सुषमा स्वराज को कोई रियायत नहीं दी जा सकती, हितों का साफ टकराव उनके नाम दर्ज

संपादकीय
15 जून 2015

मोदी सरकार के आने के बाद भाजपा में एक तो वैसे भी सुषमा स्वराज का वजन  गायब सा हो गया था, और अब वे जिस मुसीबत में फंसी हैं, उसमें उनका भविष्य और डांवाडोल दिख रहा है। लोकसभा में विपक्ष की नेता की हैसियत से एक समय सुषमा को भविष्य की भाजपा-एनडीए की प्रधानमंत्री भी माना जाता था, लेकिन फिर मोदी भाजपा और भारत के आसमान पर ऐसे छाए, कि बाकी तमाम लोग अपने मौजूदा कद के साथ भी पल भर में बौने होकर रह गए। अब विदेश मंत्री की हैसियत से सुषमा स्वराज ने जो काम किया है, वह उनकी नौकरी खाने के लिए काफी है। लोगों का यह मानना है कि नरेन्द्र मोदी सुषमा के इस काम के बाद नैतिकता के नारे को जारी भी नहीं रख सकते, और आगे-पीछे वे सुषमा के पर और कतरने के लिए मजबूर भी होंगे। दूसरी तरफ भाजपा के ही दिल्ली के एक नेता, सांसद कीर्ति आजाद ने खुलकर यह कहा है कि सुषमा स्वराज के लिए खड़ी की गई परेशानी भाजपा के ही आस्तीन के सांप का काम है। अब यह इशारा भाजपा के भीतर की खींचतान से वाकिफ लोगों के लिए बहुत जटिल भी नहीं है। 
लेकिन हम किनारे की इन बातों को छोड़कर मुख्य मुद्दे पर आएं, तो सुषमा ने जो किया है, उसे तौलना जरूरी है। ललित मोदी नाम का एक आदमी भारत के क्रिकेट में कई किस्म की जालसाजी और धोखाधड़ी, बेईमानी और भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद गिरफ्तार होने के पहले देश छोड़कर भाग गया, और लंदन में रहकर आलीशान जिंदगी जी रहा है। उसके खिलाफ केन्द्र सरकार के वित्त मंत्रालय के तहत आने वाले इनफोर्समेन्ट डायरेक्ट्रेट की जांच चल रही है जिसमें सैकड़ों करोड़ रूपए के विदेशी मुद्रा जुर्म के आरोप लगे हुए हैं। ललित मोदी बरसों से जांच एजेंसियों के सामने आने से बच रहा है, और भारत का सैकड़ों करोड़ रूपया विदेशों में जाने के आरोपों के साथ सरकारी जांच एजेंसी उसके दायर मुकदमों का सामना कर रही है। भारत सरकार ने ललित मोदी का पासपोर्ट खारिज कर दिया था, उसने बड़े-बड़े वकील खड़े करके अदालत से इस सरकारी फैसले को ही खारिज करवाया। सुषमा स्वराज के पति और उनकी बेटी दोनों ही ललित मोदी के वकील रहे हैं, और पासपोर्ट के इस मामले में भी सुषमा की बेटी बांसुरी स्वराज बरसों से ललित मोदी की तरफ से अदालत में खड़ी हो रही है। यह बात अपने आप में हैरानी की है कि पासपोर्ट रद्द करने के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट से जो फैसला हुआ, उसके खिलाफ केन्द्र सरकार ने अदालत में अपील तक नहीं की। यह अपने आप में पहली नजर में ललित मोदी के लिए एक बड़ी रियायत दिखती है, और पासपोर्ट जारी करने वाले विदेश मंत्रालय की मंत्री सुषमा ही थीं। दूसरी बात जो अभी हवा में तैर रही है, वह यह है कि सुषमा के पति 22 बरस से ललित मोदी के वकील रहे हैं, और सुषमा के परिवार के किसी एक लड़के के ब्रिटेन में एडमिशन के मामले में भी इस परिवार ने ललित मोदी की मदद ली है। 
इन तमाम बातों को देखें, तो भारतीय जांच एजेंसियों के एक भगोड़े को मदद करने की ऐसी कौन सी बेबसी सुषमा स्वराज की थी? फिर वित्त मंत्री अरूण जेटली का मंत्रालय जिस बेईमान की जांच करके उसे जेल भेजने की तैयारी में है, वह भारत में बयान देने तो नहीं आ रहा, भारत की विदेश मंत्री की मदद से वह ब्रिटेन में सरकार से मदद पा रहा है, दूसरे देशों में जाने के लिए दस्तावेज हासिल कर रहा है। यह पूरा सिलसिला राजनीति और सार्वजनिक जीवन की बड़ी साधारण जुबान में हितों के टकराव का है। सुषमा स्वराज इसकी तोहमत मीडिया पर लगा रही हैं, उनके समर्थक कीर्ति आजाद तोहमत भाजपा के भीतर के सुषमा-विरोधी किसी नेता पर लगा रहे हैं, लेकिन जिम्मेदारी तो खुद सुषमा पर आती है जो कि भारत के एक गंभीर जुर्म के आरोपी को मदद कर रही हैं, और अपने ही दूसरे साथी मंत्री के मंत्रालय को उस आरोपी की तलाश को अनदेखा कर रही हैं। 
यह पूरा सिलसिला पहली नजर जितना गंभीर दिख रहा है, वह जल्द ही सुषमा स्वराज के लिए भारी पड़ सकता है। अपने बहुत लंबे संसदीय जीवन, और खासे लंबे सरकारी अनुभव के बाद उनसे यह उम्मीद नहीं की जाती कि वे हितों के टकराव के ऐसे खुले मामले को अनदेखा करेंगी। यह सिलसिला मोदी सरकार पर भारी पड़ेगा, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी एक तरफ तो विदेशों से भारत का काला धन वापिस लाने के नारे के साथ सत्ता पर आए हैं, और अब काला धन विदेश ले जाने वालों को उनकी सरकार से ही ऐसी नाजायज मदद मिले, तो यह सरकार कैसी ईमानदारी का दावा कर सकती है? 

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