मजदूर के बच्चों ने आईआईटी पहुंचकर खड़े किए कुछ सवाल

21 जून 2015
संपादकीय
उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ के एक मजदूर के दो बेटों ने आईआईटी दाखिले में जगह बनाई, और अब जब उनके पास फीस देने की ताकत भी नहीं है, तो स्मृति ईरानी, राहुल गांधी, और अखिलेश यादव सभी लोग उसकी मदद को सामने आए हैं। स्मृति ईरानी ने आईआईटी की फीस माफ करने की घोषणा की है और स्कॉलरशिप देने की भी। 
अब जिस देश में आईआईटी दाखिले की तैयारी सैकड़ों या हजारों करोड़ रुपये सालाना की कोचिंग का कारोबार बन चुका हो, वहां पर मजदूर के दो बेटों का इस तरह कामयाबी पाना बहुत से सवाल खड़े करता है। और इन सवालों पर बात करने के पहले लगे हाथों यह भी याद दिलाना ठीक होगा कि किस तरह बिहार में बरसों से गरीब बच्चों को गरीब कोचिंग देकर आईआईटी तक पहुंचाने वाले सुपर-30 नाम से मशहूर आनंद नाम के एक नौजवान ने इस बरस भी अपने तीस बच्चों में पच्चीस को आईआईटी तक पहुंचाकर दम लिया है। भारत में कैपिटेशन फीस देकर दाखिले के पैमाने देखें, तो आईआईटी में एक-एक दाखिला कई-कई करोड़ के लायक होता है, और जो बच्चे अपनी काबिलीयत से वहां पहुंच जाते हैं वे मानो अपने मां-बाप को रातों-रात करोड़पति बना देते हैं।
अब हम उस सवाल की बात करें जो कि ऐसे गरीब बच्चों की कामयाबी से उठते हैं। होनहार तो बहुत से बच्चे रहते हैं, लेकिन जब दाखिले के लिए कड़ा मुकाबला होता है, और एक-एक नंबर पर फर्क पड़ता है, तब साल भर की लाखों की कोचिंग का फर्क पड़ता है। और भारतीय संविधान के मुताबिक यहां के बच्चों को अवसरों की समानता की जो बात कही जाती है, वह बात महज बात है, और असल जिंदगी में उसका कोई मतलब नहीं है। जब एक मजदूर के बच्चे उन बच्चों से मुकाबला करते हैं जिनको लाखों रुपये साल की कोचिंग नसीब है, तो फिर मजदूर के कोई एक-दो बच्चे भले ही कामयाबी पा जाएं, उनका तबका तो किसी तरह की बराबरी का कोई हक नहीं पाता। और उदार अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत में यह गैरबराबरी बढ़ती चल रही है जिसमें गरीब को मौके सिर्फ कागजों पर हैं, उनको बराबरी सिर्फ कागजों पर है, असल जिंदगी में उनके लिए मौके न के बराबर हैं। 
अभी हम इस मुद्दे को पढ़ाई और परीक्षा के बीच की खींचतान पर ले जाना नहीं चाहते, क्योंकि उससे गैरबराबरी की बात अधूरी रह जाएगी। भारत में शहरी और संपन्न, कुलीन और सक्षम तबके के हितों को ध्यान में रखकर बाजार ने उत्कृष्टता खड़ी करने का जो कारोबार बढ़ाया है, इस देश और इसके प्रदेशों की शिक्षा व्यवस्था उसी को बढ़ावा देती है। जब पढ़ाई को किनारे रखकर केवल मुकाबले के इम्तिहान के लिए तरकश के तीर तेज करने का ही महत्व होता है, तब गरीब के मौके घटते चले जाते हैं। ऐसे में यह सोचने की जरूरत है कि देश के बच्चों के बीच बराबरी कैसे वापिस लाई जा सकती है, और इसके साथ-साथ यह भी सोचा जाना चाहिए कि पढ़ाई की जगह जो पूरा ध्यान इम्तिहान पर रखा जाता है, उसका खात्मा भी कैसे हो?

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