आज से स्कूलें शुरू, और समाज की जिम्मेदारी

संपादकीय
16 जून 2015

छत्तीसगढ़ में आज से सरकार ने सरकारी जलसों के साथ स्कूलों को शुरू किया है। मुख्यमंत्री से लेकर बाकी तमाम लोग बच्चों के स्वागत के लिए स्कूलों में पहुंचे और सरकार ने हर बरस की तरह फिर यह घोषणा की है कि अधिक से अधिक बच्चों का स्कूल दाखिला करवाया जाएगा। छत्तीसगढ़ में निजी स्कूलों के एक छोटे हिस्से को छोड़ दें, तो अधिकतर गरीब लोगों के लिए सरकारी स्कूलें ही रहती हैं, और वहीं से निकलकर बच्चे आगे जितनी संभावनाएं रहती हैं, जितनी क्षमताएं रहती हैं, वहां तक पहुंचते हैं। 
भारत जैसी शिक्षा व्यवस्था में गरीब सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले अधिकतर बच्चों के लिए आगे के बड़े मुकाबले पहुंच के लगभग बाहर ही रहते हैं। बड़े-बड़े कॉलेजों तक जाने के लिए दाखिले के जो मुकाबले होते हैं, उनमें शहरी और संपन्न बच्चों की तैयारियां किसी ओलंपिक में खिलाड़ी के खास बने हुए जूतों और कपड़ों, उपकरणों और प्रशिक्षण जैसी ही होती हैं। लेकिन बहुत गरीब बच्चों में से अधिकतर के सपने भी इन ऊंचाइयों तक नहीं पहुंच पाते, और वे मामूली पढ़ाई करके, कस्बे के कॉलेज में कोई बेमतलब डिग्री हासिल करके रह जाते हैं। 
आज चूंकि स्कूल शुरू हुए हैं, इसलिए हम सरकार से परे भी समाज की यह जिम्मेदारी मानते हैं कि अपने आसपास के सभी बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने की एक सामूहिक और सामाजिक जिम्मेदारी पूरी करे। ऐसा न होने पर कम पढ़े-लिखे बच्चे अगर राह से भटकते हैं, तो वे बाकी समाज के लिए भी एक दिक्कत बन सकते हैं। इसलिए किसी भी समाज के ताकतवर और संपन्न तबके के लिए भी यह जरूरी है कि कमजोर और विपन्न तबका भी अपनी पूरी संभावनाओं का मौका पा सके। अमरीका जैसा पूंजीवादी देश भी जब किसी तबके को बराबरी का मौका नहीं दे पाता, और सामाजिक भेदभाव के चलते कोई तबका पिछड़ता है, तो वैसा तबका समाज के सामूहिक विकास की रफ्तार को धीमे भी करता है, दिक्कतें भी खड़ी करता है। 
इसलिए छत्तीसगढ़ में लोगों को चाहिए कि बच्चों को अधिक से अधिक स्कूल पहुंचाने में थोड़ा सा समय दें, जो लोग भी स्कूलों की देखभाल में हिस्सा ले सकते हैं, वे अपने आसपास के सरकारी स्कूलों के विकास में मदद करें, वहां के बच्चों की सार्वजनिक जगहों पर आदतों को ठीक रखने में ध्यान दें। बच्चे न तो किसी परिवार के होते, और न ही वे किसी सरकार की जिम्मेदारी होते, वे तो पूरे समाज का हिस्सा होते हैं, और समाज की जिम्मेदारी होते हैं। वे ही कल का आने वाला समाज होते हैं। इसलिए आज समाज के बाकी लोगों को नई पीढ़ी पर कुछ समय और ध्यान का पूंजीनिवेश करना चाहिए। कोई भी समाज टुकड़ों में आगे नहीं बढ़ सकता, केवल संपन्न और सक्षम तबका अकेले खुश नहीं रह सकता। इसलिए जिनके पास खुशियां कुछ अधिक हैं, उनको उदारता से अपने आसपास इन खुशियों को बांटना चाहिए। 
केन्द्र और राज्य सरकारों की बहुत सी योजनाएं स्कूलों में पोशाक से लेकर किताबों तक, और दोपहर के खाने तक की हैं। इन सबको कामयाबी से पूरा करने में समाज के हिस्सेदारी होनी चाहिए। 

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