भारत के खड़े किए देश में आज मोदी

संपादकीय
6 जून 2015

अपनी विदेश यात्राओं के लिए मशहूर हो चुके भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज बांग्लादेश में है। यह देश एक वक्त पाकिस्तान का हिस्सा था, और भारत की मदद से पूर्वी पाकिस्तान नाम का यह इलाका 1971 में बांग्लादेश बना था। उस वक्त जो पश्चिम पाकिस्तान था, वहां से चलने वाली सरकार पूर्वी पाकिस्तान के इलाके के साथ जुल्म और ज्यादती करती थी, और बहुत से ऐतिहासिक कारणों से भारत ने बांग्लादेश की मुक्तिवाहिनी की फौजी मदद की, और पाकिस्तानी फौजी समर्पण भी भारत की फौज के सामने हुआ था। यह सब तो इतिहास में दर्ज है, लेकिन आज की तारीख में भारत के बहुत से मुद्दे बांग्लादेश से जुड़े हुए हैं, और इनमें से कई मुद्दे ऐसे हैं जिन पर भारत के एक देश के रूप में हित, और भाजपा के एक पार्टी के रूप में चुनावी हित बड़े खुलकर टकराते हैं। एक तरफ तो भारत के कई इलाकों में बांग्लादेश से आकर भारत में रह रहे मजदूरों का मुद्दा है जिन्हें अवैध बांग्लादेशी कहते हुए भाजपा इनको निकालने की मांग लंबे समय से करते आ रही है। दूसरी तरफ मोदी आज बांग्लादेश में जो बातें करने जा रहे हैं, उनमें शायद बांग्लादेशी मजदूरों के भारत आकर काम करने का मुद्दा भी शामिल है। 
एक पार्टी के रूप में भाजपा के लिए यह बात एक चुनावी हित की लग सकती है कि बांग्लादेश से आकर बसे और आमतौर पर मुस्लिम इन मजदूरों के अगर वोटर कार्ड बने हैं, तो वे भाजपा के खिलाफ जा सकते हैं। लेकिन भारत और भारत सरकार को यह भी सोचना पड़ता है कि इस देश की सरहद से लगा हुआ यह देश भारत के फौजी हितों के हिसाब से भी मायने रखता है, और जो इस्लामी आतंक बांग्लादेश की जमीन से भारत में आकर हमले करता है, उसके हिसाब से भी भारत को बांग्लादेश के साथ एक दोस्ताना और नर्म रूख रखना है। एक और बात यहां पर महत्वपूर्ण है कि बांग्लादेश में जिस तरह से इस्लामी कट्टरपंथ हिंसा कर रहा है, ब्लॉगरों को मार रहा है, और जिसके अंतरराष्ट्रीय इस्लामी आतंकियों से संबंध और बढऩे के खतरे हैं, उस बांग्लादेश को कट्टरपंथ के बजाय एक उदार लोकतंत्र बनाए रखने से भारत की आंतरिक सुरक्षा भी जुड़ी हुई है। इसके लिए भी यह जरूरी है कि भारत के बांग्लादेश की सरकार से संबंध बेहतर रहे, और बांग्लादेश में लोकतंत्र को मजबूत करने में भारत प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरह से मदद करे। 
भारत के पश्चिम बंगाल और उत्तर-पूर्वी राज्यों का बांग्लादेश के साथ एक बहुत ही नामौजूद सी सरहद वाला रिश्ता है। दोनों तरफ से सामाजिक संबंध हैं, आर्थिक लेन-देन है, और पशुओं की आवाजाही भी है। मोदी के सामने एक यह मुद्दा भी है कि भारत में गोवंश को लेकर जो एक फतवा हवा में तैर रहा है, उसके चलते हुए किस तरह से भारत-बांग्लादेश के बीच पशुओं की आवाजाही, या कारोबार तय किया जाए। अभी-अभी खबरें आई थीं कि बीएसएफ ने कहा है कि बांग्लादेश की सरहद पर पशुओं की आवाजाही को रोकना उसके लिए मुमकिन नहीं है, और अगर पल भर को मान लें कि सैनिक बढ़ाकर इसे रोका भी जा सकता है, तो भी क्या ऐसा रोकना ठीक होगा? बांग्लादेश की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी के साथ भारत के रोजगार के रिश्ते भी बांग्लादेश में शांति व्यवस्था के लिए जरूरी हैं, और एक बड़ा देश होने के नाते भारत को इस मामले में बांग्लादेश के साथ दरियादिली दिखानी चाहिए। 
आज दिन भर इन दोनों देशों के बीच सबसे ऊंचे स्तर की महत्वपूर्ण बातचीत होनी है, और यह बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि बांग्लादेश के साथ के कुछ मुद्दों पर संसद में मोदी की सरकार ने यूपीए सरकार के बनाए हुए प्रस्ताव को ही माना है, और संसद की इतनी बड़ी सहमति इस एक पूरे बरस में किसी और मामले पर सामने नहीं आई थी। उम्मीद की जानी चाहिए कि मोदी भारत के फतवेबाजों से परे बांग्लादेश के साथ एक बेहतर रिश्ता बनाएंगे, और पड़ोस की रोजगार की जरूरत को भी पूरा करेंगे। भारत की सरहदी और भीतरी दोनों तरह की हिफाजत के लिए बांग्लादेश में एक मजबूत सरकार, मजबूत लोकतंत्र, और बेहतर अर्थव्यवस्था जरूरी है। जहां पर इनकी कमी रहती है, वहां पर पनपा आतंक अड़ोस-पड़ोस तक वार करता है।

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