दिल्ली का टकराव पूर्ण राज्य बने बिना खत्म होना नामुमकिन

संपादकीय
12 जून 2015
दिल्ली को लेकर यह आशंका कुछ समय पहले से चल रही थी कि वहां निर्वाचित केजरीवाल सरकार और केन्द्र के मनोनीत उपराज्यपाल के बीच का टकराव बढ़ते-बढ़ते राष्ट्रपति शासन तक पहुंच सकता है। अब दिल्ली से ऐसी खबरें उठ रही हैं कि टकराव उस किनारे तक पहुंच गया है। और उपराज्यपाल अपने आप में कोई व्यक्ति न होकर केन्द्र सरकार के प्रति जवाबदेह और केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में काम करने वाला होता है, इसलिए यह टकराव मोटे तौर पर केजरीवाल सरकार और मोदी सरकार के बीच का है। हमने कुछ दिन पहले ही इसी जगह दिल्ली के इस टकराव के बारे में लिखा था और यह भी लिखा था कि इस राज्य को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाना जरूरी है, उसके बिना यह टकराव कभी भी हो सकता था। केन्द्र में एनडीए की सरकार रहते, और फिर यूपीए के दस बरसों में कांग्रेस की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कभी ऐसा टकराव नहीं होने दिया था, लेकिन चली आ रही व्यवस्था के भीतर से एक टकराव खड़ा करना ही केजरीवाल को सत्ता में लेकर आया था, और आज भी उनका वही मिजाज है, वही तेवर है। इसलिए शीला दीक्षित के वक्त का हाल अब जारी नहीं रह सकता। ऐसे में दिल्ली एक अभूतपूर्व संवैधानिक संकट देख रहा है, जब कचरा साफ करने वालों को तनख्वाह नहीं मिल रही है, और आज केन्द्र सरकार दिल्ली शहर के सफाई कर्मचारियों को वेतन के लिए पांच सौ करोड़ रूपए देने की घोषणा कर रही है। 
आम लोगों को दिल्ली राज्य की जटिलताओं का इतना अंदाज नहीं होगा। दिल्ली में पुलिस का काम केन्द्र सरकार के मातहत है। दिल्ली में म्युनिसिपल का काम निर्वाचित महानगरपालिका देखती है जो कि राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र से परे का काम है। इसके अलावा दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का दर्जा भी प्राप्त है, और दिल्ली मेट्रो या वहां के बड़े-बड़े फ्लाईओवर जैसे कई प्रोजेक्ट केन्द्र सरकार के शहरी विकास मंत्रालय के मातहत आते हैं। ऐसे में दिल्ली सरकार कहने के लिए तो एक निर्वाचित सरकार है, लेकिन कचरा उठाने से लेकर पुलिस सिपाही तक, और बड़े-बड़े शहरी ढांचों तक के मामले उसके अधिकार क्षेत्र के बाहर के हैं। फिर दिल्ली से लगे हुए तीन राज्य ऐसे हैं, जिनके कुछ-कुछ हिस्से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, एनसीआर, में आते हैं, और वहां तक ढांचागत सुविधाओं को जोडऩे के लिए फिर केन्द्र सरकार तस्वीर में आ जाती है। 
पिछले विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की नई-नई पार्टी ने जिस तरह देश में चली आ रही मोदी लहर को मानो पानी की एक टंकी में बांधकर रख दिया था, उससे भाजपा के बहुत से लोग बहुत बुरी तरह विचलित भी थे। इसलिए आज अगर दिल्ली भाजपा के नेता, केन्द्र सरकार के मंत्री, अपनी तमाम ताकत का इस्तेमाल करके केजरीवाल को परेशान करना चाह रहे हैं, तो इसमें भारत की आम राजनीति है, और कोई अनोखी बात नहीं है। ठीक इस घमासान लड़ाई के बीच केजरीवाल दो-चार और मुसीबतों में घिरे हैं, ईमानदारी का दावा करने वाली पार्टी का कानून मंत्री फर्जी डिग्री में गिरफ्तार हो चुका है, और इस पार्टी का पिछला कानून मंत्री उस वक्त एक अफ्रीकी महिला से बदसलूकी करते पकड़ाया था, आज वह अपनी बीवी की घरेलू हिंसा की रिपोर्ट में आरोपी है। घर और बाहर हर तरफ से घिरे हुए केजरीवाल के लिए आज इस टकराव को नाटकीय बनाना भी एक विकल्प हो सकता है, और हो सकता है कि बेकाबू सरकार, बेकाबू केन्द्र सरकार, और बेकाबू संघीय ढांचे के बीच वे एक बार फिर अंगूठा चीरकर तिलक लगाकर शहीद होना चाहें। 
लेकिन इन तमाम बातों से परे इस देश में आज जरूरत यह है कि दिल्ली को एक पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए। ऐसा ही एक शहर वाला एक पूरा देश सिंगापुर है जो कि अपनी कुछ किस्म की कामयाबियों के लिए दुनिया में एक मॉडल माना जाता है। दिल्ली में ऐसी कोई बात नहीं है जो कि भारत की एक निर्वाचित राज्य सरकार काबू न कर सके, इसलिए केन्द्र सरकार को दिल्ली चलाने का मोह छोडऩा चाहिए, और भारत के संघीय ढांचे में चल रहे इस टकराव को खत्म करना चाहिए। आज केजरीवाल की पार्टी मोटे तौर पर एक राज्य में सीमित है, इसलिए उनके साथ केन्द्र सरकार के  चल रहे सुलूक के खिलाफ न तो एनडीए के लोग हैं, और न ही यूपीए के लोग हैं। लेकिन संघीय ढांचे में परंपराएं अच्छी ही कायम होना चाहिए, इसलिए पार्टीबाजी छोड़कर देश के लोकतांत्रिक दलों को दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलवाने की वकालत करनी चाहिए। 

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