नेट पर से पदचिन्ह कभी नहीं मिटते

संपादकीय
3 जून 2015

अमरीका में इन दिनों अपने नागरिकों के निजी जीवन की गोपनीयता एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। वहां सरकार जिस तरह लोगों की जिंदगी में तांक-झांक करती है, दूसरे देशों की सरकारों के फोन और ई-मेल तक घुसपैठ करती है उसे लेकर पूरी दुनिया में बड़ी फिक्र है। आज वहां पर राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी की ताकतों को कम करने वाला एक ऐतिहासिक विधेयक पारित हुआ है। अमरीका की राजनीति में एक ऐसी दहशत और ऐसे शक का माहौल भी चले आ रहा था कि अमरीकी खुफिया एजेंसियां वहां के राष्ट्रपति के काम में भी चोरी-छुपे दखल देती हैं। ऐसे में दुनिया के बाकी देशों में घुसपैठ करना तो शायद उनका सरकारी काम ही होगा। लेकिन अमरीका की संसद में आज पारित इस विधेयक से सिर्फ अमरीकी जनता की आजादी में दखल में कुछ कटौती जरूर हुई है, लेकिन बाकी दुनिया के लिए यह कोई तसल्ली की बात नहीं है। बाकी दुनिया आज भी अमरीकी जासूसी का खतरा झेल रही है। 
अब भारत जैसे बहुत से देशों की बात करें जो कि आज संचार तकनीक से लेकर सोशल मीडिया तक, और ईमेल से लेकर इंटरनेट पर अपनी फाइलें रखने तक अमरीका पर टिके हुए हैं। आज इंटरनेट पर जितनी कंपनियां लोगों को मुफ्त में डिजिटल गोदाम देती हैं, उनकी खुद की विश्वसनीयता कितनी है, इसका पता किसी को नहीं है। और भारत सरकार के बड़े-बड़े मंत्री और अफसर भी अमरीकी कंपनियों के ईमेल गोदाम पर अपनी फाइलें रखते हैं, और आम जनता तो अपनी निजी जीवन की तस्वीरें, वीडियो, और कारोबार के कागजात तक, सभी चीजें ऐसे ही सर्वरों पर मुफ्त में या मामूली भुगतान करके रखती है। भारत की कंपनियां, यहां के कारोबारी, यहां की जांच एजेंसियां, यहां के शोधकर्ता, तकरीबन हर तबके के लोग, इंटरनेट पर जहां मुफ्त में जगह मिलती है, वहां अपने कपड़े सुखाने लगते हैं। नतीजा यह है कि आज अमरीकी जासूस, या इजराइली जासूस भारत के लोगों के बारे में करीब-करीब हर बात इंटरनेट पर ही पा सकते हैं। यह ऐसी खतरनाक नौबत है कि हिन्दुस्तान में फैसला लेने वाले बड़े से बड़े लोग विदेशी दबाव के खतरे तले आ जाते हैं। यहां के अफसर, मंत्री, जज, पत्रकार, या दूसरे कारोबारी इंटरनेट पर कौन सी वयस्क वेबसाइटों पर जाते हैं, वहां किनसे क्या बात करते हैं, वहां कैसे वीडियो देखते हैं, ये तमाम बातें अमरीकी कंपनियों के कम्प्यूटरों पर दर्ज है। 
दुनिया का रिवाज है कि मुफ्त में कुछ भी नहीं मिलता। कुछ सामानों के ऊपर दाम लिखे होते हैं, और कुछ सामानों का इस्तेमाल करने पर बिना दाम दिखे उनके दाम चुकाने पड़ते हैं। लेकिन भारत जैसे देशों में आम लोगों की बात तो छोड़ ही दें, खास लोगों को भी इन खतरों की समझ नहीं है। आज अगर भारत के किसी ताकतवर ओहदे पर बैठे हुए किसी आदमी के ऐसे कम्प्यूटर रिकॉर्ड अमरीकी जासूसों के पास हैं जिनमें वह आदमी दुनिया के किसी कोने के किसी बच्चे से सेक्स की बातें कर रहा है, तो अमरीका कभी भी ऐसे हिन्दुस्तानी को ब्लैकमेल करने की हालत में रहेगा, और हमारा मानना है कि आज भी विदेशी खुफिया एजेंसियां भारत के लाखों महत्वपूर्ण लोगों की कमजोर नब्ज पूरी तरह से अपने हाथ में रखी हुई होंगी। भारत सरकार के नियमों के खिलाफ जाकर सरकार में बैठे हुए लोग यहां की सरकारी फाइलों को ऐसी विदेशी सर्वरों पर रखते हैं, जहां पर विदेशी जासूस भारत में फैसले के पहले ही वाकिफ हो जाते हैं। यह खतरनाक नौबत इसलिए आई है क्योंकि भारत ने अपने आपको 21वीं सदी की इंटरनेट-जरूरतों के लिए तैयार नहीं किया, और भारत के लोगों को यह लगता है कि इंटरनेट पर समाजसेवी-दानदाता लोग बैठे हुए हैं जो कि सौ-पचास जीबी का मुफ्त स्टोरेज हर किसी को देते हैं। 
अभी हम उन बाजारू तरकीबों को तो खतरनाक बता ही नहीं रहे हैं जिनका इस्तेमाल करके इंटरनेट कंपनियां दुनिया भर के इंटरनेट-उपभोक्ताओं की पसंद, नापसंद, जरूरत, प्राथमिकता का अंदाज लगा लेती हैं, और अगर आप निजी ईमेल में भी दो-चार बार जूतों का जिक्र कर दें, तो आपके इंटरनेट पेज पर जूतों के इश्तहार शुरू हो जाते हैं। ऐसी बाजारू और घोषित जासूसी को अभी हम अघोषित सरकारी जासूसी के मुकाबले खतरनाक कह भी नहीं रहे। लेकिन आज टेलीफोन पर, इंटरनेट पर, टाईप किया गया एक-एक अक्षर, भेजी गई या पाई गई एक-एक तस्वीर, इन सबका एक खतरनाक इस्तेमाल हो सकता है। अभी कुछ ही दिन हुए हैं जब ब्रिटिश शोधकर्ताओं ने यह साबित किया कि एंड्राइड सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करने वाले मोबाइल फोन पर से सब कुछ मिटा देने के बाद, उन हैंडसेट्स को फैक्ट्री-रीसेट कर देने के बाद भी उनमें से जानकारी, तस्वीरें निकाली जा सकती हैं। 
इंटरनेट बड़ा सुहावना लगता है, दुनिया तो खत्म हो जाएगी लेकिन इंटरनेट पर छोड़े गए पदचिन्ह कभी नहीं मिटेंगे।

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