शहरों को डूब से बचाना आसान इसलिए नहीं है...

22 जून 2015
संपादकीय
मुंबई से लेकर रायपुर तक, पहली बारिश में ही देश के कई शहर डूब से गए हैं। जगह-जगह ये सवाल उठ रहे हैं कि शहरीकरण पर इतनी बड़ी रकम खर्च होने के बाद भी शहरों से पानी की निकासी क्यों नहीं हो रही है? अमिताभ बच्चन जैसे लोग मुंबई को लेकर सवाल उठा रहे हैं, और रायपुर में आज बारिश में डूबे हुए लोग बैठकर बैठक कर रहे हैं। लेकिन शहरों में पानी भरने की न तो एक वजह है, और न ही उसका कोई आसान रास्ता है। फिर इंसानों की खड़ी की हुई सीधी दिक्कतों के साथ-साथ एक बड़ी दिक्कत यह भी है कि मौसम में ऐसे बदलाव आ गए हैं, और बारिश ऐसे थोक में होने लगी है कि मुंबई की इमारतों से लेकर असम के गेंडों तक के पानी में घिरे होने की तस्वीरें आती ही रहती हैं। 
लेकिन इस मुद्दे पर थोड़ी सी ठोस बात अगर करें, तो एक तो शहरीकरण से खड़ी हुई कुदरती दिक्कतें, और फिर शहरी जीवनशैली से खड़ी हुई दिक्कतें, ये दोनों मिलकर नीम पर चढ़े हुए करेले की तरह नौबत ला रही हैं। भारत के अधिकतर शहरों में बिना योजना के इमारतें और आबादी बढ़ती चली गई हैं, और इनके बोझ को ढोने की क्षमता विकसित नहीं हुई है। इनका एक आसान इलाज ऐसे शहर हो सकते हैं जो कि पूरे के पूरे नए बने हुए हैं, लेकिन मौजूदा शहरों को छोड़कर देश में एक साथ दसियों हजार नए कस्बे-शहर तो बनाए नहीं जा सकते। अब सरकार के जो विभाग योजना बनाने वाले हैं, उनको तो छोड़ ही दें, सरकार के जो विभाग, जो स्थानीय संस्थाएं, शहरी जमीनों पर कोई योजना बनाने के काम में लगी रहती हैं, वे भी शहर के महंगे इलाकों में एक-एक इंच जमीन की बाजारू संभावनाएं दुह लेना चाहती हैं। हम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी देख रहे हैं कि शहर के सबसे घने इलाकों में खाली पड़ी किसी सरकारी जमीन पर कई-कई मंजिल की इमारत ऐसे इस्तेमाल के लिए बनाने की योजनाएं चल रही हैं जिनके बन जाने पर वहां रोजाना दसियों हजार लोगों का आना-जाना बढ़ जाएगा। इनका बोझ, वहां पर रहने और काम करने वालों का बोझ आसपास की जो सड़कें आज भी जाम हैं, उन्हीं पर पड़ेगा। लेकिन जिन संस्थाओं को ऐसी योजनाओं से कमाई होगी, वहां बैठे लोग कमाई की किसी संभावना को छोडऩा नहीं चाहते हैं। अब यह कमाई संस्था की होगी या निजी होगी, उससे परे मुद्दे की बात यह है कि शहर के बीच और योजनाओं की कोई गुंजाइश न है, और न होनी चाहिए। ऐसा बाजारू शहरीकरण और डुबाने का काम ही कर रहा है। 
दूसरी तरफ शहरी जिंदगी में प्लास्टिक का कचरा, और बाकी किस्म की पैकिंग घूरों और नालियों में फिंककर यह नामुमकिन कर रहे हैं कि वहां से पानी बहकर निकल सके। पॉलीथीन पर रोक तो पता नहीं हकीकत में कितनी हो पाई है, लेकिन आजकल हर कदम पर चाय ठेले प्लास्टिक के फेंके जाने वाले कप इस्तेमाल करते हैं, और शहरों में पहली बारिश में ही नालियों से उफनकर ऐसा प्लास्टिक-कचरा चारों तरफ फैल गया है। जब तक शहरों के म्युनिसिपल ठोस कचरे के निपटारे में दिलचस्पी लेने के बजाय सैकड़ों करोड़ की योजनाओं में उलझे रहेंगे, तब तक शहरों में पानी भरा ही रहेगा। एक वक्त था जब म्युनिसिपल का बुनियादी काम नाली, पानी, सफाई, सड़क, और रौशनी हुआ करता था। आज स्थानीय संस्थाओं पर जो लोग काबिज होते हैं, उनकी खास दिलचस्पी बड़े-बड़े कंस्ट्रक्शन और बड़ी-बड़ी खरीदी में उलझकर रह जाती है।
इसलिए शहरों के डूब जाने का इलाज तब तक आसानी से नहीं हो सकता जब तक कि सरकार शहरी जमीनों को घनी बस्तियों में दुहना बंद न करे, लोग कचरे के बारे में न सोचें, और म्युनिसिपल अपनी बुनियादी जिम्मेदारी पर न लौटे।

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