केजरीवाल-टोली का ओछापन मुद्दे को छोड़ तरीकों पर सवाल

संपादकीय
10 जून 2015

दिल्ली की केजरीवाल सरकार के कानून मंत्री जितेन्द्र तोमर को दिल्ली पुलिस की फर्जी डिग्री के मामले में गिरफ्तार किया है। पिछले कुछ महीनों से यह मामला खबरों में था, और दिल्ली के वकीलों के संगठन ने इसे लेकर तोमर के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। हफ्तों की जांच के बाद कल यह कार्रवाई की गई, और केजरीवाल सरकार के लोगों ने इसके खिलाफ हल्ला बोल दिया है। केन्द्र सरकार के मातहत आने वाले दिल्ली के उपराज्यपाल (लेफ्टिनेंट गवर्नर) के साथ निर्वाचित दिल्ली सरकार की जो तनातनी चल रही है, वह भारत की संवैधानिक व्यवस्था पर एक बड़ा तनाव डाल रही है। जिस अंदाज में दिल्ली सरकार में अफसर लाए और हटाए जा रहे हैं, और सीएम और एलजी के अधिकार क्षेत्रों को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में सुनवाई चल रही है, उस अंदाज के चलते हुए केन्द्र की मातहत दिल्ली पुलिस की यह कार्रवाई केजरीवाल सरकार पर भारी पडऩी भी थी, और केजरीवाल के साथी दिल्ली पुलिस के तौर-तरीकों को लेकर, विधानसभा अध्यक्ष को पहले खबर न करने को लेकर कई तरह के आरोप लगा रहे हैं। 
राजनीतिक कीचड़बाजी के चलते हुए मुद्दे की बात धरी रह जा रही है। मुद्दा यह है कि किसी ने हलफनामे के तहत चुनाव आयोग को अपनी जो शैक्षणिक योग्यता बताई थी, उसके गलत होने का आरोप है, और उसके साथ-साथ जो डिग्री लगाई गई थी, या बताई गई थी, उसके फर्जी होने का भी आरोप है। अब सवाल यह उठता है कि राजनीतिक तनातनी के चलते रहने से एक राजनीतिक सत्ता के मातहत आने वाली पुलिस, दूसरी राजनीतिक सत्ता के मातहत आने वाले मंत्री पर कार्रवाई करे, या न करे? यह नौबत राज्यों और केन्द्र में तब भी आती है जब एक सत्ता जाती है, और दूसरी पार्टी की सत्ता आती है। उस वक्त भी यह कहा जाता है कि गड़े हुए मुर्दे क्यों उखाड़े जा रहे हैं? या विच-हंटिंग (चुड़ैल का शिकार), क्यों किया जा रहा है? तो ऐसे में लोकतंत्र में सत्ता पलट के साथ ही पुराने कुकर्म और पुराने जुर्म दफन ही कर दिए जाने चाहिए, और किसी ताकतवर पर कार्रवाई होनी ही नहीं चाहिए। 
दिल्ली के मामले में आम आदमी पार्टी और केजरीवाल सरकार का रूख बहुत ही शर्मनाक, और धिक्कार के लायक है। यह वही पार्टी है जो गर्मी के मौसम के आमों की तरह आम-आम करते हुए आम आदमी और आम नागरिक की बात करते हुए, अपने आपको आम बताते हुए, खास को धिक्कारते हुए, वीआईपी शब्द को गंदा बताते हुए सत्ता पर पहुंची, और आज अपने एक मंत्री पर पुलिस की एक कार्रवाई के खिलाफ वह यह गिनवा रही है कि मंत्री को गिरफ्तार करने कितनी पुलिस पहुंची, और कितनी गाडिय़ों में पहुंची। हकीकत यह है कि यह बात पूरी तरह से महत्वहीन और प्रसंगहीन है कि गिरफ्तारी की तरीका क्या रहा। महत्वपूर्ण यह है कि केजरीवाल सरकार का एक मंत्री पुलिस की जांच में फर्जी डिग्री वाला पाया गया, और उसे गिरफ्तार किया गया। अब इस सरकार को और मंत्री को अपने को हासिल कानूनी बचाव देखना चाहिए, और इसे राजनीतिक हथियार बनाकर वह मोदी या एलजी पर जितने भी हमले करेगी, उससे अपना ही ओछापन साबित करेगी। 
सार्वजनिक जीवन और भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति में जनता की अदालत और कानून की अदालत के मौके अलग-अलग होते हैं। जितने धूर्त नेता होते हैं, वे कानून की अदालत में फंसने पर जनता की अदालत की बात करते हैं, और जनता की अदालत में खारिज हो जाने पर कानून की अदालत की बात करते हैं। यह सिलसिला बहुत ही घटिया है, और इसने आम आदमी पार्टी के पाखंड को बुरी तरह उजागर कर दिया है। अगर दिल्ली पुलिस ने केजरीवाल के मंत्री को गलत सुबूतों पर गिरफ्तार किया है, तो यह तय है कि यह दिल्ली पुलिस के आका, केन्द्र सरकार पर ही भारी पड़ेगा। लेकिन जब तक किसी अदालत से ऐसा साबित नहीं हो जाता है तब तक केजरीवाल और उनके बड़बोले साथियों को अपने गिरफ्तार साथी की हिमायत में दूसरों पर हमले करने का ओछा काम नहीं करना चाहिए। 

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