यह मोदी का दिन है, लेकिन किसी पर थोपने का नहीं...

संपादकीय
20 जून 2015

भारत के साथ-साथ दुनिया के अधिकतर देशों में कल अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाने वाला है, और 21 जून को संयुक्त राष्ट्र संघ ने यह दिन भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर योग के नाम समर्पित किया था। भारत में योग दिवस के मौके पर दो बड़ी गैरजरूरी बहस छिड़ी हुई हैं। पहली बात तो यह कि योग को मुस्लिम समाज पर अनिवार्य रूप से थोपा जाए या नहीं। स्कूलों और कॉलेजों में योग को लेकर कुछ मुस्लिम संगठनों ने यह आशंका चली आ रही है कि इसके कुछ हिस्से इस्लाम की मान्यता के खिलाफ हैं। दूसरी बहस कांग्रेस ने छेड़ी है जिसने मोदी के योगदान को कम करने के लिए कल एक प्रेस कांफ्रेंस में यह कहा कि योग हजारों बरस से भारत में चले आ रहा है, और इसे मोदी ने शुरू नहीं किया है। इन दो विवादों से परे देश के आम लोग योग को लेकर उत्साह में हैं, और इस उत्साह को देखकर आक्रामक हिन्दू नेता कई तरह के बयान दे चुके हैं जिनमें योग न मानने वालों को समंदर में डूब मरने से लेकर देश छोड़कर चले जाने तक, और देशद्रोह तक की बातें की गई हैं। देश में राजकीय योगी के रूप में अपने आपको स्थापित कर रहे रामदेव ने भी कुछ ऐसे बयान दिए हैं कि जो मजहब योग से आहत होता हो, वैसे मजहब को भी लोगों को छोड़ देना चाहिए। 
योग जैसी एक भारतीय जीवन पद्धति को जिस तरह आक्रामक और विवादपूर्ण बनाने का काम कुछ साम्प्रदायिक लोग कर रहे हैं, उससे पूरे देश का नुकसान हो रहा है। कोई भी जीवन पद्धति चाहे कितनी भी अच्छी क्यों न हो, उसे तमाम लोगों पर बलपूर्वक या नियम-कानून बनाकर नहीं लादा जा सकता। यह कुछ उसी तरह का होगा जिस तरह की अमरीका इराक जैसे देशों पर अपने लड़ाकू विमानों से बमों के साथ लोकतंत्र बरसाने का दावा करता है। भारत के लोकतंत्र में लोगों के सामने विकल्प रखे जा सकते हैं, लेकिन उनको न मानने वाले लोगों को गद्दार कहना, देश छोड़कर जाने को कहना, उनको डूब मरने को कहना एक बहुत ही हिंसक साम्प्रदायिकता है, और ऐसे ओछे हमलों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पूरे योगदान का महत्व घटा दिया है। 
हम कांग्रेस की इस बात से सहमत नहीं हैं कि कल पूरी दुनिया में जो होने जा रहा है उसमें नरेन्द्र मोदी का कोई योगदान नहीं है। मोदी ने ही अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित करने की पहल की थी, और संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में एक अभूतपूर्व बहुमत के साथ उसे मंजूरी मिली थी। यह कम बात नहीं होती। कांग्रेस के पास अपने आधी सदी के कार्यकाल में ऐसा करने का बहुत मौका था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों से लगभग नावाकिफ समझे जाने वाले नरेन्द्र मोदी ने अपने शुरुआती कुछ महीनों में यह बड़ा काम कर दिखाया। और यह भूलना नहीं चाहिए कि योग की अंतरराष्ट्रीय संभावनाएं जैसे-जैसे बढ़ेंगी, हो सकता है कि भारत से लाखों योग शिक्षकों को दुनिया भर में जाकर काम करने की संभावनाएं मिलने लगें। भारत का नाम योग के साथ जुड़ा हुआ है, और जुड़ा हुआ रहेगा। इसकी कुछ बातों को किसी धर्म से जोड़कर देखना जारी रहेगा, और उन बातों को थोपने की जिद अगर नहीं होगी, तो बाकी धर्मों के लोग भी योग के अधिकांश हिस्से से जुड़ेंगे। थोपने के बजाय जोडऩे की कोशिश हिन्दुस्तान के मूर्ख और मूढ़ साम्प्रदायिक लोगों को समझाने की जरूरत है, लेकिन मोदी ने इस बारे में मुंह नहीं खोला है। 
अब हम आम लोगों की जिंदगी में योग की बात करें, तो इससे फायदे ही फायदे हैं। सूर्य नमस्कार से कुछ लोगों को धार्मिक असहमति होती है, तो उसके बिना भी योग उतना ही फायदेमंद होगा, और हर किसी की जिंदगी में यह तन और मन की बेहतरी का काम कर सकता है। आज दुनिया में शारीरिक और मानसिक बीमारियां जितनी बढ़ रही हैं, उनकी रोकथाम के लिए योग एक असरदार तरीका हो सकता है, और इससे रोज की जिंदगी की उत्पादकता भी बढ़ सकती है। बिना किसी नारे के, बिना किसी धार्मिक उन्माद के, बिना किसी हमले के योग अधिक शांति के साथ अधिक लोगों के अधिक फायदे का हो सकता है, और वही किया जाना चाहिए। फिलहाल इस मौके की पूरी वाहवाही इसकी पहल करने वाले नरेन्द्र मोदी को देने की जरूरत है, ऐसा न करके लोग सम्मान नहीं पा सकेंगे। तंगदिली हर मौके पर ठीक नहीं होती।

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