क्या मोदी के मन की बात में कभी देश के मन की बात को भी जगह मिलेगी?

संपादकीय
18 जून 2015

आजकल में हो सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मन की बात की अगली तारीख सामने आ जाए। अब तक वे कई बार रेडियो पर आकर अलग-अलग कई मुद्दों पर देश-विदेश की भारतवंशी जनता से अपने मन की बात बोल चुके हैं, और रेडियो बड़े लंबे समय बाद एक बार फिर खबरों को गढ़ रहा है। लेकिन पहले भी कुछ मौकों पर हम यह लिख चुके हैं कि जो प्रधानमंत्री आए दिन बहुत से मुद्दों पर बहुत-बहुत बोलता है, देश में बोलता है, विदेश में बोलता है, भीड़ में बोलता है, रेडियो पर बोलता है, उससे लोग उन मुद्दों पर बोलने की उम्मीद करते हैं जो कि देश में जल और धधक रहे हैं। लेकिन ऐसे आधा-एक दर्जन रेडियो प्रसारण याद करें, तो साल भर के सबसे जलते-सुलगते मुद्दों पर नरेन्द्र मोदी ने न रेडियो पर कुछ कहा, और न ही रेडियो से परे कुछ कहा। और हमारा यह पक्का मानना है कि देश में जो ज्वलंत मुद्दे हैं, वे किसी भी प्रधानमंत्री के मन से परे तो हो ही नहीं सकते। तो फिर यह मन की कैसी बात है जो कि सामने आती ही नहीं? 
एक लाईन बड़ी पुरानी है- साफ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं। यह लाईन नरेन्द्र मोदी के हर रेडियो प्रसारण के समय याद पड़ती है। उनके पहले के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चुप्पी साधे रहते थे, बहुत कम बोलते थे, और बहुत ही कम मौकों पर जनता के सामने आते थे, इसलिए उनसे लोग कुछ उम्मीद भी नहीं करते थे। लेकिन नरेन्द्र मोदी तो इतना-इतना बोलते हैं कि उनके एक भाषण में से सुर्खियां ढूंढने में अखबार वालों की जान निकल जाती है। लेकिन इसके बाद भी वे अपनी पार्टी के, अपनी सरकार के लोगों के बारे में उन मुद्दों पर कुछ नहीं बोलते, जिन मुद्दों पर बोलने की सबसे अधिक जरूरत है, और जिन मुद्दों पर देश-विदेश के लोग सचमुच ही यह जानना चाहते हैं कि इस बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का क्या कहना है? 
अब जैसे आज पूरा देश यह जानना चाहता है कि सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे, और ललित मोदी को लेकर जो बहुत ही आपराधिक दर्जे का विवाद चल रहा है, उस पर नरेन्द्र मोदी का क्या कहना है? सुषमा स्वराज उनके मंत्रिमंडल की एक सबसे वरिष्ठ सदस्य हैं, और वसुंधरा राजे उनकी पार्टी की एक मुख्यमंत्री। इन दोनों ने एक ऐसे आदमी की मदद की है, जो कि भारतीय कानून का भगोड़ा है, जिसे भारतीय जांच एजेंसियां घसीटकर भारतीय अदालत में लाना चाहती हैं। लेकिन आज इस भगोड़े की गैरकानूनी मदद करके सुषमा स्वराज ने जो काम किया है, वह काम प्रधानमंत्री की चुप्पी बर्दाश्त नहीं कर सकता। लोकतंत्र में प्रधानमंत्री को मुंह खोलना ही चाहिए, और मनमोहन सिंह के वक्त भी हम कई मौकों पर प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत बयान की मांग करते आए हैं। यह मामला भाजपा के भीतर नरेन्द्र मोदी की सहूलियत का हो सकता है कि उनके मुकाबले जिन लोगों को साल भर पहले तक गिना जाता था, वैसी संभावनाओं वाले लोगों में से एक सुषमा स्वराज अपनी ही हरकतों से निपट गई हैं। दूसरी तरफ जो वसुंधरा राजे नरेन्द्र मोदी से इस बात को लेकर नाराज चल रही थीं कि उनके बेटे को मोदी ने मंत्रिमंडल में नहीं लिया, वे वसुंधरा राजे भी अपनी ही करतूतों से निपट गई हैं। यह बात एक राजनीतिक सुविधा की हो सकती है, लेकिन देश राजनीति से ऊपर है, और प्रधानमंत्री देश के प्रति जवाबदेह हैं। 
सच तो यह है कि भाजपा और सरकार के बहुत से लोगों के साम्प्रदायिक बयानों के बाद जब मोदी से लोग कार्रवाई की उम्मीद करते थे, तब मोदी ने कोई टिप्पणी भी नहीं की। अब जब सुषमा स्वराज पर सीधी कार्रवाई की जरूरत है, तब भी मोदी इस जलते हुए मुद्दे से मुंह मोड़कर योग करते बैठे हैं। योग वैसे तो बड़ी अच्छी चीज है, लेकिन अनदेखी-योग और चुप्पी-योग, राजयोग के साथ-साथ नहीं चल सकते। मोदी को अपने मन की बात में हल्के-फुल्के और दार्शनिक अंदाज के, समाज सुधार के, और नसीहती-मसीहाई बातों के प्रसारण से परे गंभीर मुद्दों पर बोलना चाहिए। देश के प्रधानमंत्री को मन की ऐसी बात की रियायत नहीं मिल सकती जो कि देश के मन की बात को पूरी तरह अनदेखी करके चले। अब अगर प्रधानमंत्री की चुप्पी इसी तरह जारी रही, और उन्होंने आने वाले दिनों में किसी उपदेश का प्रसारण किया, तो देश के मन में यही बात उठेगी- तू इधर-उधर की बात न कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा...।

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