहां एक साप्ताहिक अखबार के संपादक को सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक भतीजे ने धमकी दी है। 
एक और खबर सोशल मीडिया पर तैर रही है कि भारत में पिछले एक बरस में किस तरह करीब पौन सौ पत्रकारों की हत्या हुई है। इसके साथ-साथ जोड़कर देखें तो छत्तीसगढ़ के ही बिलासपुर और गरियाबंद में पत्रकारों की हत्या को कुछ महीने या बरस हो चुके हैं, और अब तक कोई सुराग नहीं है। कोई दो बरस पहले बस्तर में एक अखबार के संवाददाता की हत्या हुई थी, जिसके पीछे नक्सलियों का हाथ आया था। 
अब हम पत्रकार या अखबारनवीस तबके को देखें तो यह इतना व्यापक हो गया है कि इसका दायरा कहां शुरू होता है और कहां खत्म होता है यह अंदाज लगाना मुश्किल है। देश में लाखों अखबार हैं, छत्तीसगढ़ जैसे छोटे प्रदेश में ही दसियों हजार अखबारों के नाम रजिस्टर हैं, और उनमें से कम या अधिक दिनों तक छपने वाले भी हजारों अखबार हैं। अब एक-एक अखबार के दर्जन भर पत्रकार हो सकते हैं, और दर्जनों हो सकते हैं। जहां तक भारत के अधिकतर क्षेत्रीय मीडिया का सवाल है तो उसके पत्रकार पूर्णकालिक पत्रकार दो मायने में नहीं होते, एक तो उनका पत्रकारिता से परे कोई कारोबार होता है, या फिर वे अखबार से इतनी तनख्वाह नहीं पाते कि उन्हें पूर्णकालिक कर्मचारी माना जाए। ऐसे में जो लोग रोजगार से परे अखबारनवीसी करते हैं, वे तमाम लोग भी पत्रकार तो हैं, लेकिन उनमें से बहुत से लोगों का कामकाज पत्रकारिता से परे भी कई तरह का रहता है। 
अब जैसे अखबार मालिक हैं, या मीडिया मालिक हैं, उन पर कोई रोक नहीं है कि वे मीडिया के अलावा दूसरा कारोबार न करें, इसी तरह अखबारनवीस भी आज जर्नलिस्ट होने के साथ-साथ एक्टिविस्ट भी हैं, वे दूसरे कारोबार भी करते हैं, दूसरी जगहों पर नौकरी भी करते हैं, और सोशल मीडिया की मेहरबानी से ऐसे लोग परंपरागत पेशेवर मीडिया से परे भी अपनी बातों को लिखते हैं। अब ऐसे में जब किसी पत्रकार की हत्या होती है तो वह पत्रकार की हत्या तो गिनी जाती है, लेकिन वह जमीन के कारोबार में हुई है, एक आंदोलनकारी के रूप में हुई है, किसी निजी रंजिश से हुई है, या फिर सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करके जानकारी निकालकर अदालत में जाकर किसी के खिलाफ मुकदमा चलाने की वजह से हुई है? 
यह फर्क समझने की जरूरत है कि आज कई नए तबके खड़े हो गए हैं जो पत्रकारिता के साथ-साथ मिलकर चल रहे हैं। ऐसा एक तबका अपने को आरटीआई एक्टिविस्ट कहता है और जो सरकार या सूचना के अधिकार के दायरे में आने वाले बाकी संस्थानों से जानकारी निकालकर उसके आधार पर चारों तरफ शिकायतें भेजता है, अदालतों में जनहित याचिका दायर करता है, और धरने पर भी बैठ जाता है। ऐसा दूसरा तबका है जो कि बिना किसी परंपरागत मीडिया के या परंपरागत मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया पर अपना एक अलग आंदोलन चलाता है, और वहां का हिसाब-किताब भी लोग दूसरी जगह चुकता करते हो सकते हैं, और दूसरी जगह का हिसाब-किताब भी ऐसे पत्रकार सोशल मीडिया पर चुकता कर सकते हैं, करते हैं। 
इसलिए आज पत्रकार पर हमला या पत्रकार की हत्या इस बात के बारीक खुलासे की जरूरत है। जिस तरह भारत में किसान की आत्महत्या और किसानी की वजह से आत्महत्या दो अलग-अलग चीजें भी हो सकती हैं। एक किसान किसी प्रेम संबंध की वजह से या किसी बीमारी से थककर भी खुदकुशी कर सकता है, उसी तरह एक पत्रकार की हत्या के पीछे गैरअखबार वजहें भी हो सकती हैं। ऐसे में यह मूल्यांकन जरूरी है कि हत्या या हमले के पीछे मीडियाकर्मी होना या अखबारनवीसी की वजह है, या कि किसी मामले-मुकदमे की वजह से यह हत्या हुई है? 
मध्यप्रदेश के जिस पत्रकार की हत्या को लेकर आज यहां बात शुरू की है उसकी हत्या से हमको तकलीफ हुई है। लेकिन खबर में जो वजह आई है, वह खनिज माफिया के खिलाफ मुकदमेबाजी की है। मेरी समझ यहां पर कुछ कमजोर पड़ती है कि एक पत्रकार को एक आंदोलनकारी के रूप में किस हद तक सक्रिय होना चाहिए? और एक पत्रकार का काम उसके मीडिया से परे कितनी दूर तक जायज माना जाए? वैसे तो लोकतंत्र में हर पत्रकार एक नागरिक भी है, और उसके लोकतांत्रिक-नागरिक अधिकार पत्रकार होने से घट नहीं जाते। लेकिन एक दूसरी बात जो मुझको बहुत जरूरी लगती है वह यह कि पत्रकार को अपने मीडिया से परे बाकी के लोकतांत्रिक मोर्चों पर अपनी सक्रियता सीमित रखनी चाहिए। 
बहुत से पत्रकार मंच, माला, महत्व, माईक, और मौजूदगी की पत्रकारिता करते हैं। वे पुराने कार्टूनों या लतीफों के मुताबिक जेब में कैंची लेकर चलते हैं कि कब कहां फीता काटने बुला लिया जाए। अपनी दूसरी जेब में ऐसे लोग एक माचिस लेकर चलते हैं कि सरस्वती प्रतिमा के सामने दीया जलाने के वक्त ऐसा न हो जाए कि आयोजकों के पास माचिस न रहे। फिर कई पत्रकार ऐसे रहते हैं जो अपने लिखे हुए, या कि लिखाए हुए को बेअसर पाकर बेशर्म सरकार के खिलाफ या कारखानेदारों के खिलाफ अदालत तक जाना जरूरी समझते हैं क्योंकि जब कलम बेअसर हो जाए, तो कानून की तलवार उठाना उनको जायज लगता है। 
मैं ऐसे तमाम जर्नलिस्ट-एक्टिविस्ट के खिलाफ हूं, क्योंकि इससे एक्टिविज्म को तो ताकत मिलती है, और जर्नलिज्म की साख गिरती है। जब लोग अखबारनवीसी को किसी और आंदोलन के लिए एक औजार या हथियार बना लेते हैं, तो उस आंदोलन का मकसद चाहे कितना ही अच्छा क्यों न हो, वह अच्छी अखबारनवीसी नहीं रह जाती। इसलिए ऐसे लोग अखबारनवीसी का नकाब ओढ़कर आंदोलन करते हैं, और देश में ऐसे दो ही आंदोलन थोड़ी दूर तक मुझको जायज लगे क्योंकि वे पत्रकारिता पर हमले के खिलाफ भी थे। एक तो आजादी की लड़ाई के दौरान जब अखबारनवीसी पर अंग्रेज सरकार की बंदिशें थीं, और उस दौर के अखबारनवीस जिस तरह अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ अखबार निकालते थे, आंदोलन में शामिल होते थे और जेल जाते थे, वह अखबारनवीसी को बचाने की लड़ाई भी थी, देश को आजाद कराने की लड़ाई तो थी ही। ऐसा दूसरा मौका आपातकाल के दौरान आया जब बहुत से अखबार और उसके पत्रकार इंदिरा और संजय गांधी के पांव की धूल को पुलित्जर पुरस्कार समझ बैठे थे, और उस वक्त कई लोगों को एक आंदोलनकारी बनकर मीडिया पर सरकारी सेंसरशिप के हमले का मुकाबला करना पड़ा था। लेकिन इन दो मौकों को छोड़ दें, तो भारत के पूरे इतिहास में पत्रकारिता को, और पत्रकारों को किसी और आंदोलन में शामिल होने की जरूरत नहीं थी। 
पत्रकारिता का एक खास दर्जा तभी तक जायज है जब तक इस दर्जे के लोग इसकी पवित्रता का सम्मान करते हुए इसकी शुद्धता और इसकी ईमानदारी का ख्याल रखें। इसके बिना जिस तरह एक कारखानेदार आज हजारों करोड़ खर्च करके देश का सबसे बड़ा अखबारदार भी बन जा रहा है, और उससे उसकी कोई अखबारी साख नहीं बन रही, वैसा ही हाल अखबारनवीसों का भी होने लगेगा। यह बात जरूरी इसलिए है कि आज देश भर में जगह-जगह पत्रकार की परिभाषा धुंधली हो चली है। आज हर कोई पत्रकार हो चले हैं, और कोई भी खालिस पत्रकार रह गए हैं या नहीं, यह मूल्यांकन खासा मुश्किल हो गया है। बहुत सारी गाडिय़ों पर आज प्रेस और पत्रकार के लेबल लगे देखते हैं, और उसके साथ-साथ किसी राजनीतिक पार्टी का पदाधिकारी होने का लेबल भी दिखता है। अब यह सोचने की बात है कि एक राजनीतिक पार्टी की पदाधिकारी को पत्रकार माना जाए, या कि न माना जाए? यह याद रखने की जरूरत है कि देश के मीडिया में राजनीतिक दलों के जो अपने अखबार हैं उनकी साख केवल अपनी पार्टी के प्रवक्ता जितनी है, उससे परे उनकी कोई साख नहीं है, और उनकी कोई अहमियत भी नहीं है। लोकतंत्र में वे राजनीतिक दल का एक भोंपू हैं, और उनको मीडिया मानना पूरी तरह से गलत है। लोकतंत्र में मीडिया को एक अघोषित चौथे स्तंभ का जो दर्जा हासिल है, उस दर्जे के हकदार भी राजनीतिक प्रकाशन नहीं हो सकते। इसलिए ऐसे लोगों की हत्या जो कि मीडिया से भी जुड़े हुए थे, और ऐसे लोगों की हत्या जो सिर्फ मीडिया से जुड़े हुए थे, उसमें फर्क करके देखने की जरूरत है। एक एक्टिविस्ट को जर्नलिस्ट मानने की चूक नहीं करना चाहिए। 

शहरों को डूब से बचाना आसान इसलिए नहीं है...

22 जून 2015
संपादकीय
मुंबई से लेकर रायपुर तक, पहली बारिश में ही देश के कई शहर डूब से गए हैं। जगह-जगह ये सवाल उठ रहे हैं कि शहरीकरण पर इतनी बड़ी रकम खर्च होने के बाद भी शहरों से पानी की निकासी क्यों नहीं हो रही है? अमिताभ बच्चन जैसे लोग मुंबई को लेकर सवाल उठा रहे हैं, और रायपुर में आज बारिश में डूबे हुए लोग बैठकर बैठक कर रहे हैं। लेकिन शहरों में पानी भरने की न तो एक वजह है, और न ही उसका कोई आसान रास्ता है। फिर इंसानों की खड़ी की हुई सीधी दिक्कतों के साथ-साथ एक बड़ी दिक्कत यह भी है कि मौसम में ऐसे बदलाव आ गए हैं, और बारिश ऐसे थोक में होने लगी है कि मुंबई की इमारतों से लेकर असम के गेंडों तक के पानी में घिरे होने की तस्वीरें आती ही रहती हैं। 
लेकिन इस मुद्दे पर थोड़ी सी ठोस बात अगर करें, तो एक तो शहरीकरण से खड़ी हुई कुदरती दिक्कतें, और फिर शहरी जीवनशैली से खड़ी हुई दिक्कतें, ये दोनों मिलकर नीम पर चढ़े हुए करेले की तरह नौबत ला रही हैं। भारत के अधिकतर शहरों में बिना योजना के इमारतें और आबादी बढ़ती चली गई हैं, और इनके बोझ को ढोने की क्षमता विकसित नहीं हुई है। इनका एक आसान इलाज ऐसे शहर हो सकते हैं जो कि पूरे के पूरे नए बने हुए हैं, लेकिन मौजूदा शहरों को छोड़कर देश में एक साथ दसियों हजार नए कस्बे-शहर तो बनाए नहीं जा सकते। अब सरकार के जो विभाग योजना बनाने वाले हैं, उनको तो छोड़ ही दें, सरकार के जो विभाग, जो स्थानीय संस्थाएं, शहरी जमीनों पर कोई योजना बनाने के काम में लगी रहती हैं, वे भी शहर के महंगे इलाकों में एक-एक इंच जमीन की बाजारू संभावनाएं दुह लेना चाहती हैं। हम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी देख रहे हैं कि शहर के सबसे घने इलाकों में खाली पड़ी किसी सरकारी जमीन पर कई-कई मंजिल की इमारत ऐसे इस्तेमाल के लिए बनाने की योजनाएं चल रही हैं जिनके बन जाने पर वहां रोजाना दसियों हजार लोगों का आना-जाना बढ़ जाएगा। इनका बोझ, वहां पर रहने और काम करने वालों का बोझ आसपास की जो सड़कें आज भी जाम हैं, उन्हीं पर पड़ेगा। लेकिन जिन संस्थाओं को ऐसी योजनाओं से कमाई होगी, वहां बैठे लोग कमाई की किसी संभावना को छोडऩा नहीं चाहते हैं। अब यह कमाई संस्था की होगी या निजी होगी, उससे परे मुद्दे की बात यह है कि शहर के बीच और योजनाओं की कोई गुंजाइश न है, और न होनी चाहिए। ऐसा बाजारू शहरीकरण और डुबाने का काम ही कर रहा है। 
दूसरी तरफ शहरी जिंदगी में प्लास्टिक का कचरा, और बाकी किस्म की पैकिंग घूरों और नालियों में फिंककर यह नामुमकिन कर रहे हैं कि वहां से पानी बहकर निकल सके। पॉलीथीन पर रोक तो पता नहीं हकीकत में कितनी हो पाई है, लेकिन आजकल हर कदम पर चाय ठेले प्लास्टिक के फेंके जाने वाले कप इस्तेमाल करते हैं, और शहरों में पहली बारिश में ही नालियों से उफनकर ऐसा प्लास्टिक-कचरा चारों तरफ फैल गया है। जब तक शहरों के म्युनिसिपल ठोस कचरे के निपटारे में दिलचस्पी लेने के बजाय सैकड़ों करोड़ की योजनाओं में उलझे रहेंगे, तब तक शहरों में पानी भरा ही रहेगा। एक वक्त था जब म्युनिसिपल का बुनियादी काम नाली, पानी, सफाई, सड़क, और रौशनी हुआ करता था। आज स्थानीय संस्थाओं पर जो लोग काबिज होते हैं, उनकी खास दिलचस्पी बड़े-बड़े कंस्ट्रक्शन और बड़ी-बड़ी खरीदी में उलझकर रह जाती है।
इसलिए शहरों के डूब जाने का इलाज तब तक आसानी से नहीं हो सकता जब तक कि सरकार शहरी जमीनों को घनी बस्तियों में दुहना बंद न करे, लोग कचरे के बारे में न सोचें, और म्युनिसिपल अपनी बुनियादी जिम्मेदारी पर न लौटे।

मजदूर के बच्चों ने आईआईटी पहुंचकर खड़े किए कुछ सवाल

21 जून 2015
संपादकीय
उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ के एक मजदूर के दो बेटों ने आईआईटी दाखिले में जगह बनाई, और अब जब उनके पास फीस देने की ताकत भी नहीं है, तो स्मृति ईरानी, राहुल गांधी, और अखिलेश यादव सभी लोग उसकी मदद को सामने आए हैं। स्मृति ईरानी ने आईआईटी की फीस माफ करने की घोषणा की है और स्कॉलरशिप देने की भी। 
अब जिस देश में आईआईटी दाखिले की तैयारी सैकड़ों या हजारों करोड़ रुपये सालाना की कोचिंग का कारोबार बन चुका हो, वहां पर मजदूर के दो बेटों का इस तरह कामयाबी पाना बहुत से सवाल खड़े करता है। और इन सवालों पर बात करने के पहले लगे हाथों यह भी याद दिलाना ठीक होगा कि किस तरह बिहार में बरसों से गरीब बच्चों को गरीब कोचिंग देकर आईआईटी तक पहुंचाने वाले सुपर-30 नाम से मशहूर आनंद नाम के एक नौजवान ने इस बरस भी अपने तीस बच्चों में पच्चीस को आईआईटी तक पहुंचाकर दम लिया है। भारत में कैपिटेशन फीस देकर दाखिले के पैमाने देखें, तो आईआईटी में एक-एक दाखिला कई-कई करोड़ के लायक होता है, और जो बच्चे अपनी काबिलीयत से वहां पहुंच जाते हैं वे मानो अपने मां-बाप को रातों-रात करोड़पति बना देते हैं।
अब हम उस सवाल की बात करें जो कि ऐसे गरीब बच्चों की कामयाबी से उठते हैं। होनहार तो बहुत से बच्चे रहते हैं, लेकिन जब दाखिले के लिए कड़ा मुकाबला होता है, और एक-एक नंबर पर फर्क पड़ता है, तब साल भर की लाखों की कोचिंग का फर्क पड़ता है। और भारतीय संविधान के मुताबिक यहां के बच्चों को अवसरों की समानता की जो बात कही जाती है, वह बात महज बात है, और असल जिंदगी में उसका कोई मतलब नहीं है। जब एक मजदूर के बच्चे उन बच्चों से मुकाबला करते हैं जिनको लाखों रुपये साल की कोचिंग नसीब है, तो फिर मजदूर के कोई एक-दो बच्चे भले ही कामयाबी पा जाएं, उनका तबका तो किसी तरह की बराबरी का कोई हक नहीं पाता। और उदार अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत में यह गैरबराबरी बढ़ती चल रही है जिसमें गरीब को मौके सिर्फ कागजों पर हैं, उनको बराबरी सिर्फ कागजों पर है, असल जिंदगी में उनके लिए मौके न के बराबर हैं। 
अभी हम इस मुद्दे को पढ़ाई और परीक्षा के बीच की खींचतान पर ले जाना नहीं चाहते, क्योंकि उससे गैरबराबरी की बात अधूरी रह जाएगी। भारत में शहरी और संपन्न, कुलीन और सक्षम तबके के हितों को ध्यान में रखकर बाजार ने उत्कृष्टता खड़ी करने का जो कारोबार बढ़ाया है, इस देश और इसके प्रदेशों की शिक्षा व्यवस्था उसी को बढ़ावा देती है। जब पढ़ाई को किनारे रखकर केवल मुकाबले के इम्तिहान के लिए तरकश के तीर तेज करने का ही महत्व होता है, तब गरीब के मौके घटते चले जाते हैं। ऐसे में यह सोचने की जरूरत है कि देश के बच्चों के बीच बराबरी कैसे वापिस लाई जा सकती है, और इसके साथ-साथ यह भी सोचा जाना चाहिए कि पढ़ाई की जगह जो पूरा ध्यान इम्तिहान पर रखा जाता है, उसका खात्मा भी कैसे हो?

यह मोदी का दिन है, लेकिन किसी पर थोपने का नहीं...

संपादकीय
20 जून 2015

भारत के साथ-साथ दुनिया के अधिकतर देशों में कल अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाने वाला है, और 21 जून को संयुक्त राष्ट्र संघ ने यह दिन भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर योग के नाम समर्पित किया था। भारत में योग दिवस के मौके पर दो बड़ी गैरजरूरी बहस छिड़ी हुई हैं। पहली बात तो यह कि योग को मुस्लिम समाज पर अनिवार्य रूप से थोपा जाए या नहीं। स्कूलों और कॉलेजों में योग को लेकर कुछ मुस्लिम संगठनों ने यह आशंका चली आ रही है कि इसके कुछ हिस्से इस्लाम की मान्यता के खिलाफ हैं। दूसरी बहस कांग्रेस ने छेड़ी है जिसने मोदी के योगदान को कम करने के लिए कल एक प्रेस कांफ्रेंस में यह कहा कि योग हजारों बरस से भारत में चले आ रहा है, और इसे मोदी ने शुरू नहीं किया है। इन दो विवादों से परे देश के आम लोग योग को लेकर उत्साह में हैं, और इस उत्साह को देखकर आक्रामक हिन्दू नेता कई तरह के बयान दे चुके हैं जिनमें योग न मानने वालों को समंदर में डूब मरने से लेकर देश छोड़कर चले जाने तक, और देशद्रोह तक की बातें की गई हैं। देश में राजकीय योगी के रूप में अपने आपको स्थापित कर रहे रामदेव ने भी कुछ ऐसे बयान दिए हैं कि जो मजहब योग से आहत होता हो, वैसे मजहब को भी लोगों को छोड़ देना चाहिए। 
योग जैसी एक भारतीय जीवन पद्धति को जिस तरह आक्रामक और विवादपूर्ण बनाने का काम कुछ साम्प्रदायिक लोग कर रहे हैं, उससे पूरे देश का नुकसान हो रहा है। कोई भी जीवन पद्धति चाहे कितनी भी अच्छी क्यों न हो, उसे तमाम लोगों पर बलपूर्वक या नियम-कानून बनाकर नहीं लादा जा सकता। यह कुछ उसी तरह का होगा जिस तरह की अमरीका इराक जैसे देशों पर अपने लड़ाकू विमानों से बमों के साथ लोकतंत्र बरसाने का दावा करता है। भारत के लोकतंत्र में लोगों के सामने विकल्प रखे जा सकते हैं, लेकिन उनको न मानने वाले लोगों को गद्दार कहना, देश छोड़कर जाने को कहना, उनको डूब मरने को कहना एक बहुत ही हिंसक साम्प्रदायिकता है, और ऐसे ओछे हमलों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पूरे योगदान का महत्व घटा दिया है। 
हम कांग्रेस की इस बात से सहमत नहीं हैं कि कल पूरी दुनिया में जो होने जा रहा है उसमें नरेन्द्र मोदी का कोई योगदान नहीं है। मोदी ने ही अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित करने की पहल की थी, और संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में एक अभूतपूर्व बहुमत के साथ उसे मंजूरी मिली थी। यह कम बात नहीं होती। कांग्रेस के पास अपने आधी सदी के कार्यकाल में ऐसा करने का बहुत मौका था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों से लगभग नावाकिफ समझे जाने वाले नरेन्द्र मोदी ने अपने शुरुआती कुछ महीनों में यह बड़ा काम कर दिखाया। और यह भूलना नहीं चाहिए कि योग की अंतरराष्ट्रीय संभावनाएं जैसे-जैसे बढ़ेंगी, हो सकता है कि भारत से लाखों योग शिक्षकों को दुनिया भर में जाकर काम करने की संभावनाएं मिलने लगें। भारत का नाम योग के साथ जुड़ा हुआ है, और जुड़ा हुआ रहेगा। इसकी कुछ बातों को किसी धर्म से जोड़कर देखना जारी रहेगा, और उन बातों को थोपने की जिद अगर नहीं होगी, तो बाकी धर्मों के लोग भी योग के अधिकांश हिस्से से जुड़ेंगे। थोपने के बजाय जोडऩे की कोशिश हिन्दुस्तान के मूर्ख और मूढ़ साम्प्रदायिक लोगों को समझाने की जरूरत है, लेकिन मोदी ने इस बारे में मुंह नहीं खोला है। 
अब हम आम लोगों की जिंदगी में योग की बात करें, तो इससे फायदे ही फायदे हैं। सूर्य नमस्कार से कुछ लोगों को धार्मिक असहमति होती है, तो उसके बिना भी योग उतना ही फायदेमंद होगा, और हर किसी की जिंदगी में यह तन और मन की बेहतरी का काम कर सकता है। आज दुनिया में शारीरिक और मानसिक बीमारियां जितनी बढ़ रही हैं, उनकी रोकथाम के लिए योग एक असरदार तरीका हो सकता है, और इससे रोज की जिंदगी की उत्पादकता भी बढ़ सकती है। बिना किसी नारे के, बिना किसी धार्मिक उन्माद के, बिना किसी हमले के योग अधिक शांति के साथ अधिक लोगों के अधिक फायदे का हो सकता है, और वही किया जाना चाहिए। फिलहाल इस मौके की पूरी वाहवाही इसकी पहल करने वाले नरेन्द्र मोदी को देने की जरूरत है, ऐसा न करके लोग सम्मान नहीं पा सकेंगे। तंगदिली हर मौके पर ठीक नहीं होती।

अमरीका में बर्दाश्त कम और घर-घर बंदूकें ज्यादा

संपादकीय

19 जून 2015

अमरीका के अश्वेत लोगों के एक चर्च पर हमला करके 9 लोगों को गोलियों से मार डालने वाले एक गोरे नौजवान को देखें तो उसके फेसबुक पेज पर उसके कई दर्जन दोस्तों में से आधे से अधिक, या आधे अश्वेत ही थे। लेकिन जब उसने यह हमला किया तो गोलियां चलाने के साथ-साथ उसने अश्वेत लोगों के खिलाफ नफरत की बातें भी कहीं। अब यह अमरीका जैसे एक उदार कानून वाले देश में एक भयानक घटना है, और अमरीकी समाज के भीतर रंगभेद की जड़ों को यह उजागर करती है। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी बात जो उभरकर सामने आती है वह यह कि हथियारों की आसान मौजूदगी सिरफिरे लोगों या हिंसक लोगों को हिंसा करने का कैसा मौका भी देती है। कल इस हमले के बाद अमरीकी राष्ट्रपति ने अपने शोक संदेश में इन दोनों को बातों को उठाया और कहा कि अमरीका में नस्लीय संबंधों और अमरीका की गन-पॉलिसी दोनों पर बात करने की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि विकसित देशों में अकेला अमरीका है जहां ऐसे मामले होते हैं। 
अमरीका के बारे में यह पूरा सिलसिला इसलिए अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि एक तरफ तो यह देश धार्मिक समानता को दूसरे देशों पर भी लादने के लिए इतना सक्रिय रहता है कि गुजरात दंगों के बाद बरसों तक नरेन्द्र मोदी को अमरीका जाने का वीजा नहीं मिल पाया था, और अब भी नरेन्द्र मोदी जब अमरीका जा पाए हैं तो वे भारतीय प्रधानमंत्री की हैसियत से एक अलग दर्जे से वहां जा पाए, एक सामान्य नागरिक के रूप में नहीं। दूसरी तरफ अमरीका के भीतर अश्वेतों के साथ, धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ, मुस्लिमों और सिखों के साथ जो बर्ताव होता है, उससे भी अमरीकी समाज में लोगों में बर्दाश्त की कमी जाहिर होती है और गोरे अहंकार से उपजी हिंसा बार-बार सामने आती है। अमरीका में गोरी पुलिस जिस तरह आए दिन निहत्थे अश्वेत लोगों को गोलियां मारती है, उसे लेकर पूरे देश में एक सामाजिक तनाव फैला हुआ है। ऐसी हर हिंसा के बाद काले लोगों को, और नस्लीय समानता में भरोसा रखने वाले बाकी लोगों को भी सड़कों पर आना पड़ता है। 
अब इस मामले का दूसरा पहलू। अमरीकी कारोबार हथियारों को बढ़ावा देने में लगे रहता है, और वहां के कानून को हथियारों के खिलाफ कड़ा होने ही नहीं दिया जाता। एक-एक नागरिक इतनी-इतनी बंदूकें, इतने-इतने हथियार रख सकते हैं कि वे जब चाहें तब सैकड़ों लोगों को मार सकें। हैरानी और राहत की बात यह है कि घर-घर हथियारों का जखीरा होने के बावजूद वहां पर उनके अनुपात में हिंसा उतनी अधिक अभी भी नहीं हो रही है। अमरीका में हथियारों की समर्थक लॉबी राष्ट्रपति के चुनाव तक इसे वहां के लोकतंत्र से जोड़कर पेश करती है, और अपने लिए नरमी रखने वाले को राष्ट्रपति बनाने की कोशिश भी करती है। वहां एक अजीब किस्म की सोच है कि जब तक नागरिकों के पास हथियार रहेंगे, तब तक अमरीका में कोई फौजी हुकूमत नहीं आ पाएगी। यह सोच गलत इसलिए है कि भारत जैसे देश में गिने-चुने लोगों के पास अधिक से अधिक एक-एक हथियार है, लेकिन यहां भी फौजी हुकूमत का कोई खतरा नहीं है। 
अमरीका भारत पर धार्मिक असमानता की कई तोहमतें लादते रहता है, लेकिन खुद अमरीका में गोरों और कालों के बीच इस तरह की असमानता है कि उसे मुद्दा बनाकर अगर भारत ताकतवर देश होता, तो वह अमरीकी राष्ट्रपति को वीजा देने से मना कर सकता था। लेकिन दुनिया का रिवाज यह है कि ताकतवर की लाठी के सामने सबकी बोलती बंद रहती है। और आज अमरीका में अश्वेतों का हाल कुछ उसी तरह का है जिस तरह भारत में दलितों का हाल है। इन दो स्थितियों की एक आसान तुलना भी हो सकती है, लेकिन इनके बीच कई तरह के फर्क भी गिनाए जा सकते हैं। हम कुल मिलाकर एक सामाजिक असमानता के संदर्भ में यह मिसाल दे रहे हैं। 
अमरीका में धार्मिक और सामाजिक असमानता, और वहां पर निजी हथियारों की भारी मौजूदगी मिलकर एक बड़ा खतरा तो हैं ही, वहां की पुलिस भी अलग-अलग कई प्रदेशों और शहरों में कमजोर तबकों पर हमला और हिंसा करने के लिए जानी जाती है। यह नौबत अमरीका के लिए फिक्र का सामान है, और बाकी दुनिया के लिए इस मिसाल को देखकर नसीहत लेने का सामान भी है। 

क्या मोदी के मन की बात में कभी देश के मन की बात को भी जगह मिलेगी?

संपादकीय
18 जून 2015

आजकल में हो सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मन की बात की अगली तारीख सामने आ जाए। अब तक वे कई बार रेडियो पर आकर अलग-अलग कई मुद्दों पर देश-विदेश की भारतवंशी जनता से अपने मन की बात बोल चुके हैं, और रेडियो बड़े लंबे समय बाद एक बार फिर खबरों को गढ़ रहा है। लेकिन पहले भी कुछ मौकों पर हम यह लिख चुके हैं कि जो प्रधानमंत्री आए दिन बहुत से मुद्दों पर बहुत-बहुत बोलता है, देश में बोलता है, विदेश में बोलता है, भीड़ में बोलता है, रेडियो पर बोलता है, उससे लोग उन मुद्दों पर बोलने की उम्मीद करते हैं जो कि देश में जल और धधक रहे हैं। लेकिन ऐसे आधा-एक दर्जन रेडियो प्रसारण याद करें, तो साल भर के सबसे जलते-सुलगते मुद्दों पर नरेन्द्र मोदी ने न रेडियो पर कुछ कहा, और न ही रेडियो से परे कुछ कहा। और हमारा यह पक्का मानना है कि देश में जो ज्वलंत मुद्दे हैं, वे किसी भी प्रधानमंत्री के मन से परे तो हो ही नहीं सकते। तो फिर यह मन की कैसी बात है जो कि सामने आती ही नहीं? 
एक लाईन बड़ी पुरानी है- साफ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं। यह लाईन नरेन्द्र मोदी के हर रेडियो प्रसारण के समय याद पड़ती है। उनके पहले के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चुप्पी साधे रहते थे, बहुत कम बोलते थे, और बहुत ही कम मौकों पर जनता के सामने आते थे, इसलिए उनसे लोग कुछ उम्मीद भी नहीं करते थे। लेकिन नरेन्द्र मोदी तो इतना-इतना बोलते हैं कि उनके एक भाषण में से सुर्खियां ढूंढने में अखबार वालों की जान निकल जाती है। लेकिन इसके बाद भी वे अपनी पार्टी के, अपनी सरकार के लोगों के बारे में उन मुद्दों पर कुछ नहीं बोलते, जिन मुद्दों पर बोलने की सबसे अधिक जरूरत है, और जिन मुद्दों पर देश-विदेश के लोग सचमुच ही यह जानना चाहते हैं कि इस बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का क्या कहना है? 
अब जैसे आज पूरा देश यह जानना चाहता है कि सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे, और ललित मोदी को लेकर जो बहुत ही आपराधिक दर्जे का विवाद चल रहा है, उस पर नरेन्द्र मोदी का क्या कहना है? सुषमा स्वराज उनके मंत्रिमंडल की एक सबसे वरिष्ठ सदस्य हैं, और वसुंधरा राजे उनकी पार्टी की एक मुख्यमंत्री। इन दोनों ने एक ऐसे आदमी की मदद की है, जो कि भारतीय कानून का भगोड़ा है, जिसे भारतीय जांच एजेंसियां घसीटकर भारतीय अदालत में लाना चाहती हैं। लेकिन आज इस भगोड़े की गैरकानूनी मदद करके सुषमा स्वराज ने जो काम किया है, वह काम प्रधानमंत्री की चुप्पी बर्दाश्त नहीं कर सकता। लोकतंत्र में प्रधानमंत्री को मुंह खोलना ही चाहिए, और मनमोहन सिंह के वक्त भी हम कई मौकों पर प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत बयान की मांग करते आए हैं। यह मामला भाजपा के भीतर नरेन्द्र मोदी की सहूलियत का हो सकता है कि उनके मुकाबले जिन लोगों को साल भर पहले तक गिना जाता था, वैसी संभावनाओं वाले लोगों में से एक सुषमा स्वराज अपनी ही हरकतों से निपट गई हैं। दूसरी तरफ जो वसुंधरा राजे नरेन्द्र मोदी से इस बात को लेकर नाराज चल रही थीं कि उनके बेटे को मोदी ने मंत्रिमंडल में नहीं लिया, वे वसुंधरा राजे भी अपनी ही करतूतों से निपट गई हैं। यह बात एक राजनीतिक सुविधा की हो सकती है, लेकिन देश राजनीति से ऊपर है, और प्रधानमंत्री देश के प्रति जवाबदेह हैं। 
सच तो यह है कि भाजपा और सरकार के बहुत से लोगों के साम्प्रदायिक बयानों के बाद जब मोदी से लोग कार्रवाई की उम्मीद करते थे, तब मोदी ने कोई टिप्पणी भी नहीं की। अब जब सुषमा स्वराज पर सीधी कार्रवाई की जरूरत है, तब भी मोदी इस जलते हुए मुद्दे से मुंह मोड़कर योग करते बैठे हैं। योग वैसे तो बड़ी अच्छी चीज है, लेकिन अनदेखी-योग और चुप्पी-योग, राजयोग के साथ-साथ नहीं चल सकते। मोदी को अपने मन की बात में हल्के-फुल्के और दार्शनिक अंदाज के, समाज सुधार के, और नसीहती-मसीहाई बातों के प्रसारण से परे गंभीर मुद्दों पर बोलना चाहिए। देश के प्रधानमंत्री को मन की ऐसी बात की रियायत नहीं मिल सकती जो कि देश के मन की बात को पूरी तरह अनदेखी करके चले। अब अगर प्रधानमंत्री की चुप्पी इसी तरह जारी रही, और उन्होंने आने वाले दिनों में किसी उपदेश का प्रसारण किया, तो देश के मन में यही बात उठेगी- तू इधर-उधर की बात न कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा...।

एक बड़े आर्किटेक्ट के गुजरने के मौके पर

संपादकीय
17 जून 2015

आज भारत के एक सबसे बड़े आर्किटेक्ट चाल्र्स कोरिया के गुजर जाने के बाद भी आज से आगे उनकी डिजाइन की हुई इमारतें लोगों को उनकी याद दिलाती रहेंगी। और किसी वास्तुकार के लिए यही एक कामयाबी हो सकती है कि उसे उसके काम के लिए याद रखा जाए। छत्तीसगढ़ के लोगों से उनका एक रिश्ता यह रहा कि जब यह राज्य अविभाजित मध्यप्रदेश में शामिल था, तभी राजधानी भोपाल में अंतरराष्ट्रीय कला केन्द्र भारत भवन, और मध्यप्रदेश की विधानसभा, इन दोनों महत्वपूर्ण इमारतों को चाल्र्स कोरिया ने डिजाइन किया था। उनका काम भारत के अलावा भी बहुत सी दूसरी जगहों पर बिखरा हुआ है, और अमरीका के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में से एक एमआईटी में वे पढ़ाते भी रहे। लेकिन आज यहां अकेले उनके बारे में लिखने का कोई इरादा नहीं है, और एक आर्किटेक्ट, या इंजीनियर, या शहरी नियोजक, या एक इंटीरियर डेकोरेटर का काम किस तरह दुनिया और जिंदगी को प्रभावित करता है इस पर छोड़ी सी चर्चा करना चाल्र्स कोरिया को याद करने जैसा होगा। 
भारत में बहुत बड़ा पैसा सरकारी कामकाज पर खर्च होता है, नए शहर बनते हैं, कॉलोनियां बनती हैं, इमारतें बनती हैं, और उनके भीतर के ढांचे कामकाज के हिसाब से बनाए जाते हैं। इन सबमें सरकार का कोई मुकाबला नहीं होता, इसलिए किसी निजी बिल्डर की तरह बाजार के मुकाबले में खड़े होने का दबाव सरकार पर नहीं होता, सरकार के कामकाज का ऑडिट भी सिर्फ रूपये-पैसे का होता है, इसलिए उसकी बनवाई हुई डिजाइन, उसकी बनवाई हुई योजना, और उस पर अमल को लेकर अधिक विश्लेषण नहीं किया जाता। और यही एक बात सरकार की पूरी सोच को शुरू से ही कमजोर कर देती है कि वह किसी के प्रति तब तक जवाबदेह नहीं है, जब तक कि कोई आर्थिक भ्रष्टाचार न हो जाए, कोई कानून न टूट जाए। लेकिन किसी भी शहर, कॉलोनी, या इमारत की डिजाइन के पीछे बहुत सी बातों का ख्याल रखकर आर्किटेक्चर और इंजीनियरिंग, प्लानिंग और इंटीरियर डेकोरेशन की खूबियों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जो कि बहुत से मामलों में नहीं होता। 
सरकार के काम के साथ एक और दिक्कत यह रहती है कि वही खर्च करने वाली रहती है, वही इस्तेमाल करने वाली रहती है, अपने अधिकतर काम को उसे बाजार में खड़ा नहीं करना पड़ता, और किसी से उसकी तुलना नहीं होती। लेकिन दुनिया के बहुत से ऐसे देश होते हैं जिनमें सरकारी कामकाज को भी कल्पनाशीलता के लिए, दूरदर्शिता के लिए, उत्कृष्टता के लिए, और किफायत के लिए भी जाना जाता है। फिर सरकारी कामकाज के साथ हम एक बात को जोड़े बिना कभी नहीं चल सकते कि सरकार का पूरा खर्च जनता की जेब से जाता है, और उसकी कोई भी योजना अपने देश-प्रदेश, और अपने शहर-गांव की जनता की बोझ उठाने की क्षमता को ध्यान में रखे बिना नहीं बनानी चाहिए। बनाने के लिए तो शाहजहां के ताजमहल की तरह की बेमिसाल डिजाइन बनाई जा सकती है, और लोगों के लिए एक दर्शनीय जगह कोई भी सरकार बना सकती है। लेकिन क्या जनता उस बोझ को उठा सकती है? क्या विकसित और संपन्न देशों की सोच को भारत जैसे देश और यहां के गरीब प्रदेशों के लोगों पर थोपा जा सकता है? 
हमारा यह मानना है कि सरकार अपने इस्तेमाल के लिए जो कुछ बनाती है, या कि जनता की सुविधा के लिए जो भी शहरी-ग्रामीण ढांचा खड़ा करती है, उसका खूब मूल्यांकन योजना के स्तर पर ही होना चाहिए, और जनसुनवाई करके सरकार को यह साबित करना चाहिए कि वह खर्च जायज क्यों है। सरकार के सामने ऐसी कोई बेबसी इसलिए नहीं रहती है कि देश और प्रदेश में बारी-बारी से जिन पार्टियों की भी सरकारें आती-जाती हैं, उन सबकी दिलचस्पी महंगे और बड़े, यादगार और दर्शनीय निर्माण में रहती है, क्योंकि हर कोई अपनी छाप छोड़कर जाना चाहते हैं। गांवों की पगडंडियों को ठीक करने से इतिहास में नाम दर्ज नहीं होता, इसलिए सत्ता पर आने वाले लोग ताजमहल छोड़कर जाना चाहते हैं। लेकिन जब तक इस देश में सरकारी खर्च का एक सामाजिक ऑडिट शुरू नहीं होगा, तब तक बर्बादी और तबाही जारी रहेंगी। चाल्र्स कोरिया के जाने के मौके पर उनके बारे में अधिक चर्चा का कोई मतलब नहीं है, लेकिन उनकी जो तकनीक थी, वे ज्ञान की जिस शाखा के थे, उस ज्ञान के सामाजिक इस्तेमाल के बारे में जरूर सोचना चाहिए, जो कि आज सरकारी कामकाज में मुश्किल से ही दिखाई पड़ता है। 

आज से स्कूलें शुरू, और समाज की जिम्मेदारी

संपादकीय
16 जून 2015

छत्तीसगढ़ में आज से सरकार ने सरकारी जलसों के साथ स्कूलों को शुरू किया है। मुख्यमंत्री से लेकर बाकी तमाम लोग बच्चों के स्वागत के लिए स्कूलों में पहुंचे और सरकार ने हर बरस की तरह फिर यह घोषणा की है कि अधिक से अधिक बच्चों का स्कूल दाखिला करवाया जाएगा। छत्तीसगढ़ में निजी स्कूलों के एक छोटे हिस्से को छोड़ दें, तो अधिकतर गरीब लोगों के लिए सरकारी स्कूलें ही रहती हैं, और वहीं से निकलकर बच्चे आगे जितनी संभावनाएं रहती हैं, जितनी क्षमताएं रहती हैं, वहां तक पहुंचते हैं। 
भारत जैसी शिक्षा व्यवस्था में गरीब सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले अधिकतर बच्चों के लिए आगे के बड़े मुकाबले पहुंच के लगभग बाहर ही रहते हैं। बड़े-बड़े कॉलेजों तक जाने के लिए दाखिले के जो मुकाबले होते हैं, उनमें शहरी और संपन्न बच्चों की तैयारियां किसी ओलंपिक में खिलाड़ी के खास बने हुए जूतों और कपड़ों, उपकरणों और प्रशिक्षण जैसी ही होती हैं। लेकिन बहुत गरीब बच्चों में से अधिकतर के सपने भी इन ऊंचाइयों तक नहीं पहुंच पाते, और वे मामूली पढ़ाई करके, कस्बे के कॉलेज में कोई बेमतलब डिग्री हासिल करके रह जाते हैं। 
आज चूंकि स्कूल शुरू हुए हैं, इसलिए हम सरकार से परे भी समाज की यह जिम्मेदारी मानते हैं कि अपने आसपास के सभी बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने की एक सामूहिक और सामाजिक जिम्मेदारी पूरी करे। ऐसा न होने पर कम पढ़े-लिखे बच्चे अगर राह से भटकते हैं, तो वे बाकी समाज के लिए भी एक दिक्कत बन सकते हैं। इसलिए किसी भी समाज के ताकतवर और संपन्न तबके के लिए भी यह जरूरी है कि कमजोर और विपन्न तबका भी अपनी पूरी संभावनाओं का मौका पा सके। अमरीका जैसा पूंजीवादी देश भी जब किसी तबके को बराबरी का मौका नहीं दे पाता, और सामाजिक भेदभाव के चलते कोई तबका पिछड़ता है, तो वैसा तबका समाज के सामूहिक विकास की रफ्तार को धीमे भी करता है, दिक्कतें भी खड़ी करता है। 
इसलिए छत्तीसगढ़ में लोगों को चाहिए कि बच्चों को अधिक से अधिक स्कूल पहुंचाने में थोड़ा सा समय दें, जो लोग भी स्कूलों की देखभाल में हिस्सा ले सकते हैं, वे अपने आसपास के सरकारी स्कूलों के विकास में मदद करें, वहां के बच्चों की सार्वजनिक जगहों पर आदतों को ठीक रखने में ध्यान दें। बच्चे न तो किसी परिवार के होते, और न ही वे किसी सरकार की जिम्मेदारी होते, वे तो पूरे समाज का हिस्सा होते हैं, और समाज की जिम्मेदारी होते हैं। वे ही कल का आने वाला समाज होते हैं। इसलिए आज समाज के बाकी लोगों को नई पीढ़ी पर कुछ समय और ध्यान का पूंजीनिवेश करना चाहिए। कोई भी समाज टुकड़ों में आगे नहीं बढ़ सकता, केवल संपन्न और सक्षम तबका अकेले खुश नहीं रह सकता। इसलिए जिनके पास खुशियां कुछ अधिक हैं, उनको उदारता से अपने आसपास इन खुशियों को बांटना चाहिए। 
केन्द्र और राज्य सरकारों की बहुत सी योजनाएं स्कूलों में पोशाक से लेकर किताबों तक, और दोपहर के खाने तक की हैं। इन सबको कामयाबी से पूरा करने में समाज के हिस्सेदारी होनी चाहिए। 

सुषमा स्वराज को कोई रियायत नहीं दी जा सकती, हितों का साफ टकराव उनके नाम दर्ज

संपादकीय
15 जून 2015

मोदी सरकार के आने के बाद भाजपा में एक तो वैसे भी सुषमा स्वराज का वजन  गायब सा हो गया था, और अब वे जिस मुसीबत में फंसी हैं, उसमें उनका भविष्य और डांवाडोल दिख रहा है। लोकसभा में विपक्ष की नेता की हैसियत से एक समय सुषमा को भविष्य की भाजपा-एनडीए की प्रधानमंत्री भी माना जाता था, लेकिन फिर मोदी भाजपा और भारत के आसमान पर ऐसे छाए, कि बाकी तमाम लोग अपने मौजूदा कद के साथ भी पल भर में बौने होकर रह गए। अब विदेश मंत्री की हैसियत से सुषमा स्वराज ने जो काम किया है, वह उनकी नौकरी खाने के लिए काफी है। लोगों का यह मानना है कि नरेन्द्र मोदी सुषमा के इस काम के बाद नैतिकता के नारे को जारी भी नहीं रख सकते, और आगे-पीछे वे सुषमा के पर और कतरने के लिए मजबूर भी होंगे। दूसरी तरफ भाजपा के ही दिल्ली के एक नेता, सांसद कीर्ति आजाद ने खुलकर यह कहा है कि सुषमा स्वराज के लिए खड़ी की गई परेशानी भाजपा के ही आस्तीन के सांप का काम है। अब यह इशारा भाजपा के भीतर की खींचतान से वाकिफ लोगों के लिए बहुत जटिल भी नहीं है। 
लेकिन हम किनारे की इन बातों को छोड़कर मुख्य मुद्दे पर आएं, तो सुषमा ने जो किया है, उसे तौलना जरूरी है। ललित मोदी नाम का एक आदमी भारत के क्रिकेट में कई किस्म की जालसाजी और धोखाधड़ी, बेईमानी और भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद गिरफ्तार होने के पहले देश छोड़कर भाग गया, और लंदन में रहकर आलीशान जिंदगी जी रहा है। उसके खिलाफ केन्द्र सरकार के वित्त मंत्रालय के तहत आने वाले इनफोर्समेन्ट डायरेक्ट्रेट की जांच चल रही है जिसमें सैकड़ों करोड़ रूपए के विदेशी मुद्रा जुर्म के आरोप लगे हुए हैं। ललित मोदी बरसों से जांच एजेंसियों के सामने आने से बच रहा है, और भारत का सैकड़ों करोड़ रूपया विदेशों में जाने के आरोपों के साथ सरकारी जांच एजेंसी उसके दायर मुकदमों का सामना कर रही है। भारत सरकार ने ललित मोदी का पासपोर्ट खारिज कर दिया था, उसने बड़े-बड़े वकील खड़े करके अदालत से इस सरकारी फैसले को ही खारिज करवाया। सुषमा स्वराज के पति और उनकी बेटी दोनों ही ललित मोदी के वकील रहे हैं, और पासपोर्ट के इस मामले में भी सुषमा की बेटी बांसुरी स्वराज बरसों से ललित मोदी की तरफ से अदालत में खड़ी हो रही है। यह बात अपने आप में हैरानी की है कि पासपोर्ट रद्द करने के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट से जो फैसला हुआ, उसके खिलाफ केन्द्र सरकार ने अदालत में अपील तक नहीं की। यह अपने आप में पहली नजर में ललित मोदी के लिए एक बड़ी रियायत दिखती है, और पासपोर्ट जारी करने वाले विदेश मंत्रालय की मंत्री सुषमा ही थीं। दूसरी बात जो अभी हवा में तैर रही है, वह यह है कि सुषमा के पति 22 बरस से ललित मोदी के वकील रहे हैं, और सुषमा के परिवार के किसी एक लड़के के ब्रिटेन में एडमिशन के मामले में भी इस परिवार ने ललित मोदी की मदद ली है। 
इन तमाम बातों को देखें, तो भारतीय जांच एजेंसियों के एक भगोड़े को मदद करने की ऐसी कौन सी बेबसी सुषमा स्वराज की थी? फिर वित्त मंत्री अरूण जेटली का मंत्रालय जिस बेईमान की जांच करके उसे जेल भेजने की तैयारी में है, वह भारत में बयान देने तो नहीं आ रहा, भारत की विदेश मंत्री की मदद से वह ब्रिटेन में सरकार से मदद पा रहा है, दूसरे देशों में जाने के लिए दस्तावेज हासिल कर रहा है। यह पूरा सिलसिला राजनीति और सार्वजनिक जीवन की बड़ी साधारण जुबान में हितों के टकराव का है। सुषमा स्वराज इसकी तोहमत मीडिया पर लगा रही हैं, उनके समर्थक कीर्ति आजाद तोहमत भाजपा के भीतर के सुषमा-विरोधी किसी नेता पर लगा रहे हैं, लेकिन जिम्मेदारी तो खुद सुषमा पर आती है जो कि भारत के एक गंभीर जुर्म के आरोपी को मदद कर रही हैं, और अपने ही दूसरे साथी मंत्री के मंत्रालय को उस आरोपी की तलाश को अनदेखा कर रही हैं। 
यह पूरा सिलसिला पहली नजर जितना गंभीर दिख रहा है, वह जल्द ही सुषमा स्वराज के लिए भारी पड़ सकता है। अपने बहुत लंबे संसदीय जीवन, और खासे लंबे सरकारी अनुभव के बाद उनसे यह उम्मीद नहीं की जाती कि वे हितों के टकराव के ऐसे खुले मामले को अनदेखा करेंगी। यह सिलसिला मोदी सरकार पर भारी पड़ेगा, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी एक तरफ तो विदेशों से भारत का काला धन वापिस लाने के नारे के साथ सत्ता पर आए हैं, और अब काला धन विदेश ले जाने वालों को उनकी सरकार से ही ऐसी नाजायज मदद मिले, तो यह सरकार कैसी ईमानदारी का दावा कर सकती है? 

हिंसक हथियारबंद आंदोलनों में कमउम्र बच्चों का इस्तेमाल

संपादकीय
14 जून 2015

वैसे तो नक्सल मोर्चों पर मारे जाने वाले नक्सलियों की तस्वीरों को देखकर आमतौर पर लोगों के मन में हमदर्दी नहीं उमड़ती, क्योंकि लोगों का यह मानना रहता है कि वे बहुत से बेकसूर लोगों की मौतों के लिए जिम्मेदार रहते हैं, और थोक में कत्ल करते हैं। लेकिन कल बस्तर मारे गए हैदराबाद के एक छात्र का चेहरा देखकर लोग हैरान हैं, और तकलीफ में भी हैं कि एक बच्चे जैसे चेहरे वाला 20-22 बरस का यह नौजवान कम्प्यूटर के अपने हुनर के साथ भी, ग्रेजुएशन की डिग्री के साथ भी किस तरह जंगल के इस खतरनाक हथियारबंद आंदोलन से जुड़ा, और इतनी कमउम्र में जान खो बैठा। वैसे तो इस एक तस्वीर को अगर छोड़ दें, तो बहुत से दूसरे लोग इससे भी कमउम्र में मारे जाते हैं, जिनमें से कुछ अपनी मर्जी से नक्सल हिंसा में भागीदार रहते हैं, और कुछ ऐसे भी रहते हैं जिनको घरों से नक्सली उठाकर ले जाते हैं। दो-चार दिन पहले ही झारखंड में एक पुलिस मुठभेड़ में मारे गए एक दर्जन नक्सल आरोपियों के बारे में अब जानकारी आ रही है कि उसमें से शायद चार लड़के नाबालिग थे, लेकिन वहां के पुलिस प्रमुख का बयान आया है कि गोलियां उम्र नहीं देखतीं। 
भारत के कई राज्यों में बिखरे हुए, और जड़ें जमाए हुए नक्सल आंदोलन, या नक्सल-हिंसा में जगह-जगह कमउम्र बच्चों का इस्तेमाल हो रहा है। नक्सली हिंसा के अलावा इस एक बात के भी मुजरिम हैं कि वे बच्चों को हथियारबंद करके उनको खूनी मोर्चों पर इस्तेमाल कर रहे हैं। बच्चों का लड़ाई के मोर्चों पर इस्तेमाल दुनिया के बहुत से देशों में हो रहा है, और सीरिया या इराक से आई हुई वे तस्वीरें बहुत भयानक थीं जिनमें बहुत छोटे बच्चों के हाथों में पिस्तौल थमाकर उनसे कत्ल करवाया जा रहा था। लेकिन अफ्रीकी के कुछ मोर्चों पर, या कुछ मुस्लिम देशों में आतंकियों के मोर्चों पर नाबालिग हाथों में बंदूकें एक अलग बात है। जब भारत जैसे एक विकसित-लोकतंत्र में ऐसा जारी है, तो फिर यह सरकार/सरकारों की एक बड़ी नाकामयाबी तो है ही, यह अतिउग्र और हिंसक माओवादी आंदोलन का भी एक बेरहम चेहरा है जो कि बच्चों का लड़ाई में इस्तेमाल कर रहा है। इसके पहले भी ऐसे वीडियो सामने आए हैं जिनमें पुलिस और सुरक्षा बलों से बड़े मुठभेड़ के बाद भी लाशों के पास से हथियार बीनने के लिए नक्सलियों ने बच्चों का इस्तेमाल किया था। इससे परे भी कई मोर्चों पर नक्सली गांव के बच्चे-बड़े, महिलाएं, इनका इस्तेमाल एक आड़ की तरह करते आए हैं। 
लेकिन पिछले बरस एक खबर यह आई थी कि सीरिया से युद्ध की जिन तस्वीरों को खींचकर एक नाबालिग लड़का एक अमरीकी समाचार एजेंसी को भेज रहा था, और वह एजेंसी उस लड़के को उसका भुगतान भी कर रही थी, उसकी मौत फोटोग्राफी करते हुए ही हुई। अब सवाल यह उठता है कि जंग की फोटोग्राफी जैसे खतरनाक काम में एक नाबालिग लड़के से काम करवाना, या उसके काम का भुगतान करके इस्तेमाल करना एक मीडिया एजेंसी के लिए, खासकर अमरीकी एजेंसी के लिए कितना जायज था? क्या अमरीका का कानून वहां के किसी बच्चे के ऐसे इस्तेमाल की इजाजत देता? लेकिन दिक्कत यह है कि इस्लामी आतंक और गृह युद्ध से गुजरते हुए अरब देशों का हाल हो, या कि अफ्रीकी देशों का हाल हो, या फिर भारत जैसे नक्सल मोर्चों की बात हो, जिन हथियारबंद आंदोलनों को न लोकतंत्र पर भरोसा है, न देश के कानून की परवाह है, और न ही इंसानियत के आम पैमानों की जिनको फिक्र है, वैसे लोग बच्चों का इस्तेमाल करें, या घरों से लड़कियों को उठाकर ले जाएं और उनका सेक्स-गुलाम की तरह इस्तेमाल करें, इस पर कोई रोक तो है नहीं। अपने देश की सरकार के खिलाफ, वहां के संविधान के खिलाफ जो हथियारबंद आंदोलन चलते हैं, वे कौन-कौन से नियम-कानून तोड़ते हैं, उसका क्या महत्व है? जब पूरा आंदोलन ही हिंसक रहता है, अलोकतांत्रिक रहता है, गैरकानूनी रहता है, तो उसमें कमउम्र बच्चों का इस्तेमाल कैसे रोका जाए? 

मध्यप्रदेश महिला कांग्रेस की राजनीतिक कमअक्ली

संपादकीय
13 जून 2015

मध्यप्रदेश महिला कांग्रेस ने घोषणा की है कि वहां के भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को दो लाख चूडिय़ां भेंट की जाएंगी। प्रदेश में महिलाओं पर अत्याचार रोकने में नाकामयाब होने की वजह से मुख्यमंत्री को यह भेंट मिलने जा रही है। महिला कांग्रेस ने इसके लिए राज्य की सभी महिलाओं से दो-दो चूडिय़ां भेजने की अपील की है। आज इक्कीसवीं सदी में भी भारत की इस सबसे पुरानी पार्टी के प्रदेश स्तर के सबसे बड़े नेताओं की समझ का ठिकाना नहीं है। जिस पार्टी की मुखिया इंदिरा गांधी रहीं, आज सोनिया गांधी हैं, वह पार्टी चूडिय़ों को कमजोरी और नाकामयाबी का प्रतीक मान रही है। कोई और पार्टी ऐसा करती तो समझ आता, कोई पुरूषवादी संगठन ऐसा करता तो भी समझ आता, लेकिन महिला कांग्रेस चूडिय़ों को नाकामयाबी का प्रतीक माने, और एक आंदोलन का हथियार बनाए, यह शर्मनाक है, और इस पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर अपने नेताओं के राजनीतिक शिक्षण-प्रशिक्षण का काम करना चाहिए।
भारतीय समाज में महिलाओं से जुड़े हुए बहुत से ऐसे प्रतीक हैं जिनको कमजोरी का निशान, प्रतीक, या सुबूत मान लिया जाता है। इनमें चूडिय़ां सबसे लोकप्रिय और अधिक इस्तेमाल होने वाला प्रतीक है। इस देश में जो खाप पंचायती सोच चली आ रही है, और जिसके तहत इस देश के महान कहे जाने वाले लेखक-कवि महिलाओं को ताडऩ का अधिकारी लिखते आए हैं, जिस सोच के तहत इस देश में महिलाओं को सती बनाया जाता था, वृंदावन को उन महिलाओं से भर दिया गया है जो पति खो चुकी हैं, जिन महिलाओं को मां के पेट में ही भ्रूण की उम्र में ही मार डाला जाता है, उन महिलाओं को खुद अपने बारे में सोचना चाहिए, और अपनी तबके की ऐसी बेइज्जती नहीं करनी चाहिए जैसी कि मध्यप्रदेश महिला कांग्रेस कर रही है। 
अगर हमको ठीक याद पड़ रहा है तो दशकों पहले इंदिरा गांधी ने विरोध और प्रदर्शन के इस तरीके के खिलाफ सार्वजनिक बयान दिया था और नाराजगी जाहिर की थी कि महिलाओं के प्रतीक को कमजोरी का प्रतीक बनाना गलत है। लेकिन आज दशकों बाद भी अगर प्रमुख महिलाएं भी ऐसे ही प्रतीकों की कैद हैं, और वे एक गुलाम सोच को सार्वजनिक बढ़ावा दे रही हैं, तो इस पार्टी को पढऩे-लिखने की जरूरत है, और सार्वजनिक समझ पाने की जरूरत है। इसी समझ की कमी से देश की आधी आबादी को राजनीतिक आरक्षण देने से संसद और विधानसभाएं कतरा रही हैं। कई राजनीतिक दल सार्वजनिक रूप से महिला आरक्षण का विरोध कर रहे हैं, और जिस देश में पंचायत और वार्ड स्तर पर लडऩे के लिए न सिर्फ महिलाएं, बल्कि अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग जातियों की महिलाएं भी मिल जाती हैं, जीत जाती हैं, पंचायत और म्युनिसिपल चला रही हैं, वहां पर पुरूष प्रधान राजनीतिक दल यह झांसा देते आ रहे हैं कि विधानसभा और लोकसभा सीटों पर पर्याप्त महिला उम्मीदवार नहीं मिल पाएंगी। और मध्यप्रदेश महिला कांग्रेस मानो ऐसी ही सोच को बढ़ावा दे रही है। 
हमारा मानना है कि महिला अधिकारों की बात उठाने वाले जन संगठनों को ऐसे प्रतीकात्मक आंदोलनों के खिलाफ महिला आयोग में शिकायत दर्ज करानी चाहिए, और अदालत में जनहित याचिका दायर करनी चाहिए। वैसे तो किसी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज खुद होकर भी ऐसी खबर पर मध्यप्रदेश महिला कांग्रेस को नोटिस दे सकते हैं कि उसकी कमअक्ली महिला तबके की इज्जत के खिलाफ है। इस देश में महिलाओं के साथ भेदभाव करने वाले प्रतीकों, शब्दों, कहावतों और मुहावरों पर रोक लगाने की जरूरत है। सिर्फ कानून काफी नहीं है, सरकारों को अपने कामकाज में, समाज को अपनी भाषा में, और संगठनों को अपने तौर-तरीकों में महिलाओं के लिए अपमानजनक बातें खत्म करना पड़ेगा। यह काम आसान नहीं है, अभी कुछ दशक पहले तक भारत का हिन्दू समाज पति की मौत के बाद पत्नी को सती बनाने का हिमायती था। और तो और एक हाईकोर्ट के एक जज भी ऐसी हिमायत करते हुए खुलकर सामने आए थे। ऐसे देश में कांग्रेस पार्टी को अपने तौर-तरीके सुधार कर एक मिसाल पेश करनी चाहिए, और अगर सोनिया गांधी के रहते ऐसा नहीं होगा, तो कब होगा?


दिल्ली का टकराव पूर्ण राज्य बने बिना खत्म होना नामुमकिन

संपादकीय
12 जून 2015
दिल्ली को लेकर यह आशंका कुछ समय पहले से चल रही थी कि वहां निर्वाचित केजरीवाल सरकार और केन्द्र के मनोनीत उपराज्यपाल के बीच का टकराव बढ़ते-बढ़ते राष्ट्रपति शासन तक पहुंच सकता है। अब दिल्ली से ऐसी खबरें उठ रही हैं कि टकराव उस किनारे तक पहुंच गया है। और उपराज्यपाल अपने आप में कोई व्यक्ति न होकर केन्द्र सरकार के प्रति जवाबदेह और केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में काम करने वाला होता है, इसलिए यह टकराव मोटे तौर पर केजरीवाल सरकार और मोदी सरकार के बीच का है। हमने कुछ दिन पहले ही इसी जगह दिल्ली के इस टकराव के बारे में लिखा था और यह भी लिखा था कि इस राज्य को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाना जरूरी है, उसके बिना यह टकराव कभी भी हो सकता था। केन्द्र में एनडीए की सरकार रहते, और फिर यूपीए के दस बरसों में कांग्रेस की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कभी ऐसा टकराव नहीं होने दिया था, लेकिन चली आ रही व्यवस्था के भीतर से एक टकराव खड़ा करना ही केजरीवाल को सत्ता में लेकर आया था, और आज भी उनका वही मिजाज है, वही तेवर है। इसलिए शीला दीक्षित के वक्त का हाल अब जारी नहीं रह सकता। ऐसे में दिल्ली एक अभूतपूर्व संवैधानिक संकट देख रहा है, जब कचरा साफ करने वालों को तनख्वाह नहीं मिल रही है, और आज केन्द्र सरकार दिल्ली शहर के सफाई कर्मचारियों को वेतन के लिए पांच सौ करोड़ रूपए देने की घोषणा कर रही है। 
आम लोगों को दिल्ली राज्य की जटिलताओं का इतना अंदाज नहीं होगा। दिल्ली में पुलिस का काम केन्द्र सरकार के मातहत है। दिल्ली में म्युनिसिपल का काम निर्वाचित महानगरपालिका देखती है जो कि राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र से परे का काम है। इसके अलावा दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का दर्जा भी प्राप्त है, और दिल्ली मेट्रो या वहां के बड़े-बड़े फ्लाईओवर जैसे कई प्रोजेक्ट केन्द्र सरकार के शहरी विकास मंत्रालय के मातहत आते हैं। ऐसे में दिल्ली सरकार कहने के लिए तो एक निर्वाचित सरकार है, लेकिन कचरा उठाने से लेकर पुलिस सिपाही तक, और बड़े-बड़े शहरी ढांचों तक के मामले उसके अधिकार क्षेत्र के बाहर के हैं। फिर दिल्ली से लगे हुए तीन राज्य ऐसे हैं, जिनके कुछ-कुछ हिस्से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, एनसीआर, में आते हैं, और वहां तक ढांचागत सुविधाओं को जोडऩे के लिए फिर केन्द्र सरकार तस्वीर में आ जाती है। 
पिछले विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की नई-नई पार्टी ने जिस तरह देश में चली आ रही मोदी लहर को मानो पानी की एक टंकी में बांधकर रख दिया था, उससे भाजपा के बहुत से लोग बहुत बुरी तरह विचलित भी थे। इसलिए आज अगर दिल्ली भाजपा के नेता, केन्द्र सरकार के मंत्री, अपनी तमाम ताकत का इस्तेमाल करके केजरीवाल को परेशान करना चाह रहे हैं, तो इसमें भारत की आम राजनीति है, और कोई अनोखी बात नहीं है। ठीक इस घमासान लड़ाई के बीच केजरीवाल दो-चार और मुसीबतों में घिरे हैं, ईमानदारी का दावा करने वाली पार्टी का कानून मंत्री फर्जी डिग्री में गिरफ्तार हो चुका है, और इस पार्टी का पिछला कानून मंत्री उस वक्त एक अफ्रीकी महिला से बदसलूकी करते पकड़ाया था, आज वह अपनी बीवी की घरेलू हिंसा की रिपोर्ट में आरोपी है। घर और बाहर हर तरफ से घिरे हुए केजरीवाल के लिए आज इस टकराव को नाटकीय बनाना भी एक विकल्प हो सकता है, और हो सकता है कि बेकाबू सरकार, बेकाबू केन्द्र सरकार, और बेकाबू संघीय ढांचे के बीच वे एक बार फिर अंगूठा चीरकर तिलक लगाकर शहीद होना चाहें। 
लेकिन इन तमाम बातों से परे इस देश में आज जरूरत यह है कि दिल्ली को एक पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए। ऐसा ही एक शहर वाला एक पूरा देश सिंगापुर है जो कि अपनी कुछ किस्म की कामयाबियों के लिए दुनिया में एक मॉडल माना जाता है। दिल्ली में ऐसी कोई बात नहीं है जो कि भारत की एक निर्वाचित राज्य सरकार काबू न कर सके, इसलिए केन्द्र सरकार को दिल्ली चलाने का मोह छोडऩा चाहिए, और भारत के संघीय ढांचे में चल रहे इस टकराव को खत्म करना चाहिए। आज केजरीवाल की पार्टी मोटे तौर पर एक राज्य में सीमित है, इसलिए उनके साथ केन्द्र सरकार के  चल रहे सुलूक के खिलाफ न तो एनडीए के लोग हैं, और न ही यूपीए के लोग हैं। लेकिन संघीय ढांचे में परंपराएं अच्छी ही कायम होना चाहिए, इसलिए पार्टीबाजी छोड़कर देश के लोकतांत्रिक दलों को दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलवाने की वकालत करनी चाहिए। 

टीबी के इलाज में सरकार से परे समाज की भी जरूरत

संपादकीय
11 जून 2015

अमरीका से एक खबर आई है कि वहां पर दवाओं से प्रतिरोध विकसित कर चुकी एक भारतीय महिला टीबी मरीज को लेकर तीन राज्यों में दहशत फैली हुई है। पिछले कुछ हफ्तों में वह अमरीका के इन राज्यों में अपने रिश्तेदारों और परिचितों से मिल रही थी, और बीमारी का उसका दर्जा अत्यंत दवा प्रतिरोधी टीबी माना जा रहा है। अब उसके संपर्क में जो-जो लोग आए हैं, उनकी तलाश की जा रही है। 
भारत में दुनिया के सबसे अधिक मरीज तकरीबन हर बीमारी के हैं, और टीबी के भी। यह गरीबी और कुपोषण पर पलने वाली बीमारी है, और भारत में इसका इलाज मोटे तौर पर सरकारी अस्पतालों से ही होता है, और भारत के सरकारी अस्पतालों का हाल जगजाहिर है। न जांच, न डॉक्टर, न दवा, और न खुराक, इनमें से किसी बात की गारंटी नहीं होती है, और टीबी एक ऐसी बीमारी है जिसमें बीच में जहां दवा छूटी, वहां वह बीमारी उस दवा से प्रतिरोध विकसित कर लेती है। साधारण टीबी बढ़कर मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट टीबी हो जाती है, और जैसा कि अभी अमरीका की खबर में है, वह एक्स्ट्रीम ड्रग रेजिस्टेंट हो जाती है। और जिन लोगों को ऐसी टीबी से संक्रमण होता है, उनकी बीमारी साधारण टीबी नहीं होती, वह ऐसे ही खतरनाक दर्जे की टीबी होती है। 
भारत जैसे गरीब आबादी वाले देश में छोटे-छोटे कमरों, और कोठरियों में परिवार के कई लोग रहते हैं। और उनमें से एक को अगर टीबी है, तो बाकी लोगों को भी वह बीमारी फैलने का खतरा बहुत बड़ा हो जाता है। सरकार की तरफ से इसके इलाज का प्रचार तो होता है, लेकिन अगर मरीज अस्पताल तक दवा लेने के लिए हर कुछ हफ्तों या महीनों में न पहुंच सके, तो सरकारी या सामाजिक ढांचा ऐसा नहीं है कि मरीज और दवा का मेल करवा सके। इसके साथ-साथ परिवार के बाकी लोगों को सावधानी बरतना-सिखाना, खानपान का ठीक-ठाक इंतजाम करना, यह सब गरीबी के बीच मुमकिन नहीं होता है। 
और टीबी से परे भी गरीबी में पनपने वाली मलेरिया जैसी कई जानलेवा बीमारियां हैं, और जिस तरह टीबी के कीटाणु प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं, उसी तरह मलेरिया फैलाने वाले मच्छर भी एक-एक करके कई दवाओं से प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं, और फिर मलेरिया को रोक पाना आसान नहीं होता। छत्तीसगढ़ में गांवों और गरीब इलाकों में मलेरिया से होने वाली मौतों का हाल यह है कि बस्तर के नक्सल मोर्चे पर तैनात राज्य पुलिस और सीआरपीएफ जैसे सुरक्षा बलों के जवान उनको इलाज हासिल रहते हुए भी मलेरिया से मारे जाते हैं। गरीबी और गंदगी के अलावा इलाज से दूरी भी एक वजह है, और छत्तीसगढ़ में जगह-जगह यह बात भी आड़े आती है। 
फिर दुनिया के दवा कारोबार और इलाज के उद्योग के साथ एक दिक्कत यह है कि शोध कार्य में होने वाला बड़ा खर्च उन बीमारियों या दवाओं के लिए होता है जिनकी खपत संपन्न तबके में अधिक है। गरीबों के बीच होने वाली बीमारियों के लिए दवा बनाकर भी दवा कंपनियां किसी को महंगे में तो बेच भी नहीं सकतीं। इसलिए गरीबी की बीमारियों पर शोध कार्य किसी पूंजीवादी सरकार या कारोबार की प्राथमिकता नहीं रहती। इसलिए भारत जैसे देश में टीबी से बचाव एक बड़ी फिक्र की बात है, और सरकारी अस्पतालों से मुफ्त दवा के अलावा भी सामाजिक ढांचे को टीबी के मरीजों को खानपान में मदद करनी चाहिए। अंग्रेजों के साथ इस देश में जो ईसाई मिशनरी के लोग आए थे, उन्होंने देश भर में जगह-जगह टीबी के अस्पताल खोले थे, और टीबी के अलावा कुष्ठ रोग जैसी बीमारियों को दूर करने के लिए आश्रम खोलने के काम उन्होंने ही किए थे। आज भी चाहे ऐसे आश्रमों की जरूरत न हो, लेकिन इलाज में सामाजिक क्षेत्र के वैसे ही योगदान की जरूरत है। 

केजरीवाल-टोली का ओछापन मुद्दे को छोड़ तरीकों पर सवाल

संपादकीय
10 जून 2015

दिल्ली की केजरीवाल सरकार के कानून मंत्री जितेन्द्र तोमर को दिल्ली पुलिस की फर्जी डिग्री के मामले में गिरफ्तार किया है। पिछले कुछ महीनों से यह मामला खबरों में था, और दिल्ली के वकीलों के संगठन ने इसे लेकर तोमर के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। हफ्तों की जांच के बाद कल यह कार्रवाई की गई, और केजरीवाल सरकार के लोगों ने इसके खिलाफ हल्ला बोल दिया है। केन्द्र सरकार के मातहत आने वाले दिल्ली के उपराज्यपाल (लेफ्टिनेंट गवर्नर) के साथ निर्वाचित दिल्ली सरकार की जो तनातनी चल रही है, वह भारत की संवैधानिक व्यवस्था पर एक बड़ा तनाव डाल रही है। जिस अंदाज में दिल्ली सरकार में अफसर लाए और हटाए जा रहे हैं, और सीएम और एलजी के अधिकार क्षेत्रों को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में सुनवाई चल रही है, उस अंदाज के चलते हुए केन्द्र की मातहत दिल्ली पुलिस की यह कार्रवाई केजरीवाल सरकार पर भारी पडऩी भी थी, और केजरीवाल के साथी दिल्ली पुलिस के तौर-तरीकों को लेकर, विधानसभा अध्यक्ष को पहले खबर न करने को लेकर कई तरह के आरोप लगा रहे हैं। 
राजनीतिक कीचड़बाजी के चलते हुए मुद्दे की बात धरी रह जा रही है। मुद्दा यह है कि किसी ने हलफनामे के तहत चुनाव आयोग को अपनी जो शैक्षणिक योग्यता बताई थी, उसके गलत होने का आरोप है, और उसके साथ-साथ जो डिग्री लगाई गई थी, या बताई गई थी, उसके फर्जी होने का भी आरोप है। अब सवाल यह उठता है कि राजनीतिक तनातनी के चलते रहने से एक राजनीतिक सत्ता के मातहत आने वाली पुलिस, दूसरी राजनीतिक सत्ता के मातहत आने वाले मंत्री पर कार्रवाई करे, या न करे? यह नौबत राज्यों और केन्द्र में तब भी आती है जब एक सत्ता जाती है, और दूसरी पार्टी की सत्ता आती है। उस वक्त भी यह कहा जाता है कि गड़े हुए मुर्दे क्यों उखाड़े जा रहे हैं? या विच-हंटिंग (चुड़ैल का शिकार), क्यों किया जा रहा है? तो ऐसे में लोकतंत्र में सत्ता पलट के साथ ही पुराने कुकर्म और पुराने जुर्म दफन ही कर दिए जाने चाहिए, और किसी ताकतवर पर कार्रवाई होनी ही नहीं चाहिए। 
दिल्ली के मामले में आम आदमी पार्टी और केजरीवाल सरकार का रूख बहुत ही शर्मनाक, और धिक्कार के लायक है। यह वही पार्टी है जो गर्मी के मौसम के आमों की तरह आम-आम करते हुए आम आदमी और आम नागरिक की बात करते हुए, अपने आपको आम बताते हुए, खास को धिक्कारते हुए, वीआईपी शब्द को गंदा बताते हुए सत्ता पर पहुंची, और आज अपने एक मंत्री पर पुलिस की एक कार्रवाई के खिलाफ वह यह गिनवा रही है कि मंत्री को गिरफ्तार करने कितनी पुलिस पहुंची, और कितनी गाडिय़ों में पहुंची। हकीकत यह है कि यह बात पूरी तरह से महत्वहीन और प्रसंगहीन है कि गिरफ्तारी की तरीका क्या रहा। महत्वपूर्ण यह है कि केजरीवाल सरकार का एक मंत्री पुलिस की जांच में फर्जी डिग्री वाला पाया गया, और उसे गिरफ्तार किया गया। अब इस सरकार को और मंत्री को अपने को हासिल कानूनी बचाव देखना चाहिए, और इसे राजनीतिक हथियार बनाकर वह मोदी या एलजी पर जितने भी हमले करेगी, उससे अपना ही ओछापन साबित करेगी। 
सार्वजनिक जीवन और भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति में जनता की अदालत और कानून की अदालत के मौके अलग-अलग होते हैं। जितने धूर्त नेता होते हैं, वे कानून की अदालत में फंसने पर जनता की अदालत की बात करते हैं, और जनता की अदालत में खारिज हो जाने पर कानून की अदालत की बात करते हैं। यह सिलसिला बहुत ही घटिया है, और इसने आम आदमी पार्टी के पाखंड को बुरी तरह उजागर कर दिया है। अगर दिल्ली पुलिस ने केजरीवाल के मंत्री को गलत सुबूतों पर गिरफ्तार किया है, तो यह तय है कि यह दिल्ली पुलिस के आका, केन्द्र सरकार पर ही भारी पड़ेगा। लेकिन जब तक किसी अदालत से ऐसा साबित नहीं हो जाता है तब तक केजरीवाल और उनके बड़बोले साथियों को अपने गिरफ्तार साथी की हिमायत में दूसरों पर हमले करने का ओछा काम नहीं करना चाहिए। 

ऐसे आदित्यनाथों से दहशत फैल रही है, हिकारत भी

9 जून 2015
संपादकीय

न चाहते हुए भी आज फिर आदित्यनाथ सरीखे के बयान को लेकर इस जगह लिखना पड़ रहा है। भाजपा के इस योगी कहे जाने वाले सांसद की हिंसक और साम्प्रदायिक बातों को लेकर मोदी सरकार की कई अच्छी खबरें पहले पन्ने से भीतर के पन्नों पर खिसकते रही हैं, और आज फिर वही हुआ है। आदित्यनाथ ने कहा है कि जो लोग योग का विरोध कर रहे हैं, उन्हें भारत छोड़ देना चाहिए, और जो लोग सूर्य नमस्कार को नहीं मानते, उन्हें समुद्र में डूब जाना चाहिए। भारत छोडऩे की बात नई नहीं है। कुछ ही दिन पहले मोदी के एक मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा था कि जिन लोगों को गोमांस खाना है, उन लोगों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए। इसके पहले भी भाजपा के एक और बड़े बिहारी नेता गिरिराज सिंह ने कहा था कि जो लोग मोदी सरकार का विरोध करते हैं, उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए। 
अब कुल जमा बात यह बन रही है कि इस देश के वे तमाम हिंदू पाकिस्तान चले जाएं जो कि गोमांस खाते हैं, तो ऐसे में दलितों-आदिवासियों सहित दसियों करोड़ हिंदू इस देश से कम हो जाएंगे। इसके बाद केरल, पश्चिम बंगाल, उत्तर-पूर्व, कश्मीर, और दक्षिण भारत की कुछ दूसरी जगहों के अल्पसंख्यक भी कुछ करोड़ कम हो जाएंगे। फिर जो लोग मोदी सरकार का विरोध करते हैं, वे भी अगर पाकिस्तान भेज दिए गए, तो दसियों करोड़ लोग और कम हो जाएंगे, क्योंकि इतने लोगों ने तो मोदी के खिलाफ वोट दिया ही था। अब जो बचे-खुचे हैं, उनमें से जो लोग देर से सोकर उठते हैं, और सूर्य नमस्कार पर जिनकी आस्था नहीं है, ऐसे दसियों करोड़ लोग और चल बसेंगे। इन सबको मिला लें तो भाजपा के ये तीन नेता ही मिलकर देश की आबादी को आधी करने पर उतारू हैं। 
अब एक सवाल यह उठता है कि मोदी जैसे ताकतवर के मुखिया रहते हुए और उनके सबसे करीबी सहयोगी के भाजपाध्यक्ष रहते हुए क्या भाजपा के भीतर किसी की यह मजाल हो सकती है कि मोदी की सहमति और अनुमति के बिना इस तरह की बातें करे? आज कांगे्रस मुख्यमंत्रियों की बैठक में कांगे्रसाध्यक्ष सोनिया गांधी ने यह बात कही भी है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने सहयोगी की कही हुई साम्प्रदायिक बातों को अनदेखा करते हैं, और दूसरी तरफ अपने-आपको अच्छी सरकार का चैंपियन बताते हैं। उन्होंने कहा कि मोदी अपने साथियों को ऐसे बयान देने की छूट देते हैं। 
यह बात मोदी के समर्थकों और प्रशंसकों में से जो लोग साम्प्रदायिक हिंसा वाले नहीं हैं, उनके बीच भी चल रही है कि मोदी के मौन को सहमति के अलावा और क्या माना जा सकता है? संस्कृत में बहुत पहले लिखा गया था कि मौन: सम्मति लक्षणम्..., आज मोदी के साथी अच्छे भले विज्ञान को, अच्छे भले योग को साम्प्रदायिक लहू में लपेटकर बहुत से लोगों से परे करवा दे रहे हैं। यह पूरी की पूरी सोच बहुत ही हिंसक और साम्प्रदायिक है, यह देश को काटने और बांटने वाली है, देश को छोड़कर लोगों को बाहर जाने के लिए कहना देश की बहुत बड़ी आबादी का अपमान है। और अगर मोदी या उनकी पार्टी का यह सोचना है कि लोगों को काट-काटकर, अपने से दूर करके भाजपा का कोई चुनावी फायदा हो रहा है, तो ऐसा बिल्कुल नहीं है। यह सिलसिला ऐसे किसी चुनावी गणित से परे भी थमना चाहिए, क्योंकि इससे देश के कई तबकों में दहशत फैल रही है, और हिकारत भी।

कुछ बच्चे फूल से कालीनों पर लोटपोट, और कुछ मां-बाप के लहू से भीगे हुए

08 जून 2015
ब्रिटेन में शाही परिवार को लेकर बावले लोगों में एक तस्वीर तैर रही है कि किस तरह राजघराने के सबसे नए बच्चे एक साथ हैं, और एक-दो बरस का राजकुमार, एक-दो महीने की राजकुमारी को चूम रहा है। एक भाई और बहन की ऐसी तस्वीर जाहिर है कि देखने वालों को छू जाती है। लेकिन यह तस्वीर देखते ही एक दूसरी तस्वीर दिमाग में आती है जिसमें वियतनाम में काम पर गए मजदूरों के दो बहुत छोटे बच्चे घर पर हैं, और दो-तीन बरस का भाई अपनी डरी-सहमी रोती हुई एक-दो बरस की बहन को लिपटाकर उसे चुप करा रहा है, उसे हौसला दे रहा है। 
लेकिन इसके साथ-साथ मुझको एक दूसरी तस्वीर भी याद पड़ती है जिसमें कुछ बरस पहले इराक की एक तस्वीर है जिसमें वहां की सड़क पर बिखरे हुए खून के बीच एक बच्ची दहशत में भरी हुई चीख रही है, क्योंकि कार में उसके बीमार भाई को अस्पताल ले जाकर वापिस लाते मां-बाप को अमरीकी सैनिकों ने कार रोककर गोलियां मार दी थीं, और मां-बाप के लहू के बीच, उस लहू से सनी हुई वह बच्ची जोरों से चीख रही है। 
बच्ची तो बच्ची है। फिर वह चाहे अपने राजकुमार भाई की गोद में ब्रिटिश राजघराने की बच्ची हो, या फिर अमरीकी हमले में एक पूरी पीढ़ी खोने वाले वियतनाम के मजदूर मां-बाप की अकेली बच्ची हो, या फिर इराक में अमरीकी गोलियों में मां-बाप को खोकर अकेले बीमार भाई के साथ बची हुई लहू से सनी हुई बच्ची हो। और दुनिया की बच्चियों के बीच, उनकी खुशियों और उनकी तकलीफों के बीच का यह फासला दुनिया की हमलावर राजनीति का तय किया हुआ है। वियतनाम की एक पूरी पीढ़ी को अमरीकी फौजी हमले ने खत्म कर दिया, और इतिहास में वियतनाम की उस बच्ची की तस्वीर इस जंग के पोस्टर की तरह दर्ज है जिसमें नापाम बम की आग से बचकर भागती हुई वह वियतनामी बच्ची बिना कपड़ों के ही सड़क पर दहशत में दौड़ी जा रही है। ऐसे बच्चे अमरीकी हमलों और उसके गिरोह के देशों के हमलों से दुनिया भर में लहूलुहान हैं। 
आज इस पर लिखने का मौका इसलिए है कि इराक से आई एक रिपोर्ट में 2005 की उस खून भरी रात वाली बच्ची की नई तस्वीर है, अब वह 15 बरस की है, और उसने 2011  तक अपनी वह तस्वीर नहीं देखी थी जिसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया था (शायद अमरीकी गिरोह को छोड़कर)। समर नाम की यह बच्ची उस रात पांच बरस की थी, और कुछ बरस पहले उसने अपनी वह तस्वीर देखी जिसमें वह अमरीकी सैनिकों के बीच खड़ी हुई, अपने मां-बाप के लहू से सनी हुई, चीख रही है। यह तस्वीर जिस युद्ध-फोटोग्राफर ने खींची थी वह भी अभी कुछ समय पहले लीबिया में युद्ध की तस्वीरें खींचते हुए मारा गया है। लेकिन समर की यह तस्वीर एक ऐतिहासिक तस्वीर बन गई है, जिसके देश में लाखों लोग अमरीकी हमले के बाद शारीरिक और मानसिक सदमों के शिकार होकर पड़े हैं। 
अभी-अभी अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के दफ्तर से राष्ट्रपति निवास व्हाईट हाउस से निकली कुछ तस्वीरें सामने आई हैं, जिनमें ओबामा वहां पहुंचे बहुत छोटे बच्चों के साथ बच्चे बनकर खेल रहे हैं, या बच्चे उनके आसपास जिद में कालीन पर लेटे हुए हैं। कुछ बरस पहले का बराक ओबामा का वह बयान भी याद करने लायक है जिसमें उन्होंने अपनी बेटियों के बारे में कहा था कि इराक जैसी तस्वीरों को वे अपने बेटियों को दिखाने का हौसला नहीं कर सकते।
जिस दुनिया से इस सदी में सरहदों से परे कई मामलों में एक होने की उम्मीद की जाती है, जहां पर लोगों की आवाजाही बढ़ती जा रही है, कारोबार बढ़ते जा रहा है, वहां पर अगर एक देश के बच्चे मां-बाप के लहू से भीगे हुए बड़े होंगे, और दूसरे देशों में बच्चों को फूलों की तरह हथेलियों पर रखा जाएगा, तो यह फासला क्या दुनिया में कभी अमन-चैन आने देगा? और खासकर तब जब ये हमले किसी देश या गिरोह द्वारा धर्म के आधार पर किए जाएं, तेल के कुओं पर कब्जे के लिए किए जाएं, किसी दूसरे देश को अपनी बराबरी के हथियार बनाने से रोकने के लिए किए जाएं, किसी दूसरे देश में वहां के मुखिया को मारने के लिए किए जाएं, वहां की खदानों के लिए किए जाएं, वहां पर अपने किस्म का एक तथाकथित लोकतंत्र कायम करने के लिए किए जाएं, तो फिर वहां की आने वाली पीढिय़ां किस तरह इससे उबर पाएंगी? 
आज दुनिया का मीडिया सिर्फ ताकतवर मुल्कों के कब्जे वाले ताकतवर मालिकों के कब्जे का नहीं रह गया है। सोशल मीडिया के मार्फत किसी तकलीफदेह की, किसी जख्मी की तस्वीरें उतनी ही रफ्तार से फैल सकती हैं जितनी रफ्तार से व्हाईट हाउस के कालीन पर लोटपोट होते बच्चे की, या कि बकिंघम पैलेस के राजकुमार और राजकुमारी के बचपन की। अब दुनिया में बहुत सी हिंसा और बहुत सा आतंक दुनिया के किसी मुल्क की सरकारी हिंसा और सरकारी आतंक के जवाब में होने के खतरे कायम हैं। ये कुछ उसी तरह के हैं कि जिस तरह एक वक्त फूलन के साथ एक दूसरी जाति के गिरोह ने सामूहिक बलात्कार किया था, और फिर उसके जवाब में फूलन ने गिरोह बनाकर दूसरी जाति की महिलाओं के साथ अपने गिरोह के आदमियों से वही कुछ करवाया था। 
दुनिया में आज धर्म के आधार पर, रंग के आधार पर, और धर्म के भीतर के समुदायों के आधार पर भी, ईश्वर की उपासना के तौर-तरीकों के आधार पर, अर्थव्यवस्था और कारोबार में एकाधिकार की चाह के आधार पर, ऐसे सौ आधारों पर भेदभाव हिंसा और हमलों की हद तक चल रहा है। ये आधार आने वाली दुनिया में हिंसा और आतंक की बुनियाद से कम कुछ नहीं हैं। आज अलग-अलग देशों के बीच, किसी एक देश में वहां के अलग-अलग तबकों के बीच भेदभाव से जो हिंसा हो रही है, उसकी प्रतिक्रिया में आज, कल, या परसों, जवाबी हिंसा होना तय है। और महज अमरीका को गालियां क्यों दें, हिन्दुस्तान के भीतर ही जिस तरह आज दलितों को पीने के पानी के हक से भी रोका जा रहा है, जहां पर एक दलित दूल्हे के घोड़ी पर चढऩे पर भी उसका कत्ल होता है, जहां पर दलित महिलाओं को महज बलात्कार का हकदार माना जाता है, वहां पर देशों के भीतर भी बेइंसाफी के खिलाफ हिंसा तय है। 
भारत जैसे लोकतंत्र में हम देखते हैं कि बहुत से तबकों के लिए इंसाफ पाने का अकेला जरिया हिंसा है, और ऐसा ही दुनिया के देशों के बीच भी है। एक तरफ कालीनों पर लोग अपने बच्चों को लोटपोट करवाते रहें, और वे ही लोग दूसरे देशों में बच्चों को उन्हीं के बेकसूर मां-बाप के लहू से नहलाते रहें, तो जवाबी हिंसा से ऐसे लोग और ऐसी दुनिया बच नहीं सकते। दुनिया में जैसे-जैसे कानून का राज बढऩे का एक ढकोसला खड़ा किया जा रहा है, बढ़ाया जा रहा है, एक झांसा पैदा किया जा रहा है, वैसे-वैसे हकीकत में भेदभाव और फर्क की हिंसा बढ़ते चल रही है। 
लोगों को भूलना नहीं चाहिए कि दुनिया के देशों ने मिलकर संयुक्त राष्ट्र संघ नाम का एक संगठन खड़ा किया था जिससे उम्मीद की जाती थी कि वह देशों के बीच के झगड़ों को निपटाएगा। लेकिन ताजा इतिहास बताता है कि अभी दस बरस पहले ही तब के अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने संयुक्त राष्ट्र की अपील को खारिज करते हुए झूठे गढ़े हुए एक मामले को दिखाकर, एक साजिश बनाकर इराक पर हमला किया था, और वहां के शासक सद्दाम हुसैन का कत्ल किया था। अभी फिर ताजा खबरें ये आ रही हैं कि ओसामा-बिन-लादेन को मारने के लिए अमरीका ने अपने हत्यारों की जो टोली बनाई थी, उसने दुनिया में घूम-घूमकर कत्ल किए, और बेहथियार लोगों को भी मारा। 
लेकिन हम आखिर में शुरू की बात पर लौटते हैं कि जो लोग अपने बच्चों और दूसरे बच्चों के बीच हक का इतना बड़ा फासला हिंसा करके खड़ा करते हैं, वे आगे चलकर कभी न कभी एक जवाबी हिंसा का शिकार होंगे क्योंकि ऐसे जख्मी लोगों के लिए दुनिया में कोई अदालत नहीं है। 

लाल बत्तियों और सायरनों से सड़कों पर बिखरता लहू

संपादकीय
8 जून 2015

मध्यप्रदेश के एक मंत्री की गाड़ी से दो लोगों को टक्कर लगी और एक की मौत हो गई। आज सुबह की इस खबर से पहले कल या परसों ही इसी प्रदेश से एक दूसरी खबर थी कि एक विधायक की गाड़ी से टक्कर में एक मौत हुई, और विधायक का ड्राइवर गिरफ्तार हुआ। लेकिन यह बात सिर्फ मध्यप्रदेश की हो ऐसा नहीं है। छत्तीसगढ़ में भी हम कई बार ऐसा देखते हैं, और लोग ऐसी लाल-नीली बत्तियों वाली गाडिय़ों से जख्मी होते हैं या मरते हैं तो ही खबर बनती हैं। इससे पहले लोगों को कूद-कूदकर, छिटककर सड़क के किनारे होना पड़ता है, और सायरन-बत्तियों को रास्ता देना पड़ता है। यह सायरन-बत्तियां फायर ब्रिगेड, एम्बुलेंस, या पुलिस की ड्यूटी-गाडिय़ों की हो, तो भी ठीक है, ये सब तो सत्ता के आसपास के तमाम लोग लगाकर घूम रहे हैं।
अखबारों में आए दिन सत्ता पर सवार लोगों की ऐसी गाडिय़ों की तस्वीरें छपती हैं जो कि नंबर प्लेट की जगह ओहदों वाली पट्टियों की होती हैं, और जिनके सिर पर बत्तियां और सायरन लगे होते हैं। जनता में मानो दहशत पैदा करने के लिए गाडिय़ों के सिर पर दो-दो, तीन-तीन सायरन लगा दिए जाते हैं, और ताकतवर ओहदों वाले लोगों के आसपास के ड्राइवर और सुरक्षाकर्मी भी अकेले चलते हुए भी सड़क खाली करवाने के लिए इनका इस्तेमाल करते रहते हैं। 
सत्ता की ताकत के इस्तेमाल का यह एक बहुत ही हिंसक और अश्लील नजारा है। यह रंग-ढंग ऊपर से शुरू होता है और नीचे तक चले आता है। पुलिस के एक सिपाही के घर वाले भी मोटर साइकिल की नंबर प्लेट पर नंबर की जगह पुलिस लिखवाकर चलते हैं, अखबारों में काम करने वाले लोगों से परे, इतने लोग नंबर प्लेट पर प्रेस लिखवाकर चलते हैं कि उनमें कपड़े प्रेस करने वाले लोग भी जरूर शामिल रहते होंगे, वरना इतने प्रेस वाले आएंगे कहां से? भारतीय लोकतंत्र में बेशर्मी इतने गहरे तक घर कर गई है कि किसी को दूसरों को कुचलने में कोई शर्म महसूस नहीं होती। लोग गाडिय़ों के काफिलों में चलते हैं, क्योंकि ऐसे काफिले ताकत का प्रतीक बन जाते हैं, और लोग ऐसा मानकर चलते हैं कि यह ताकत उनको अपनी जिंदगी के आखिरी दिन तक के लिए मिली हुई है। लोग दूसरों को सड़कों से खदेड़ते हुए अपने काफिलों को खूनी रफ्तार से दौड़ाते हैं, यह मानकर कि उनके मौजूद रहते किसी और को सड़क पर रहने का कोई हक नहीं है। 
ऐसा सिलसिला भारत में खत्म होना आसान इसलिए नहीं है कि यहां सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज भी ऐसी ही गाडिय़ों, और ऐसे ही सायरन वाले काफिलों में चलते हैं, और सत्ता के इस आतंक का मजा लेते हुए, आम जनता में आतंक पैदा करते हुए अब उनकी सोच इस कदर सामंती हो गई है कि वे इससे परे रहकर शायद हीन भावना का शिकार हो जाएंगे। जिन बड़ी अदालतों के जज छोटी-छोटी बातों पर जनता के बुनियादी हकों को लेकर सुनवाई करते हैं, और सरकार के फैसलों को खारिज करते हैं, उन्हें यह न सूझना मुमकिन नहीं लगता कि किसी जज के लिए बजाए जाते सायरन से सड़क की बाकी जनता के बुनियादी हक कुचले जाते हैं। और फिर ऐसे जज सायरन बजाकर चलकर दस मिनट जल्दी पहुंचकर क्या कोई ऐसा फैसला लिखने वाले हैं जिसमें दस मिनट की देर होने से एक भूचाल आ जाएगा? क्या एक नेता या अफसर सायरन बजाकर, लोगों को सड़क से हटवाकर जाकर आनन-फानन बिजली की रफ्तार से कोई ऐसा हुक्म करने वाले हैं जिसमें देर होने से जनता भूखी मर जाएगी? 
सत्ता इंसानियत को छीन लेती है। वैसे इंसानियत अपने आप में बड़ा दगाबाज शब्द है, और इसका जो प्रचलित अर्थ है, उससे परे इंसानियत का सही मतलब तो अच्छी और बुरी उन तमाम बातों के एक बंडल का है, जिसके भीतर इंसान और हैवान दोनों ही एक साथ काबिज हैं। इंसान अपने भीतर के हैवान को छुपाने के लिए इंसानियत शब्द को एक अलग मतलब दे देते हैं, और हैवान अपने से बाहर के किसी काल्पनिक जंतु को बता देते हैं। दरअसल इंसान के भीतर ही यह हैवान भी है, और दुनिया में जैसे-जैसे इंसान को ताकत मिलते चलती है, सबसे पहले वह ताकत उसके भीतर के हैवान को मजबूत करती है। इसी बात को लोग प्रचलित शब्दों में कहते हैं कि ताकत उनके सिर पर चढ़ गई है। यही सिर पर चढ़ी ताकत बिना नंबर प्लेट चलने में गौरव हासिल करती है, लाल-नीली बत्तियां जलाकर, सायरन बजाकर, सड़कों से आम जनता को किनारे धकेलकर अपने अहंकार को सहलाती है। 
क्या भारत की कोई अदालत अपने खुद के इस सामंती मजे पर रोक लगा सकेगी?

बलात्कारियों के हिमायती मंत्रियों के खिलाफ जनहित याचिका दायर करने की बड़ी जरूरत

संपादकीय
7 जून 2015

उत्तरप्रदेश के एक मंत्री ने कहा है कि बलात्कार आपसी सहमति से होते हैं। यह सोच लोहिया का नाम लेकर बनी समाजवादी पार्टी के मंत्री का है। दूसरी तरफ देश के एक दूसरे हिस्से में गोवा के एक मंत्री ने अपने राज्य में पहुंची दूसरे राज्यों की महिलाओं से सामूहिक बलात्कार को नादानी बताया है। इस तरह की बातें देश के अलग-अलग हिस्सों में बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोग कहते ही रहते हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद जल्द ही पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी को एक बलात्कार की शिकायत का सामना करना पड़ा, और पुलिस की जांच शुरू भी होने के पहले उन्होंने इसे राजनीतिक साजिश करार दे दिया, यह एक और बात है कि हफ्तों के भीतर ही पुलिस ने इस शिकायत को सही पाया और बलात्कारियों को गिरफ्तार भी किया। दिल्ली के एक पिछले पुलिस कमिश्नर ने यह सवाल उठाया था कि रात आठ बजे के बाद लड़कियां अपने घर के किसी आदमी के साथ क्यों बाहर नहीं निकलतीं, अकेले क्यों जाती हैं?  एक किसी महान भारतीय ने उसी समय यह बयान भी दिया कि नूडल्स खाने से बलात्कार की घटनाएं बढ़ती हैं। इस मुताबिक तो अब मैगी पर रोक लगने के बाद बलात्कार करीब-करीब खत्म हो जाने थे। 
लेकिन बलात्कार को अकेले देखना उसकी जड़ों को अनदेखा करना होगा। भारतीय समाज में कन्या भ्रूण से लेकर सतीप्रथा तक लड़की और महिला को प्रताडि़त करने के इतने किस्म के मौलिक तरीके आजाद भारत में भी जारी हैं कि जिन्हें देखकर दुनिया हक्का-बक्का रह जाती है। लोग कन्याओं को थोक में मार रहे हैं, कहीं मां मार रही है, कहीं बाप मार रहा है, और छत्तीसगढ़ में तो अभी-अभी बेटे की चाह में एक बाप ने दो बेटियों को मार डाला। ऐसे देश में महिला के लिए जो हिकारत सैकड़ों बरस से समाज में, और खासकर हिन्दू समाज में, और खासकर गैरदलित-गैरआदिवासी हिन्दू समाज में फैली हुई है, वह आए दिन कहीं न कहीं किसी लड़की या महिला की जान लेती है। हत्या या बलात्कार तो अखबारी सुर्खियों में आ जाते हैं, लेकिन लड़की की प्रताडऩा खबरों में आने के पहले कम से कम हजार गुना अधिक मामलों में होती है, और जब वह हिंसा की सीमा पार कर जाती है तब जाकर वह खबर बनती है। 
लड़कियों के हक को लेकर समाज की सोच में एक बदलाव की जरूरत है। जब हरियाणा की खाप पंचायतें, या उत्तरप्रदेश और आसपास के इलाकों में इज्जत के नाम पर की जाने वाली लड़कियों और प्रेमी जोड़ों की हत्याएं आए दिन खबर बनती हैं, जब हर हफ्ते कहीं न कहीं हिन्दू समाज का कोई तबका ऐसे फतवे जारी करता है, कि लड़कियों के जींस पहनने पर रोक लगाई जा रही है, उनके मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर रोक लगाई जा रही है, तो ऐसे तबके अपने प्रभाव क्षेत्र के मर्दों को बिना कही यह मंजूरी देते हैं कि वे आसपास की लड़कियों और महिलाओं से बलात्कार कर सकते हैं। जब एक समाजवादी मंत्री या भाजपा का एक मंत्री बलात्कार को सहमति या नादानी बताते हैं, जब समाजवादी मुलायम सिंह कहते हैं कि लड़कों से तो गलतियां हो ही जाती हैं, तो फिर यह सत्ता का उकसावा और सत्ता की दी हुई मंजूरी रहती है जिसके इस्तेमाल को लड़के और मर्द वैसे भी बेसब्र रहते हैं। 
हमारा मानना है कि इस देश में सुप्रीम कोर्ट के अलावा एक और संवैधानिक संस्था राष्ट्रीय महिला आयोग भी है। और इनकी कुर्सियों पर बैठे हुए जो जज या सदस्य हैं, यह उनकी जिम्मेदारी है कि ऐसे सार्वजनिक बयानों पर ऐसे लोगों को कटघरे में खड़ा करें, और उनकी हिंसक बातों के खिलाफ उन्हें सजा सुनाएं। जब तक संवैधानिक संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करेंगी, और सरकारी संस्थाओं पर बैठे लोग बलात्कार को खिलवाड़ मानकर बलात्कारियों को बढ़ावा देते रहेंगे, तब तक इस देश में लड़कियों की हिफाजत की बात बोगस रहेगी। अगर ईमानदारी से लड़कियों को बचाना है, तो ओहदों पर बैठे लोगों की बकवास के खिलाफ लोगों को जनहित याचिका दायर करनी चाहिए। वैसे तो बड़ी अदालतों के जज अपनी मर्जी के खिलाफ की छोटी-छोटी बातों को लेकर खुद ही मुकदमे दर्ज कर लेते हैं, लेकिन चूंकि उनको लड़कियों के खिलाफ ऐसी गैरकानूनी और हिंसक बातों की गंभीरता खुद होकर समझ नहीं आ रही, इसलिए किसी जवाबदेह नागरिक को जनहित याचिका दायर करनी चाहिए। 

भारत के खड़े किए देश में आज मोदी

संपादकीय
6 जून 2015

अपनी विदेश यात्राओं के लिए मशहूर हो चुके भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज बांग्लादेश में है। यह देश एक वक्त पाकिस्तान का हिस्सा था, और भारत की मदद से पूर्वी पाकिस्तान नाम का यह इलाका 1971 में बांग्लादेश बना था। उस वक्त जो पश्चिम पाकिस्तान था, वहां से चलने वाली सरकार पूर्वी पाकिस्तान के इलाके के साथ जुल्म और ज्यादती करती थी, और बहुत से ऐतिहासिक कारणों से भारत ने बांग्लादेश की मुक्तिवाहिनी की फौजी मदद की, और पाकिस्तानी फौजी समर्पण भी भारत की फौज के सामने हुआ था। यह सब तो इतिहास में दर्ज है, लेकिन आज की तारीख में भारत के बहुत से मुद्दे बांग्लादेश से जुड़े हुए हैं, और इनमें से कई मुद्दे ऐसे हैं जिन पर भारत के एक देश के रूप में हित, और भाजपा के एक पार्टी के रूप में चुनावी हित बड़े खुलकर टकराते हैं। एक तरफ तो भारत के कई इलाकों में बांग्लादेश से आकर भारत में रह रहे मजदूरों का मुद्दा है जिन्हें अवैध बांग्लादेशी कहते हुए भाजपा इनको निकालने की मांग लंबे समय से करते आ रही है। दूसरी तरफ मोदी आज बांग्लादेश में जो बातें करने जा रहे हैं, उनमें शायद बांग्लादेशी मजदूरों के भारत आकर काम करने का मुद्दा भी शामिल है। 
एक पार्टी के रूप में भाजपा के लिए यह बात एक चुनावी हित की लग सकती है कि बांग्लादेश से आकर बसे और आमतौर पर मुस्लिम इन मजदूरों के अगर वोटर कार्ड बने हैं, तो वे भाजपा के खिलाफ जा सकते हैं। लेकिन भारत और भारत सरकार को यह भी सोचना पड़ता है कि इस देश की सरहद से लगा हुआ यह देश भारत के फौजी हितों के हिसाब से भी मायने रखता है, और जो इस्लामी आतंक बांग्लादेश की जमीन से भारत में आकर हमले करता है, उसके हिसाब से भी भारत को बांग्लादेश के साथ एक दोस्ताना और नर्म रूख रखना है। एक और बात यहां पर महत्वपूर्ण है कि बांग्लादेश में जिस तरह से इस्लामी कट्टरपंथ हिंसा कर रहा है, ब्लॉगरों को मार रहा है, और जिसके अंतरराष्ट्रीय इस्लामी आतंकियों से संबंध और बढऩे के खतरे हैं, उस बांग्लादेश को कट्टरपंथ के बजाय एक उदार लोकतंत्र बनाए रखने से भारत की आंतरिक सुरक्षा भी जुड़ी हुई है। इसके लिए भी यह जरूरी है कि भारत के बांग्लादेश की सरकार से संबंध बेहतर रहे, और बांग्लादेश में लोकतंत्र को मजबूत करने में भारत प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरह से मदद करे। 
भारत के पश्चिम बंगाल और उत्तर-पूर्वी राज्यों का बांग्लादेश के साथ एक बहुत ही नामौजूद सी सरहद वाला रिश्ता है। दोनों तरफ से सामाजिक संबंध हैं, आर्थिक लेन-देन है, और पशुओं की आवाजाही भी है। मोदी के सामने एक यह मुद्दा भी है कि भारत में गोवंश को लेकर जो एक फतवा हवा में तैर रहा है, उसके चलते हुए किस तरह से भारत-बांग्लादेश के बीच पशुओं की आवाजाही, या कारोबार तय किया जाए। अभी-अभी खबरें आई थीं कि बीएसएफ ने कहा है कि बांग्लादेश की सरहद पर पशुओं की आवाजाही को रोकना उसके लिए मुमकिन नहीं है, और अगर पल भर को मान लें कि सैनिक बढ़ाकर इसे रोका भी जा सकता है, तो भी क्या ऐसा रोकना ठीक होगा? बांग्लादेश की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी के साथ भारत के रोजगार के रिश्ते भी बांग्लादेश में शांति व्यवस्था के लिए जरूरी हैं, और एक बड़ा देश होने के नाते भारत को इस मामले में बांग्लादेश के साथ दरियादिली दिखानी चाहिए। 
आज दिन भर इन दोनों देशों के बीच सबसे ऊंचे स्तर की महत्वपूर्ण बातचीत होनी है, और यह बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि बांग्लादेश के साथ के कुछ मुद्दों पर संसद में मोदी की सरकार ने यूपीए सरकार के बनाए हुए प्रस्ताव को ही माना है, और संसद की इतनी बड़ी सहमति इस एक पूरे बरस में किसी और मामले पर सामने नहीं आई थी। उम्मीद की जानी चाहिए कि मोदी भारत के फतवेबाजों से परे बांग्लादेश के साथ एक बेहतर रिश्ता बनाएंगे, और पड़ोस की रोजगार की जरूरत को भी पूरा करेंगे। भारत की सरहदी और भीतरी दोनों तरह की हिफाजत के लिए बांग्लादेश में एक मजबूत सरकार, मजबूत लोकतंत्र, और बेहतर अर्थव्यवस्था जरूरी है। जहां पर इनकी कमी रहती है, वहां पर पनपा आतंक अड़ोस-पड़ोस तक वार करता है।

बचाव से अधिक सस्ता इलाज नहीं हो सकता

संपादकीय
5 जून 2015

देश के बच्चों और बड़ों के खानपान को तबाह करने वाली शहरी चीजों में से एक मैगी के खिलाफ पूरे देश में जो सरकारी कार्रवाई चल रही है, उससे दो फायदे हो रहे हैं। एक तो उसका जहरीला पदार्थ खाने से लोग बच रहे हैं, दूसरी बात यह कि सेहत के लिए खराब ऐसे खानपान से भी लोग बच रहे हैं। बड़े-बड़े फिल्मी सितारों के उकसावे में आकर बहुत से लोग मैगी जैसा सेहत के खिलाफ सामान पकाकर खाने लगे थे, और घर की माताओं को भी उकसाया गया था कि बच्चों को भूख लगे तो दो मिनट में मैगी बनाकर उनका पेट भरा जा सकता है। यह तो अच्छा हुआ कि इसमें जहरीले पदार्थ निकले, और लोगों के बीच मैगी जैसे सामान को लेकर एक बहस शुरू हुई। अब यह बहस जागरूकता और चौकन्नेपन में बदल पाती है या नहीं, यह तो लोगों पर खुद भी निर्भर करता है, अकेले सरकारें कुछ नहीं कर सकतीं। जो लोग तमाम चेतावनियों के बावजूद सिगरेट और तम्बाखू का इस्तेमाल बंद नहीं करते, उनको मैगी के खतरे से क्या लेना-देना, वैसे लापरवाह लोगों को किसी भी देश-प्रदेश की सरकार बचा भी नहीं सकती। 
हम तो मैगी के बहाने यह चर्चा करने जा रहे हैं कि लोगों को बचपन से ही सेहतमंद खाने की तरफ कैसे मोडऩा चाहिए, और सेहतमंद खाने के साथ-साथ सेहतमंद जीवनशैली किस तरह बाद की उम्र में लोगों को मुसीबत से, परेशानी से बचा सकते हैं। आज मैगी के विवाद से लेकर अगले दो-ढाई हफ्तों तक भारत में योग पर भी चर्चा होनी है जो कि देश-प्रदेश में बड़े धूमधाम से मनाया जाने वाला है। देश का एक तबका योग के वैज्ञानिक पहलुओं को खड़ाऊओं से कुचलते हुए उसके भगवानकरण में जुटा हुआ है, और इसके जवाब में मुस्लिम अल्पसंख्यक लोग योग के ऐसे हिस्सों का विरोध कर रहे हैं जो कि उनके मुताबिक इस्लाम की धार्मिक मान्यताओं से टकराता है। एक तरफ तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश में सभी तबकों के बराबरी के अधिकार को लेकर बहुत से बयान दे रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ हकीकत यह है कि खान-पान से लेकर योग-ध्यान तक, हिन्दुओं के एक सीमित तबके की भावनाओं को बढ़ावा मिल रहा है, और हिन्दुओं के ही बाकी तबकों सहित बाकी धर्म के लोग बेचैन हैं कि देश में आज एक धर्मान्ध वातावरण चल रहा है। 
हमारा यह मानना है कि खान-पान हो, या योग-ध्यान, गंगा की सफाई हो, या गणित की पढ़ाई हो, वैज्ञानिक पहलुओं को छोड़कर अगर अतीत के कुछ नारों को आज की हकीकत बनाने के लिए सरकार का इस्तेमाल किया जाएगा, तो हिन्दू गंगा की सफाई में गैरहिन्दू कैसे और क्यों जुड़ पाएंगे? क्या इस देश में सिर्फ हिन्दुओं के योग-ध्यान करने से सरकार की जिम्मेदारी पूरी हो जाएगी, और सरकार का इलाज का बजट घटेगा? इन तमाम मुद्दों पर एक सर्वसहमति का भी ध्यान रखना चाहिए, और किसी एक धर्म या जाति, किसी एक सोच या तबके का आक्रामक तेवर बाकी लोगों को फायदों से भी काट देता है, और देश की मूलधारा से भी। योग को लेकर उसके जो वैज्ञानिक पहलू हैं, उसके जो चिकित्सकीय फायदे हैं, उन पर ध्यान देना चाहिए, और देश की धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक व्यवस्था के तहत इसके धार्मिक पहलू को बाकी लोगों से अलग रखना चाहिए, सरकार के कार्यक्रम से अलग रखना चाहिए। 
यह मौका देश में एक सेहतमंद जीवनशैली के बारे में सोचने का है, और केन्द्र और राज्य सरकारों को स्थानीय संस्थाओं, और सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर जनजागरूकता को बढ़ाना चाहिए, न सिर्फ खाने और योग को लेकर, बल्कि आधुनिक जीवन में जितने तरह की चिकित्सकीय दिक्कतें आ रही हैं, उनको भी दूर करने के लिए सबको कोशिश करनी चाहिए। आज इस देश में किसी बीमारी का इलाज अधिकतर आबादी की पहुंच के बाहर हो गया है। ऐसे में लोगों को सेहतमंद बनाए रखना एक राष्ट्रीय मिशन की तरह होना चाहिए, और हम पहले भी इस बात को लिख चुके हैं कि जिला स्तर पर ऐसे केन्द्र बनने चाहिए जहां न सिर्फ योग और व्यायाम हों, बल्कि खान-पान की जागरूकता, जीवनशैली की शिक्षा का इंतजाम भी वहां हो। बचाव से अधिक सस्ता कोई इलाज नहीं हो सकता। 

पर्यावरण के कुछ कम खतरनाक लगते मुद्दों को भी देखने की जरूरत

04 जून 2015
संपादकीय

पर्यावरण दिवस पर देश भर की निगाहें कारखानों और खदानों पर जाकर टिकेंगी, और पेड़ों के कटने, नदी में गंदगी बहने की तरफ भी। लेकिन पर्यावरण की तबाही और प्रदूषण के इन बड़े मुद्दों के साथ-साथ बहुत से ऐसे छोटे मुद्दे हैं जो कि पर्यावरण को तबाह करते हैं, लेकिन जो अनदेखे भी रह जाते हैं। पर्यावरण की तबाही सिर्फ गंदगी और जहर से नहीं होती, वह उन तमाम चीजों से होती है जिनके बिना लोगों का काम चल सकता है, लेकिन लोग सामानों की फिजूलखर्ची में उनको बनवाने में लग जाते हैं। जैसे जरूरत से अधिक बड़े मकान, दफ्तरों के जरूरत से बड़े अधिक ठंडे कमरे, जरूरत से अधिक बड़ी कार, जरूरत से अधिक सामानों की खपत। दिखने को ये तमाम बातें अर्थव्यवस्था को बढ़ाने वाली दिखती हैं, लेकिन हकीकत में इनमें से हर सामान को बनाने में धरती पर एक प्रदूषण बढ़ता है। 
यह सिलसिला गांधी जैसे लोगों ने एक सदी पहले ही देख लिया था, और दुनिया में किफायत की वकालत की थी। लेकिन जैसे-जैसे दुनिया का कारोबार आक्रामक होते चले गया, वैसे-वैसे इंसान को एक ग्राहक, और फिर उससे भी अधिक बड़ा ग्राहक बनाने की दौड़ और होड़ चल पड़ी। नतीजा यह हुआ कि आज अमरीका जैसे देश में प्रति व्यक्ति मासूम दिखते सामानों की खपत दुनिया में सबसे अधिक है। वहां पर निजी कार लेकर चलने वाले लोग इतनी बड़ी कारें लेकर चलते हैं कि वहां की जुबान में उसे ट्रक कहा जाता है। तकरीबन पूरे अमरीका में सार्वजनिक परिवहन नाम की चीज नहीं हैं, और हर किसी को ऑटोमोबाइल उद्योग, पेट्रोलियम उद्योग, बड़ी-बड़ी कारें लेकर चलने के लिए उकसाते हैं। यह सिलसिला अमरीका से निकलकर हिन्दुस्तान तक पहुंच गया है, और अब चार लोगों के परिवारों में चार कारें भी होने लगी हैं। इन सबको बनाने में जितना सामान लगता है, और जितनी बिजली लगती है, इनको लाने-ले-जाने में जितना ईंधन लगता है, वह सब धरती पर न दिखने वाला प्रदूषण बढ़ाते हैं, और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं। 
इसलिए आज बाजार के हमलावर तेवरों के मुकाबले अगर लोगों को धरती के पर्यावरण को बचाना है तो गांधी जैसी सादगी, किफायत, और कम खर्च के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है। आज छोटे-छोटे बच्चे अगर संपन्न परिवारों के हैं, तो वे नमकीन आलू चिप्स से लेकर आईस्क्रीम तक, और फास्टफूड से लेकर चॉकलेट तक, रोज ही जाने कितनी ही पैकिंग धरती पर बोझ बनाते चलते हैं। दूसरी तरफ भारत में परंपरागत खानपान अधिक सेहतमंद रहा है, और मैगी जैसे जहरीले सामानों की मार्केटिंग के पहले यहां घरों में बने हुए नाश्ते के सामान खाकर बच्चे ऐसा खतरा नहीं झेलते थे, इतना खर्च नहीं करते थे, और धरती पर इतना कचरा नहीं बढ़ाते थे। 
एक दूसरा पहलू पर्यावरण दिवस पर अनदेखा यह रह जाता है कि बढ़ती हुई गाडिय़ों के बढ़ते हुए शोर के साथ-साथ शहरी जिंदगी में शादी-ब्याह और जुलूस में बढ़ते हुए संगीत-प्रदूषण से लोगों का जीना हराम हो रहा है, कान खराब हो रहे हैं, तन-मन की शांति खराब हो रही है, और कामकाज पर उसका सीधा असर हो रहा है। लेकिन यह प्रदूषण अनदेखा रह जाता है। ऐसा ही प्रदूषण शादी-ब्याह की जगहों पर बेकाबू संगीत और पटाखों से होता है, और यह सोचना भी मुश्किल है कि विवाह स्थलों के आसपास जिन लोगों के घर हैं, वे बारात के बैंडबाजे, और विवाह स्थल के कानफाड़ू संगीत के करीब जिंदगी भर कैसे रहते होंगे? इसी तरह धार्मिक संगीत लोगों के लिए जीना मुश्किल कर देता है, और रायपुर में ही एक मंदिर के खिलाफ पड़ोस में रहने वाले कुछ लोगों ने अदालत तक जाकर लाउडस्पीकरों पर रोक लगवाई थी, लेकिन प्रशासन उस रोक को बाकी जगह लागू करना जरूरी नहीं समझता, और न ही वह खुद होकर सुप्रीम कोर्ट के उन आदेशों को लागू करता जो कि ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ बरसों पहले दिए गए हैं, और देश भर में आज भी लागू हैं। धार्मिक संगीत याद दिलाता है कि किस तरह सैकड़ों बरस पहले कबीर ने यह कहने की हिम्मत की थी कि मुल्ला मस्जिद की मीनार पर चढ़कर इस तरह जोरों की आवाज लगाता है कि मानो खुदा बहरा हो गया हो। धार्मिक पाखंड के खिलाफ ऐसी बात आज भी कहने की हिम्मत किसी में नहीं है, और ऐसे पाखंड के सभी धर्मों के शोरगुल पर काबू करने की हिम्मत भी किसी में नहीं है। 
पर्यावरण दिवस पर कारखाने, खदान, पेड़ कटाई, और नदी प्रदूषण से परे के इन कुछ मुद्दों को हम उठा रहे हैं, इस उम्मीद से कि कम खतरनाक लगने वाले इन मुद्दों पर भी कार्रवाई हो। 

नेट पर से पदचिन्ह कभी नहीं मिटते

संपादकीय
3 जून 2015

अमरीका में इन दिनों अपने नागरिकों के निजी जीवन की गोपनीयता एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। वहां सरकार जिस तरह लोगों की जिंदगी में तांक-झांक करती है, दूसरे देशों की सरकारों के फोन और ई-मेल तक घुसपैठ करती है उसे लेकर पूरी दुनिया में बड़ी फिक्र है। आज वहां पर राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी की ताकतों को कम करने वाला एक ऐतिहासिक विधेयक पारित हुआ है। अमरीका की राजनीति में एक ऐसी दहशत और ऐसे शक का माहौल भी चले आ रहा था कि अमरीकी खुफिया एजेंसियां वहां के राष्ट्रपति के काम में भी चोरी-छुपे दखल देती हैं। ऐसे में दुनिया के बाकी देशों में घुसपैठ करना तो शायद उनका सरकारी काम ही होगा। लेकिन अमरीका की संसद में आज पारित इस विधेयक से सिर्फ अमरीकी जनता की आजादी में दखल में कुछ कटौती जरूर हुई है, लेकिन बाकी दुनिया के लिए यह कोई तसल्ली की बात नहीं है। बाकी दुनिया आज भी अमरीकी जासूसी का खतरा झेल रही है। 
अब भारत जैसे बहुत से देशों की बात करें जो कि आज संचार तकनीक से लेकर सोशल मीडिया तक, और ईमेल से लेकर इंटरनेट पर अपनी फाइलें रखने तक अमरीका पर टिके हुए हैं। आज इंटरनेट पर जितनी कंपनियां लोगों को मुफ्त में डिजिटल गोदाम देती हैं, उनकी खुद की विश्वसनीयता कितनी है, इसका पता किसी को नहीं है। और भारत सरकार के बड़े-बड़े मंत्री और अफसर भी अमरीकी कंपनियों के ईमेल गोदाम पर अपनी फाइलें रखते हैं, और आम जनता तो अपनी निजी जीवन की तस्वीरें, वीडियो, और कारोबार के कागजात तक, सभी चीजें ऐसे ही सर्वरों पर मुफ्त में या मामूली भुगतान करके रखती है। भारत की कंपनियां, यहां के कारोबारी, यहां की जांच एजेंसियां, यहां के शोधकर्ता, तकरीबन हर तबके के लोग, इंटरनेट पर जहां मुफ्त में जगह मिलती है, वहां अपने कपड़े सुखाने लगते हैं। नतीजा यह है कि आज अमरीकी जासूस, या इजराइली जासूस भारत के लोगों के बारे में करीब-करीब हर बात इंटरनेट पर ही पा सकते हैं। यह ऐसी खतरनाक नौबत है कि हिन्दुस्तान में फैसला लेने वाले बड़े से बड़े लोग विदेशी दबाव के खतरे तले आ जाते हैं। यहां के अफसर, मंत्री, जज, पत्रकार, या दूसरे कारोबारी इंटरनेट पर कौन सी वयस्क वेबसाइटों पर जाते हैं, वहां किनसे क्या बात करते हैं, वहां कैसे वीडियो देखते हैं, ये तमाम बातें अमरीकी कंपनियों के कम्प्यूटरों पर दर्ज है। 
दुनिया का रिवाज है कि मुफ्त में कुछ भी नहीं मिलता। कुछ सामानों के ऊपर दाम लिखे होते हैं, और कुछ सामानों का इस्तेमाल करने पर बिना दाम दिखे उनके दाम चुकाने पड़ते हैं। लेकिन भारत जैसे देशों में आम लोगों की बात तो छोड़ ही दें, खास लोगों को भी इन खतरों की समझ नहीं है। आज अगर भारत के किसी ताकतवर ओहदे पर बैठे हुए किसी आदमी के ऐसे कम्प्यूटर रिकॉर्ड अमरीकी जासूसों के पास हैं जिनमें वह आदमी दुनिया के किसी कोने के किसी बच्चे से सेक्स की बातें कर रहा है, तो अमरीका कभी भी ऐसे हिन्दुस्तानी को ब्लैकमेल करने की हालत में रहेगा, और हमारा मानना है कि आज भी विदेशी खुफिया एजेंसियां भारत के लाखों महत्वपूर्ण लोगों की कमजोर नब्ज पूरी तरह से अपने हाथ में रखी हुई होंगी। भारत सरकार के नियमों के खिलाफ जाकर सरकार में बैठे हुए लोग यहां की सरकारी फाइलों को ऐसी विदेशी सर्वरों पर रखते हैं, जहां पर विदेशी जासूस भारत में फैसले के पहले ही वाकिफ हो जाते हैं। यह खतरनाक नौबत इसलिए आई है क्योंकि भारत ने अपने आपको 21वीं सदी की इंटरनेट-जरूरतों के लिए तैयार नहीं किया, और भारत के लोगों को यह लगता है कि इंटरनेट पर समाजसेवी-दानदाता लोग बैठे हुए हैं जो कि सौ-पचास जीबी का मुफ्त स्टोरेज हर किसी को देते हैं। 
अभी हम उन बाजारू तरकीबों को तो खतरनाक बता ही नहीं रहे हैं जिनका इस्तेमाल करके इंटरनेट कंपनियां दुनिया भर के इंटरनेट-उपभोक्ताओं की पसंद, नापसंद, जरूरत, प्राथमिकता का अंदाज लगा लेती हैं, और अगर आप निजी ईमेल में भी दो-चार बार जूतों का जिक्र कर दें, तो आपके इंटरनेट पेज पर जूतों के इश्तहार शुरू हो जाते हैं। ऐसी बाजारू और घोषित जासूसी को अभी हम अघोषित सरकारी जासूसी के मुकाबले खतरनाक कह भी नहीं रहे। लेकिन आज टेलीफोन पर, इंटरनेट पर, टाईप किया गया एक-एक अक्षर, भेजी गई या पाई गई एक-एक तस्वीर, इन सबका एक खतरनाक इस्तेमाल हो सकता है। अभी कुछ ही दिन हुए हैं जब ब्रिटिश शोधकर्ताओं ने यह साबित किया कि एंड्राइड सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करने वाले मोबाइल फोन पर से सब कुछ मिटा देने के बाद, उन हैंडसेट्स को फैक्ट्री-रीसेट कर देने के बाद भी उनमें से जानकारी, तस्वीरें निकाली जा सकती हैं। 
इंटरनेट बड़ा सुहावना लगता है, दुनिया तो खत्म हो जाएगी लेकिन इंटरनेट पर छोड़े गए पदचिन्ह कभी नहीं मिटेंगे।

हर स्तर पर फिक्स होने वाले खेल अब जुएं-सट्टे जैसे

2 जून 2015
संपादकीय

फुटबॉल विश्वकप की मेजबानी के लिए दक्षिण अफ्रीका से मोटी रिश्वत वसूलते हुए अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल संघ, फीफा, के सबसे बड़े पदाधिकारी जिस तरह से पकड़ाए हैं, उस पर सजा तो जब होनी है तब होनी है, लेकिन इससे एक बात फिर सामने आती है कि अंतरराष्ट्रीय खेलों के आयोजन में खेल एक किनारे हाशिए पर चले जाते हैं, और राजनीति, भ्रष्टाचार, बाजार, और जुर्म, इनका बोलबाला रहता है। भारत में राष्ट्रमंडल खेलों के भ्रष्टाचार से लेकर क्रिकेट की सट्टेबाजी, और आईपीएल के नाम पर हर किस्म के जुर्म, भारत में क्रिकेट के नाम पर ठेकेदारी करने वाली संगठन बीसीसीआई के कपड़े जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट में उतरे हैं, इन सबको देखकर यह लगता है कि खेल जब तक बिना पैसों के होते थे, तभी तक वे खेल थे। अब वे बाजार, और बाजारू जुर्म हो गए हैं। इसके साथ-साथ भारत में एक दूसरी बात यह है कि दाऊद इब्राहीम किस्म के अंडरवल्र्ड माफिया सरगना जिस तरह क्रिकेट की सट्टेबाजी करते हैं, और जिस तरह सट्टेबाज पूरी दुनिया के क्रिकेट खिलाडिय़ों को खरीदते हैं, उसके हिसाब से अब क्रिकेट कोई खेल ही नहीं रह गया है। पांच दिनों का यह खेल घटते-घटते अब बीस-बीस ओवर का रह गया है क्योंकि सट्टेबाजों को पांच दिन लंबे नतीजे काम नहीं आते। अब मिनट-मिनट पर बाजी तय होती है, और लेनदेन हो जाता है। लेकिन इसमें नया कुछ भी नहीं है। हॉलीवुड की पुरानी फिल्में देखें तो माफिया का हाथ घुड़दौड़ को तय करने में रहता था जिसमें दुनिया के सबसे बड़े दांव लगते थे। लोगों को वह फिल्म याद होगी जिसमें एक जॉकी के न मानने पर उसके पसंदीदा घोड़े का सिर काटकर माफिया भेज देता है।
दुनिया में खेलों के नियम बदलना, खेल सामान बनाने वाली कंपनियां तय करवाती हैं, स्टेडियम बनाने वाले ठेकेदार तय करवाते हैं, और इश्तहार का कारोबार करने वाली कंपनियां करवाती हैं। खेल संघों में कौन जीते, और कौन हारे, इसका फैसला भी बहुत बड़ा पैसा करता है। भारतीय संसद में जो लोग एक-दूसरे पर झपटते हुए थकते नहीं हैं, वे शुक्ला, और जेटली क्रिकेट की राजनीति में एक-दूसरे के हमजोली रहते हैं, और देश का कोई बड़ा राजनीतिक दल ऐसे रिश्तों की वजह से बीसीसीआई को देश के नियमों में लाने की हिम्मत नहीं करता। सरकार जहां अनदेखी करने का काम करती है, वहीं पर सुप्रीम कोर्ट को मजबूरी में दखल देकर श्रीनिवासन जैसे पदाधिकारी पर कार्रवाई करनी पड़ती है, और यह एक दिलचस्प तस्वीर रहती है कि किस तरह से अनुपातहीन जयललिता, और सुप्रीम कोर्ट में कुसूरवार पाए गए श्रीनिवासन शपथ ग्रहण में साथ रहते हैं।
जिस तरह लोग जुएं और सट्टे के नतीजों का नशा करते हैं, वैसा ही कुछ नशा अब बड़े खेल रह गए हैं, जिनमें मेजबानी पाने के लिए एक पूरा देश एक संगठन को मोटी रिश्वत देता है। वे कारोबार तो छोटे हैं जिनमें लोग किसी देश को रिश्वत देते हैं, अब बड़ा तो यह खेल का कारोबार हो गया है जिसमें देश लोगों को रिश्वत देता है। अब जिन लोगों को जुएं सट्टे की तरह खेल का मजा लेना है, वे हर स्तर पर फिक्स होते चलने वाले अंतरराष्ट्रीय खेलों का मजा लेते चलें। यह मजा भी प्रसारण के अधिकार देने की फिक्सिंग के साथ घर तक पहुंचेगा।