बचाव से अधिक सस्ता इलाज नहीं हो सकता

संपादकीय
5 जून 2015

देश के बच्चों और बड़ों के खानपान को तबाह करने वाली शहरी चीजों में से एक मैगी के खिलाफ पूरे देश में जो सरकारी कार्रवाई चल रही है, उससे दो फायदे हो रहे हैं। एक तो उसका जहरीला पदार्थ खाने से लोग बच रहे हैं, दूसरी बात यह कि सेहत के लिए खराब ऐसे खानपान से भी लोग बच रहे हैं। बड़े-बड़े फिल्मी सितारों के उकसावे में आकर बहुत से लोग मैगी जैसा सेहत के खिलाफ सामान पकाकर खाने लगे थे, और घर की माताओं को भी उकसाया गया था कि बच्चों को भूख लगे तो दो मिनट में मैगी बनाकर उनका पेट भरा जा सकता है। यह तो अच्छा हुआ कि इसमें जहरीले पदार्थ निकले, और लोगों के बीच मैगी जैसे सामान को लेकर एक बहस शुरू हुई। अब यह बहस जागरूकता और चौकन्नेपन में बदल पाती है या नहीं, यह तो लोगों पर खुद भी निर्भर करता है, अकेले सरकारें कुछ नहीं कर सकतीं। जो लोग तमाम चेतावनियों के बावजूद सिगरेट और तम्बाखू का इस्तेमाल बंद नहीं करते, उनको मैगी के खतरे से क्या लेना-देना, वैसे लापरवाह लोगों को किसी भी देश-प्रदेश की सरकार बचा भी नहीं सकती। 
हम तो मैगी के बहाने यह चर्चा करने जा रहे हैं कि लोगों को बचपन से ही सेहतमंद खाने की तरफ कैसे मोडऩा चाहिए, और सेहतमंद खाने के साथ-साथ सेहतमंद जीवनशैली किस तरह बाद की उम्र में लोगों को मुसीबत से, परेशानी से बचा सकते हैं। आज मैगी के विवाद से लेकर अगले दो-ढाई हफ्तों तक भारत में योग पर भी चर्चा होनी है जो कि देश-प्रदेश में बड़े धूमधाम से मनाया जाने वाला है। देश का एक तबका योग के वैज्ञानिक पहलुओं को खड़ाऊओं से कुचलते हुए उसके भगवानकरण में जुटा हुआ है, और इसके जवाब में मुस्लिम अल्पसंख्यक लोग योग के ऐसे हिस्सों का विरोध कर रहे हैं जो कि उनके मुताबिक इस्लाम की धार्मिक मान्यताओं से टकराता है। एक तरफ तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश में सभी तबकों के बराबरी के अधिकार को लेकर बहुत से बयान दे रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ हकीकत यह है कि खान-पान से लेकर योग-ध्यान तक, हिन्दुओं के एक सीमित तबके की भावनाओं को बढ़ावा मिल रहा है, और हिन्दुओं के ही बाकी तबकों सहित बाकी धर्म के लोग बेचैन हैं कि देश में आज एक धर्मान्ध वातावरण चल रहा है। 
हमारा यह मानना है कि खान-पान हो, या योग-ध्यान, गंगा की सफाई हो, या गणित की पढ़ाई हो, वैज्ञानिक पहलुओं को छोड़कर अगर अतीत के कुछ नारों को आज की हकीकत बनाने के लिए सरकार का इस्तेमाल किया जाएगा, तो हिन्दू गंगा की सफाई में गैरहिन्दू कैसे और क्यों जुड़ पाएंगे? क्या इस देश में सिर्फ हिन्दुओं के योग-ध्यान करने से सरकार की जिम्मेदारी पूरी हो जाएगी, और सरकार का इलाज का बजट घटेगा? इन तमाम मुद्दों पर एक सर्वसहमति का भी ध्यान रखना चाहिए, और किसी एक धर्म या जाति, किसी एक सोच या तबके का आक्रामक तेवर बाकी लोगों को फायदों से भी काट देता है, और देश की मूलधारा से भी। योग को लेकर उसके जो वैज्ञानिक पहलू हैं, उसके जो चिकित्सकीय फायदे हैं, उन पर ध्यान देना चाहिए, और देश की धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक व्यवस्था के तहत इसके धार्मिक पहलू को बाकी लोगों से अलग रखना चाहिए, सरकार के कार्यक्रम से अलग रखना चाहिए। 
यह मौका देश में एक सेहतमंद जीवनशैली के बारे में सोचने का है, और केन्द्र और राज्य सरकारों को स्थानीय संस्थाओं, और सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर जनजागरूकता को बढ़ाना चाहिए, न सिर्फ खाने और योग को लेकर, बल्कि आधुनिक जीवन में जितने तरह की चिकित्सकीय दिक्कतें आ रही हैं, उनको भी दूर करने के लिए सबको कोशिश करनी चाहिए। आज इस देश में किसी बीमारी का इलाज अधिकतर आबादी की पहुंच के बाहर हो गया है। ऐसे में लोगों को सेहतमंद बनाए रखना एक राष्ट्रीय मिशन की तरह होना चाहिए, और हम पहले भी इस बात को लिख चुके हैं कि जिला स्तर पर ऐसे केन्द्र बनने चाहिए जहां न सिर्फ योग और व्यायाम हों, बल्कि खान-पान की जागरूकता, जीवनशैली की शिक्षा का इंतजाम भी वहां हो। बचाव से अधिक सस्ता कोई इलाज नहीं हो सकता। 

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