अमरीका में बर्दाश्त कम और घर-घर बंदूकें ज्यादा

संपादकीय

19 जून 2015

अमरीका के अश्वेत लोगों के एक चर्च पर हमला करके 9 लोगों को गोलियों से मार डालने वाले एक गोरे नौजवान को देखें तो उसके फेसबुक पेज पर उसके कई दर्जन दोस्तों में से आधे से अधिक, या आधे अश्वेत ही थे। लेकिन जब उसने यह हमला किया तो गोलियां चलाने के साथ-साथ उसने अश्वेत लोगों के खिलाफ नफरत की बातें भी कहीं। अब यह अमरीका जैसे एक उदार कानून वाले देश में एक भयानक घटना है, और अमरीकी समाज के भीतर रंगभेद की जड़ों को यह उजागर करती है। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी बात जो उभरकर सामने आती है वह यह कि हथियारों की आसान मौजूदगी सिरफिरे लोगों या हिंसक लोगों को हिंसा करने का कैसा मौका भी देती है। कल इस हमले के बाद अमरीकी राष्ट्रपति ने अपने शोक संदेश में इन दोनों को बातों को उठाया और कहा कि अमरीका में नस्लीय संबंधों और अमरीका की गन-पॉलिसी दोनों पर बात करने की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि विकसित देशों में अकेला अमरीका है जहां ऐसे मामले होते हैं। 
अमरीका के बारे में यह पूरा सिलसिला इसलिए अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि एक तरफ तो यह देश धार्मिक समानता को दूसरे देशों पर भी लादने के लिए इतना सक्रिय रहता है कि गुजरात दंगों के बाद बरसों तक नरेन्द्र मोदी को अमरीका जाने का वीजा नहीं मिल पाया था, और अब भी नरेन्द्र मोदी जब अमरीका जा पाए हैं तो वे भारतीय प्रधानमंत्री की हैसियत से एक अलग दर्जे से वहां जा पाए, एक सामान्य नागरिक के रूप में नहीं। दूसरी तरफ अमरीका के भीतर अश्वेतों के साथ, धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ, मुस्लिमों और सिखों के साथ जो बर्ताव होता है, उससे भी अमरीकी समाज में लोगों में बर्दाश्त की कमी जाहिर होती है और गोरे अहंकार से उपजी हिंसा बार-बार सामने आती है। अमरीका में गोरी पुलिस जिस तरह आए दिन निहत्थे अश्वेत लोगों को गोलियां मारती है, उसे लेकर पूरे देश में एक सामाजिक तनाव फैला हुआ है। ऐसी हर हिंसा के बाद काले लोगों को, और नस्लीय समानता में भरोसा रखने वाले बाकी लोगों को भी सड़कों पर आना पड़ता है। 
अब इस मामले का दूसरा पहलू। अमरीकी कारोबार हथियारों को बढ़ावा देने में लगे रहता है, और वहां के कानून को हथियारों के खिलाफ कड़ा होने ही नहीं दिया जाता। एक-एक नागरिक इतनी-इतनी बंदूकें, इतने-इतने हथियार रख सकते हैं कि वे जब चाहें तब सैकड़ों लोगों को मार सकें। हैरानी और राहत की बात यह है कि घर-घर हथियारों का जखीरा होने के बावजूद वहां पर उनके अनुपात में हिंसा उतनी अधिक अभी भी नहीं हो रही है। अमरीका में हथियारों की समर्थक लॉबी राष्ट्रपति के चुनाव तक इसे वहां के लोकतंत्र से जोड़कर पेश करती है, और अपने लिए नरमी रखने वाले को राष्ट्रपति बनाने की कोशिश भी करती है। वहां एक अजीब किस्म की सोच है कि जब तक नागरिकों के पास हथियार रहेंगे, तब तक अमरीका में कोई फौजी हुकूमत नहीं आ पाएगी। यह सोच गलत इसलिए है कि भारत जैसे देश में गिने-चुने लोगों के पास अधिक से अधिक एक-एक हथियार है, लेकिन यहां भी फौजी हुकूमत का कोई खतरा नहीं है। 
अमरीका भारत पर धार्मिक असमानता की कई तोहमतें लादते रहता है, लेकिन खुद अमरीका में गोरों और कालों के बीच इस तरह की असमानता है कि उसे मुद्दा बनाकर अगर भारत ताकतवर देश होता, तो वह अमरीकी राष्ट्रपति को वीजा देने से मना कर सकता था। लेकिन दुनिया का रिवाज यह है कि ताकतवर की लाठी के सामने सबकी बोलती बंद रहती है। और आज अमरीका में अश्वेतों का हाल कुछ उसी तरह का है जिस तरह भारत में दलितों का हाल है। इन दो स्थितियों की एक आसान तुलना भी हो सकती है, लेकिन इनके बीच कई तरह के फर्क भी गिनाए जा सकते हैं। हम कुल मिलाकर एक सामाजिक असमानता के संदर्भ में यह मिसाल दे रहे हैं। 
अमरीका में धार्मिक और सामाजिक असमानता, और वहां पर निजी हथियारों की भारी मौजूदगी मिलकर एक बड़ा खतरा तो हैं ही, वहां की पुलिस भी अलग-अलग कई प्रदेशों और शहरों में कमजोर तबकों पर हमला और हिंसा करने के लिए जानी जाती है। यह नौबत अमरीका के लिए फिक्र का सामान है, और बाकी दुनिया के लिए इस मिसाल को देखकर नसीहत लेने का सामान भी है। 

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