मध्यप्रदेश महिला कांग्रेस की राजनीतिक कमअक्ली

संपादकीय
13 जून 2015

मध्यप्रदेश महिला कांग्रेस ने घोषणा की है कि वहां के भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को दो लाख चूडिय़ां भेंट की जाएंगी। प्रदेश में महिलाओं पर अत्याचार रोकने में नाकामयाब होने की वजह से मुख्यमंत्री को यह भेंट मिलने जा रही है। महिला कांग्रेस ने इसके लिए राज्य की सभी महिलाओं से दो-दो चूडिय़ां भेजने की अपील की है। आज इक्कीसवीं सदी में भी भारत की इस सबसे पुरानी पार्टी के प्रदेश स्तर के सबसे बड़े नेताओं की समझ का ठिकाना नहीं है। जिस पार्टी की मुखिया इंदिरा गांधी रहीं, आज सोनिया गांधी हैं, वह पार्टी चूडिय़ों को कमजोरी और नाकामयाबी का प्रतीक मान रही है। कोई और पार्टी ऐसा करती तो समझ आता, कोई पुरूषवादी संगठन ऐसा करता तो भी समझ आता, लेकिन महिला कांग्रेस चूडिय़ों को नाकामयाबी का प्रतीक माने, और एक आंदोलन का हथियार बनाए, यह शर्मनाक है, और इस पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर अपने नेताओं के राजनीतिक शिक्षण-प्रशिक्षण का काम करना चाहिए।
भारतीय समाज में महिलाओं से जुड़े हुए बहुत से ऐसे प्रतीक हैं जिनको कमजोरी का निशान, प्रतीक, या सुबूत मान लिया जाता है। इनमें चूडिय़ां सबसे लोकप्रिय और अधिक इस्तेमाल होने वाला प्रतीक है। इस देश में जो खाप पंचायती सोच चली आ रही है, और जिसके तहत इस देश के महान कहे जाने वाले लेखक-कवि महिलाओं को ताडऩ का अधिकारी लिखते आए हैं, जिस सोच के तहत इस देश में महिलाओं को सती बनाया जाता था, वृंदावन को उन महिलाओं से भर दिया गया है जो पति खो चुकी हैं, जिन महिलाओं को मां के पेट में ही भ्रूण की उम्र में ही मार डाला जाता है, उन महिलाओं को खुद अपने बारे में सोचना चाहिए, और अपनी तबके की ऐसी बेइज्जती नहीं करनी चाहिए जैसी कि मध्यप्रदेश महिला कांग्रेस कर रही है। 
अगर हमको ठीक याद पड़ रहा है तो दशकों पहले इंदिरा गांधी ने विरोध और प्रदर्शन के इस तरीके के खिलाफ सार्वजनिक बयान दिया था और नाराजगी जाहिर की थी कि महिलाओं के प्रतीक को कमजोरी का प्रतीक बनाना गलत है। लेकिन आज दशकों बाद भी अगर प्रमुख महिलाएं भी ऐसे ही प्रतीकों की कैद हैं, और वे एक गुलाम सोच को सार्वजनिक बढ़ावा दे रही हैं, तो इस पार्टी को पढऩे-लिखने की जरूरत है, और सार्वजनिक समझ पाने की जरूरत है। इसी समझ की कमी से देश की आधी आबादी को राजनीतिक आरक्षण देने से संसद और विधानसभाएं कतरा रही हैं। कई राजनीतिक दल सार्वजनिक रूप से महिला आरक्षण का विरोध कर रहे हैं, और जिस देश में पंचायत और वार्ड स्तर पर लडऩे के लिए न सिर्फ महिलाएं, बल्कि अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग जातियों की महिलाएं भी मिल जाती हैं, जीत जाती हैं, पंचायत और म्युनिसिपल चला रही हैं, वहां पर पुरूष प्रधान राजनीतिक दल यह झांसा देते आ रहे हैं कि विधानसभा और लोकसभा सीटों पर पर्याप्त महिला उम्मीदवार नहीं मिल पाएंगी। और मध्यप्रदेश महिला कांग्रेस मानो ऐसी ही सोच को बढ़ावा दे रही है। 
हमारा मानना है कि महिला अधिकारों की बात उठाने वाले जन संगठनों को ऐसे प्रतीकात्मक आंदोलनों के खिलाफ महिला आयोग में शिकायत दर्ज करानी चाहिए, और अदालत में जनहित याचिका दायर करनी चाहिए। वैसे तो किसी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज खुद होकर भी ऐसी खबर पर मध्यप्रदेश महिला कांग्रेस को नोटिस दे सकते हैं कि उसकी कमअक्ली महिला तबके की इज्जत के खिलाफ है। इस देश में महिलाओं के साथ भेदभाव करने वाले प्रतीकों, शब्दों, कहावतों और मुहावरों पर रोक लगाने की जरूरत है। सिर्फ कानून काफी नहीं है, सरकारों को अपने कामकाज में, समाज को अपनी भाषा में, और संगठनों को अपने तौर-तरीकों में महिलाओं के लिए अपमानजनक बातें खत्म करना पड़ेगा। यह काम आसान नहीं है, अभी कुछ दशक पहले तक भारत का हिन्दू समाज पति की मौत के बाद पत्नी को सती बनाने का हिमायती था। और तो और एक हाईकोर्ट के एक जज भी ऐसी हिमायत करते हुए खुलकर सामने आए थे। ऐसे देश में कांग्रेस पार्टी को अपने तौर-तरीके सुधार कर एक मिसाल पेश करनी चाहिए, और अगर सोनिया गांधी के रहते ऐसा नहीं होगा, तो कब होगा?


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