एक्टिविस्ट को जर्नलिस्ट मानने की चूक न करें

22 जून 2015


मध्यप्रदेश में कल एक पत्रकार के अपहरण के बाद उसकी हत्या की खबर है, और पहली खबर में आई जानकारी के मुताबिक वहां के खनिज माफिया ने यह हत्या की है जिसके खिलाफ यह पत्रकार अदालत में मुकदमा लड़ रहा था। इसके पहले उत्तरप्रदेश में एक पत्रकार को जलाकर मारने के बाद एक मंत्री पर यह तोहमत है कि उसने पुलिस भेजकर इस पत्रकार को जलवाया क्योंकि इसने सोशल मीडिया पर इस मंत्री के खिलाफ कुछ लिखा था। अब वह मंत्री इसके बाद से लगातार फरार चल रहा है, पुलिस में उसके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज है, मरने वाले पत्रकार ने आखिरी बयान में उसका नाम बताया है, और पत्रकार का गरीब परिवार एक पेड़ के नीचे धरना देते टीवी की खबरों में दिख रहा है। इस हादसे के दो दिन बाद ही उत्तरप्रदेश में एक दूसरे पत्रकार के बारे में एक खबर आई कि उसे मोटरसाइकिल से बांधकर घसीटा गया। एक खबर छत्तीसगढ़ के भाटापारा से दो दिन पहले ही आई है कि वहां एक साप्ताहिक अखबार के संपादक को सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक भतीजे ने धमकी दी है। 
एक और खबर सोशल मीडिया पर तैर रही है कि भारत में पिछले एक बरस में किस तरह करीब पौन सौ पत्रकारों की हत्या हुई है। इसके साथ-साथ जोड़कर देखें तो छत्तीसगढ़ के ही बिलासपुर और गरियाबंद में पत्रकारों की हत्या को कुछ महीने या बरस हो चुके हैं, और अब तक कोई सुराग नहीं है। कोई दो बरस पहले बस्तर में एक अखबार के संवाददाता की हत्या हुई थी, जिसके पीछे नक्सलियों का हाथ आया था। 
अब हम पत्रकार या अखबारनवीस तबके को देखें तो यह इतना व्यापक हो गया है कि इसका दायरा कहां शुरू होता है और कहां खत्म होता है यह अंदाज लगाना मुश्किल है। देश में लाखों अखबार हैं, छत्तीसगढ़ जैसे छोटे प्रदेश में ही दसियों हजार अखबारों के नाम रजिस्टर हैं, और उनमें से कम या अधिक दिनों तक छपने वाले भी हजारों अखबार हैं। अब एक-एक अखबार के दर्जन भर पत्रकार हो सकते हैं, और दर्जनों हो सकते हैं। जहां तक भारत के अधिकतर क्षेत्रीय मीडिया का सवाल है तो उसके पत्रकार पूर्णकालिक पत्रकार दो मायने में नहीं होते, एक तो उनका पत्रकारिता से परे कोई कारोबार होता है, या फिर वे अखबार से इतनी तनख्वाह नहीं पाते कि उन्हें पूर्णकालिक कर्मचारी माना जाए। ऐसे में जो लोग रोजगार से परे अखबारनवीसी करते हैं, वे तमाम लोग भी पत्रकार तो हैं, लेकिन उनमें से बहुत से लोगों का कामकाज पत्रकारिता से परे भी कई तरह का रहता है। 
अब जैसे अखबार मालिक हैं, या मीडिया मालिक हैं, उन पर कोई रोक नहीं है कि वे मीडिया के अलावा दूसरा कारोबार न करें, इसी तरह अखबारनवीस भी आज जर्नलिस्ट होने के साथ-साथ एक्टिविस्ट भी हैं, वे दूसरे कारोबार भी करते हैं, दूसरी जगहों पर नौकरी भी करते हैं, और सोशल मीडिया की मेहरबानी से ऐसे लोग परंपरागत पेशेवर मीडिया से परे भी अपनी बातों को लिखते हैं। अब ऐसे में जब किसी पत्रकार की हत्या होती है तो वह पत्रकार की हत्या तो गिनी जाती है, लेकिन वह जमीन के कारोबार में हुई है, एक आंदोलनकारी के रूप में हुई है, किसी निजी रंजिश से हुई है, या फिर सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करके जानकारी निकालकर अदालत में जाकर किसी के खिलाफ मुकदमा चलाने की वजह से हुई है? 
यह फर्क समझने की जरूरत है कि आज कई नए तबके खड़े हो गए हैं जो पत्रकारिता के साथ-साथ मिलकर चल रहे हैं। ऐसा एक तबका अपने को आरटीआई एक्टिविस्ट कहता है और जो सरकार या सूचना के अधिकार के दायरे में आने वाले बाकी संस्थानों से जानकारी निकालकर उसके आधार पर चारों तरफ शिकायतें भेजता है, अदालतों में जनहित याचिका दायर करता है, और धरने पर भी बैठ जाता है। ऐसा दूसरा तबका है जो कि बिना किसी परंपरागत मीडिया के या परंपरागत मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया पर अपना एक अलग आंदोलन चलाता है, और वहां का हिसाब-किताब भी लोग दूसरी जगह चुकता करते हो सकते हैं, और दूसरी जगह का हिसाब-किताब भी ऐसे पत्रकार सोशल मीडिया पर चुकता कर सकते हैं, करते हैं। 
इसलिए आज पत्रकार पर हमला या पत्रकार की हत्या इस बात के बारीक खुलासे की जरूरत है। जिस तरह भारत में किसान की आत्महत्या और किसानी की वजह से आत्महत्या दो अलग-अलग चीजें भी हो सकती हैं। एक किसान किसी प्रेम संबंध की वजह से या किसी बीमारी से थककर भी खुदकुशी कर सकता है, उसी तरह एक पत्रकार की हत्या के पीछे गैरअखबार वजहें भी हो सकती हैं। ऐसे में यह मूल्यांकन जरूरी है कि हत्या या हमले के पीछे मीडियाकर्मी होना या अखबारनवीसी की वजह है, या कि किसी मामले-मुकदमे की वजह से यह हत्या हुई है? 
मध्यप्रदेश के जिस पत्रकार की हत्या को लेकर आज यहां बात शुरू की है उसकी हत्या से हमको तकलीफ हुई है। लेकिन खबर में जो वजह आई है, वह खनिज माफिया के खिलाफ मुकदमेबाजी की है। मेरी समझ यहां पर कुछ कमजोर पड़ती है कि एक पत्रकार को एक आंदोलनकारी के रूप में किस हद तक सक्रिय होना चाहिए? और एक पत्रकार का काम उसके मीडिया से परे कितनी दूर तक जायज माना जाए? वैसे तो लोकतंत्र में हर पत्रकार एक नागरिक भी है, और उसके लोकतांत्रिक-नागरिक अधिकार पत्रकार होने से घट नहीं जाते। लेकिन एक दूसरी बात जो मुझको बहुत जरूरी लगती है वह यह कि पत्रकार को अपने मीडिया से परे बाकी के लोकतांत्रिक मोर्चों पर अपनी सक्रियता सीमित रखनी चाहिए। 
बहुत से पत्रकार मंच, माला, महत्व, माईक, और मौजूदगी की पत्रकारिता करते हैं। वे पुराने कार्टूनों या लतीफों के मुताबिक जेब में कैंची लेकर चलते हैं कि कब कहां फीता काटने बुला लिया जाए। अपनी दूसरी जेब में ऐसे लोग एक माचिस लेकर चलते हैं कि सरस्वती प्रतिमा के सामने दीया जलाने के वक्त ऐसा न हो जाए कि आयोजकों के पास माचिस न रहे। फिर कई पत्रकार ऐसे रहते हैं जो अपने लिखे हुए, या कि लिखाए हुए को बेअसर पाकर बेशर्म सरकार के खिलाफ या कारखानेदारों के खिलाफ अदालत तक जाना जरूरी समझते हैं क्योंकि जब कलम बेअसर हो जाए, तो कानून की तलवार उठाना उनको जायज लगता है। 
मैं ऐसे तमाम जर्नलिस्ट-एक्टिविस्ट के खिलाफ हूं, क्योंकि इससे एक्टिविज्म को तो ताकत मिलती है, और जर्नलिज्म की साख गिरती है। जब लोग अखबारनवीसी को किसी और आंदोलन के लिए एक औजार या हथियार बना लेते हैं, तो उस आंदोलन का मकसद चाहे कितना ही अच्छा क्यों न हो, वह अच्छी अखबारनवीसी नहीं रह जाती। इसलिए ऐसे लोग अखबारनवीसी का नकाब ओढ़कर आंदोलन करते हैं, और देश में ऐसे दो ही आंदोलन थोड़ी दूर तक मुझको जायज लगे क्योंकि वे पत्रकारिता पर हमले के खिलाफ भी थे। एक तो आजादी की लड़ाई के दौरान जब अखबारनवीसी पर अंग्रेज सरकार की बंदिशें थीं, और उस दौर के अखबारनवीस जिस तरह अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ अखबार निकालते थे, आंदोलन में शामिल होते थे और जेल जाते थे, वह अखबारनवीसी को बचाने की लड़ाई भी थी, देश को आजाद कराने की लड़ाई तो थी ही। ऐसा दूसरा मौका आपातकाल के दौरान आया जब बहुत से अखबार और उसके पत्रकार इंदिरा और संजय गांधी के पांव की धूल को पुलित्जर पुरस्कार समझ बैठे थे, और उस वक्त कई लोगों को एक आंदोलनकारी बनकर मीडिया पर सरकारी सेंसरशिप के हमले का मुकाबला करना पड़ा था। लेकिन इन दो मौकों को छोड़ दें, तो भारत के पूरे इतिहास में पत्रकारिता को, और पत्रकारों को किसी और आंदोलन में शामिल होने की जरूरत नहीं थी। 
पत्रकारिता का एक खास दर्जा तभी तक जायज है जब तक इस दर्जे के लोग इसकी पवित्रता का सम्मान करते हुए इसकी शुद्धता और इसकी ईमानदारी का ख्याल रखें। इसके बिना जिस तरह एक कारखानेदार आज हजारों करोड़ खर्च करके देश का सबसे बड़ा अखबारदार भी बन जा रहा है, और उससे उसकी कोई अखबारी साख नहीं बन रही, वैसा ही हाल अखबारनवीसों का भी होने लगेगा। यह बात जरूरी इसलिए है कि आज देश भर में जगह-जगह पत्रकार की परिभाषा धुंधली हो चली है। आज हर कोई पत्रकार हो चले हैं, और कोई भी खालिस पत्रकार रह गए हैं या नहीं, यह मूल्यांकन खासा मुश्किल हो गया है। बहुत सारी गाडिय़ों पर आज प्रेस और पत्रकार के लेबल लगे देखते हैं, और उसके साथ-साथ किसी राजनीतिक पार्टी का पदाधिकारी होने का लेबल भी दिखता है। अब यह सोचने की बात है कि एक राजनीतिक पार्टी की पदाधिकारी को पत्रकार माना जाए, या कि न माना जाए? यह याद रखने की जरूरत है कि देश के मीडिया में राजनीतिक दलों के जो अपने अखबार हैं उनकी साख केवल अपनी पार्टी के प्रवक्ता जितनी है, उससे परे उनकी कोई साख नहीं है, और उनकी कोई अहमियत भी नहीं है। लोकतंत्र में वे राजनीतिक दल का एक भोंपू हैं, और उनको मीडिया मानना पूरी तरह से गलत है। लोकतंत्र में मीडिया को एक अघोषित चौथे स्तंभ का जो दर्जा हासिल है, उस दर्जे के हकदार भी राजनीतिक प्रकाशन नहीं हो सकते। इसलिए ऐसे लोगों की हत्या जो कि मीडिया से भी जुड़े हुए थे, और ऐसे लोगों की हत्या जो सिर्फ मीडिया से जुड़े हुए थे, उसमें फर्क करके देखने की जरूरत है। एक एक्टिविस्ट को जर्नलिस्ट मानने की चूक नहीं करना चाहिए। 

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