हर स्तर पर फिक्स होने वाले खेल अब जुएं-सट्टे जैसे

2 जून 2015
संपादकीय

फुटबॉल विश्वकप की मेजबानी के लिए दक्षिण अफ्रीका से मोटी रिश्वत वसूलते हुए अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल संघ, फीफा, के सबसे बड़े पदाधिकारी जिस तरह से पकड़ाए हैं, उस पर सजा तो जब होनी है तब होनी है, लेकिन इससे एक बात फिर सामने आती है कि अंतरराष्ट्रीय खेलों के आयोजन में खेल एक किनारे हाशिए पर चले जाते हैं, और राजनीति, भ्रष्टाचार, बाजार, और जुर्म, इनका बोलबाला रहता है। भारत में राष्ट्रमंडल खेलों के भ्रष्टाचार से लेकर क्रिकेट की सट्टेबाजी, और आईपीएल के नाम पर हर किस्म के जुर्म, भारत में क्रिकेट के नाम पर ठेकेदारी करने वाली संगठन बीसीसीआई के कपड़े जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट में उतरे हैं, इन सबको देखकर यह लगता है कि खेल जब तक बिना पैसों के होते थे, तभी तक वे खेल थे। अब वे बाजार, और बाजारू जुर्म हो गए हैं। इसके साथ-साथ भारत में एक दूसरी बात यह है कि दाऊद इब्राहीम किस्म के अंडरवल्र्ड माफिया सरगना जिस तरह क्रिकेट की सट्टेबाजी करते हैं, और जिस तरह सट्टेबाज पूरी दुनिया के क्रिकेट खिलाडिय़ों को खरीदते हैं, उसके हिसाब से अब क्रिकेट कोई खेल ही नहीं रह गया है। पांच दिनों का यह खेल घटते-घटते अब बीस-बीस ओवर का रह गया है क्योंकि सट्टेबाजों को पांच दिन लंबे नतीजे काम नहीं आते। अब मिनट-मिनट पर बाजी तय होती है, और लेनदेन हो जाता है। लेकिन इसमें नया कुछ भी नहीं है। हॉलीवुड की पुरानी फिल्में देखें तो माफिया का हाथ घुड़दौड़ को तय करने में रहता था जिसमें दुनिया के सबसे बड़े दांव लगते थे। लोगों को वह फिल्म याद होगी जिसमें एक जॉकी के न मानने पर उसके पसंदीदा घोड़े का सिर काटकर माफिया भेज देता है।
दुनिया में खेलों के नियम बदलना, खेल सामान बनाने वाली कंपनियां तय करवाती हैं, स्टेडियम बनाने वाले ठेकेदार तय करवाते हैं, और इश्तहार का कारोबार करने वाली कंपनियां करवाती हैं। खेल संघों में कौन जीते, और कौन हारे, इसका फैसला भी बहुत बड़ा पैसा करता है। भारतीय संसद में जो लोग एक-दूसरे पर झपटते हुए थकते नहीं हैं, वे शुक्ला, और जेटली क्रिकेट की राजनीति में एक-दूसरे के हमजोली रहते हैं, और देश का कोई बड़ा राजनीतिक दल ऐसे रिश्तों की वजह से बीसीसीआई को देश के नियमों में लाने की हिम्मत नहीं करता। सरकार जहां अनदेखी करने का काम करती है, वहीं पर सुप्रीम कोर्ट को मजबूरी में दखल देकर श्रीनिवासन जैसे पदाधिकारी पर कार्रवाई करनी पड़ती है, और यह एक दिलचस्प तस्वीर रहती है कि किस तरह से अनुपातहीन जयललिता, और सुप्रीम कोर्ट में कुसूरवार पाए गए श्रीनिवासन शपथ ग्रहण में साथ रहते हैं।
जिस तरह लोग जुएं और सट्टे के नतीजों का नशा करते हैं, वैसा ही कुछ नशा अब बड़े खेल रह गए हैं, जिनमें मेजबानी पाने के लिए एक पूरा देश एक संगठन को मोटी रिश्वत देता है। वे कारोबार तो छोटे हैं जिनमें लोग किसी देश को रिश्वत देते हैं, अब बड़ा तो यह खेल का कारोबार हो गया है जिसमें देश लोगों को रिश्वत देता है। अब जिन लोगों को जुएं सट्टे की तरह खेल का मजा लेना है, वे हर स्तर पर फिक्स होते चलने वाले अंतरराष्ट्रीय खेलों का मजा लेते चलें। यह मजा भी प्रसारण के अधिकार देने की फिक्सिंग के साथ घर तक पहुंचेगा।

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