टीबी के इलाज में सरकार से परे समाज की भी जरूरत

संपादकीय
11 जून 2015

अमरीका से एक खबर आई है कि वहां पर दवाओं से प्रतिरोध विकसित कर चुकी एक भारतीय महिला टीबी मरीज को लेकर तीन राज्यों में दहशत फैली हुई है। पिछले कुछ हफ्तों में वह अमरीका के इन राज्यों में अपने रिश्तेदारों और परिचितों से मिल रही थी, और बीमारी का उसका दर्जा अत्यंत दवा प्रतिरोधी टीबी माना जा रहा है। अब उसके संपर्क में जो-जो लोग आए हैं, उनकी तलाश की जा रही है। 
भारत में दुनिया के सबसे अधिक मरीज तकरीबन हर बीमारी के हैं, और टीबी के भी। यह गरीबी और कुपोषण पर पलने वाली बीमारी है, और भारत में इसका इलाज मोटे तौर पर सरकारी अस्पतालों से ही होता है, और भारत के सरकारी अस्पतालों का हाल जगजाहिर है। न जांच, न डॉक्टर, न दवा, और न खुराक, इनमें से किसी बात की गारंटी नहीं होती है, और टीबी एक ऐसी बीमारी है जिसमें बीच में जहां दवा छूटी, वहां वह बीमारी उस दवा से प्रतिरोध विकसित कर लेती है। साधारण टीबी बढ़कर मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट टीबी हो जाती है, और जैसा कि अभी अमरीका की खबर में है, वह एक्स्ट्रीम ड्रग रेजिस्टेंट हो जाती है। और जिन लोगों को ऐसी टीबी से संक्रमण होता है, उनकी बीमारी साधारण टीबी नहीं होती, वह ऐसे ही खतरनाक दर्जे की टीबी होती है। 
भारत जैसे गरीब आबादी वाले देश में छोटे-छोटे कमरों, और कोठरियों में परिवार के कई लोग रहते हैं। और उनमें से एक को अगर टीबी है, तो बाकी लोगों को भी वह बीमारी फैलने का खतरा बहुत बड़ा हो जाता है। सरकार की तरफ से इसके इलाज का प्रचार तो होता है, लेकिन अगर मरीज अस्पताल तक दवा लेने के लिए हर कुछ हफ्तों या महीनों में न पहुंच सके, तो सरकारी या सामाजिक ढांचा ऐसा नहीं है कि मरीज और दवा का मेल करवा सके। इसके साथ-साथ परिवार के बाकी लोगों को सावधानी बरतना-सिखाना, खानपान का ठीक-ठाक इंतजाम करना, यह सब गरीबी के बीच मुमकिन नहीं होता है। 
और टीबी से परे भी गरीबी में पनपने वाली मलेरिया जैसी कई जानलेवा बीमारियां हैं, और जिस तरह टीबी के कीटाणु प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं, उसी तरह मलेरिया फैलाने वाले मच्छर भी एक-एक करके कई दवाओं से प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं, और फिर मलेरिया को रोक पाना आसान नहीं होता। छत्तीसगढ़ में गांवों और गरीब इलाकों में मलेरिया से होने वाली मौतों का हाल यह है कि बस्तर के नक्सल मोर्चे पर तैनात राज्य पुलिस और सीआरपीएफ जैसे सुरक्षा बलों के जवान उनको इलाज हासिल रहते हुए भी मलेरिया से मारे जाते हैं। गरीबी और गंदगी के अलावा इलाज से दूरी भी एक वजह है, और छत्तीसगढ़ में जगह-जगह यह बात भी आड़े आती है। 
फिर दुनिया के दवा कारोबार और इलाज के उद्योग के साथ एक दिक्कत यह है कि शोध कार्य में होने वाला बड़ा खर्च उन बीमारियों या दवाओं के लिए होता है जिनकी खपत संपन्न तबके में अधिक है। गरीबों के बीच होने वाली बीमारियों के लिए दवा बनाकर भी दवा कंपनियां किसी को महंगे में तो बेच भी नहीं सकतीं। इसलिए गरीबी की बीमारियों पर शोध कार्य किसी पूंजीवादी सरकार या कारोबार की प्राथमिकता नहीं रहती। इसलिए भारत जैसे देश में टीबी से बचाव एक बड़ी फिक्र की बात है, और सरकारी अस्पतालों से मुफ्त दवा के अलावा भी सामाजिक ढांचे को टीबी के मरीजों को खानपान में मदद करनी चाहिए। अंग्रेजों के साथ इस देश में जो ईसाई मिशनरी के लोग आए थे, उन्होंने देश भर में जगह-जगह टीबी के अस्पताल खोले थे, और टीबी के अलावा कुष्ठ रोग जैसी बीमारियों को दूर करने के लिए आश्रम खोलने के काम उन्होंने ही किए थे। आज भी चाहे ऐसे आश्रमों की जरूरत न हो, लेकिन इलाज में सामाजिक क्षेत्र के वैसे ही योगदान की जरूरत है। 

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