बलात्कारियों के हिमायती मंत्रियों के खिलाफ जनहित याचिका दायर करने की बड़ी जरूरत

संपादकीय
7 जून 2015

उत्तरप्रदेश के एक मंत्री ने कहा है कि बलात्कार आपसी सहमति से होते हैं। यह सोच लोहिया का नाम लेकर बनी समाजवादी पार्टी के मंत्री का है। दूसरी तरफ देश के एक दूसरे हिस्से में गोवा के एक मंत्री ने अपने राज्य में पहुंची दूसरे राज्यों की महिलाओं से सामूहिक बलात्कार को नादानी बताया है। इस तरह की बातें देश के अलग-अलग हिस्सों में बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोग कहते ही रहते हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद जल्द ही पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी को एक बलात्कार की शिकायत का सामना करना पड़ा, और पुलिस की जांच शुरू भी होने के पहले उन्होंने इसे राजनीतिक साजिश करार दे दिया, यह एक और बात है कि हफ्तों के भीतर ही पुलिस ने इस शिकायत को सही पाया और बलात्कारियों को गिरफ्तार भी किया। दिल्ली के एक पिछले पुलिस कमिश्नर ने यह सवाल उठाया था कि रात आठ बजे के बाद लड़कियां अपने घर के किसी आदमी के साथ क्यों बाहर नहीं निकलतीं, अकेले क्यों जाती हैं?  एक किसी महान भारतीय ने उसी समय यह बयान भी दिया कि नूडल्स खाने से बलात्कार की घटनाएं बढ़ती हैं। इस मुताबिक तो अब मैगी पर रोक लगने के बाद बलात्कार करीब-करीब खत्म हो जाने थे। 
लेकिन बलात्कार को अकेले देखना उसकी जड़ों को अनदेखा करना होगा। भारतीय समाज में कन्या भ्रूण से लेकर सतीप्रथा तक लड़की और महिला को प्रताडि़त करने के इतने किस्म के मौलिक तरीके आजाद भारत में भी जारी हैं कि जिन्हें देखकर दुनिया हक्का-बक्का रह जाती है। लोग कन्याओं को थोक में मार रहे हैं, कहीं मां मार रही है, कहीं बाप मार रहा है, और छत्तीसगढ़ में तो अभी-अभी बेटे की चाह में एक बाप ने दो बेटियों को मार डाला। ऐसे देश में महिला के लिए जो हिकारत सैकड़ों बरस से समाज में, और खासकर हिन्दू समाज में, और खासकर गैरदलित-गैरआदिवासी हिन्दू समाज में फैली हुई है, वह आए दिन कहीं न कहीं किसी लड़की या महिला की जान लेती है। हत्या या बलात्कार तो अखबारी सुर्खियों में आ जाते हैं, लेकिन लड़की की प्रताडऩा खबरों में आने के पहले कम से कम हजार गुना अधिक मामलों में होती है, और जब वह हिंसा की सीमा पार कर जाती है तब जाकर वह खबर बनती है। 
लड़कियों के हक को लेकर समाज की सोच में एक बदलाव की जरूरत है। जब हरियाणा की खाप पंचायतें, या उत्तरप्रदेश और आसपास के इलाकों में इज्जत के नाम पर की जाने वाली लड़कियों और प्रेमी जोड़ों की हत्याएं आए दिन खबर बनती हैं, जब हर हफ्ते कहीं न कहीं हिन्दू समाज का कोई तबका ऐसे फतवे जारी करता है, कि लड़कियों के जींस पहनने पर रोक लगाई जा रही है, उनके मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर रोक लगाई जा रही है, तो ऐसे तबके अपने प्रभाव क्षेत्र के मर्दों को बिना कही यह मंजूरी देते हैं कि वे आसपास की लड़कियों और महिलाओं से बलात्कार कर सकते हैं। जब एक समाजवादी मंत्री या भाजपा का एक मंत्री बलात्कार को सहमति या नादानी बताते हैं, जब समाजवादी मुलायम सिंह कहते हैं कि लड़कों से तो गलतियां हो ही जाती हैं, तो फिर यह सत्ता का उकसावा और सत्ता की दी हुई मंजूरी रहती है जिसके इस्तेमाल को लड़के और मर्द वैसे भी बेसब्र रहते हैं। 
हमारा मानना है कि इस देश में सुप्रीम कोर्ट के अलावा एक और संवैधानिक संस्था राष्ट्रीय महिला आयोग भी है। और इनकी कुर्सियों पर बैठे हुए जो जज या सदस्य हैं, यह उनकी जिम्मेदारी है कि ऐसे सार्वजनिक बयानों पर ऐसे लोगों को कटघरे में खड़ा करें, और उनकी हिंसक बातों के खिलाफ उन्हें सजा सुनाएं। जब तक संवैधानिक संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करेंगी, और सरकारी संस्थाओं पर बैठे लोग बलात्कार को खिलवाड़ मानकर बलात्कारियों को बढ़ावा देते रहेंगे, तब तक इस देश में लड़कियों की हिफाजत की बात बोगस रहेगी। अगर ईमानदारी से लड़कियों को बचाना है, तो ओहदों पर बैठे लोगों की बकवास के खिलाफ लोगों को जनहित याचिका दायर करनी चाहिए। वैसे तो बड़ी अदालतों के जज अपनी मर्जी के खिलाफ की छोटी-छोटी बातों को लेकर खुद ही मुकदमे दर्ज कर लेते हैं, लेकिन चूंकि उनको लड़कियों के खिलाफ ऐसी गैरकानूनी और हिंसक बातों की गंभीरता खुद होकर समझ नहीं आ रही, इसलिए किसी जवाबदेह नागरिक को जनहित याचिका दायर करनी चाहिए। 

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