लाल बत्तियों और सायरनों से सड़कों पर बिखरता लहू

संपादकीय
8 जून 2015

मध्यप्रदेश के एक मंत्री की गाड़ी से दो लोगों को टक्कर लगी और एक की मौत हो गई। आज सुबह की इस खबर से पहले कल या परसों ही इसी प्रदेश से एक दूसरी खबर थी कि एक विधायक की गाड़ी से टक्कर में एक मौत हुई, और विधायक का ड्राइवर गिरफ्तार हुआ। लेकिन यह बात सिर्फ मध्यप्रदेश की हो ऐसा नहीं है। छत्तीसगढ़ में भी हम कई बार ऐसा देखते हैं, और लोग ऐसी लाल-नीली बत्तियों वाली गाडिय़ों से जख्मी होते हैं या मरते हैं तो ही खबर बनती हैं। इससे पहले लोगों को कूद-कूदकर, छिटककर सड़क के किनारे होना पड़ता है, और सायरन-बत्तियों को रास्ता देना पड़ता है। यह सायरन-बत्तियां फायर ब्रिगेड, एम्बुलेंस, या पुलिस की ड्यूटी-गाडिय़ों की हो, तो भी ठीक है, ये सब तो सत्ता के आसपास के तमाम लोग लगाकर घूम रहे हैं।
अखबारों में आए दिन सत्ता पर सवार लोगों की ऐसी गाडिय़ों की तस्वीरें छपती हैं जो कि नंबर प्लेट की जगह ओहदों वाली पट्टियों की होती हैं, और जिनके सिर पर बत्तियां और सायरन लगे होते हैं। जनता में मानो दहशत पैदा करने के लिए गाडिय़ों के सिर पर दो-दो, तीन-तीन सायरन लगा दिए जाते हैं, और ताकतवर ओहदों वाले लोगों के आसपास के ड्राइवर और सुरक्षाकर्मी भी अकेले चलते हुए भी सड़क खाली करवाने के लिए इनका इस्तेमाल करते रहते हैं। 
सत्ता की ताकत के इस्तेमाल का यह एक बहुत ही हिंसक और अश्लील नजारा है। यह रंग-ढंग ऊपर से शुरू होता है और नीचे तक चले आता है। पुलिस के एक सिपाही के घर वाले भी मोटर साइकिल की नंबर प्लेट पर नंबर की जगह पुलिस लिखवाकर चलते हैं, अखबारों में काम करने वाले लोगों से परे, इतने लोग नंबर प्लेट पर प्रेस लिखवाकर चलते हैं कि उनमें कपड़े प्रेस करने वाले लोग भी जरूर शामिल रहते होंगे, वरना इतने प्रेस वाले आएंगे कहां से? भारतीय लोकतंत्र में बेशर्मी इतने गहरे तक घर कर गई है कि किसी को दूसरों को कुचलने में कोई शर्म महसूस नहीं होती। लोग गाडिय़ों के काफिलों में चलते हैं, क्योंकि ऐसे काफिले ताकत का प्रतीक बन जाते हैं, और लोग ऐसा मानकर चलते हैं कि यह ताकत उनको अपनी जिंदगी के आखिरी दिन तक के लिए मिली हुई है। लोग दूसरों को सड़कों से खदेड़ते हुए अपने काफिलों को खूनी रफ्तार से दौड़ाते हैं, यह मानकर कि उनके मौजूद रहते किसी और को सड़क पर रहने का कोई हक नहीं है। 
ऐसा सिलसिला भारत में खत्म होना आसान इसलिए नहीं है कि यहां सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज भी ऐसी ही गाडिय़ों, और ऐसे ही सायरन वाले काफिलों में चलते हैं, और सत्ता के इस आतंक का मजा लेते हुए, आम जनता में आतंक पैदा करते हुए अब उनकी सोच इस कदर सामंती हो गई है कि वे इससे परे रहकर शायद हीन भावना का शिकार हो जाएंगे। जिन बड़ी अदालतों के जज छोटी-छोटी बातों पर जनता के बुनियादी हकों को लेकर सुनवाई करते हैं, और सरकार के फैसलों को खारिज करते हैं, उन्हें यह न सूझना मुमकिन नहीं लगता कि किसी जज के लिए बजाए जाते सायरन से सड़क की बाकी जनता के बुनियादी हक कुचले जाते हैं। और फिर ऐसे जज सायरन बजाकर चलकर दस मिनट जल्दी पहुंचकर क्या कोई ऐसा फैसला लिखने वाले हैं जिसमें दस मिनट की देर होने से एक भूचाल आ जाएगा? क्या एक नेता या अफसर सायरन बजाकर, लोगों को सड़क से हटवाकर जाकर आनन-फानन बिजली की रफ्तार से कोई ऐसा हुक्म करने वाले हैं जिसमें देर होने से जनता भूखी मर जाएगी? 
सत्ता इंसानियत को छीन लेती है। वैसे इंसानियत अपने आप में बड़ा दगाबाज शब्द है, और इसका जो प्रचलित अर्थ है, उससे परे इंसानियत का सही मतलब तो अच्छी और बुरी उन तमाम बातों के एक बंडल का है, जिसके भीतर इंसान और हैवान दोनों ही एक साथ काबिज हैं। इंसान अपने भीतर के हैवान को छुपाने के लिए इंसानियत शब्द को एक अलग मतलब दे देते हैं, और हैवान अपने से बाहर के किसी काल्पनिक जंतु को बता देते हैं। दरअसल इंसान के भीतर ही यह हैवान भी है, और दुनिया में जैसे-जैसे इंसान को ताकत मिलते चलती है, सबसे पहले वह ताकत उसके भीतर के हैवान को मजबूत करती है। इसी बात को लोग प्रचलित शब्दों में कहते हैं कि ताकत उनके सिर पर चढ़ गई है। यही सिर पर चढ़ी ताकत बिना नंबर प्लेट चलने में गौरव हासिल करती है, लाल-नीली बत्तियां जलाकर, सायरन बजाकर, सड़कों से आम जनता को किनारे धकेलकर अपने अहंकार को सहलाती है। 
क्या भारत की कोई अदालत अपने खुद के इस सामंती मजे पर रोक लगा सकेगी?

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