एक बड़े आर्किटेक्ट के गुजरने के मौके पर

संपादकीय
17 जून 2015

आज भारत के एक सबसे बड़े आर्किटेक्ट चाल्र्स कोरिया के गुजर जाने के बाद भी आज से आगे उनकी डिजाइन की हुई इमारतें लोगों को उनकी याद दिलाती रहेंगी। और किसी वास्तुकार के लिए यही एक कामयाबी हो सकती है कि उसे उसके काम के लिए याद रखा जाए। छत्तीसगढ़ के लोगों से उनका एक रिश्ता यह रहा कि जब यह राज्य अविभाजित मध्यप्रदेश में शामिल था, तभी राजधानी भोपाल में अंतरराष्ट्रीय कला केन्द्र भारत भवन, और मध्यप्रदेश की विधानसभा, इन दोनों महत्वपूर्ण इमारतों को चाल्र्स कोरिया ने डिजाइन किया था। उनका काम भारत के अलावा भी बहुत सी दूसरी जगहों पर बिखरा हुआ है, और अमरीका के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में से एक एमआईटी में वे पढ़ाते भी रहे। लेकिन आज यहां अकेले उनके बारे में लिखने का कोई इरादा नहीं है, और एक आर्किटेक्ट, या इंजीनियर, या शहरी नियोजक, या एक इंटीरियर डेकोरेटर का काम किस तरह दुनिया और जिंदगी को प्रभावित करता है इस पर छोड़ी सी चर्चा करना चाल्र्स कोरिया को याद करने जैसा होगा। 
भारत में बहुत बड़ा पैसा सरकारी कामकाज पर खर्च होता है, नए शहर बनते हैं, कॉलोनियां बनती हैं, इमारतें बनती हैं, और उनके भीतर के ढांचे कामकाज के हिसाब से बनाए जाते हैं। इन सबमें सरकार का कोई मुकाबला नहीं होता, इसलिए किसी निजी बिल्डर की तरह बाजार के मुकाबले में खड़े होने का दबाव सरकार पर नहीं होता, सरकार के कामकाज का ऑडिट भी सिर्फ रूपये-पैसे का होता है, इसलिए उसकी बनवाई हुई डिजाइन, उसकी बनवाई हुई योजना, और उस पर अमल को लेकर अधिक विश्लेषण नहीं किया जाता। और यही एक बात सरकार की पूरी सोच को शुरू से ही कमजोर कर देती है कि वह किसी के प्रति तब तक जवाबदेह नहीं है, जब तक कि कोई आर्थिक भ्रष्टाचार न हो जाए, कोई कानून न टूट जाए। लेकिन किसी भी शहर, कॉलोनी, या इमारत की डिजाइन के पीछे बहुत सी बातों का ख्याल रखकर आर्किटेक्चर और इंजीनियरिंग, प्लानिंग और इंटीरियर डेकोरेशन की खूबियों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जो कि बहुत से मामलों में नहीं होता। 
सरकार के काम के साथ एक और दिक्कत यह रहती है कि वही खर्च करने वाली रहती है, वही इस्तेमाल करने वाली रहती है, अपने अधिकतर काम को उसे बाजार में खड़ा नहीं करना पड़ता, और किसी से उसकी तुलना नहीं होती। लेकिन दुनिया के बहुत से ऐसे देश होते हैं जिनमें सरकारी कामकाज को भी कल्पनाशीलता के लिए, दूरदर्शिता के लिए, उत्कृष्टता के लिए, और किफायत के लिए भी जाना जाता है। फिर सरकारी कामकाज के साथ हम एक बात को जोड़े बिना कभी नहीं चल सकते कि सरकार का पूरा खर्च जनता की जेब से जाता है, और उसकी कोई भी योजना अपने देश-प्रदेश, और अपने शहर-गांव की जनता की बोझ उठाने की क्षमता को ध्यान में रखे बिना नहीं बनानी चाहिए। बनाने के लिए तो शाहजहां के ताजमहल की तरह की बेमिसाल डिजाइन बनाई जा सकती है, और लोगों के लिए एक दर्शनीय जगह कोई भी सरकार बना सकती है। लेकिन क्या जनता उस बोझ को उठा सकती है? क्या विकसित और संपन्न देशों की सोच को भारत जैसे देश और यहां के गरीब प्रदेशों के लोगों पर थोपा जा सकता है? 
हमारा यह मानना है कि सरकार अपने इस्तेमाल के लिए जो कुछ बनाती है, या कि जनता की सुविधा के लिए जो भी शहरी-ग्रामीण ढांचा खड़ा करती है, उसका खूब मूल्यांकन योजना के स्तर पर ही होना चाहिए, और जनसुनवाई करके सरकार को यह साबित करना चाहिए कि वह खर्च जायज क्यों है। सरकार के सामने ऐसी कोई बेबसी इसलिए नहीं रहती है कि देश और प्रदेश में बारी-बारी से जिन पार्टियों की भी सरकारें आती-जाती हैं, उन सबकी दिलचस्पी महंगे और बड़े, यादगार और दर्शनीय निर्माण में रहती है, क्योंकि हर कोई अपनी छाप छोड़कर जाना चाहते हैं। गांवों की पगडंडियों को ठीक करने से इतिहास में नाम दर्ज नहीं होता, इसलिए सत्ता पर आने वाले लोग ताजमहल छोड़कर जाना चाहते हैं। लेकिन जब तक इस देश में सरकारी खर्च का एक सामाजिक ऑडिट शुरू नहीं होगा, तब तक बर्बादी और तबाही जारी रहेंगी। चाल्र्स कोरिया के जाने के मौके पर उनके बारे में अधिक चर्चा का कोई मतलब नहीं है, लेकिन उनकी जो तकनीक थी, वे ज्ञान की जिस शाखा के थे, उस ज्ञान के सामाजिक इस्तेमाल के बारे में जरूर सोचना चाहिए, जो कि आज सरकारी कामकाज में मुश्किल से ही दिखाई पड़ता है। 

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