हिंसक हथियारबंद आंदोलनों में कमउम्र बच्चों का इस्तेमाल

संपादकीय
14 जून 2015

वैसे तो नक्सल मोर्चों पर मारे जाने वाले नक्सलियों की तस्वीरों को देखकर आमतौर पर लोगों के मन में हमदर्दी नहीं उमड़ती, क्योंकि लोगों का यह मानना रहता है कि वे बहुत से बेकसूर लोगों की मौतों के लिए जिम्मेदार रहते हैं, और थोक में कत्ल करते हैं। लेकिन कल बस्तर मारे गए हैदराबाद के एक छात्र का चेहरा देखकर लोग हैरान हैं, और तकलीफ में भी हैं कि एक बच्चे जैसे चेहरे वाला 20-22 बरस का यह नौजवान कम्प्यूटर के अपने हुनर के साथ भी, ग्रेजुएशन की डिग्री के साथ भी किस तरह जंगल के इस खतरनाक हथियारबंद आंदोलन से जुड़ा, और इतनी कमउम्र में जान खो बैठा। वैसे तो इस एक तस्वीर को अगर छोड़ दें, तो बहुत से दूसरे लोग इससे भी कमउम्र में मारे जाते हैं, जिनमें से कुछ अपनी मर्जी से नक्सल हिंसा में भागीदार रहते हैं, और कुछ ऐसे भी रहते हैं जिनको घरों से नक्सली उठाकर ले जाते हैं। दो-चार दिन पहले ही झारखंड में एक पुलिस मुठभेड़ में मारे गए एक दर्जन नक्सल आरोपियों के बारे में अब जानकारी आ रही है कि उसमें से शायद चार लड़के नाबालिग थे, लेकिन वहां के पुलिस प्रमुख का बयान आया है कि गोलियां उम्र नहीं देखतीं। 
भारत के कई राज्यों में बिखरे हुए, और जड़ें जमाए हुए नक्सल आंदोलन, या नक्सल-हिंसा में जगह-जगह कमउम्र बच्चों का इस्तेमाल हो रहा है। नक्सली हिंसा के अलावा इस एक बात के भी मुजरिम हैं कि वे बच्चों को हथियारबंद करके उनको खूनी मोर्चों पर इस्तेमाल कर रहे हैं। बच्चों का लड़ाई के मोर्चों पर इस्तेमाल दुनिया के बहुत से देशों में हो रहा है, और सीरिया या इराक से आई हुई वे तस्वीरें बहुत भयानक थीं जिनमें बहुत छोटे बच्चों के हाथों में पिस्तौल थमाकर उनसे कत्ल करवाया जा रहा था। लेकिन अफ्रीकी के कुछ मोर्चों पर, या कुछ मुस्लिम देशों में आतंकियों के मोर्चों पर नाबालिग हाथों में बंदूकें एक अलग बात है। जब भारत जैसे एक विकसित-लोकतंत्र में ऐसा जारी है, तो फिर यह सरकार/सरकारों की एक बड़ी नाकामयाबी तो है ही, यह अतिउग्र और हिंसक माओवादी आंदोलन का भी एक बेरहम चेहरा है जो कि बच्चों का लड़ाई में इस्तेमाल कर रहा है। इसके पहले भी ऐसे वीडियो सामने आए हैं जिनमें पुलिस और सुरक्षा बलों से बड़े मुठभेड़ के बाद भी लाशों के पास से हथियार बीनने के लिए नक्सलियों ने बच्चों का इस्तेमाल किया था। इससे परे भी कई मोर्चों पर नक्सली गांव के बच्चे-बड़े, महिलाएं, इनका इस्तेमाल एक आड़ की तरह करते आए हैं। 
लेकिन पिछले बरस एक खबर यह आई थी कि सीरिया से युद्ध की जिन तस्वीरों को खींचकर एक नाबालिग लड़का एक अमरीकी समाचार एजेंसी को भेज रहा था, और वह एजेंसी उस लड़के को उसका भुगतान भी कर रही थी, उसकी मौत फोटोग्राफी करते हुए ही हुई। अब सवाल यह उठता है कि जंग की फोटोग्राफी जैसे खतरनाक काम में एक नाबालिग लड़के से काम करवाना, या उसके काम का भुगतान करके इस्तेमाल करना एक मीडिया एजेंसी के लिए, खासकर अमरीकी एजेंसी के लिए कितना जायज था? क्या अमरीका का कानून वहां के किसी बच्चे के ऐसे इस्तेमाल की इजाजत देता? लेकिन दिक्कत यह है कि इस्लामी आतंक और गृह युद्ध से गुजरते हुए अरब देशों का हाल हो, या कि अफ्रीकी देशों का हाल हो, या फिर भारत जैसे नक्सल मोर्चों की बात हो, जिन हथियारबंद आंदोलनों को न लोकतंत्र पर भरोसा है, न देश के कानून की परवाह है, और न ही इंसानियत के आम पैमानों की जिनको फिक्र है, वैसे लोग बच्चों का इस्तेमाल करें, या घरों से लड़कियों को उठाकर ले जाएं और उनका सेक्स-गुलाम की तरह इस्तेमाल करें, इस पर कोई रोक तो है नहीं। अपने देश की सरकार के खिलाफ, वहां के संविधान के खिलाफ जो हथियारबंद आंदोलन चलते हैं, वे कौन-कौन से नियम-कानून तोड़ते हैं, उसका क्या महत्व है? जब पूरा आंदोलन ही हिंसक रहता है, अलोकतांत्रिक रहता है, गैरकानूनी रहता है, तो उसमें कमउम्र बच्चों का इस्तेमाल कैसे रोका जाए? 

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