पर्यावरण के कुछ कम खतरनाक लगते मुद्दों को भी देखने की जरूरत

04 जून 2015
संपादकीय

पर्यावरण दिवस पर देश भर की निगाहें कारखानों और खदानों पर जाकर टिकेंगी, और पेड़ों के कटने, नदी में गंदगी बहने की तरफ भी। लेकिन पर्यावरण की तबाही और प्रदूषण के इन बड़े मुद्दों के साथ-साथ बहुत से ऐसे छोटे मुद्दे हैं जो कि पर्यावरण को तबाह करते हैं, लेकिन जो अनदेखे भी रह जाते हैं। पर्यावरण की तबाही सिर्फ गंदगी और जहर से नहीं होती, वह उन तमाम चीजों से होती है जिनके बिना लोगों का काम चल सकता है, लेकिन लोग सामानों की फिजूलखर्ची में उनको बनवाने में लग जाते हैं। जैसे जरूरत से अधिक बड़े मकान, दफ्तरों के जरूरत से बड़े अधिक ठंडे कमरे, जरूरत से अधिक बड़ी कार, जरूरत से अधिक सामानों की खपत। दिखने को ये तमाम बातें अर्थव्यवस्था को बढ़ाने वाली दिखती हैं, लेकिन हकीकत में इनमें से हर सामान को बनाने में धरती पर एक प्रदूषण बढ़ता है। 
यह सिलसिला गांधी जैसे लोगों ने एक सदी पहले ही देख लिया था, और दुनिया में किफायत की वकालत की थी। लेकिन जैसे-जैसे दुनिया का कारोबार आक्रामक होते चले गया, वैसे-वैसे इंसान को एक ग्राहक, और फिर उससे भी अधिक बड़ा ग्राहक बनाने की दौड़ और होड़ चल पड़ी। नतीजा यह हुआ कि आज अमरीका जैसे देश में प्रति व्यक्ति मासूम दिखते सामानों की खपत दुनिया में सबसे अधिक है। वहां पर निजी कार लेकर चलने वाले लोग इतनी बड़ी कारें लेकर चलते हैं कि वहां की जुबान में उसे ट्रक कहा जाता है। तकरीबन पूरे अमरीका में सार्वजनिक परिवहन नाम की चीज नहीं हैं, और हर किसी को ऑटोमोबाइल उद्योग, पेट्रोलियम उद्योग, बड़ी-बड़ी कारें लेकर चलने के लिए उकसाते हैं। यह सिलसिला अमरीका से निकलकर हिन्दुस्तान तक पहुंच गया है, और अब चार लोगों के परिवारों में चार कारें भी होने लगी हैं। इन सबको बनाने में जितना सामान लगता है, और जितनी बिजली लगती है, इनको लाने-ले-जाने में जितना ईंधन लगता है, वह सब धरती पर न दिखने वाला प्रदूषण बढ़ाते हैं, और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं। 
इसलिए आज बाजार के हमलावर तेवरों के मुकाबले अगर लोगों को धरती के पर्यावरण को बचाना है तो गांधी जैसी सादगी, किफायत, और कम खर्च के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है। आज छोटे-छोटे बच्चे अगर संपन्न परिवारों के हैं, तो वे नमकीन आलू चिप्स से लेकर आईस्क्रीम तक, और फास्टफूड से लेकर चॉकलेट तक, रोज ही जाने कितनी ही पैकिंग धरती पर बोझ बनाते चलते हैं। दूसरी तरफ भारत में परंपरागत खानपान अधिक सेहतमंद रहा है, और मैगी जैसे जहरीले सामानों की मार्केटिंग के पहले यहां घरों में बने हुए नाश्ते के सामान खाकर बच्चे ऐसा खतरा नहीं झेलते थे, इतना खर्च नहीं करते थे, और धरती पर इतना कचरा नहीं बढ़ाते थे। 
एक दूसरा पहलू पर्यावरण दिवस पर अनदेखा यह रह जाता है कि बढ़ती हुई गाडिय़ों के बढ़ते हुए शोर के साथ-साथ शहरी जिंदगी में शादी-ब्याह और जुलूस में बढ़ते हुए संगीत-प्रदूषण से लोगों का जीना हराम हो रहा है, कान खराब हो रहे हैं, तन-मन की शांति खराब हो रही है, और कामकाज पर उसका सीधा असर हो रहा है। लेकिन यह प्रदूषण अनदेखा रह जाता है। ऐसा ही प्रदूषण शादी-ब्याह की जगहों पर बेकाबू संगीत और पटाखों से होता है, और यह सोचना भी मुश्किल है कि विवाह स्थलों के आसपास जिन लोगों के घर हैं, वे बारात के बैंडबाजे, और विवाह स्थल के कानफाड़ू संगीत के करीब जिंदगी भर कैसे रहते होंगे? इसी तरह धार्मिक संगीत लोगों के लिए जीना मुश्किल कर देता है, और रायपुर में ही एक मंदिर के खिलाफ पड़ोस में रहने वाले कुछ लोगों ने अदालत तक जाकर लाउडस्पीकरों पर रोक लगवाई थी, लेकिन प्रशासन उस रोक को बाकी जगह लागू करना जरूरी नहीं समझता, और न ही वह खुद होकर सुप्रीम कोर्ट के उन आदेशों को लागू करता जो कि ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ बरसों पहले दिए गए हैं, और देश भर में आज भी लागू हैं। धार्मिक संगीत याद दिलाता है कि किस तरह सैकड़ों बरस पहले कबीर ने यह कहने की हिम्मत की थी कि मुल्ला मस्जिद की मीनार पर चढ़कर इस तरह जोरों की आवाज लगाता है कि मानो खुदा बहरा हो गया हो। धार्मिक पाखंड के खिलाफ ऐसी बात आज भी कहने की हिम्मत किसी में नहीं है, और ऐसे पाखंड के सभी धर्मों के शोरगुल पर काबू करने की हिम्मत भी किसी में नहीं है। 
पर्यावरण दिवस पर कारखाने, खदान, पेड़ कटाई, और नदी प्रदूषण से परे के इन कुछ मुद्दों को हम उठा रहे हैं, इस उम्मीद से कि कम खतरनाक लगने वाले इन मुद्दों पर भी कार्रवाई हो। 

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