बंगले खाली कराना तो मुश्किल राजधानियों से बंगले खत्म करें

संपादकीय
31 जुलाई 2015

दिल्ली हाईकोर्ट ने यूपीए सरकार में मंत्री रहीं कांग्रेस की दो नेताओं के बंगले खाली करवाने का आदेश दिया है, और उन पर जुर्माना भी ठोका है। कार्यकाल खत्म होने के बाद भी अंबिका सोनी, कुमारी शैलजा बंगलों पर काबिज थीं, और कानूनी लड़ाई को लंबा खींचते हुए वहां बने रहने की कोशिश कर रही थीं। दूसरी तरफ ऐसी खबरें छपती रही हैं कि नए सांसदों को बंगले या मकान न मिलने से उनको होटलों में ठहराने पर केन्द्र सरकार का करोड़ों रूपया हर महीने कैसे खर्च हो रहा है। 
हम इसे सत्ता की एक बड़ी बेशर्मी मानते हैं कि हक खत्म हो जाने के बाद भी लोग बंगलों पर काबिज रहते हैं। ऐसा अकेले कांग्रेस नेताओं ने किया हो वैसा भी नहीं है। समय-समय पर कई पार्टियों के लोग ऐसा करते आए हैं, और केन्द्र सरकार या संसद के अफसर इनसे जूझते ही रहते हैं। दूसरी तरफ एक अलग मिसाल वामपंथी सांसद सामने रखते हैं जब उन्हें मिले बंगलों या मकानों के बड़े हिस्सों पर पार्टी संगठन के दफ्तरों के लिए जगह देनी पड़ती है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि वामपंथी सांसद अपनी तनख्वाह पार्टी में जमा कराते हैं, और वहां से उन्हें गुजारा-भत्ता मिलता है। जो लोग भी सरकारी बंगलों पर जमे रहना चाहते हैं, वे इस गरीब देश की जनता के पैसों की बर्बादी करते हैं। 
दूसरी तरफ ब्रिटेन जैसे देश हैं जहां से भारत ने संसदीय व्यवस्था सीखी है, और वहां पर सांसदों को लंदन में रहने के लिए मकान किराया भर मिलता है, किसी तरह का मकान नहीं मिलता। भारत में न सिर्फ दिल्ली में, बल्कि प्रदेशों की राजधानियों में भी एक-एक मंत्री के लिए, जज या अफसर के लिए, संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के लिए जितने बड़े-बड़े बंगले सरकार ढोती है, वह पूरा सिलसिला खत्म कर देना चाहिए। या तो सरकार बहुमंजिली इमारतें बनवाएं, जिससे कि बंगलों की जमीन खाली हो सके, उनके रख-रखाव पर होने वाला करोड़ों रूपए सालाना का अघोषित खर्च खत्म हो, बंगलों पर तैनात दर्जनों कर्मचारियों का जनहित में दूसरी जगह इस्तेमाल हो, और पर्यावरण भी बच सके। देश की तमाम राजधानियों में मंत्रियों जैसे बड़े बंगलों को खाली कराकर वहां पर बगीचे बना दिए जाएं, या उन इमारतों में कोई आर्ट गैलरी बना दी जाए, कोई सभागृह बना दिया जाए, तो जनता की इस दौलत का जनकल्याण में उपयोग हो सकता है। 
आज शहरों में जमीन की कमी भी है, और खुली जगह की कमी भी है। सरकारी इमारतों को ऊंचा बनाकर वहां अधिक लोगों को रहने की जगह दी जा सकती है, और सरकार का खर्च भी बहुत घटाया जा सकता है। लेकिन जब सरकार अपने खुद पर खर्च करने पर उतारू होती है, तो उस पर काबू पाना मुश्किल होता है। अदालतें भी ऐसी फिजूलखर्ची पर रोक इसलिए नहीं लगातीं, क्योंकि जज खुद ऐसे ही बंगलों में रहते हैं, मंत्रियों जैसे ही गाडिय़ों के काफिले में चलते हैं, अदालतों के कमरे भी वैसी ही महंगे बनवाते हैं, और उनका कोई नैतिक अधिकार सरकारी फिजूलखर्ची रोकने पर नहीं बच जाता। 
भारत की संसद भी इस बारे में चर्चा करना नहीं चाहती क्योंकि वहां बैठे हुए हर सांसद की हसरत शायद और बड़े बंगले की रहती है, बंगला बड़ा मिले, और संसद की कैंटीन में खाना और सस्ता मिले। भारत में बोलचाल की हिन्दी में एक लाईन कही जाती है कि मस्त रहो मस्ती में, आग लगे बस्ती में। यही बात सांसदों और सत्ता को भोग रहे बाकी तमाम सरकारी-संवैधानिक संस्थाओं पर लागू होती है। चूंकि हर सरकार बंगलों पर कब्जों को लेकर कई तरह की रियायत का फैसला लेती है इसलिए हमारा मानना है कि यह सिलसिला ही खत्म करना चाहिए, और किसी भी राजधानी में कुछ बंगलों को बेचकर ही उतने दर्जन मकान किसी इमारत में सरकार बनवा सकती है, और गरीब देश, गरीब जनता पर अहसान कर सकती है। 

विशेष संपादकीय 30 जुलाई 2015 एक ऐसे देश के भक्त, जो होगा तो वह लोकतंत्र तो नहीं होगा... सुनील कुमार याकूब मेमन की फांसी को लेकर हिन्दुस्तान में सोशल मीडिया में बड़ी रफ्तार से खेमे बन गए। बहुत से लोग बिना अगली किसी दया याचिका पर सुनवाई के याकूब को टंगे देखना चाहती थी, कुछ लोग याकूब को फांसी के लायक मुजरिम न मानकर सजा में रहम की उम्मीद कर रहे थे, कुछ लोग यह मान रहे थे कि उसके मुस्लिम होने से उसे कोई रियायत नहीं मिल पाई, कुछ लोगों का यह मानना था कि मौत की सजा खत्म होनी चाहिए, और इसीलिए याकूब को भी फांसी नहीं मिलनी चाहिए। कुछ लोग अदालत तक आधी रात के बाद भी जाकर इस फांसी को टलवाने की कोशिश करते रहे, कि इस पर और बहस हो जाने तक, फांसी को रोक दिया जाए। और कुछ लोग अदालत के रात भर जागकर इन कोशिशों पर सुनवाई करने को कोसते भी रहे। जितने मुंह, उतनी बातें। लोकतंत्र में सभी किस्म की विचारधाराओं और सोच की जगह है। इस हिसाब से ये तमाम बातें एक सेहतमंद लोकतंत्र का सुबूत हो सकती थीं, अगर वे तर्क के रूप में सामने आतीं, या बहस के रूप में सामने आतीं। लेकिन कुछ राष्ट्रवादी, कुछ सम्प्रदायवादी, और कुछ हिंसक-अलोकतांत्रिक लोगों ने बहस की जगह को गालियों में तब्दील कर दिया। उनकी गालियां धर्मनिरपेक्ष लोगों पर भी थीं, कानूनपसंद लोगों पर भी, फांसी-विरोधी लोगों पर भी, और लुभावनी-हड़बड़ी का विरोध करने वालों पर भी। मोटे तौर पर एक छोटा तबका तर्क और न्याय की बात कर रहा था, और एक बड़ा तबका धर्मोन्माद से लेकर उथले-राष्ट्रवाद तक के नारे लगाते हुए चौराहे पर इंसाफ के अंदाज में किसी मुजरिम से अपील का हक भी छीन लेना चाह रहा था। जो लोकतंत्र पहले मीडिया में, और अब सोशल मीडिया में भी, लोगों को विचारों का हक दे रहा है, उसी लोकतंत्र के खिलाफ सोशल मीडिया का जैसा इस्तेमाल किसी भी बेचैन करने वाली नौबत में होता है, उससे वह लोकतांत्रिक-अधिकार प्रतिउत्पादक (काउंटर प्रोडक्टिव) साबित हो रहा है। लेकिन यह लोकतंत्र का बर्दाश्त है कि वह इसकी भी जगह देता है। दिक्कत यह आ रही है कि सोशल मीडिया एक ऐसे भीड़भरे चौराहे में तब्दील हो गया है जहां पर किसी पर आरोप लगाकर उसे चौराहे पर ही मौत की सजा दी जा रही है, और आसपास की भीड़ एक हिंसक-उत्तेजना में तालियां बजा रही है। पिछले कुछ दिनों में लगातार सीरिया और इराक जैसी जगहों से ऐसी तस्वीरें आ रही हैं जिनमें इस्लामी-आतंकी बेकसूर, असहमति रखने वाले, दूसरे धर्म के, या सरकार के सैनिकों जैसे लोगों को चौराहों पर मार रहे हैं, इमारतों से नीचे फेंक रहे हैं, सड़कों पर पिंजरों में बंद करके जिंदा जला रहे हैं, उनके हाथ काट रहे हैं, सिर काट रहे हैं, बच्चों से उन पर गोलियां चलवा रहे हैं, और लोग खड़े होकर देख रहे हैं। यह उस समाज में लोकतांत्रिक समझ और फिक्र के खात्मे का सुबूत है कि ऐसी बेइंसाफ-हिंसा होते हुए देखने के लिए भीड़ जुट जाती है, कई बार खुश भी हो जाती है, कई बार मारने में शामिल भी हो जाती है। यह उस देश और उस समाज में इंसाफ और लोकतंत्र की समझ कमजोर होने या खत्म होने का सुबूत है। हिन्दुस्तान में चूंकि सरकारी या गैरसरकारी हिंसा अभी शहरी चौराहों पर इस तरह की नहीं है कि जिसे देखकर हिंसक सोच वाली भीड़ तालियां बजा सके, इसलिए सोशल मीडिया पर ही ऐसा हो रहा है। लेकिन सोशल मीडिया से परे भी कुछ घटनाएं फिक्र की हैं। लोगों को याद होगा कि एक-दो बरस पहले जब छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलियों ने सीआरपीएफ के जवानों को एक ही हमले में बड़ी संख्या में मारा था, तब दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आहाते में रहने वाले छात्रों के कुछ समूहों ने बड़ी खुशियां मनाई थीं। जेएनयू को एक वामपंथी विचारधारा और आक्रामक तेवरों के लिए जाना जाता है। कई बार वहां उठने वाले मुद्दे बेइंसाफी के खिलाफ होते हैं, लेकिन कुछ मौके ऐसे भी रहते हैं जब लोकतंत्र के खिलाफ हुए हमलों की तारीफ में वहां खुशियां मनाई जाती हैं। वहां के बहुत से पढऩे और पढ़ाने वाले लोगों का यह मानना है कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में कमजोर के साथ इंसाफ तब तक नहीं हो सकता, जब तक इस व्यवस्था के खिलाफ हिंसा न की जाए। लोकतंत्र के भीतर हिंसा को भी दूर तक बर्दाश्त करने की खूबी ही है। वह चाहे नक्सल हिंसा हो, चाहे वह गांधी की हत्या हो, चाहे वह बाबरी मस्जिद को गिराना हो, चाहे वह इंदिरा-राजीव की हत्या हो, चाहे वह गोधरा हो, चाहे वह गुजरात हो। भारतीय लोकतंत्र अपनी सोच पर चलते हुए बहुत से मौकों पर खामी की हद तक बर्दाश्त वाला लगता है, और ऐसा लगता है कि इसमें मुजरिमों को छूट ही छूट है। लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि मुम्बई बम ब्लास्ट के मुजरिम को अगर 22 बरस बाद आज फांसी हो पा रही है, तो उस आतंकी हमले के पहले गिराई गई बाबरी मस्जिद के मुजरिमों को आज तक कोई सजा नहीं हो पाई है। कहीं गोधरा के मामले चल रहे हैं, तो कहीं उसके बाद के गुजरात दंगों के। और इन सबसे पहले के 1984 के दंगों के मुजरिमों पर फैसला अब तक बाकी ही है। लोकतंत्र कभी भी ऐसी तेज रफ्तार व्यवस्था नहीं हो सकता जिसमें कि किसी आरोपी को सुनवाई का हर मौका दिए बिना उस पर कोई भी फैसला हो जाए। कुछ लोगों को ऐसा तेज रफ्तार इंसाफ सुहा सकता है, लेकिन वे बैठकर अगर चैन से सोचें कि ऐसे तेज रफ्तार इंसाफ का शिकार अगर वे खुद हो जाएं, और उस वक्त हो जाएं, जब वे गुनहगार न हों, तब क्या होगा? ब्रिटेन में जो स्कॉटलैंड यार्ड दुनिया की सबसे अच्छी जांच एजेंसियों में से एक माना जाता है, उस स्कॉटलैंड यार्ड के पकड़े हुए लोग, मौत की सजा मिल जाने के 58 बरस बाद बेकसूर साबित हुए, और न तो यार्ड उनको वापिस जिंदा कर सकता था, और न ही ब्रिटिश न्याय व्यवस्था। इसलिए आज अमरीका में मौत की सजा पाए हुए लोग दस-दस, बीस-बीस बरस तक तरह-तरह की अपीलों पर चलते रहते हैं, और अभी-अभी मौत की कतार से एक कैदी को वहां 30 बरस खड़े रहने के बाद बेकसूर पाकर रिहा किया गया। इसलिए लोकतंत्र में पूर्वाग्रह, नफरत, हिंसा, और हड़बड़ी में किसी की जिंदगी नहीं लेनी चाहिए। हमारी अपनी सोच तो यह है कि मौत की सजा खत्म होनी चाहिए, क्योंकि एक बुनियादी बात यह है कि जो जिंदगी कोई देश किसी को दे नहीं सकता, उसे वह जिंदगी लेने का कोई हक नहीं होना चाहिए। दूसरी बात यह कि गलतियां जांच एजेंसियों और अदालतों से भी हो सकती हैं, और इनको जिंदगी लेने का हक नहीं मिल सकता। इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस नेता शशि थरूर ने आज सुबह एक ट्वीट किया जिसे लेकर उन्हें खूब गालियां पड़ रही हैं। उन्होंने लिखा कि एक इंसान को फांसी पर चढ़ा दिया गया, और उसका उन्हें दुख है। उन्होंने लिखा कि सरकार प्रायोजित ऐसी हत्याएं हमें नीचा दिखा रही हैं, जिसने हमें हत्यारों के स्तर पर ला दिया है। शशि थरूर ने अपनी ट्वीट में कहीं भी अपना दुख याकूब मेमन के लिए नहीं लिखा, बल्कि उन्होंने मौत की सजा के खिलाफ लिखा। लेकिन जो लोग एक नफरत के तहत हड़बड़ी में किसी को फांसी पर टांगना चाहते हैं, उनके पास सिद्धांत की बात करने वाले एक असहमत के लिए गालियों का जखीरा तैयार है। आज भारतीय समाज के जो लोग याकूब मेमन की फांसी को एक लोकतांत्रिक कार्रवाई मानने के बजाय नफरत के एक जश्न की तरह मनाना चाहते हैं, उनकी आस्था लोकतंत्र पर नहीं है। लोगों को यह याद रखना चाहिए कि अजमल कसाब से लेकर याकूब मेमन तक को फांसी दिलवाने वाले सरकारी वकील की कही एक बात इस देश में बरसों से गूंज रही थी कि कांग्रेस की सरकार कसाब को जेल में बिरयानी खिला रही थी। यह बहुत बड़ा चुनावी नारा भी बना था। और पिछले बरस इसी वकील ने यह साफ किया कि उन्होंने बिरयानी वाली वह बात एक जुमले के रूप में कही थी, उसका हकीकत से लेना-देना नहीं था। अब बिरयानी को लेकर जिन लोगों को गालियां पड़ीं, और जिनके वोट छीने गए, उनका क्या होगा? इस देश की सरकार और यहां की अदालत की जो हेठी इस जुमले के बाद नफरत ने खड़ी कर दी थी, उस हेठी का क्या होगा? सड़क हो या सोशल मीडिया, हिंसक भीड़ का बर्ताव लोकतंत्र और इंसाफ से परे होता है। और ऐसे लोगों को जब हिंसा का मौका मिलता है, तो वे ओवरटाईम करने वाले किसी कर्मचारी की तरह अधिक घंटों तक इसी हिंसा की नुमाइश करने में लग जाते हैं। राष्ट्रवाद का नारा लगाते हुए अपने से असहमत तमाम लोगों को गद्दार कहते हुए, देशनिकाला देते हुए जो लोग अपने को देशभक्त साबित करते हैं, वे एक ऐसे देश की अपनी सोच भी साबित करते हैं जिसमें कोई लोकतंत्र नहीं रहेगा। वे भक्त तो हैं, लेकिन एक ऐसे देश के जो कि लोकतंत्र नहीं है। उनकी हिंसा उनकी कल्पना के ऐसे अलोकतांत्रिक देश के भी फायदे की नहीं होगी, क्योंकि उनकी ऐसी हिंसा अमरीका जैसे दादा को आकर उन पर बम बरसाने का एक तर्क भी दे देगी। फिलहाल भारत की सड़क से लेकर यहां के सोशल मीडिया तक नफरत और पूर्वाग्रह, हिंसा और बेइंसाफी का शोर इतना बढ़ा हुआ है, कि इसके बीच इंसाफ और इंसानियत हाशिए पर धकेल दिए गए हैं।

विशेष संपादकीय 
30 जुलाई 2015
सुनील कुमार

याकूब मेमन की फांसी को लेकर हिन्दुस्तान में सोशल मीडिया में बड़ी रफ्तार से खेमे बन गए। बहुत से लोग बिना अगली किसी दया याचिका पर सुनवाई के याकूब को टंगे देखना चाहती थी, कुछ लोग याकूब को फांसी के लायक मुजरिम न मानकर सजा में रहम की उम्मीद कर रहे थे, कुछ लोग यह मान रहे थे कि उसके मुस्लिम होने से उसे कोई रियायत नहीं मिल पाई, कुछ लोगों का यह मानना था कि मौत की सजा खत्म होनी चाहिए, और इसीलिए याकूब को भी फांसी नहीं मिलनी चाहिए। कुछ लोग अदालत तक आधी रात के बाद भी जाकर इस फांसी को टलवाने की कोशिश करते रहे, कि इस पर और बहस हो जाने तक, फांसी को रोक दिया जाए। और कुछ लोग अदालत के रात भर जागकर इन कोशिशों पर सुनवाई करने को कोसते भी रहे। जितने मुंह, उतनी बातें। 
लोकतंत्र में सभी किस्म की विचारधाराओं और सोच की जगह है। इस हिसाब से ये तमाम बातें एक सेहतमंद लोकतंत्र का सुबूत हो सकती थीं, अगर वे तर्क के रूप में सामने आतीं, या बहस के रूप में सामने आतीं। लेकिन कुछ राष्ट्रवादी, कुछ सम्प्रदायवादी, और कुछ हिंसक-अलोकतांत्रिक लोगों ने बहस की जगह को गालियों में तब्दील कर दिया। उनकी गालियां धर्मनिरपेक्ष लोगों पर भी थीं, कानूनपसंद लोगों पर भी, फांसी-विरोधी लोगों पर भी, और लुभावनी-हड़बड़ी का विरोध करने वालों पर भी। मोटे तौर पर एक छोटा तबका तर्क और न्याय की बात कर रहा था, और एक बड़ा तबका धर्मोन्माद से लेकर उथले-राष्ट्रवाद तक के नारे लगाते हुए चौराहे पर इंसाफ के अंदाज में किसी मुजरिम से अपील का हक भी छीन लेना चाह रहा था। 
जो लोकतंत्र पहले मीडिया में, और अब सोशल मीडिया में भी, लोगों को विचारों का हक दे रहा है, उसी लोकतंत्र के खिलाफ सोशल मीडिया का जैसा इस्तेमाल किसी भी बेचैन करने वाली नौबत में होता है, उससे वह लोकतांत्रिक-अधिकार प्रतिउत्पादक (काउंटर प्रोडक्टिव) साबित हो रहा है। लेकिन यह लोकतंत्र का बर्दाश्त है कि वह इसकी भी जगह देता है। दिक्कत यह आ रही है कि सोशल मीडिया एक ऐसे भीड़भरे चौराहे में तब्दील हो गया है जहां पर किसी पर आरोप लगाकर उसे चौराहे पर ही मौत की सजा दी जा रही है, और आसपास की भीड़ एक हिंसक-उत्तेजना में तालियां बजा रही है। 
पिछले कुछ दिनों में लगातार सीरिया और इराक जैसी जगहों से ऐसी तस्वीरें आ रही हैं जिनमें इस्लामी-आतंकी बेकसूर, असहमति रखने वाले, दूसरे धर्म के, या सरकार के सैनिकों जैसे लोगों को चौराहों पर मार रहे हैं, इमारतों से नीचे फेंक रहे हैं, सड़कों पर पिंजरों में बंद करके जिंदा जला रहे हैं, उनके हाथ काट रहे हैं, सिर काट रहे हैं, बच्चों से उन पर गोलियां चलवा रहे हैं, और लोग खड़े होकर देख रहे हैं। यह उस समाज में लोकतांत्रिक समझ और फिक्र के खात्मे का सुबूत है कि ऐसी बेइंसाफ-हिंसा होते हुए देखने के लिए भीड़ जुट जाती है, कई बार खुश भी हो जाती है, कई बार मारने में शामिल भी हो जाती है। यह उस देश और उस समाज में इंसाफ और लोकतंत्र की समझ कमजोर होने या खत्म होने का सुबूत है। 
हिन्दुस्तान में चूंकि सरकारी या गैरसरकारी हिंसा अभी शहरी चौराहों पर इस तरह की नहीं है कि जिसे देखकर हिंसक सोच वाली भीड़ तालियां बजा सके, इसलिए सोशल मीडिया पर ही ऐसा हो रहा है। लेकिन सोशल मीडिया से परे भी कुछ घटनाएं फिक्र की हैं। 
लोगों को याद होगा कि एक-दो बरस पहले जब छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलियों ने सीआरपीएफ के जवानों को एक ही हमले में बड़ी संख्या में मारा था, तब दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आहाते में रहने वाले छात्रों के कुछ समूहों ने बड़ी खुशियां मनाई थीं। जेएनयू को एक वामपंथी विचारधारा और आक्रामक तेवरों के लिए जाना जाता है। कई बार वहां उठने वाले मुद्दे बेइंसाफी के खिलाफ होते हैं, लेकिन कुछ मौके ऐसे भी रहते हैं जब लोकतंत्र के खिलाफ हुए हमलों की तारीफ में वहां खुशियां मनाई जाती हैं। वहां के बहुत से पढऩे और पढ़ाने वाले लोगों का यह मानना है कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में कमजोर के साथ इंसाफ तब तक नहीं हो सकता, जब तक इस व्यवस्था के खिलाफ हिंसा न की जाए। 
लोकतंत्र के भीतर हिंसा को भी दूर तक बर्दाश्त करने की खूबी ही है। वह चाहे नक्सल हिंसा हो, चाहे वह गांधी की हत्या हो, चाहे वह बाबरी मस्जिद को गिराना हो, चाहे वह इंदिरा-राजीव की हत्या हो, चाहे वह गोधरा हो, चाहे वह गुजरात हो। भारतीय लोकतंत्र अपनी सोच पर चलते हुए बहुत से मौकों पर खामी की हद तक बर्दाश्त वाला लगता है, और ऐसा लगता है कि इसमें मुजरिमों को छूट ही छूट है। लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि मुम्बई बम ब्लास्ट के मुजरिम को अगर 22 बरस बाद आज फांसी हो पा रही है, तो उस आतंकी हमले के पहले गिराई गई बाबरी मस्जिद के मुजरिमों को आज तक कोई सजा नहीं हो पाई है। कहीं गोधरा के मामले चल रहे हैं, तो कहीं उसके बाद के गुजरात दंगों के। और इन सबसे पहले के 1984 के दंगों के मुजरिमों पर फैसला अब तक बाकी ही है। 
लोकतंत्र कभी भी ऐसी तेज रफ्तार व्यवस्था नहीं हो सकता जिसमें कि किसी आरोपी को सुनवाई का हर मौका दिए बिना उस पर कोई भी फैसला हो जाए। कुछ लोगों को ऐसा तेज रफ्तार इंसाफ सुहा सकता है, लेकिन वे बैठकर अगर चैन से सोचें कि ऐसे तेज रफ्तार इंसाफ का शिकार अगर वे खुद हो जाएं, और उस वक्त हो जाएं, जब वे गुनहगार न हों, तब क्या होगा? ब्रिटेन में जो स्कॉटलैंड यार्ड दुनिया की सबसे अच्छी जांच एजेंसियों में से एक माना जाता है, उस स्कॉटलैंड यार्ड के पकड़े हुए लोग, मौत की सजा मिल जाने के 58 बरस बाद बेकसूर साबित हुए, और न तो यार्ड उनको वापिस जिंदा कर सकता था, और न ही ब्रिटिश न्याय व्यवस्था। इसलिए आज अमरीका में मौत की सजा पाए हुए लोग दस-दस, बीस-बीस बरस तक तरह-तरह की अपीलों पर चलते रहते हैं, और अभी-अभी मौत की कतार से एक कैदी को वहां 30 बरस खड़े रहने के बाद बेकसूर पाकर रिहा किया गया। इसलिए लोकतंत्र में पूर्वाग्रह, नफरत, हिंसा, और हड़बड़ी में किसी की जिंदगी नहीं लेनी चाहिए। हमारी अपनी सोच तो यह है कि मौत की सजा खत्म होनी चाहिए, क्योंकि एक बुनियादी बात यह है कि जो जिंदगी कोई देश किसी को दे नहीं सकता, उसे वह जिंदगी लेने का कोई हक नहीं होना चाहिए। दूसरी बात यह कि गलतियां जांच एजेंसियों और अदालतों से भी हो सकती हैं, और इनको जिंदगी लेने का हक नहीं मिल सकता। इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस नेता शशि थरूर ने आज सुबह एक ट्वीट किया जिसे लेकर उन्हें खूब गालियां पड़ रही हैं। उन्होंने लिखा कि एक इंसान को फांसी पर चढ़ा दिया गया, और उसका उन्हें दुख है। उन्होंने लिखा कि सरकार प्रायोजित ऐसी हत्याएं हमें नीचा दिखा रही हैं, जिसने हमें हत्यारों के स्तर पर ला दिया है। शशि थरूर ने अपनी ट्वीट में कहीं भी अपना दुख याकूब मेमन के लिए नहीं लिखा, बल्कि उन्होंने मौत की सजा के खिलाफ लिखा। लेकिन जो लोग एक नफरत के तहत हड़बड़ी में किसी को फांसी पर टांगना चाहते हैं, उनके पास सिद्धांत की बात करने वाले एक असहमत के लिए गालियों का जखीरा तैयार है। 
आज भारतीय समाज के जो लोग याकूब मेमन की फांसी को एक लोकतांत्रिक कार्रवाई मानने के बजाय नफरत के एक जश्न की तरह मनाना चाहते हैं, उनकी आस्था लोकतंत्र पर नहीं है। लोगों को यह याद रखना चाहिए कि अजमल कसाब से लेकर याकूब मेमन तक को फांसी दिलवाने वाले सरकारी वकील की कही एक बात इस देश में बरसों से गूंज रही थी कि कांग्रेस की सरकार कसाब को जेल में बिरयानी खिला रही थी। यह बहुत बड़ा चुनावी नारा भी बना था। और पिछले बरस इसी वकील ने यह साफ किया कि उन्होंने बिरयानी वाली वह बात एक जुमले के रूप में कही थी, उसका हकीकत से लेना-देना नहीं था। अब बिरयानी को लेकर जिन लोगों को गालियां पड़ीं, और जिनके वोट छीने गए, उनका क्या होगा? इस देश की सरकार और यहां की अदालत की जो हेठी इस जुमले के बाद नफरत ने खड़ी कर दी थी, उस हेठी का क्या होगा? 
सड़क हो या सोशल मीडिया, हिंसक भीड़ का बर्ताव लोकतंत्र और इंसाफ से परे होता है। और ऐसे लोगों को जब हिंसा का मौका मिलता है, तो वे ओवरटाईम करने वाले किसी कर्मचारी की तरह अधिक घंटों तक इसी हिंसा की नुमाइश करने में लग जाते हैं। राष्ट्रवाद का नारा लगाते हुए अपने से असहमत तमाम लोगों को गद्दार कहते हुए, देशनिकाला देते हुए जो लोग अपने को देशभक्त साबित करते हैं, वे एक ऐसे देश की अपनी सोच भी साबित करते हैं जिसमें कोई लोकतंत्र नहीं रहेगा। वे भक्त तो हैं, लेकिन एक ऐसे देश के जो कि लोकतंत्र नहीं है। उनकी हिंसा उनकी कल्पना के ऐसे अलोकतांत्रिक देश के भी फायदे की नहीं होगी, क्योंकि उनकी ऐसी हिंसा अमरीका जैसे दादा को आकर उन पर बम बरसाने का एक तर्क भी दे देगी। फिलहाल भारत की सड़क से लेकर यहां के सोशल मीडिया तक नफरत और पूर्वाग्रह, हिंसा और बेइंसाफी का शोर इतना बढ़ा हुआ है, कि इसके बीच इंसाफ और इंसानियत हाशिए पर धकेल दिए गए हैं। 

हिन्दुस्तान की हर तरफ गंदगी का एक बहुत बड़ा फायदा भी

संपादकीय
29 जुलाई 2015

दुनिया भर से अलग-अलग कई खबरें आती हैं कि लोग अपनी निजी जिम्मेदारी से परे जाकर किस तरह एक सामाजिक जिम्मेदारी के तहत और लोगों के लिए काम करते हैं। अमरीका के बॉस्टन शहर से खबर और तस्वीर आई है कि किस तरह वहां तीन बार राज्य के गवर्नर रहे हुए, और राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार रहे हुए माइकल डुकाकिस आज भी सड़क-फुटपाथ पर बिखरा कचरा बीनकर घूरे पर डालते देखे जाते हैं। वे झोला लेकर निकलते हैं, और अपने शहर को साफ करने के लिए जो कर सकते हैं करते हैं। ऐसी ही एक खबर चीन से आई है कि वहां के एक पहाड़ पर पर्वतारोही और सैलानी जो कचरा छोड़ आते हैं, उसे साफ करने के लिए पर्यावरण प्रेमियों का एक संगठन वहां हर बरस जाता है, और पहाड़ से रस्सियों से लटककर भी बिखरे हुए कचरे को हर जगह से साफ करता है। इस बरस बच्चों को भी ले जाकर सफाई में लगाया गया ताकि उन्हें एक सीख मिले। मुम्बई में बरसों से देश के एक प्रमुख कार्टूनिस्ट आबिद सुरती घर-घर जाकर पूछते हैं कि क्या उनके यहां कोई नल टपकता है, और अगर ऐसा रहता है तो वे अपने साथ औजारों का बैग लेकर चलते हैं, वॉशर जैसे छोटे-मोटे पुर्जे भी लेकर चलते हैं, और अपने खर्च पर, अपनी मेहनत से, पानी का टपकना बंद करके लौटते हैं। 
लेकिन हिन्दुस्तान के अधिकतर हिस्से में लोग अपने कचरे को सड़क के दूसरी तरफ फेंककर अपने को सफाईपसंद साबित करते चलते हैं। लोग जहां बैठते हैं, वहीं पर कचरा करना, वहीं पर थूकना शुरू कर देते हैं। कोई कोना दिखते ही लोगों के मुंह में थूक तैयार होने लगता है, और जरा सी आड़ कहीं दिखी तो बदन के भीतर पेशाब का जलस्तर बाढ़ वाली नदी की तरह एकदम से ऊपर हो जाता है। दुनिया के कई देशों में हिन्दुस्तानियों को लेकर लतीफे चलते हैं कि वे कितने गंदे रहते हैं। और यह बात गलत भी नहीं है। लोग घूरों के साथ जीने के वैसे ही आदी हो गए हैं जैसे कि वफादार कुत्ते बेईमान इंसानी नस्ल के साथ जीना सीख गए हैं। सड़क और घूरे से परे भी किसी बगीचे या तालाब के किनारे घूमने की जगह साफ-सुथरी हो तो भी हिन्दुस्तानी तन-मन उसे गंदा करने के लिए एकदम कुलबुलाने लगता है। सफाई एक किस्म से भारतीय अहंकार के सामने चुनौती बनकर खड़ी हो जाती है कि इतने हिन्दुस्तानियों के रहते जगह अब तक साफ कैसी बची हुई है। इसके बाद फिर उस साफ जगह के लिए हिन्दुस्तानियों के बदन के हर रास्ते से कुछ न कुछ बाहर निकलना शुरू हो जाता है। 
बहुत से लोगों ने भारत के बाहर सभ्य देश देखे हैं, उनमें से जो लोग पुनर्जन्म में भरोसा रखते हैं, वे भारत लौटने तक इस बात पर हैरान होने लगते हैं कि वे कौन से लोग होते हैं जो बहुत से जन्म अच्छा काम करने के बाद साफ-सुथरे देशों में पैदा होते हैं? और ऐसे लोग हिन्दुस्तान लौटते ही इस बात पर भी हैरान होने लगते हैं कि उन्होंने पिछले जन्मों में कौन-कौन से कुकर्म किए होंगे जो कि इतने गंदे देश में पैदा होकर, इतने गंदे देश में मर जाएंगे? यह दार्शनिक जिज्ञासा आस्थावान लोगों को और अधिक परेशान करती है क्योंकि वे लोग पाप और पुण्य, पिछले और अगले जन्म, पर भरोसा करते हैं। इस धार्मिक देश का हाल यह है कि सार्वजनिक इमारतों में सीढिय़ों के कोने लोगों की पीक और थूक से बचाने के लिए जगह-जगह देवी-देवताओं की तस्वीरों वाले टाईल्स दीवारों में स्थाई रूप से लगा दिए जाते हैं, क्योंकि वही एक तरीका लोगों को गंदगी फैलाने से रोक पाता है। 
गंदगी के लिए हिन्दुस्तानियों का बर्दाश्त देखने लायक है, और गंदगी फैलाने की उनकी क्षमता भी गजब की है। एक खतरा यह भी दिखता है कि हिन्दुस्तान से अगर गंदगी गायब हो जाए, तो यहां आने वाले विदेशी सैलानी इतने गुना बढ़ जाएंगे, कि उनके रूकने के लिए होटलें कम पडऩे लगेंगी, टैक्सियां बचेंगी भी नहीं, और ताजमहल पर भीड़ में दंगा होने लगेगा। इसलिए कभी-कभी यह भी लगता है कि विदेशियों के हमलों से भारत को बचाने के लिए इसे इतना गंदा रखा जाता है कि अब अंग्रेज, फ्रेंच, पुर्तगाली, और डच लोग इधर दुबारा मुंह भी न करें। गंदगी का यह एक बड़ा फायदा है कि विदेशी हमलावर कितनी भी बंदूकें लेकर आएं, उनसे वे हिन्दुस्तान का कचरा साफ नहीं कर पाएंगे। 
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कलाम पर आंसू बहाने का हक किसे? जो सरकारी किफायत बरते, महज उसे...

28 जुलाई 2015
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार

डॉ. अब्दुल कलाम आजाद के गुजरने से देश के अनगिनत आम लोगों को ऐसा लगा कि देश के सबसे बड़े ओहदे पर पहुंचने वाले सबसे आम आदमी की मौत हो गई। किसी ने ऐसी सादगी देखी-सुनी नहीं थी, और ऐसे मौके भी कम ही आते हैं जब सत्तारूढ़ पार्टी इतने और ऐसे काबिल इंसान को देश की सबसे बड़ी कुर्सी पर बिठाए। वे अपनी तकनीकी और वैज्ञानिक विशेषज्ञता के साथ-साथ एक गजब के इंसान भी थे। कभी-कभी विज्ञान, अंतरिक्ष, या हथियारों के मामलों में देश को इतनी बड़ी कामयाबी तक पहुंचाने वाले लोगों में कहीं न कहीं एक अहंकार आ जाता है। लेकिन डॉ. अब्दुल कलाम अहंकार से आजाद थे। वे सरकारी ओहदे से उपजने वाली बददिमागी से भी आजाद थे। वे राष्ट्रपति भवन की सामंती बेडिय़ों से भी आजाद थे, और उनमें यह हौसला था कि चुनाव में वोटरों की कतार में लगकर वे वोट डालने जाएं। वे राष्ट्रपति के पद के साथ जुड़ी हुई सामंती पोशाक की गुलामी से भी आजाद थे, और कई बार वे आम शर्ट-पैंट में नजर आते थे, और अपने उठने-बैठने में भी वे आम इंसान की तरह बेतकल्लुफी के साथ याद किए जाते थे। 
राष्ट्रपति की कुर्सी पर पहुंचने वाले वे एक गैरराजनेता थे, इसलिए उनकी बहुत सी खूबियां ऐसी थीं जो किसी ने किसी राष्ट्रपति में देखी-सुनी नहीं थीं। जब उन्होंने राष्ट्रपति पद की शपथ ली, तो उनके परिवार के लोग दूर दक्षिण के रामेश्वरम से दिल्ली तक अपने खर्चे पर ट्रेन के आम डिब्बे में सफर करके पहुंचे थे, और उसके बाद से किसी ने किसी और मौके पर उनके परिवार के लोगों को देखा भी नहीं था। राष्ट्रपति भवन में उनके परिवार के खाने-पीने पर जो खर्च हुआ, उसका एक-एक पैसा डॉ. अब्दुल कलाम ने अपनी जेब से राष्ट्रपति भवन को दिया। देश के लोग उनको ऐसी सादगी के लिए भी याद करते हैं, और करेंगे। लेकिन आज उनके गुजरने पर सत्ता पर काबिज देश भर के जो लोग बयान जारी कर रहे हैं, और शोक जता रहे हैं, उनमें से सादगी में भरोसा रखने वाले तो उंगलियों पर गिने जा सकने लायक भी नहीं हैं। इसलिए उनकी वाहवाही करके, उनकी खूबियां गिनाकर लोग अपनी खुद की खामियों की तरफ भी लोगों का ध्यान खींच रहे हैं। उनको ऐसी श्रद्धांजलि देने का कोई मतलब नहीं है जिसके साथ-साथ लोग जनता के पैसों से होने वाले खर्च में किफायत की सोचें, सादगी की सोचें, विनम्रता की सोचें, और बिना स्वार्थ वाले सामाजिक योगदान की सोचें। हालांकि आज चारों तरफ यही सब हो रहा है, और सादगी-किफायत की मिसालों को जल्द से जल्द दफन कर देने में ही भारतीय लोकतंत्र में सत्ता के सामंती मिजाज की सुरक्षा है। 
देश की नौजवान पीढ़ी डॉ. अब्दुल कलाम आजाद को इसलिए भी याद करती है कि वे राष्ट्रपति के ओहदे के कटघरे से बाहर निकलकर एक नौजवान जिंदादिली के साथ बच्चों और नौजवानों से बातें करते थे, खुलकर उनको नसीहतें देते थे, हौसला बढ़ाते थे, रास्ता दिखाते थे। उनकी इन बातों में असर इसलिए भी था क्योंकि वे अपनी कही बातों की मिसाल खुद थे। बचपन में जिसने अखबार बेचे हों, वह भारत का मिसाइल मैन कहलाए, बिना अपनी किसी कोशिश के राष्ट्रपति बनाया जाए, जिसे भारत रत्न से सम्मानित किया जाए और लोगों को लगे कि इस सम्मान के वे सबसे जायज हकदार थे, उसे लोगों को नसीहत देने का हक भी था, और उस नसीहत का वजन भी था। लेकिन आज यह सोचें कि उनके मुकाबले देश में ऐसे और कितने चर्चित या प्रमुख लोग हैं जिनकी बात का लोगों पर वजन पड़े, तो शायद कोई दूसरा नाम ऐसी ऊंचाई पर नहीं सूझता। देश की मिसाइल तकनीक में उनका योगदान आम समझ से परे का है, लेकिन देश में इंसानियत को बढ़ावा देने में उनका गैरवैज्ञानिक, अनकहा योगदान, अपने खुद के जीवन के माध्यम से खासा बड़ा रहा। लोगों को लगा कि देश की सबसे बड़ी कुर्सियों में से किसी पर कभी कोई ऐसा भी पहुंच सकता है जो कि भ्रष्ट न हो, दुष्ट न हो, जनता के पैसों की बर्बादी जिसका शगल न हो। लेकिन हम फिर आखिर में यह कहेंगे कि जिनको जनता के पैसों पर सादगी से रहते न बनता हो, उनको अपनी श्रद्धांजलि इस सीधे-सादे आदमी से दूर रखनी चाहिए।

शादीशुदा जोड़ों में बलात्कार पर सजा, इंसाफ कम, बेइंसाफी अधिक का खतरा

27 जुलाई 2015

अभी संसद में और संसद के बाहर इस बात पर बहस चल रही है कि क्या शादीशुदा जोड़ों के बीच ऐसे सेक्स को बलात्कार का दर्जा देकर सजा के लायक बनाया जाए जिसमें एक जोड़ीदार दूसरे की मर्जी के खिलाफ देहसंबंध बनाए। मोटे तौर पर बलात्कार से एक आदमी ही मुजरिम दिखता है, लेकिन हो सकता है कि ऐसा कोई कानून बनते समय उसे आदमी और औरत दोनों को बराबरी का हक देने वाला बनाने की बात भी हो। शादीशुदा जोड़ों के बीच भी अगर बलात्कार की नौबत आती है, तो उसमें जरूरी नहीं है कि आदमी की ही जरूरत औरत से अधिक हो, और वही हमलावर हो, तस्वीर इसके ठीक उल्टी भी हो सकती है, इसलिए कानून बनाते समय तमाम संभावनाओं पर, तमाम आशंकाओं पर नजर डाल लेना जरूरी होता है। 
भारतीय समाज के बहुत से शादीशुदा जोड़ों के बारे में कुछ बातों की जानकारी उन्हीं के बताए हुए मुझे है, और उसी के आधार पर मुझे बलात्कार की परिभाषा के ऐसे विस्तार वाले कानून के साथ कुछ दिक्कतें भी लगती हैं। भारतीय समाज की हकीकत को देखें, तो बहुत से जोड़े कई मौकों पर बरसों तक अलग रहने लगते हैं, बहुत से जोड़े तलाक का हौसला जुटा पाते हैं, और बहुत से मामलों में दहेज प्रताडऩा जैसी शिकायतें भी सामने आती हैं। मतलब यह कि शादीशुदा जोड़ों के बीच इतने तनाव की नौबत आने के पहले तक भी तनाव कम या ज्यादा हद तक तो शुरू हो ही चुका रहता है, तभी जाकर अलगाव की ऐसी नौबत आती है। क्या ऐसे में लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ तलाक के लिए अदालत में वजह गिनाने का एक नया मौका नहीं मिल जाएगा? और पेशेवर वकील और जज सेक्स की ऐसी बारीकियों के कितने विश्लेषण के काबिल होंगे? और शादीशुदा जोड़े के दोनों भागीदारों में से जो लोग अदालत में सेक्स विशेषज्ञों को गवाह के रूप में खड़ा कर पाएंगे, क्या वे ऐसे मामलों को जीतने की अधिक संभावना नहीं रखेंगे? ऐसा नहीं है कि पैसों की ताकत से आज भी लोग ऐसे विशेषज्ञ नहीं खरीदते हैं, लेकिन सेक्स संबंधों की जटिलताओं  से मोटे तौर पर नावाकिफ जज और वकील हो सकता है कि विशेषज्ञ राय सुनना चाहें। 
अब एक स्थिति की कल्पना करें जिसमें पति-पत्नी के बीच मानसिक या शारीरिक जरूरतों को लेकर फर्क हो। ऐसा फर्क पसंद और नापसंद को लेकर भी हो सकता है, कि किसी को सेक्स का कोई एक तरीका पसंद हो, और साथी को इस तरीके से नापसंदगी हो। एक दूसरी बात यह हो सकती है कि एक की शारीरिक जरूरतें अधिक हों, और दूसरे की कम हों। एक तीसरी बात यह हो सकती है कि किसी एक दिन किसी एक की हालत सेक्स के लायक हो, लेकिन साथी की हालत उस दिन वैसी न हो। ऐसी बहुत सी स्थितियां आ सकती हैं, हर शादीशुदा जोड़े की जिंदगी में आती हैं जब किसी एक दिन, किसी एक वक्त पर, किसी एक किस्म के सेक्स के लिए, एक को दूसरे पर कुछ दबाव डालकर उसे तैयार करना पड़ता है, या कम से कम उसकी कोशिश लोग करते हैं। 
अब यह नौबत एक शादीशुदा जोड़े के बीच एक के हिसाब से मनुहार की, मनाने की, तैयार करने की हो सकती है, और इन्हीं कोशिशों को दूसरा साथी जबर्दस्ती करार दे सकता है, या दे सकती है। जहां शादीशुदा जिंदगी पचास बरस या उससे भी लंबी हो सकती है, वहां पर यह भी समझने की जरूरत है कि ऐसी नौबत कई बार आ सकती हैं। किसी भी देश, प्रदेश, समाज, धर्म, और परिवार की अपनी खास नौबतों के चलते हुए कई ऐसे मौके आ सकते हैं जब परिवार के दूसरे लोगों का ख्याल रखते हुए भी एक महिला अपने पति को रोकने की कोशिश करे, और वह उसी वक्त सेक्स पर आमादा हो। 
अब आधी सदी की शादीशुदा जिंदगी में आने वाली ऐसी अनगिनत नौबतों में जब जिंदगी के बाकी तनाव मिलकर एक अलगाव की नौबत ला सकते हैं, तब ऐसी मनुहार या ऐसी जबर्दस्ती कब बलात्कार करार दे दी जाए, यह फर्क कर पाना बड़ा मुश्किल होगा। एक कोशिश और एक जबर्दस्ती के बीच ऐसी नौबत में कोई सरहद नहीं खींची जा सकेगी, और एक ही तस्वीर को दो तरफ से देखकर उसके दो मतलब निकालने का खतरा हमेशा ही बना रहेगा। 
ऐसे में कानून क्या करेगा, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह अंधा होता है, और सिर्फ सुबूतों पर फैसला करता है। भारत में कानून के बारे में एक दूसरी बात यह भी है कि यह महिलाओं के मामले में, दलितों और आदिवासियों के मामले में, बच्चों और नाबालिगों के मामले में इनको विशेष अधिकार देने वाला है, और इनकी बात का वजन आरोपी की बात से अधिक रखने का इंतजाम कानून में ही है। ऐसे में एक शादीशुदा जोड़े के बीच जबर्दस्ती सेक्स को सजा के लायक बलात्कार बनाने से एक तो शिकायत करने वाली महिलाओं के पति पर एक खतरा बढ़ेगा, जो कि हो सकता है हर वक्त जायज न हो, और दूसरी नौबत यह आएगी ही आएगी कि आपसी तनाव से गुजर रहे जोड़ों के बीच देहसंबंधों से दिक्कतें सुलझने की संभावना घट जाएगी, या खत्म ही हो जाएगी। 
किसी कानून को जो कि इंसानों पर लागू होना है, उनको बनाते समय इंसान के बुनियादी मिजाज, और उसकी बुनियादी जरूरतों को अनदेखा नहीं करना चाहिए। इसके साथ-साथ उस देश और वहां की सामाजिक व्यवस्था की सीमाओं और संभावनाओं को भी देखना चाहिए। इन सबको देखें तो लगता है कि भारत में शादीशुदा जोड़ों के बीच देहसंबंधों को लेकर कई तरह की संभावनाएं टटोलने की संभावनाएं ऐसे कानून से खत्म हो जाएंगी। आज बलात्कार को स्थापित करने के लिए जो मेडिकल जांच होती है, वह यह देखती है कि बलात्कार के शिकायतकर्ता के बदन पर जख्मों के निशान, जबर्दस्ती के निशान, नाखूनों के निशान हैं या नहीं। अब दूसरी तरफ भारत के ही वात्सायन के कामसूत्र को पढ़ें, तो उसमें देहसंबंधों की विविधताओं में से कुछ ऐसी हैं जिनमें नाखूनों और दांतों से नोंचने या काटने को देहसंबंध का एक तरीका बताया गया है। अदालत में जब एक अंधे कानून, और वात्सायन में मुकाबला होगा, तो कौन जीतेगा? 
यह बात जगजाहिर है कि हर आदमी और हर औरत की सेक्स की पसंद, नापसंद, प्राथमिकता, और जरूरत, इन सबमें बड़ी विविधता रहती है और बड़ा फर्क रहता है। किसी एक की पसंद किसी दूसरे के लिए हिंसा भी हो सकती है। ऐसे में क्या शादी के पहले संभावित जोड़े के दोनों लोगों के बीच खुलासे से बातचीत होकर एक विवाह-पूर्व लिखित समझौता होना चाहिए, जैसा कि कई देशों में अभी भी प्रचलित है। 
एक दूसरी बात इसी से जुड़ी हुई यह है कि भारत में परिवार की तय की हुई शादियों से परे जहां पर लड़के-लड़कियां साथ रहना पहले शुरू करते हैं, और शादी कुछ महीनों या बरसों के बाद करते हैं, या कम से कम शादी के पहले उनके हर किस्म के संबंध बन चुके होते हैं, वे एक-दूसरे की पसंद-नापसंद, एक-दूसरे के मिजाज को बेहतर समझ चुके होते हैं, और उनके बीच शादी के बाद बलात्कार जैसे खतरे शायद कम हों। इसलिए ऐसे किसी कानून के साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि ऐसी शिकायत या ऐसे जुर्म की नौबत समाज के भीतर, जोड़ों के भीतर कैसे घटाई जा सकती है। जुर्म की जड़ को खत्म किए बिना ऊपर-ऊपर उसके लिए सजा बनाते चलने से सरकार और समाज पर बोझ बढ़ते चलेगा। आज जो समाज शादी के बाद की जबर्दस्ती को सजा के लायक जुर्म बनाने की तैयारी कर रहा है, उस समाज को कम से कम शादी के पहले लड़के-लड़कियों को प्रेम करने, साथ रहने का मौका देना सीखना चाहिए, वरना बेमेल संबंधों को लादकर उसके बीच अपराध और सजा का इंतजाम करना एक बड़ी नासमझी होगी। 
यह सब कहने का यह मतलब बिल्कुल ही नहीं है कि शादीशुदा जोड़ों के बीच आपसी बलात्कार की नौबत आती ही नहीं है। और मैं तो इसे केवल आदमी का किया हुआ जुर्म मानने से भी इंकार करता हूं। हो सकता है कि कई मामलों में एक औरत की जरूरत अधिक आक्रामक रहती हो। लेकिन इनमें से जो भी नौबत हो, किसी कानून को बनाने के पहले, या उसको बनाने के साथ-साथ, एक बड़ी मशक्कत सामाजिक और वैवाहिक परामर्श के लिए होनी चाहिए। भारत का दकियानूसी समाज शादी के पहले तक लड़के-लड़कियों को सेक्स की किसी चर्चा से भी रोकने पर आमादा रहता है। और शादी के तुरंत बाद उनसे तन-मन के जटिल संबंधों का विशेषज्ञ बन जाने की उम्मीद की जाती है। इसके बीच जो तनाव खड़ा होता है, उसे सिर्फ कानून से निपटाना नासमझी होगी। जो समाज, या जो सरकारें समस्या की जड़़ों तक पहुंचने की जहमत उठाना नहीं चाहते, उनके लिए यह पसंदीदा शगल रहता है कि हर बात के लिए एक नया कानून बना दिया जाए, जो कि उसी तरह अमल से दूर रहे, जैसे कि आज के अधिकतर कानून किताबों के बीच कैद रहते हैं। 
शादीशुदा जोड़े के बीच बलात्कार एक बड़ी जटिल बहस का मुद्दा रहेंगे, और समाज को इस बारे में संसद से कहीं अधिक सोचने की जरूरत है, वरना इंसाफ कम, बेइंसाफी अधिक का खतरा खड़ा हो जाएगा। 

मौजूदा ट्रैफिक नियम तो लागू नहीं और कड़े करने की तैयारी बेमतलब, मोदी को राज्यों में कोई सुनेगा?

27 जुलाई 2015
संपादकीय

भारत में सड़क दुर्घटना में मौतों के आंकड़े दुनिया में सबसे अधिक हैं, महज गिनती में नहीं, बल्कि आबादी के अनुपात में भी सड़कों पर भारत में सबसे ज्यादा मौतें होती हैं। कल प्रधानमंत्री मोदी ने रेडियो पर प्रसारित अपने मन की बात में सड़क हादसों को लेकर फिक्र जाहिर की और कहा कि किस तरह हर मिनट भारत की सड़क पर हर चार मिनट में एक मौत हो रही है, और मरने वाले लोगों में 15 से 25 बरस उम्र के नौजवान लड़के सबसे अधिक हैं। उन्होंने दुपहिया या चारपहिया चलाने वाले लोगों के सुरक्षा नियमों पर जोर देने की अपील परिवार के लोगों से भी की है। उन्होंने यह भी कहा कि कड़े सुरक्षा नियमों के साथ नया सड़क कानून लाने की तैयारी चल रही है। और इसके साथ-साथ वे कुछ प्रमुख सड़कों के लिए एक ऐसे बिना नगद भुगतान दुर्घटना-इलाज की योजना लाने वाले हैं कि घायलों को तुरंत मदद मिल सके। 
मोदी की इन बातों को लेकर हम छत्तीसगढ़ जैसे राज्य की सरकार को याद दिलाना चाहते हैं कि हेलमेट और कारों के लिए सीट बेल्ट के नियम तो आज भी लागू हैं, और आज भी इनको न मानने वालों पर जुर्माने का इंतजाम है। और जब आज इन्हीं नियमों को सरकार लागू कराने में कोई दिलचस्पी नहीं ले रही है, हर कुछ घंटों में छत्तीसगढ़ की सड़कों पर दुर्घटना-मौत हो रही है, तो फिर और अधिक कड़े नियम आ जाने से क्या फर्क पड़ेगा? सरकारें नियम-कानून को अधिक कड़ा बनाकर खुश हो लेती हैं कि उन्होंने कड़ी सजा या बड़े जुर्माने का इंतजाम कर दिया है, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अमल न होने वाले कड़े कानून के मुकाबले अमल में आने वाले मामूली कानून का असर अधिक होता है। मोदी की कही बात, और उनकी जाहिर की गई फिक्र बेमतलब है अगर भारत के राज्य मौजूदा या आने वाले ट्रैफिक नियमों को लागू न करें। भारत के संघीय ढांचे में ट्रैफिक नियम लागू करना राज्य सरकारों का काम है, और प्रधानमंत्री एक मसीहाई अंदाज में नसीहत तो दे सकते हैं, सड़क किनारे खड़े होकर चालान सिर्फ दिल्ली में काट सकते हैं, जहां पर कि पुलिस उनके मातहत है। 
हम छत्तीसगढ़ के संदर्भ में बार-बार इस बात को लिखते आए हैं कि यहां पर एम्बुलेंस के इंतजाम में जितना जोर लगाया गया है, उसके साथ-साथ अगर हेलमेट और सीट बेल्ट के नियम कड़ाई से लागू करने में उतना ही जोर लगाया जाता, तो एम्बुलेंस की जरूरत भी कम पड़ती, और हर बरस सैकड़ों या हजारों ऐसी जिंदगियां बचतीं, जो कि आनन-फानन पहुंचने वाली एम्बुलेंस भी नहीं बचा पातीं। इस राज्य में मुख्यमंत्री खुद सड़क पर हेलमेट लगाकर दुपहिया चला चुके हैं, लेकिन पुलिस किसी मौसमी बुखार की तरह कभी-कभी नियम लागू करने में गर्मी दिखाती हैं, और बाकी वक्त उसका उत्साह खत्म हो जाता है। सरकारों का, बीमा कंपनियों का, और लोगों का खुद का, इतना बड़ा खर्च दुर्घटना के बाद के इलाज में होता है कि उसकी गिनती मुश्किल है। और यह इलाज भी उन्हीं लोगों का हो पाता है जो कि हादसों में सड़क पर ही मर नहीं जाते। बहुत से बचे हुए लोग जिंदगी भर के लिए टूटे-फूटे बदन को लेकर अपनी जिंदगी को कोसते रह जाते हैं, और उनकी गिनती दुर्घटना-मौतों में भी नहीं होती। 
राज्य सरकारों को यह चाहिए कि ट्रैफिक के नियमों को कड़ाई से लागू करे, जनता तो सरकारी कड़ाई के बिना अपनी पूरी गैरजिम्मेदारी का मजा लेते चलती है, और उसे जिम्मेदार बनाना सरकार की एक बुनियादी जिम्मेदारी है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पिछले बरस जब हेलमेट को लेकर कड़ाई हुई, तो कम से कम आधे सिरों पर हेलमेट दिखने लगे थे। वह कड़ाई खत्म हुई तो लोगों को लगा कि सिर पर से खतरा खत्म हो गया है, और नियम सरकार के खुद के सिर को बचाने के लिए है। हमने राजस्थान की राजधानी जयपुर में देखा हुआ है कि किस तरह घूंघट और घाघरे वाली महिलाएं भी दुपहिये के पीछे बैठने पर हेलमेट लगाती ही हैं। 
हमारा यह मानना है कि जनकल्याणकारी लोकतंत्र में जितनी जिम्मेदारी लोगों की अपने सिरों को बचाने की है, उतनी ही जिम्मेदारी सरकार की भी है कि वह अपनी जिम्मेदारी के सिर पर हेलमेट लगाकर उस जिम्मेदारी को बचाए, और उसका इस्तेमाल करे। हेलमेट और सीट बेल्ट किसी भी सभ्य और जागरूक समाज की अपनी जिम्मेदारी भी होना चाहिए, और उससे बचने की कोशिश करने वालों को सार्वजनिक सड़कों पर रहने का कोई हक नहीं है। सरकार को इन नियमों को सौ फीसदी कड़ाई से लागू करना चाहिए, और आगे जाकर जनता इस बात के लिए सरकार की वाहवाही ही करेगी। इसके पहले कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सड़क के नियम-कानून और अधिक कड़े करें, राज्य सरकारों को मौजूदा कानूनों को कड़ाई, गंभीरता, और ईमानदारी से लागू करना चाहिए, वरना दिल्ली के मसीहा की नसीहत अनसुनी करने की तोहमत राज्य सरकारों पर लगना तय है। 

पीएम के कमरे की पेंटिंग से देशभर के हस्तशिल्प तक...

संपादकीय
26 जुलाई 2015

आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रेडियो पर अपने मन की बात के प्रसारण में छत्तीसगढ़-नागपुर में काम करने वाले एक रेल अधिकारी का जिक्र किया जिनकी पेंटिंग्स इन दिनों खबरों में हैं। इनमें से कई पेंटिंग्स उन्होंने छत्तीसगढ़ के कोरबा के रेलवे प्लेटफॉर्म को देखकर बनाई थीं। अब प्रधानमंत्री के मुंह से इस चर्चा के बाद यह कलाकार अचानक और शोहरत पा गया है। लेकिन इससे परे भी देखें तो रोजाना प्रधानमंत्री के घर-दफ्तर में उनसे मिलने वाले लोगों की जो तस्वीरें सरकार जारी करती है, उनमें प्रधानमंत्री के पीछे दीवार पर लगी हुई एक ही तस्वीर लगातार दिखती है, और जिसके बारे में यह खुलासा कहीं नहीं होता कि उसका कलाकार कौन है। दूसरी बात यह कि अब तक वे सैकड़ों मेहमानों से उसी एक तस्वीर के सामने लगी कुर्सियों पर बैठकर मिल चुके हैं। उसका कलाकार चाहे जो हो, प्रधानमंत्री के घर-दफ्तर का काम देखने वाले अफसरों या सलाहाकारों में से कोई अगर कला की कुछ अधिक समझ रखते होते, तो उस जगह की तस्वीर को कुछ-कुछ दिनों के बाद बदल भी सकते थे, ताकि कई कलाकारों का काम देश-विदेश तक ऐसी सरकारी तस्वीरों के रास्ते पहुंच पाता। इतने विशाल देश के प्रधानमंत्री के कमरे में अलग-अलग प्रदेशों के, अलग-अलग शैलियों के कलाकारों और चित्रों को जगह मिल सकती थी, और ओहदे की अहमियत के साथ-साथ कला का एक अतिरिक्त सम्मान भी हो सकता था। लेकिन यही बात ऐसे दूसरे महत्वपूर्ण लोगों के साथ हो सकती है जो कि मुख्यमंत्री हैं, या कि राज्यपाल हैं, और जिनके पास रोजाना कई लोग मिलने आते हैं। ऐसे दफ्तरों या घरों में साज-सज्जा में फेरबदल करके देश या प्रदेश की अलग-अलग तरह की कला को खींची जाने वाली तस्वीरों में जगह दी जा सकती है, और उससे बिना किसी अतिरिक्त प्रचार के कलाकृति और कलाकार को बड़ी संख्या में पाठक-दर्शक मिलते रहेंगे। 
प्रधानमंत्री मोदी चूंकि रंग-बिरंगे और तरह-तरह के कपड़ों को बनवाकर पहनने के शौकीन हैं, इसलिए वे, या उनकी तरह के और दूसरे मशहूर लोग भारत में बनने वाले हजारों इलाकों के लाखों किस्म के कपड़ों में से अलग-अलग को मौका भी दे सकते हैं, और तस्वीरों के साथ वे उन बुनकर-इलाकों या शैलियों का जिक्र भी हो सकता है। जब मेड-इन-इंडिया को कामयाब बनाना मकसद हो, तो ऐसे तमाम मौकों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। हमारे पाठकों को याद होगा कि जब मोदी ने दूसरे देशों के राष्ट्र प्रमुखों या शासन प्रमुखों को भारत की हस्तकला की कलाकृतियां भेंट कीं, तो हमने बहुत मेहनत करके उनके पीछे के कलाकारों को ढूंढकर निकाला, और पहले ही दिन की खबरों में उनकी तस्वीर और नाम सहित उनकी कला की जानकारी भी इस अखबार में छापी थी। हो सकता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय या उनके प्रचार-अधिकारी भी ऐसे हर मौकों पर चुनिंदा कलाकृतियों और कलाकारों के बारे में जानकारी देते चलें कि मोदी किन लोगों को किनकी बनाई हुई कृतियां भेंट कर रहे हैं। 
हम भारत में हस्तशिल्प और हाथकरघा के विकास की अपार संभावना देखते हैं। घरेलू बाजार में भी, और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी। प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक, और केन्द्रीय मंत्रियों से लेकर मुख्यमंत्रियों तक, अगर विदेशी मेहमानों के आने पर भारतीय कला-कौशल का सूझ-बूझ के साथ इस्तेमाल हो, और उनके बारे में रोचक जानकारी साथ-साथ मीडिया को दी जाए, तो देश के भीतर भी देश के हस्तशिल्प के बारे में एक नई जागरूकता पैदा होगी। और हस्तशिल्प-हाथकरघा के बारे में एक बात यह भी है कि इनके लिए न तो महंगी तकनीक लगती, न ही हर वक्त बिजली लगती, और न ही कोई आयातित कच्चा माल लगता। यह लोगों को सौ फीसदी रोजगार देने वाला काम है, और भारत के पर्यटन बाजार के साथ-साथ इसका गहरा रिश्ता है। आज जिस तरह देश में कौशल-विकास की बात चल रही है, तो कुछ आईआईटी के लोगों ने देश के अलग-अलग हिस्सों में हस्तशिल्पकारों के औजारों को अधिक उत्पादक और बेहतर बनाने का काम किया भी है। इस तरह के काम को भी बढ़ाने की जरूरत है ताकि भारत का परंपरागत कुटीर उद्योग बेहतर उत्पादकता के साथ हस्तशिल्प बना सके। 

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की आस्था और पोशाक पर कही बात बड़ी फिक्र खड़ी करती है...

संपादकीय
25 जुलाई 2015

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एच.एल. दत्तू ने कल एक याचिका पर बहस के दौरान मुस्लिम समुदाय की तरफ से खड़े एक वकील से कहा कि परीक्षा के दौरान सिर पर स्कार्फ बांधने या पूरी बाहों के कपड़े पहनने की जिद धार्मिक आस्था नहीं बल्कि अहंकार है। वे सीबीएसई द्वारा आयोजित ऑल इंडिया प्री-मेडिकल टेस्ट के लिए लागू नए नियमों के खिलाफ एक अपील पर सुनवाई कर रहेे थे। सीबीएसई ने नकल से बचने के लिए नियम लागू किए हैं कि कोई भी परीक्षार्थी सिर पर स्कार्फ नहीं बांधेंगे या टोपी नहीं लगाएंगे। इसके साथ ही पूरी बाहों के कपड़ों पर भी रोक लगाई गई है। बहुत सी मुस्लिम छात्राएं अपनी धार्मिक-सामाजिक मान्यताओं के तहत बालों को स्कार्फ से ढांककर रखती हैं, और बाहें खुली नहीं रखती हैं। उनकी तरफ से एक छात्र संगठन ने अदालत में सीबीएसई के इस नियम के खिलाफ अपील की थी, और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली एक बेंच ने इसके खिलाफ रूख दिखाया। 
जस्टिस एच.एल. दत्तू ने मुस्लिम समुदाय की छात्राओं की तरफ से खड़े वकील के इस तर्क को खारिज किया कि यह उनकी (मुस्लिम छात्राओं की) का अनिवार्य धार्मिक रिवाज है, और उन्हें इसका पालन करना होता है। हमारी धार्मिक आस्था में हमें सिर ढांककर रखना होता है। इस पर जज का कहना था कि यह और कुछ नहीं सिर्फ एक अहंकार की बात है। आस्था कपड़ों से जुड़ी हुई नहीं होती। तीन घंटे सीबीएसई के नियमों के हिसाब से कपड़े पहने जा सकते हैं, और इतनी छोटी-छोटी बातों के लिए अदालत नहीं आना चाहिए। 
आज चूंकि यह इम्तिहान हो ही रहा है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब इस पर तो और कुछ नहीं हो सकता, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के रूख का विश्लेषण जरूर किया जाना चाहिए। कल की अदालती कार्रवाई में सिर्फ मुस्लिमों रिवाजों को लेकर बात हुई, इसलिए यह बात सामने नहीं आई कि कोई छात्र अगर पगड़ी लगाकर पहुंचेंगे, तो उनके लिए सीबीएसई का क्या नियम है? क्योंकि कुछ हफ्ते पहले आए सीबीएसई के इस नए ड्रेस कोड में पगड़ी का कोई जिक्र नहीं किया गया है, लेकिन क्या जस्टिस दत्तू अपनी इस बात को पगड़ी के बारे में भी कह रहे थे? सुप्रीम कोर्ट जब किसी बात पर कुछ बोलता है, तो उसका कहा हुआ या उसका आदेश तब तक कानून का दर्जा रखता है जब तक कि उसके खिलाफ संसद कोई कानून न बना दे। अदालत की कही हुई बातों की मिसाल भी दी जाती है, और मातहत अदालतें जजों की जुबानी बातों को भी मार्गदर्शक मान लेती हैं। इसलिए जस्टिस दत्तू की बातों से एक फिक्र खड़ी होती है। 
लोगों को याद होगा कि जस्टिस दत्तू ने ही कुछ महीने पहले देश के उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों की एक बैठक ईसाईयों के एक त्यौहार, गुड फ्राईडे, पर बुलाई थी, और जब एक वकील ने इस पर आपत्ति की, तो उन्होंने आपत्ति खारिज कर दी, और वे अपने फैसले पर कायम रहे। कुछ ही महीनों के भीतर एक दूसरे अल्पसंख्यक तबके को लेकर जस्टिस दत्तू का यह रूख सामने आया है। इन दोनों बातों को मिलाकर देखे बिना हम नहीं रह पा रहे हैं। कल का उनका अदालती रूख जरा भी न्यायसंगत नहीं था। अल्पसंख्यकों को अपनी पोशाक को लेकर अपनी धार्मिक मान्यताओं को मानने की आजादी है। इसके खिलाफ यूरोप के कुछ देशों में नियम बदले जा रहे हैं, लेकिन भारत में धार्मिक आजादी के अलग पैमाने लागू हैं। सिखों को भारत में अपनी पगड़ी को लेकर कई तरह की छूट मिली हुई हैं, जिनमें हेलमेट की छूट भी है, फौजी टोपी की छूट भी है, सुरक्षा जांच में भी छूट है, और स्कूल की पोशाक में भी छूट है। हम सिखों की पगड़ी और मुस्लिम लड़कियों की हिजाब के बीच धार्मिक अधिकारों में कोई फर्क नहीं देखते। यह तो इम्तिहान का इंतजाम करने वाले सीबीएसई की सोच की बात है कि वह नकल रोकने के लिए किस तरह की जांच करेगी। लेकिन नकल रोकने के नाम पर हिजाब पहनने वाली लड़कियों का हिजाब उतरवा देना, या जिनको पूरी बाहों के कपड़ों की आदत है, उन्हें आधी बांह की कपड़े पहनने पर मजबूर करना, बुनियादी हक के खिलाफ है। सीबीएसई आसानी से यह काम कर सकती थी कि उसके पोशाक-नियमों में छूट चाहने वाले लोग परीक्षा केन्द्र पर घंटे भर पहले पहुंचें। जिन लड़कियों को इन रिवाजों की आदत है, उनको ठीक इम्तिहान के समय इनसे दूर करना उनके साथ ज्यादती होगी, और इससे उनके प्रदर्शन पर फर्क भी पड़ सकता है। 
हम जस्टिस दत्तू की इस बात से पूरी तरह असहमत हैं कि आस्था कपड़ों से जुड़ी हुई नहीं रहती। इसी देश में क्या कोई किसी साधू या साध्वी को किसी रंग के कपड़े पहनने से रोक सकते हैं? क्या कोई नागा साधुओं को जबर्दस्ती कपड़े पहना सकते हैं? जबकि देश में कोई और इन धार्मिक लोगों की तरह कपड़े उतारकर रहे, तो उसे  यही अदालत जेल भेज देगी। तो क्या साधुओं का यह नॉन-ड्रेस-कोड उनकी धार्मिक आस्था की वजह से कानूनी रियायत नहीं पाता है? क्या कोई किसी की दाढ़ी-चोटी काटने पर मजबूर कर सकते हैं? क्या बुर्का पहनने वाली किसी महिला, या पगड़ी पहनने वाले किसी सिख को उनके ये कपड़े पहनने से रोका जा सकता है? आज दुनिया में अगर किसी देश में धार्मिक आस्था पोशाक से सबसे अधिक विविधता से जुड़ी हुई है, तो वह भारत ही है। सुप्रीम कोर्ट को लोगों के धार्मिक रीति-रिवाज खारिज करने के पहले यह सोचना चाहिए था कि क्या वह ऐसा ही आस्थाहीन रूख सभी धर्मों के लिए अख्तियार कर सकता है? 
एक के बाद दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यक तबके की भावनाओं को लेकर भारत की सबसे बड़ी अदालत के सबसे बड़े जज का यह रूख फिक्र खड़ी करता है, और हम इसे एक तय बात मानते हैं कि अल्पसंख्यक समुदाय का भरोसा ऐसे जज से उठ सकता है। 

लोकतंत्र में संसदीय सदन का विकल्प नहीं, गंभीर काम हो

संपादकीय
24 जुलाई 2015

संसद और छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश जैसी विधानसभाओं के सत्र एक-एक मुद्दे को लेकर खत्म होते दिख रहे हैं। संसद में जैसी कि आशंका थी, सुषमा स्वराज के मामले पर कांग्रेस ऐसी अड़ी हुई है कि वह इस्तीफे से कम पर तैयार नहीं दिख रही, दूसरी तरफ मध्यप्रदेश विधानसभा में व्यापम का मुद्दा है ही, और छत्तीसगढ़ में नान का मुद्दा है, और आज इस वक्त अविश्वास प्रस्ताव पर बहस चल रही है। इन तीनों ही सदनों में सरकार के कुछ ऐसे काम होंगे जिन पर विपक्ष को पैनी और बारीक बहस करनी थी, लेकिन आज भ्रष्टाचार और सरकारी अपराध के मुद्दों पर सत्र खत्म होते दिख रहा है। संसद से विधानसभाओं तक जहां भी किसी विधेयक या संशोधन का मामला होगा, वह या तो टल जाएगा, या फिर हड़बड़ी में बिना किसी विचार-विमर्श के, महज बहुमत या ध्वनिमत से पारित कर दिया जाएगा। नतीजा यह होगा कि ऐसे संशोधन या नए कानून जब लागू होंगे, तब जाकर उनकी खामियां और कमियां सामने आएंगी। 
भारतीय राजनीति में केन्द्र से लेकर राज्य तक कांग्रेस और भाजपा के बीच सांप-नेवले जैसे संबंध हो गए हैं। जब केन्द्र में यूपीए की सरकार थी, तो प्रमुख विपक्षी दल की हैसियत से भाजपा ने यही काम किया था, और अधिक बरस नहीं हुए हैं, जब सुषमा स्वराज ने यह सार्वजनिक बयान दिया था कि अगर सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनेंगी, तो वे सिर मुंडा लेंगी। ऐसी नफरत के जवाब में आज कांग्रेस अगर सुषमा के इस्तीफे पर अड़ी हुई है, कि देश के एक भगोड़े को मदद करने वाली सुषमा को इस्तीफा देना चाहिए, तो इसे कांग्रेस की ज्यादती भी नहीं कहा जा सकता। सोनिया गांधी से इतनी व्यक्तिगत नफरत उजागर करके सुषमा स्वराज ने लोकतंत्र के लिए भी हिकारत दिखाई थी, और भारत के संविधान के लिए भी। और आज सुषमा और उनकी पार्टी की सरकार को यह चाहिए कि अगर वे सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने के खिलाफ थीं, तो उनको संविधान संशोधन पेश करके विदेशी मूल के लोगों को प्रधानमंत्री पद से रोकने का कानून बनाना चाहिए। 
दरअसल राजनीति में आंख फोडऩे का जवाब आंख फोडऩे से दिया जाता है, और नफरत का जवाब नफरत से। इसलिए आज अगर सुषमा स्वराज के मुद्दे पर संसद चल नहीं पा रही है, तो इसके पीछे सुषमा की वह नफरत भरी बात भी है, और ललित मोदी के मुद्दे पर उनका कानून-विरोधी आचरण भी है। सुषमा स्वराज ने जो किया है वह इस्तीफे से कम के लायक नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शायद सुषमा की अधिक फजीहत का मौका खड़ा कर रहे हैं। ऐसे विवादों पर पहले बहुत से इस्तीफे होते आए हैं। लेकिन हमारा मकसद आज यहां इस मुद्दे पर चर्चा नहीं है, बल्कि यह बात करना है कि संसद और विधानसभाओं को विरोध और प्रदर्शन का मंच बनाना कितना गलत है, और उससे लोकतंत्र का कितना दीर्घकालीन नुकसान हो रहा है। विरोध करने वाले लोग चाहे वे कल भाजपा वाले रहे हों, और आज चाहे वे कांग्रेस वाले हों, वे इस बात को अनदेखा कर रहे हैं कि इस देश में विरोध-प्रदर्शन के मौके तो बहुत से हो सकते हैं, और जगहों के विकल्प भी हो सकते हैं, लेकिन संसद और विधानसभाओं के कोई विकल्प नहीं हैं। और संसदीय सदन सबसे अधिक तो विपक्ष के ही काम के रहते हैं, क्योंकि वहां पर ही विपक्ष सरकार को घेर सकता है। इस मौके को खोकर विपक्ष जब सिर्फ प्रदर्शन या विरोध पर अड़े रहता है, तो वह जनता से जुड़े हुए बहुत से मुद्दों को उठाने का मौका भी खो बैठता है। हमारा अनुभव यह रहा है कि संसद हो या विधानसभा, केन्द्र और राज्य सरकारों के लिए यह बात सबसे सहूलियत की होती है कि सत्र का बहुत सा वक्त विरोध में खत्म हो जाए, और सख्त सवालों का सामना ही न करना पड़े। बहुत से सवालों को मौका नहीं मिलता, और अधिकतर सवालों के लिखित जवाब पर बात खत्म हो जाती है। ऐसी भी संभावना है कि संसद और विधानसभाओं के सत्र वक्त के पहले खत्म कर दिए जाएं। यह भी लोकतंत्र का बड़ा नुकसान होगा। 
हमारा तो यह मानना है कि विपक्ष को सदन के एक-एक मिनट का बहुत ही पैना इस्तेमाल करना चाहिए, और सरकार को घेरकर उससे जवाब-तलब करना चाहिए। विरोध करने का तरीका तो यह होना चाहिए कि रोज अधिक से अधिक समय तक सत्र को चलाया जाए, अधिक से अधिक बहस की जाए, मुद्दे उठाए जाएं, और सत्र के दिन घटाने का विरोध किया जाए। जिस तरह जापानी कारखानों में कर्मचारी विरोध करने के लिए जरूरत से अधिक उत्पादन करके मैनेजमेंट के लिए दिक्कत खड़ी कर देते हैं, उसी तरह भारत की संसदीय व्यवस्था में विपक्ष को सत्र को अधिक से अधिक लंबा करवाकर, उसके मिनट-मिनट का जनहित में इस्तेमाल करना चाहिए। अपने संसदीय विशेषाधिकार को सिर्फ नारों और बहिर्गमन में खर्च करके विपक्ष सिर्फ जनता के प्रति अपनी जवाबदेही का नुकसान करता है। सत्ता में कोई भी पार्टी हो, विपक्ष में कोई भी हो, सदन का इस्तेमाल कड़ाई से संसदीय काम के लिए होना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में संसदीय-सदन का कोई विकल्प नहीं है।

आदिवासी हकों के साथ ऐसा जुर्म नक्सलियों के बने रहने की गारंटी

संपादकीय
23 जुलाई 2015

देश भर में संसद से विधानसभाओं तक में भ्रष्टाचार की बड़ी खबरें इस कदर छाई हुई हैं कि दिल्ली में छत्तीसगढ़ की एक खबर को कोई नामलेवा नहीं मिला। यहां के आदिवासी बस्तर से जिन प्रतिभाशाली आदिवासी बच्चों को लाकर सरकारी खर्च पर राजधानी में बड़ी निजी स्कूलों में पढ़ाने की सरकार की योजना है, उसके तहत वहां से लाए बच्चों को एक नामौजूद कागजी स्कूल में दाखिल करना बताया गया, और वे हकीकत में उस फर्जी स्कूल के मालिक के घर पर साल भर से बंधुआ मजदूरी करते हुए मिले। इन प्रतिभाशाली बच्चों को महंगी निजी शिक्षा तो नहीं मिल पाई, लेकिन इन आदिवासी बच्चों को स्कूल के सवर्ण मालिक के घर पर बर्तन मांजने, कपड़े धोने, और फर्श पोंछने का काम जरूर मिल गया, और इनको स्कूल का चेहरा भी देखना नसीब नहीं हुआ। बस्तर के इनके इलाके के एक कांग्रेस विधायक ने वहीं से पुलिस लाकर यह मामला पकड़वाया, तो अब सरकार के हाथ-पांव फूले हैं, और आनन-फानन में दर्जन भर सरकारी अफसर निलंबित हुए हैं, और यह पता लगा है कि किस तरह एक फर्जी स्कूल को सरकार के दर्जन भर अफसरों से झूठे सर्टिफिकेट दिए जा रहे थे, और सरकार इन बच्चों की बंधुआ मजदूरी के लिए इस मुजरिम स्कूल-मालिक को फीस का भुगतान भी कर रही थी। 
सरकार के कामकाज में कदम-कदम पर ऐसा ही भ्रष्टाचार भरा हुआ है। दो दिन पहले ही राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने अलग-अलग विभागों के आठ ऐसे अफसरों पर छापे डाले हैं जिनमें से हर किसी के पास दस-दस करोड़ से ज्यादा की दौलत निकली है। यह हाल सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों में बड़ी संख्या में लोगों का है, और इनमें से कार्रवाई सिर्फ नमूने की हो पाती है। हांडी का चावल पका है या नहीं, इसे देखने के लिए जिस तरह एक-दो दाने निकालकर देखे जाते हैं, करीब उतना ही अनुपात भ्रष्ट सरकारी अफसरों में से पकड़ाने वालों का होता होगा। 
लेकिन भ्रष्टाचार के बारे में लिखने के लिए हमारे पास ऐसा कुछ नया नहीं है जो कि दो-तीन दिन पहले इसी जगह पर हम लिख नहीं चुके हैं। आज तो यह चर्चा करने की जरूरत है कि क्या समाज अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह बरी हो चुका है कि उसे सरकारी ढांचे में पनपे हुए ऐसे जुर्म दिखते नहीं हैं? ऐसा जुर्म करने वाले सरकारी और गैरसरकारी लोग, उनका जुर्म निश्चित ही सैकड़ों लोगों की नजरों में रहता होगा, लेकिन इनमें से कोई एक भी अपने नाम सहित या गुमनाम होकर सरकार के पास जाकर शिकायत नहीं करता? ऐसे तो सरकार के अपने निगरानी के इंतजाम पुख्ता रहना चाहिए, लेकिन सरकार के कामकाज में भ्रष्टाचार का आकार इतना बड़ा है कि सरकार की कई जांच एजेंसियां भी संगठित भ्रष्टाचार और अपराध के बरसों निकल जाने पर भी कुछ का सिरा ही थाम पाती हैं, और सजा तो उनमें से भी शायद ही किसी को होती है। लेकिन इनसे परे समाज के लोगों की नजरों में जब भ्रष्टाचार आता है, तब वे इसे उजागर करने में दिलचस्पी कम ही दिखाते हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि जो परिवार बच्चों से बंधुआ मजदूरी करवाता है, वह परिवार समाज से बाहर किसी टापू पर रहता हो। अड़ोस-पड़ोस के लोग अगर बाल-बंधुआ मजदूरी की शिकायत करते तो पहले भी कार्रवाई हो सकती थी। 
आदिवासी समाज के लिए सुरक्षा के अलग और कड़े कानून हैं। इसके बावजूद अगर ऐसे जुर्म का हौसला लोग करते हैं, तो उसका मतलब यही है कि सरकार में ऊपर तक की भागीदारी है। और स्कूल शिक्षा से लेकर आदिवासी विभाग तक के लोग जिस तरह इस जुर्म में हिस्सेदार मिले हैं वह शर्मनाक है। राज्य सरकार कमजोर तबकों की भलाई के लिए योजनाएं बनाती है, लेकिन उनका फायदा इस तरह से मुजरिम और भ्रष्ट सरकारी मशीनरी लूट ले जाते हैं। अभी जो मामला पकड़ाया है, उसके बाद सरकार को अपने घर को सुधारना चाहिए। यह मामूली मामला नहीं है, और दर्जन भर लोगों को निलंबित कर देना भी काफी नहीं है, सरकार को एक-एक कर अपने हर विभाग से ऐसे संगठित और फैले हुए भ्रष्टाचार को खत्म करना होगा, वरना जिस बस्तर से ये बच्चे पढऩे की उम्मीद में राजधानी आए थे, उसी बस्तर में नक्सलियों की जड़ें वहां की दबी-कुचली और शोषित आदिवासी जनता की हमदर्दी से ही जमी हैं। जिस दिन तक आदिवासी हकों के साथ सरकार ऐसा जुर्म करती रहेगी, उस दिन तक नक्सलियों को कितनी भी सरकारी बंदूकें खत्म नहीं कर पाएंगी।

बेवफाई पर हैकिंग का हमला इंसान क्या इंसान भी न रहे?

संपादकीय
22 जुलाई 2015

इंटरनेट पर अभी एक मजेदार और खतरनाक मामला हुआ है। पश्चिमी दुनिया में खासी लोकप्रिय एक बेवफाई की वेबसाईट को नैतिकतावादी हैकरों ने हैक कर लिया, और करीब पौने चार करोड़ लोगों की डेटिंग की जानकारी, उनकी बातचीत, बेवफाई के उनके सुबूत, उनकी शिनाख्त सहित हासिल कर लिए हैं। अब उनकी मांग है कि या तो यह वयस्क-डेटिंग वेबसाईट बंद की जाए, या फिर वे इस तमाम जानकारी को सबसे अधिक दाम देने वाले को बेच देंगे। यह एडल्ट-डेटिंग-वेबसाईट शादीशुदा लोगों में बेवफाई के संबंधों के लिए लोकप्रिय थी, और इस पर एक बार दर्ज हो जाने के बाद यहां से अपनी जानकारी हटाने के लिए लोगों को हजार रूपये से कुछ अधिक देने पड़ते थे। अब इस हैकिंग की खबर मिलने के बाद अपनी जानकारी मिटाने के लिए लोगों की भीड़ ऑनलाईन दौड़ पड़ी है, लेकिन जानकारी चोरी हो चुकी है, और नैतिकतावादी अपनी नजर में अनैतिक इस वेबसाईट को बंद करवाने पर उतारू हैं। 
एशले मैडिसन नाम की इस वेबसाईट का नारा था- जिंदगी छोटी है, एक चक्कर चलाओ। यह लोगों को शादी के बाद या शादी के पहले दूसरों से संबंध बनाने के लिए तरह-तरह की सहूलियतें देती है, लेकिन आज इसे इस्तेमाल करने वाले करोड़ों लोग दहशत में पड़े हुए हैं। इंटरनेट पर जो लोग अपनी जानकारी को पूरी तरह गोपनीय मानकर वैध-अवैध समझे जाने वाले तन-मन के रिश्ते बनाकर चल रहे थे, वे सब आज खतरे में पड़ गए हैं। निजी जीवन में रिश्तों में ईमानदारी की वकालत करने वाले इन नैतिकतावादियों का कहना है कि लोगों को बुराई की तरफ धकेलने वाली ऐसी वेबसाईट को अगर बंद नहीं किया गया तो वे करोड़ों लोगों की निजी जानकारी सार्वजनिक कर देंगे। पश्चिम में आज इस बात को लेकर एक बड़ा तनाव खड़ा हो गया है कि ऐसा अगर होता है तो उससे दसियों लाख लोगों के पे्रम संबंध या शादी के रिश्ते किस तरह तबाह हो जाएंगे। 
इंसानी जिंदगी की हकीकत यह है कि बहुत से लोग अपनी भावनात्मक और शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए एक से अधिक लोगों से संबंध रखते हैं, और शादीशुदा जिंदगी की सरहदें इसमें अधिक बाधा नहीं बनतीं। लोग इंटरनेट पर मिलने वाली गोपनीयता के चलते दाएं-बाएं कई तरफ मुंह मार लेते हैं, फिर भी उनका मुंह साफ दिखते रहता है। बहुत से परिवारों की तो हकीकत यह है कि कोई एक साथी, या दोनों ही साथी, शादी के बाहर कुछ पलों के लिए अपनी-अपनी खुशी जुटाकर लौटते हैं, तो वे अपने साथी को बर्दाश्त कर पाते हैं, या उसे खुश रख पाते हैं। कई बार खुश रखने की जिम्मेदारी बाहर की अपनी करतूत से उपजे अपराध-बोध की वजह से आती है। लेकिन समाज में नैतिकता के जो पैमाने हैं, वे ऐसे रिश्तों के खिलाफ रहते हैं, और अमरीका की संसद ऐसे रिश्तों पर लंबी बहस और महाभियोग भी देख चुकी है। 
दरअसल इंसानी मिजाज बहुत अधिक वफादारी का रहता नहीं है। शादी नाम की एक सामाजिक संस्था का ढांचा अपनी फौलादी गिरफ्त में शादी के दोनों भागीदारों को कड़े शिकंजे में रखता जरूर है, लेकिन वह गिरफ्त इंसान के बुनियादी मिजाज के खिलाफ ही रहती है। लोग इस ताक में रहते हैं कि कब इस गिरफ्त से परे, चाहे कुछ देर के लिए ही सही निकला जा सके। लेकिन जो पश्चिम दूर बैठे पूरब के लोगों को बड़ा अनैतिक और बेवफा लगता है, वहां पर भी नैतिकता के कई किस्म के अभियान चलते हैं। अमरीका में ही ऐसे बड़े-बड़े सामाजिक जमावड़े होते हैं जिनमें किशोरियां अपनी शादी तक अपने कौमार्य को बचाकर रखने का वायदा सामूहिक और सार्वजनिक रूप से अपने माता-पिता से करती हैं। पश्चिम में बेवफाई शादी के टूट जाने की काफी वजह मान ली जाती है, और ऐसे में ऑनलाईन डेटिंग से लोगों को चोरी-छिपे खुशी हासिल करने का एक जरिया मिल जाता है। 
अब नैतिकतावादियों की यह हैकिंग एक अलग किस्म का खतरा पेश करती है। कल के दिन शाकाहारी लोग ऐसी हैकिंग कर सकते हैं जिससे वे सार्वजनिक रूप से शाकाहारी बने हुए, लेकिन मांसाहार खरीदने वाले लोगों के भुगतान की जानकारी का भांडाफोड़ कर दें, मालिश से लेकर वेश्या तक को के्रडिट कार्ड से भुगतान करने की जानकारी उजागर कर दें, और धीरे-धीरे किसी राजनीतिक विचारधारा को रखने वाले लोगों की जानकारी हैक कर ली जाए, और फिर उनसे बदला निकाला जाए। जब कानून से परे किसी जुर्म के रास्ते से कोई भांडाफोड़ होता है, तो उससे निजी जिंदगी का भरोसा भी खत्म हो जाता है। और आज हैकिंग से यह आसान हो गया है कि लोगों की निजी जिंदगी का एक-एक अक्षर, एक-एक पल, एक-एक तस्वीर, और एक-एक सांस की जानकारी लूट ली जाए, बेच दी जाए, दीवारों पर चिपका दी जाए। 
इस पूरे सिलसिले से एक ही नसीहत निकलती है कि आज के डिजिटल युग में कुछ भी सुरक्षित नहीं है, सिवाय अच्छी सोच के, अच्छी बातों के, अच्छे कामों के, और अच्छे संपर्कों के। लेकिन सवाल यह उठता है कि इतना अच्छा होना इंसान के मिजाज के तो ठीक खिलाफ है, और इंसान जीते जी एक अच्छे किस्म का भगवान भला कैसे हो जाए?

शांताकुमार की चिट्टी के पीछे और आगे के मुद्दे

संपादकीय
21 जुलाई 2015

भाजपा के एक बड़े-बुजुर्ग नेता, हिमाचल के मुख्यमंत्री और केन्द्रीय मंत्री रह चुके शांताकुमार ने पार्टी अध्यक्ष को एक कड़ी चि_ी लिखी है और कहा है कि जिस तरह के घोटालों की चर्चा हो रही है उससे भाजपा के कार्यकर्ताओं का सिर शर्म से झुक गया है। उनकी बात को इस संदर्भ में देखना ठीक होगा कि जिंदगी की तीन चौथाई सदी पूरी कर चुके जिन नेताओं को भाजपा ने आज सरकार से, और संगठन से दूर, घर बिठा दिया है, शांताकुमार उन्हीं में से एक हैं। हमारे कहने का यह मतलब नहीं है कि उनकी नाराजगी या उनकी तकलीफ इसी वजह से उपजी हैं, लेकिन इस बात को ध्यान में रखकर ही उनकी कही बातों को समझना ठीक होगा। 
जिंदगी में एक दौर ऐसा आता है जब लोगों के पास खोने को कुछ नहीं बचता। जैसे कि कर्नाटक के राज्यपाल रहे हंसराज भारद्वाज एक ताकतवर केन्द्रीय कांग्रेसी मंत्री रहने के बाद अब जब बयान देते हैं, कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी के खिलाफ बोलते हैं। ऐसे और भी कुछ नेता हैं जिनका वक्त गुजर गया है, जिनकी संभावनाएं बची नहीं हैं, और अब वे शहादत के अंदाज में मसीहाई बयान देकर अपनी बहादुरी का इतिहास छोड़कर जाना चाहते हैं। आज मोदी के संदर्भ में जब चर्चा चलती है तो नाम लिए बिना लालकृष्ण अडवानी को यह लगता है कि देश से आपातकाल के फिर लागू होने का खतरा टला नहीं है। मुरली मनोहर जोशी या सिंघल को यह लगता है कि इस सरकार की योजनाएं कभी गंगा साफ नहीं कर पाएंगी। ऐसा ही अलग-अलग बुजुर्गों को कुछ न कुछ लगते रहता है। दरअसल किसी संगठन या सरकार में जब बहुत से लोगों की लंबे समय तक अनदेखी होती है, तो उन्हें अपने मौजूदगी दर्ज कराने के लिए भी ऐसी कुछ बातें सूझती हैं। यह कुछ वैसा ही होता है जैसा कि किसी संयुक्त परिवार में दिन भर अनदेखी के शिकार बुजुर्गों को अपनी हस्ती दर्ज कराने के लिए कभी खांसी आने लगती है, तो कभी वे किसी और बात को लेकर बड़बड़ाने लगते हैं।
लेकिन हम शांताकुमार की खुली चि_ी को महज इतना ही मानकर छोड़ देना नहीं चाहते। हो सकता है कि उनकी नीयत निजी उपेक्षा से घायल का दर्द न हो, और भाजपा के बारे में आज चल रही बदनामी को लेकर उठ रहा एक निष्ठावान दर्द हो। भाजपा के खिलाफ आज बदनामी कम नहीं हो रही है, शांताकुमार ने राजस्थान से लेकर मुम्बई तक और मध्यप्रदेश के व्यापम तक के कई मुद्दे गिनाए हैं। भाजपा के किसी भी शुभचिंतक का यह मानना है कि इन तमाम घोटालों से भाजपा का बड़ा नुकसान हो रहा है। चूंकि आज पूरे देश में कोई चुनाव नहीं है, और मोदी या भाजपा की पिछले आम चुनाव की लोकप्रियता पर आज दुबारा कोई जनमतसंग्रह नहीं हो रहा है, इसलिए भाजपा को बदनामी की फिक्र नहीं दिख रही है। लेकिन बहुत सी सरकारें अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद, जीत की पूरी उम्मीद के बाद भी, आम चुनाव हार जाती हैं। एनडीए की ही पिछली अटल-सरकार को देखें तो उसका यही हाल हुआ था। इंडिया शाइनिंग नाम के अभियान के साथ भाजपा का आत्मविश्वास सिर चढ़कर बोल रहा था, लेकिन मतदाताओं ने उसे दस बरस के लिए खारिज कर दिया था। इसलिए आज खुद मोदी और अमित शाह के हित में है कि पार्टी को होते चल रहे छोटे-छोटे नुकसान को अनदेखा न करे, और किसी भी बदनामी को छोटा न माने। एक-एक करके हर राज्य में कुछ-कुछ बदनामी होगी, तो कुल मिलाकर हो सकता है कि अगला लोकसभा चुनाव हाथ से निकलने की नौबत आ जाए। अमित शाह को यह भी देखना होगा कि भाजपा के शांताकुमार से परे, मुम्बई की शिवसेना की मेयर ने कल ही एक सार्वजनिक बयान में कहा है कि नरेन्द्र मोदी को देखकर उनको हिटलर की याद आती है। अब अगर भाजपा का सबसे पुराना चुनावी-साथी अगर लगातार इस तरह तिरछा-तिरछा चले, और अपने अखबार में आए दिन मोदी और भाजपा सरकार की आलोचना करे, तो यह बात भाजपा के लिए कुछ सोचने की तो बनती है। शांताकुमार ने जो मुद्दे उठाए हैं, वे आज देश की जनता के दिल-दिमाग पर भी छाए हुए हैं। देश और प्रदेशों के हित से परे, भाजपा को आत्महित में भी इन पर आत्ममंथन करना चाहिए, और कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। 

नान-घोटाले में बड़े अफसरों पर कार्रवाई इतनी देर से कि..

संपादकीय
20 जुलाई 2015

छत्तीसगढ़ के सैकड़ों करोड़ के नान घोटाले की खबरें जल्द खत्म नहीं होना है। आज से कांग्रेस के हमले की धार कुछ कम हो सकती है, क्योंकि दो बड़े अफसरों के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा केन्द्र सरकार से मांगी गई मुकदमे की इजाजत आ गई है, लेकिन फिर भी यह घोटाला इतना बड़ा, इतना संगठित, और इतने गरीब लोगों के हक को छीनने वाला है कि यह कांग्रेस के हाथ एक हथियार बने रहेगा। और फिर यह तो आने वाले दिन ही बताएंगे कि सत्तारूढ़ पार्टी को अब तक के चुनावों में जिस राशन-रियायत नीति का नफा मिलते रहा है, उसे इसी राशन-घोटाले के इस मामले से कितना नुकसान मिलेगा। लेकिन आज की तारीख में केन्द्र सरकार से नान घोटाले के दो सबसे बड़े अफसरों पर मुकदमे की राह साफ हो चुकी है, और एसीबी ने अदालत में राज्य सेवा के बाकी जिन अफसरों-कर्मचारियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी, उसमें इन दो आईएएस अफसरों के जुर्म के बारे में बड़े खुलासे से लिखा था। इसलिए अब यह जाहिर है कि इन पर मुकदमा टल नहीं सकता। 
लेकिन आज सवाल यह है कि नान-घोटाला सामने आने के बाद, इन दो अफसरों के भ्रष्टाचार की लंबी-चौड़ी टेलीफोन रिकॉर्डिंग सरकार के पास होने के बाद, क्या इन पर मुकदमे की इजाजत में इतना समय लगना था? सरकार के कुछ लोगों का यह मानना है कि मुकदमे की इजाजत के पहले सरकार को मामले को तौलना पड़ता है, और उसके बाद ही इजाजत दी जा सकती है। लेकिन इसी सरकार के कुछ दूसरे उतने ही ताकतवर अफसरों का यह भी कहना है कि सरकार ने समय पर कार्रवाई करने की अपनी नीयत साबित करने में देर कर दी। हमारा यह मानना है कि ऐसी औपचारिकता को पूरा करने में सरकार को महीनों लगाने के बजाय कुछ दिनों के भीतर ही रात-दिन मेहनत करके अपनी नीयत और अपनी जिम्मेदारी की साख बचानी चाहिए थी। आज जब केन्द्र सरकार से यह इजाजत आई है, तो प्रदेश में राज्य सरकार की किसी कोशिश को कोई वाहवाही इससे नहीं मिल सकती। यह बहुत देर से हुई कार्रवाई है, जो कि अब इतनी छोटी है कि वह अपना महत्व खो बैठी है। लोकतंत्र में सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी को जनधारणा का सम्मान भी करना चाहिए। 
जब जनधारणा और सरकार की खुद की जांच एजेंसी यह मान चुकी थी कि इन दो अफसरों की अगुवाई में भ्रष्टाचार का पूरा गिरोह काम कर रहा था, राज्य को लूट रहा था, गरीब जनता के खून को चूस रहा था, तब सरकार इजाजत देने में महीनों लगा रही थी। यह मामला इस तरह का नहीं था कि जिसकी फाईलों पर सरकार के दो-तीन विभाग महीनों गंवा देते। जिस तरह किसी को दिल का दौरा पडऩे पर शुरुआती एक घंटे में इलाज मिल जाने को गोल्डन अवर (सुनहरा घंटा) कहा जाता है, वैसा ही हाल सरकार की साख का होता है। छत्तीसगढ़ सरकार ने जितना समय इस इजाजत पर गंवाया है, उससे उसे नान-घोटाले के नुकसान का दुगुना नुकसान झेलना पड़ रहा है। जनधारणा में, जनता की नजरों में इस तरह गिरने से इस सरकार को यह सबक लेना चाहिए कि भ्रष्टाचार के बाकी मामलों की फाईलों पर सरकार जिस तरह से बैठी हुई है, उसे वहां से हिलना चाहिए, और भ्रष्ट लोगों को आज सरकार हांकने से परे करना चाहिए। आज भी इस प्रदेश में वन विभाग के कुख्यात आरा मिल घोटाले जैसे भ्रष्टाचार के बहुत से मामले हैं, जिनमें कुसूरवार पाए गए लोग आज भी सरकार के ताकतवर ओहदों पर बने हुए हैं, और इससे जनता के बीच यह साफ संदेश जाता है कि सरकार भ्रष्ट लोगों को बचा रही है। 
छत्तीसगढ़ सरकार के पास आज भी अगले चुनाव के पहले का करीब तीन बरस का समय ऐसा है जिसमें वह भ्रष्टाचार से छुटकारा पाने की कोशिशों की साख बना सकती है, लेकिन इसके लिए उसे ठोस मेहनत करनी पड़ेगी। आज ऐसी नीयत दिखाई नहीं पड़ती है, और सरकार के ताकतवर और हमदर्द अफसर इस बात पर निजी चर्चा में भारी अफसोस जाहिर करते हैं कि किस तरह सरकार ने नान-घोटाले में समय रहते कार्रवाई नहीं की, इन अफसरों को छुट्टी पर भेजने जैसा एक आसान रास्ता भी इस्तेमाल नहीं किया, और अब जब विधानसभा शुरू हो रही है, तो यह कार्रवाई करती हुई सरकार गंवाई हुई साख वापिस नहीं पा सकती। अब भी सरकार को बाकी बची हुई फाईलों पर से धूल हटाकर, या खुद उन पर से हटकर, इंसाफ होने देना चाहिए।

सेल्फी का मनोविश्लेषण

20 जुलाई 2015
मोबाइल फोन के कैमरे से अपनी तस्वीरें लेने के शौक ने अंग्रेजी जुबान को एक नया शब्द, सेल्फी, दिया है। लेकिन अपनी तस्वीरें लेने का काम तो शायद दुनिया के शुरुआती कैमरों के साथ ही शुरू हो गया होगा, और सौ बरस पहले भी ऐसे कैमरे आते थे जिनमें सेल्फटाईमर का फीचर रहता था, और लोग किसी स्टैंड पर लगाकर, या दीवार पर रखकर खुद बटन दबाकर, दौड़कर सामने जाकर खड़े होते थे, और अपनी सेल्फी लेते थे। लेकिन जैसे-जैसे यह शौक दीवानगी की तरफ बढऩे लगा, लोगों को इसके लिए अलग से एक शब्द की जरूरत पड़ी, और सेल्फी गढ़ा गया। 
अभी कई किस्म की सेल्फी को लेकर यह विवाद चल रहा है कि किसी हादसे के मौके के सामने खड़े होकर अपनी तस्वीर खींचना एक बीमार मानसिकता की बात है, या उसे असामान्य न माना जाए? अभी जब ट्यूनीशिया के समुद्र तट पर पश्चिमी सैलानियों पर अंधाधुंध गोली-बारी करके एक मुस्लिम आतंकी ने दर्जनों लोगों को मार डाला, तो उसके बाद वहां ब्रिटिश लेबर पार्टी का एक संसदीय-चुनाव उम्मीदवार अपनी सेल्फी लेते एक दूसरे कैमरे पर कैद हुआ। दर्जनों ब्रिटिश सैलानियों के कत्ल के मौके पर ऐसा शौक इस नेता को खासी आलोचना दिला गया। 
और दुनिया में जगह-जगह सड़क हादसों के सामने, आगजनी के सामने लोग अपनी सेल्फी लेते दिखते हैं। अभी फ्रांस से एक सेल्फी सामने आई है जिसमें एक इस्लामी आतंकी ने अपनी फैक्ट्री-बॉस का कत्ल करके उसके सिर को तार से टांगकर उसके सामने खड़े होकर अपनी सेल्फी ली। यह तस्वीर धुंधली किए बिना छापना भी मुमकिन नहीं था। 
जिंदगी के अच्छे से अच्छे, और बुरे से बुरे मौकों पर अपनी सेल्फी लेने की सोच अगर इस शब्द से परे देखें, तो न तो नई है, और न ही इसमें कुछ अटपटी बात है। लोग तो हमेशा से ही सबसे अच्छे और सबसे बुरे वक्त की अपने किस्म की नाटकीयता को दर्ज करके रखना, उसकी चर्चा करना, उसके बारे में लिखना, यह सब करते ही आए हैं। दरअसल जिंदगी में यह एक बड़ी सामान्य और आम बात है कि लोग सबसे अच्छी और सबसे बुरी बातों को ही अधिक याद रख पाते हैं, इनके बीच की आम बातें तो याद रखने लायक होती भी नहीं हैं, क्योंकि वे रोजाना ही होती हैं। लोगों को अपने ऑपरेशन तो याद रहते हैं, बच्चों का पैदा होना तो याद रहता है, शादी और बुजुर्गों का गुजरना भी याद रहता है, लेकिन लोगों को क्या यह याद रह सकता है कि उन्हें सर्दी-खांसी कब हुई थी? 
फिर यह भी याद रखना चाहिए कि हिंसा करने वाले लोगों का भरोसा अपनी हिंसक हरकत पर रहता ही है। वह चाहे किसी धर्म की वजह से हो, राजनीतिक या सामाजिक विचारधारा की वजह से हो, या किसी आपसी रंजिश की वजह से हो, लोग हिंसा तभी करते हैं, जब उस हिंसा पर उनका भरोसा होता है। एक मुजरिम कत्ल करके किसी को तभी लूटता है, जब उसे लगता है कि उसे ऐसा करने का हक है, या ऐसी उसकी एक जायज जरूरत है। इसलिए ऐसी हिंसा के बाद जो लोग अपनी तस्वीरें लेते हैं, वे तस्वीरें लेने के लिए किसी बीमार मानसिकता के शिकार नहीं हैं, वे अपनी हिंसा के लिए एक बीमार मानसिकता के हो सकते हैं, लेकिन इसके बाद कटे हुए सिर के साथ अपनी सेल्फी लेना तो उसी हिंसा का एक अगली कड़ी है, वह अलग से हिंसा नहीं है। अगर कटे सिर के साथ अपनी तस्वीर लेना किसी को बुरा लगना चाहिए तो वैसा कोई इंसान किसी का सिर काटेगा ही क्यों? 
अब सेल्फी की कुल मिलाकर बात की जाए, तो इंसान तो हमेशा से ही आत्ममुग्धता के शिकार रहते आए हैं। यह अलग-अलग लोगों में अलग-अलग दर्जे की जरूर हो सकती है, लेकिन कमोबेश हर किसी में रहती ही है। ऐसा अगर नहीं होता, तो दुनिया में आईने का आविष्कार हुआ ही क्यों रहता? पहली सेल्फी तो पानी में अपनी खुद की शक्ल देखने की रही होगी, और चूंकि उस वक्त कैमरा या मोबाइल फोन नहीं रहे होंगे, इसलिए लोगों ने अपने चेहरे को अपने ही दिमाग में कैद कर लिया होगा। पुराने वक्त में जो लोग खर्च उठा सकते थे, वे अपनी तस्वीरें बनवाते थे, अपनी तस्वीरें खिंचवाते थे, और उन्हें टांगकर भी रखते थे। इसलिए अपने चेहरे पर फिदा होने में नया कुछ भी नहीं है, सेल्फी में नया कुछ है, तो मुफ्त की यह तकनीक नई है, जिसके चलते बिना किसी खर्च के लोग अपने फोन के कैमरे से ही अपनी तस्वीर खींच लेते हैं। 
बहुत से लोग बार-बार अपने चेहरे को आईने में देखने वाले रहते हैं, महिलाओं पर यह तोहमत कुछ अलग लगती है कि वे अपना चेहरा देखे बिना रह नहीं सकतीं, लेकिन आदमियों का भी यही हाल रहता है कि जहां आईना दिखे वे अपने बाल ठीक करने लगते हैं, कपड़ों की बटन या टाई सम्हालने लगते हैं। यह इंसानी मिजाज अब बिना किसी आईने के भी अपने मोबाइल फोन से काम चला लेता है, और अब चेहरे से परे, मौके को भी साथ-साथ दर्ज कर लेता है। पहले भी यही होता था, साधारण कैमरे लेकर चलने वाले लोग ताजमहल या कुतुबमीनार के सामने खड़े होकर किसी और से अनुरोध करते थे कि उनके कैमरे की बटन दबाकर उनकी तस्वीर खींच दें। 
अब यह देखें कि सेल्फी के नफा-नुकसान क्या हैं? एक तो यह कि लोग अपने खुद के चेहरे, अपने कपड़ों, और अपने हाव-भाव को बेहतर रखने लगेंगे, अगर उनके खुद के हाथ में अपनी तस्वीर लेने के लिए कैमरे का बटन रहेगा। कोई दूसरा तस्वीर ले तो हो सकता है कि अपना चेहरा मुस्कुराता न रहे, लेकिन सेल्फी लेने वाले लोग तो अपनी मर्जी का चेहरा बनने तक राह देख ही सकते हैं। दूसरी बात यह कि लोगों के अपने मन की आत्ममुग्धता इससे बहुत हद तक संतुष्ट होती है, और लोग अपनी खुद की तस्वीरें खींचकर, उन्हें सोशल वेबसाईटों पर पोस्ट करके खुश हो लेते हैं, और ऐसी खुशी पाने के लिए वे अब दूसरों के मुंह से अपनी वाहवाही के मोहताज नहीं रहते, उसका इंतजार करते हुए बेचैन नहीं रहते। 
ऐसा भी नहीं लगता कि सेल्फी लेने वाले लोग अपनी जिंदगी के बाकी कामकाज को छोड़कर सिर्फ अपनी तस्वीरें लेते बैठे रहते हैं। डिजिटल टेक्नालॉजी इतनी आसान हो गई है कि लोग दिन भर में अपनी दर्जन भर तस्वीरें आधा दर्जन मिनट में ही ले सकते हैं, और अपनी खुशी खुद पा सकते हैं। फिर यही एक टेक्नालॉजी ऐसी है जो कि गरीबों को भी मामूली मोबाइल फोन से भी कामचलाऊ अच्छी तस्वीरें लेने का मौका देते हैं, और कुछ बरस पहले तक यह सहूलियत सिर्फ कैमरे वाले लोगों को हासिल थी। 
एक और बात जिसके खतरे भी हैं, और जिसे बहुत से लोग पसंद नहीं करते, वह है बहुत ही अंतरंग और निजी तस्वीरों की। लोग अपने जीवन साथी के लिए, या अपने प्रेम संबंधों के लिए, अपनी दोस्ती के लिए बहुत ही निजी सेल्फी लेकर भेज सकते हैं, और अपने जोड़ीदार को एक खुशी या संतुष्टि दे सकते हैं। इसके अपने खतरे भी हैं, लेकिन इसके अपने मजे भी हैं। 
एक ग्रीक राजकुमार नार्सिसस से अंग्रेजी जुबान में नार्सिसिज्म शब्द आया, जिसका हिन्दी में मतलब आत्ममुग्धता है। आत्ममुग्धता कोई बहुत बुरी बात भी नहीं है, अगर यह उस व्यक्ति की सोच का एक छोटा हिस्सा हो। जो लोग चारों तरफ से आत्ममुग्धता से घिरकर उसके कैदी हो जाते हैं, उनके लिए वह प्रतिउत्पादक (काउंटर प्रोडक्टिव) हो जाती है। लेकिन जो लोग ऐसी दिमागी दिक्कत के शिकार नहीं होते, उनके लिए सेल्फी एक आत्मसंतुष्टि का आसान जरिया है, और यह उनके, उनके जोड़ीदार के, और उनके दोस्तों के खुशी का एक मुफ्त का तरीका भी है। दूसरी तरफ जो लोग सेल्फी से कतराते हैं, उनके बारे में यह भी सोचने की जरूरत है, कि क्या उनकी जिंदगी में कुछ ऐसी वजहें हैं जिनसे वे अपने ही चेहरे से कतराने लगे हैं :-)

हिफाजत की हसरत वालों को पाखंड से निकलना भी होगा

संपादकीय
19 जुलाई 2015

देश भर में चारों तरफ से बलात्कार की ऐसी खबरें आती है जिनमें घर का ही कोई रिश्तेदार किसी बच्चे से सेक्स ज्यादती करते पकड़ाता है, कहीं पड़ोसी किसी नाबालिग पर बलात्कार करते मिलता है, कहीं मोहल्ले का कोई लड़का किसी बच्ची को चॉकलेट का लालच देकर ले जाता है और रेप करता है। चारों तरफ बलात्कार की ऐसी खबरें हैं जिनमें बलात्कारी जान-पहचान का निकलता है। ऐसी नौबत में पुलिस और सरकार इसे रोकने के लिए कुछ भी नहीं कर सकते। जब तक पहले से किसी छेड़छाड़ की शिकायत न हो, जब तक पहले ऐसा जुर्म कर चुका आदमी पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज न हो, तब तक लोगों को खुद ही अपना और अपने बच्चों का ख्याल रखना है। कहने के लिए तो लोकतंत्र में हर किस्म की हिफाजत के लिए सरकार और उसकी पुलिस जवाबदेह है, लेकिन यह जवाब किसी नुकसान की भरपाई कभी नहीं कर सकता। 
पश्चिमी देशों में एक वक्त जवान लड़कियों को सावधान किया जाता था कि कुछ खाते-पीते हुए उन्हें यह सावधानी बरतनी चाहिए कि कोई उन्हें रेप-पिल नाम से बदनाम वह दवा घोलकर न पिला दे, जिसके बाद वे अपना आपा खो बैठें, और उनके साथ बलात्कार हो जाए। लेकिन भारत में इसकी भी जरूरत नहीं पड़ रही है। बहुत सी लड़कियां अपने किसी दोस्त या फेसबुक-दोस्त के साथ ऐसे चली जाती हैं, कि उसके साथ और भी दोस्त रहते हैं, और फिर सब मिलकर सामूहिक बलात्कार करते हैं। अब ऐसे मामलों में देश की आधी आबादी को पुलिस बना दिया जाए, तो ही वह बाकी आधी आबादी पर नजर रख सकती है। इसलिए समझदारी इसमें है कि लोग सावधानी सीखें, सावधानी बरतें, और खतरों से दूर रहें। 
इस देश में महिलाओं को लेकर लोगों का सोच वैसे भी बहुत सम्मान का नहीं है, और ऐसे में उनको कोई सामाजिक बचाव नहीं मिल पाता है। अभी कल ही दिल्ली की घटना दिल दहलाने वाली है जिसमें एक लड़की छेडख़ानी की शिकार बनी हुई थी, और छेडऩे वाले लड़कों ने कल उसे चाकुओं से गोदकर खुली सड़क पर मार डाला। ऐसे में पुलिस तो मौके पर जब पहुंचे, तभी कोई कार्रवाई कर सके, लेकिन आसपास के लोग भी तमाशबीन बने खड़े रहते हैं, और हिंसा को रोकने की कोशिश नहीं करते। दिनदहाड़े सड़क पर अगर समाज से कोई हिफाजत नहीं मिल सकती, तो ऐसे समाज को पुलिस की कितनी भी ताकत नहीं बचा सकती। 
सेक्स को लेकर होने वाले जुर्म का एक दूसरा सामाजिक पहलू है, जिसकी चर्चा किए बिना सेक्स-अपराध किसी तरह से कम नहीं हो सकते। इस देश में लोगों को प्रेम-संबंधों की इजाजत नहीं है, लड़के-लड़कियों की दोस्ती पर समाज की कातिल निगरानी है, खानदान की इज्जत के नाम पर प्रेमी-जोड़ों की हत्या हर हफ्ते-पखवाड़े खबरों में रहती है। ऐसे में सेक्स की जरूरत, या भावनात्मक संबंधों की जरूरत होने पर लोगों के पास सिवाय सेक्स-शोषण के, सेक्स-अपराध के, और कोई रास्ता नहीं बचता। वयस्क जरूरतों को लेकर भारत एक बड़ा पाखंडी देश है, जहां की कारोबारी राजधानी मुम्बई को डांस-बार भी बर्दाश्त नहीं है, यह एक अलग बात है कि मुंबई एशिया का सबसे बड़ा चकला बना हुआ है, जहां रोजाना लाखों बदन बेचे जाते हैं। यह पाखंड भारत के मिजाज की रग-रग में समाया हुआ है, और लोग उन तमाम बातों को अनदेखा कर देना चाहते हैं, जो कि उनके सामाजिक और सांस्कृतिक गौरव को ठेस पहुंचाती हैं। लोग बच्चों के यौन शोषण को एक पश्चिमी बीमारी मानते हैं, लोग समलैंगिकता को जुर्म मानते हैं, लोग दूसरे धर्म की शादी को लव-जेहाद जैसे नाम देते हैं, लोग दूसरी जाति में शादी को बर्दाश्त नहीं करते, अपने खुद के गोत्र के भीतर शादी बर्दाश्त नहीं करते, और कुल मिलाकर वे वेश्यावृत्ति से लेकर परिवार के भीतर यौन-शोषण तक सबको बर्दाश्त करते हैं। ऐसी दकियानूसी समाज-व्यवस्था सेक्स-अपराधों को कम नहीं कर सकती, और ऐसा समाज चाहता है कि हर किस्म की हिफाजत पुलिस का जिम्मा रहे। पुलिस का काम है अधिकतर मामलों में अपराध हो जाने के बाद शुरू होता है, और बंद कमरों में दो लोगों के बीच होने वाले अपराध को पुलिस कभी नहीं रोक सकती। हिफाजत की हसरत रखने वाले समाज को अपने आपको पाखंड से निकालना भी पड़ेगा। 

दामाद, कोई कांग्रेस का, तो कोई भाजपा का भी...

संपादकीय
18 जुलाई 2015
केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली के गुजर चुके ससुर की जन्म शताब्दी के मौके पर जम्मू में हुए एक स्मृति-समारोह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस बात की चर्चा की, कि स्व. गिरधारी लाल डोगरा ने अपने जीते जी कभी अपने दामाद (जेटली) को आगे नहीं बढ़ाया, और जेटली अपने दम पर आगे बढ़े। इसके बाद मोदी ने कुछ हल्के अंदाज में कहा कि आजकल दामाद कैसे-कैसे काम करते हैं। उनकी इस बात को कांग्रेस पार्टी ने अपने दामाद रॉबर्ट वाड्रा से जोड़कर लिया, और मोदी पर जवाबी हमले किए। मोदी के साथ-साथ कांग्रेस ने अटल बिहारी वाजपेयी के दत्तक-दामाद रंजन भट्टाचार्य पर भी हमले किए, जिनका नाम अटलजी के प्रधानमंत्री रहते हुए कई किस्म के सौदों के सिलसिले में लिया जाता था, और जो प्रधानमंत्री के अधिकृत परिवार का दर्जा प्राप्त करके देश-विदेश में उनके साथ साये की तरह रहा करते थे। 
अब अगर यह भी मान लिया जाए कि मोदी का हमला सिर्फ रॉबर्ट वाड्रा पर नहीं था, और रंजन भट्टाचार्य पर भी था, तो भी उसमें कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए। गुजरात दंगों के बाद मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुए, प्रधानमंत्री की हैसियत से अटल बिहारी वाजपेयी ने चाहे दबी-छुपी जुबान से ही सही, मोदी को राजधर्म की याद दिलाई थी। वे मोदी को हटाने की ताकत, या हौसला, जुटा नहीं पाए थे, लेकिन उनकी तकलीफ कई लोगों ने बाद में इधर-उधर लिखी थी। इसलिए अगर कांग्रेस के दामाद के साथ-साथ भाजपा के इस चर्चित दत्तक-दामाद की याद भी अगर लोगों को आ जाए, तो भी उसमें मोदी का कोई निजी नुकसान नहीं है। मोदी अपने परिवार से परे और दूर हैं, न उनकी कोई दत्तक-पुत्री है, न कोई दत्तक-दामाद, और न ही मोदी पर कोई परिवारवाद की तोहमत लगा सकते हैं। साथ-साथ यह भी याद रखने की जरूरत है कि भाजपा के भीतर साल भर पहले तक जो मोदी की सबसे ताकतवर प्रतिद्वंदी मानी जाती थीं, वे सुषमा स्वराज भी आज अपने पति और पुत्री के ललित मोदी से पेशेवर रिश्तों, और उसके बाद भारत सरकार की तरफ से इस भगोड़े पर मेहरबानी की तोहमत झेल रही हैं, और यह नौबत मोदी के लिए किसी निजी परेशानी की नहीं है। फिर यह भी याद रखने की जरूरत है कि राजस्थान की भाजपा-मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जिस तरह ललित मोदी की कंपनी से अपने बेटे की कंपनी के लिए करोड़ों की रियायत पाने के आरोप झेल रही हैं, वह नौबत भी मोदी के लिए बुरी नहीं है, क्योंकि जब मोदी प्रधानमंत्री बन रहे थे, तो वसुंधरा के तीखे तेवर सामने आए थे, क्योंकि उनके बेटे को मंत्री नहीं बनाया गया था, और राजस्थान से जिसे मंत्री बनाया गया था, वसुंधरा उसके खिलाफ थीं। ऐसे में उन्होंने अपनी नाखुशी जाहिर की थी। आज मोदी को बिना कुछ किए भाजपा के भीतर के अपने इन लोगों से हिसाब चुकता करने का मौका मिल रहा है। एक तीसरा नाम मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का है जिन्होंने लोकसभा चुनाव प्रचार के वक्त शुरू में तो मोदी की तस्वीरें भी पोस्टरों और होर्डिंग पर नहीं लगने दी थीं, और अब व्यापम घोटाले को लेकर शिवराज सुप्रीम कोर्ट से लेकर सीबीआई तक उलझे हुए हैं, और मोदी से जरा भी अलग चलने वाले, और आज मुसीबत में फंसने वाले वे तीसरे सत्तारूढ़ भाजपा नेता हैं। 
भाजपा के भीतर मोदी बाकी लोगों से बिल्कुल अलग, बिना संतान वाले, और बिना दामाद या समधी वाले, ऐसे नेता हैं, जिनका खुद का परिवार प्रधानमंत्री पद की महिमा से परे, आम जिंदगी की एक मिसाल की तरह रहता है। इसलिए वे इस तरह की बातें करके भी, भाजपा के और नेताओं के लिए परेशानी चाहे खड़ी करें, उन्हें निजी रूप से ऐसा कहने का नैतिक हक तो है ही। लेकिन एक सवाल यह भी है कि अटल-राज के बाद रंजन भट्टाचार्य के कामों को लेकर दस बरस में यूपीए सरकार ने क्या जांच-पड़ताल की? और मोदी सरकार का, हरियाणा और राजस्थान की भाजपा सरकारों का एक बरस पूरा होने पर भी रॉबर्ट वाड्रा के जमीनों के उन चर्चित मामलों पर इन सरकारों ने क्या किया जिनको कि मोदी आज तक मुद्दा बना रहे हैं? क्या कांग्रेस और भाजपा एक-दूसरे के खिलाफ महज जुबानी जंग करने पर भरोसा रखती हैं, और एक-दूसरे के दामाद को तकलीफ से परे रखती हैं? लोगों को याद है कि चौथाई सदी से बोफोर्स की महज चर्चा ही चर्चा चल रही है, एनडीए की पिछली सरकार ने भी कुछ नहीं किया, और आज की सरकार भी बोफोर्स की अब तक की आधी-पूरी जांच का कुछ नहीं कर पा रही है। फिलहाल दामादों के कामकाज चटपटी खबर देकर मीडिया को भुखमरी से बचाने का काम ही कर रहे हैं।

नारायण मूर्ति की बात पर सोचने की जरूरत है

संपादकीय
17 जुलाई 2015
भारत की एक सबसे प्रतिष्ठित कंपनी, इंफोसिस, के सह-संस्थापक एन.आर. नारायण मूर्ति ने अभी एक विज्ञान-समारोह के मंच से कहा कि भारत ने ऐसा एक भी आविष्कार नहीं किया है जो पूरी दुनिया में घर-घर तक जाना जाता हो। वे बेंगलुरू में भारतीय विज्ञान संस्थान के दीक्षांत समारोह में बोल रहे थे। यह संस्थान देश के सबसे प्रमुख विज्ञान-शिक्षा केन्द्र के रूप में जाना जाता है। नारायण मूर्ति का कहना था कि भारतीय शैक्षणिक संस्थान असरदार शोध करने में नाकामयाब रहे। उनकी बात पर वैज्ञानिकों की मिली-जुली प्रतिक्रिया है, कुछ का कहना है कि भारत में खोज तो महत्वपूर्ण हुई हैं लेकिन खोज को प्रयोगशाला से समाज और बाजार तक ले जाने के तरीके भारत में विकसित नहीं हैं। कुछ वैज्ञानिकों ने कहा कि भारत के ही वैज्ञानिक अमरीका जैसे देशों में जाकर बेहतर काम कर पाते हैं जहां पर खोज को लोगों तक पहुंचाने के बेहतर तरीके हैं।
नारायण मूर्ति के कहे एक-एक शब्द का विश्लेषण हम नहीं कर रहे लेकिन जो मुद्दा उन्होंने छेड़ा है वह अब और गंभीर इसलिए हो गया है कि अब भारत के कुछ उग्र राष्ट्रवादी संगठन लगातार इस प्रचार में लगे हैं कि किस तरह दुनिया की बहुत सी बड़ी खोजें भारत में हुई हैं और पौराणिक काल में ही भारत में कौन-कौन से आविष्कार हो चुके थे, राम किस तरह पुष्पक विमान से यात्रा करके अयोध्या लौटे थे। लोग कुछ झूठों को इतनी अधिक बार दुहरा चुके हैं कि अब शायद वे खुद भी उन पर भरोसा करने लगे हैं।
किसी भी देश, संस्था, या व्यक्ति के आगे बढऩे का रास्ता अपनी असलियत को जानने, और मानने, के बाद ही शुरू होता है। आगे बढऩे की जरूरत उन्हीं लोगों को हो सकती है, जो झूठे अहंकार और पाखंडी गौरव में न जीते हों। लेकिन जिन लोगों के उग्र राष्ट्रवाद के चलते, धार्मिक अहंकार के चलते लोग यह मानने को ही तैयार न हों कि इतिहास में कभी कोई उनसे भी बेहतर रहा हो, वैसा समाज आगे बढऩे की अपनी संभावनाएं खो बैठता है। भारत में कुछ ताकतें अपनी कार के पीछे देखने वाले बैक व्यू मिरर की जगह एक पौराणिक फिल्म चलाते हैं, और खुद भी उस कहानी पर फिदा रहते हैं, और चाहते हैं कि बाकी लोग भी उस पर भरोसा करें। कार के बैक व्यू मिरर में मनपसंद फीचर फिल्म देखने वाले सामने मंजिल तक नहीं पहुंच पाते।
दूसरी बात यह कि मोदी सरकार आने के बाद देश के सबसे ऊंचे दर्जे के शैक्षणिक संस्थानों में जिस तरह की राजनीतिक दखल बढ़ गई है, उससे इन संस्थानों की मौलिकता और संभावनाएं खत्म होना शुरू हो गया है। भारत जैसे विशाल और विविधताओं वाले देश में अगर एक धर्म को संगठनों की पसंद ही ओहदों के लिए लोग तय करेगी, तो ऐसे संस्थानों का योगदान नीचे गिरने लगेगा, शुरू हो चुका है।
आज दुनिया के जिन देशों के मुकाबिले भारत आविष्कार से लेकर निर्माण तक में आगे बढऩा चाहता है, उन देशों से आज भारत कुछ समझने को भी तैयार नहीं है। चीन में किसी ने अपने इतिहास को लेकर कोई झूठा दावा किया हो यह सुनाई भी नहीं पड़ता, और अमरीका की तो सारी उपलब्धि ही हर रंग, धर्म, नस्ल को बराबरी से बढ़ावा देने और प्रतिभा को बढ़ावा देने पर टिकी हुई है। भारत इन दोनों को कोशिश करके अपने से दूर रखते चल रहा है।
हम समय-समय पर और बातों को भी लिखते आए हैं कि किस तरह भारत में नौजवान पीढ़ी के प्यार-मोहब्बत से लेकर उसकी शादी तक में साम्प्रदायिक-जातीय दखल इस देश की नौजवान पीढ़ी को कुचलकर रख दे रही है। ऐसे ही लोगों को अमरीका में जाकर आजादी की सांस मिलती है और वे बेहतर काम करते हैं।
भारत को जो लोग मुगलों के हमले के पहले के दौर में ले जाना चाहते हैं, वे इस देश की संभावनाओं को भी उन्हीं पिछली सदियों में ले जाकर पटकेंगे।

एक-दूसरे के दिमाग तक पहुंच के खतरे...

संपादकीय
16 जुलाई 2015
वैज्ञानिकों ने अभी एक प्रयोग किया है कि किस तरह दो चूहों के दिमाग तारों से एक-दूसरे से जोड़कर उनके दिमागों के बीच बातचीत हो सकती है, या एक-दूसरे पर नियंत्रण हो सकता है। वैज्ञानिकों ने यह प्रयोग बंदरों के साथ भी किया, और इंसानों के साथ कुछ अलग तरह के प्रयोग चल ही रहे हैं। अब इंसान सिर्फ सोचकर कम्प्यूटरों पर कुछ काम करने के कामयाब प्रयोग कर भी चुके हैं, यहां तक कि कुछ आम मोबाईल फोन भी इंसानी भाव-भंगिमा, चेहरे-आंखों को देखकर स्क्रीन पर कुछ तरह के काम कर रहे हैं। मतलब यह कि मशीनें इंसानों को पढ़ रही हैं, इंसान मशीनों पर सिर्फ दिमाग या नजरों से काबू कर रहे हैं, इंसानी दिमाग दूसरे इंसानी दिमागों को पढऩे के करीब हैं, और जल्द ही विज्ञान का बाजार या बाजार का विज्ञान कुछ इंसानों को दूसरे इंसानों के दिमागों पर काबू भी दे देगा।
यहां पर एक छोटी सी बात भी समझने की जरूरत है कि बातचीत में जिसे दिल और दिमाग दो अलग-अलग सोचने वाली चीजें कहा जाता है, वह दरअसल अकेला दिमाग ही है, और दिल के सोचने-समझने की बातें वैसी ही जुमला है जैसे इन दिनों भारत की राजनीति में तैर रहे हैं। ऐसे में किसी के दिमाग तक पहुंच जाने का मतलब ही हो जाएगा उसके तन की तरह उसके मन को भी नंगा देख लेना। इसके बाद का हाल करीब-करीब वैसा ही हो जाएगा जिस तरह सौ बरस पहले गोरों के मुल्क में काले गुलामों की नीलामी होती थी, या आज जिस तरह चकलाघर चलाने वाले मुजरिम बालिग-नाबालिग लड़कियों की देह नीलाम करते हैं।
इंसानी फितरत औरों पर काबू की है, मर्द, औरत पर और बच्चों पर काबू चाहता है, मालिक नौकर पर, अफसर जूनियर पर और प्रेमी प्रेमिका पर। अब विज्ञान एक दूसरा काबू बाजार के मार्फत इंसानों को देने जा रहा है, दूसरों के दिमाग पर। आज भी दफ्तरों में मैनेजमेंट अपने कर्मचारियों के कम्प्यूटरों और कम्यूनिकेशन पर सौ फीसदी काबू रखने की तकनीकी ताकत रखता है। कई जगहों पर कर्मचारियों को कानूनी रूप से यह बता भी दिया जाता है। अब आगे चलकर इक्कीसवीं या बाईसवीं सदी के नवगुलामों के दिमाग भी किसी विज्ञानकथा की तरह सरकार या बाजार के काबू में रहेंगे।
लेकिन सरकार और बाजार से परे, निजी रिश्तों में भी देखें तो एक-दूसरे के दिमाग पढऩा ही दुनिया को तबाह करने के लिए काफी होगा, काबू करने की जरूरत भी नहीं होगी। लोग एक-दूसरे के बारे में क्या सोचते हैं यह पता लगते ही दुनिया का पारिवारिक, भावनात्मक, और सामाजिक ढांचा चरमरा जाएगा। कुछ जिंदगियों मिनटों में तबाह हो जाएगी, और कुछ दिनों में। दरअसल निजी और सामाजिक इंसानी रिश्ते सच कम, और झूठ अधिक, की बुनियाद पर खड़े रहते हैं। जब झूठ की ईंटें खिसक जाएंगी तो तमाम रिश्ते दरारों के रास्ते तबाही तक पहुंच जाएंगे। 
यह विज्ञान के विनाश तक पहुंचाने का सिलसिला है। जापान में अभी-अभी एक रोबो ने एक इंसान पर हमला करने उसे मार डाला। रोबो जैसी मशीनों में कृत्रिम-बुद्धि (आर्टीफीशियल इंटेलिजेंस) बढ़ते चलने की बात अब आम हो गई है। अब छोटे से साधारण मोबाइल फोन भी आपकी पिछले बातों से सीखकर, आपको अगले शब्द सुझाने लगते हैं। विज्ञान और टेक्नालॉजी, दूसरे इंसानों के दिमाग पढ़कर, उन पर काबू करके, दुनिया को खात्मे की तरफ ले जाएंगे। 

कौशल विकास एक और सरकारी धांधली होकर न रह जाए...

15 जुलाई 2015
संपादकीय

पन्द्रह जुलाई को विश्व युवा कौशल विकास दिवस मनाया जा रहा है। तकरीबन सभी प्रदेशों में, देशों में इस मौके पर कार्यक्रम होंगे। लेकिन कौशल विकास को अगर सिर्फ रोजगार दिलाने वाले हुनर सिखाने तक सीमित मान लिया जाएगा, तो यह नौजवानों के लिए खासी बेइंसाफी की बात होगी। रोजगार के लिए कुछ हुनर सीधे-सीधे पहचाने जाते हैं, लेकिन आज की दुनिया में नौजवानों के लिए बहुत सी दूसरी बातें भी हर हुनर के साथ जुड़ी हुई रहती हैं, जिनको गिना नहीं जाता है।
अब दुनिया का कौन सा ऐसा हुनर है जिसके साथ नौजवानों को एक अच्छे व्यक्तित्व की जरूरत न हो? विनम्रता की जरूरत न हो? देश और दुनिया में अधिक प्रचलित, अंगे्रजी जैसी किसी दूसरी भाषा की जरूरत न हो, कम्प्यूटर की जानकारी की जरूरत न हो? ड्राइविंग की जरूरत न हो? अर्जी बनाना, ई-मेल करना सीखने की जरूरत न हो? हर काम या रोजगार के साथ, हर हुनर के साथ नौजवानों को ये आम खूबियां अगर सीखने मिलें, तो उनका हर हुनर अधिक संभावनाएं पा सकता है।
जब तक नौजवानों को अपने कौशल या अपने हुनर के मुताबिक काम या रोजगार मिल नहीं जाता, तब तक उनके पास इन खूबियों को सीखने का वक्त रहता है, लेकिन सहूलियत नहीं रहती। भारत अगर अपनी युवा पीढ़ी का कौशल विकास चाहता है, तो उसे इस पीढ़ी को बुनियादी हुनर के साथ-साथ दूसरी बातें भी सिखानी होंगी। आज तो इस देश में जिस तरह की धांधली किसी भी दूसरे सरकारी काम में होती है, वैसी ही धांधली कौशल विकास कार्यक्रमों के तहत भी हो रही है। फर्जी संस्थाएं कौशल विकास के नाम पर कागजों पर फसल उगाकर काटने और बेचने जैसा काम कर रही हैं। ऐसे में कौशल विकास के आंकड़े तो पनपते जाएंगे, लेकिन न तो देश में किसी हुनर की उत्कृष्टता बढ़ेगी और न ही दुनिया में ऐसे हुनर की कोई कद्र होगी।
सरकार को अपने अनुदान के साथ-साथ भरोसेमंद सामाजिक संगठनों को भी कौशल विकास से जोडऩा होगा। भारत में पोलियो के खात्मे के लिए देश भर में सरकारी कोशिशों के साथ-साथ रोटरी जैसे संगठन ने बरसों से इसमें कंधे से कंधा भिड़ाकर काम किया, तब जाकर पोलियो खत्म हुआ। हिंदुस्तान के देश-प्रदेशों की सरकारों के जब तक गैरसरकारी संगठनों, सामाजिक संस्थाओं का योगदान कहीं मिलेगा, कौशल विकास के नाम पर मोटे तौर पर महज जालसाजों का विकास होगा। 
आज देश के भीतर भी अलग-अलग हुनर के कामगारों की डिमांड और सप्लाई के बीच बड़ा फासला है। देश में आज करोड़ों नौजवान बिना काम भटक रहे हैं और दसियों लाख ड्राइवरों की जरूरत है, दसियों लाख रसोईयों की, दसियों लाख नर्सों की जरूरत है। ऐसे दर्जनों हुनर हैं जिसमें माहिर लोगों की जरूरत दस-दस लाख से अधिक एक-एक काम में है, लेकिन ये जरूरतें अच्छे प्रशिक्षित और माहिर लोगों की है, औने-पौने काम चलाऊ लोगों की नहीं। सरकार और समाज को मिलकर देश और जनता के लिए अगर अच्छे दिन लाने हैं, तो भारत के हुनर को विश्वस्तरीय बनाना होगा। ऐसा होने पर यहां की आबादी बोझ न बनकर यहां की दौलत बन जाएगी। आज विकसित और सम्पन्न दुनिया में लोग हफ्ते में चार दिन के काम को घटाकर तीन दिन का करने के फेर में हैं। ऐसे में हर देश में माली से लेकर मालिश वाले तक की जरूरत बढ़ती जाएगी। ऐसे दुनिया के लिए भारत को अपनी नौजवान पीढ़ी को मुख्य हुनर के साथ-साथ बाकी आम खूबियां भी सिखानी होंगी। तभी केरल की तरह बाकी हिंदुस्तान में भी बाहर गया हुआ हुनर डॉलर कमाकर लाएगा।

भीड़ में हिन्दुस्तानी दिमाग खो बैठते हैं

संपादकीय
14 जुलाई 2015

आन्ध्र में गोदावरी तट पर आज से शुरू हुए एक हिन्दू पर्व पर नदी में नहाने के लिए भीड़ टूट पड़ी, और दो दर्जन से अधिक मौतें अब तक हो चुकी हैं। आज का यह त्यौहार, पुष्करालु, 144 बरस में एक बार आने वाला है, और आने वाले दिनों में आन्ध्र-तेलंगाना के गोदावरी-घाटों पर तीन-चार करोड़ श्रद्धालुओं के आने का अंदाज है। हर बरस भारत में एक-दो ऐसे मामले हो ही जाते हैं जिनमें दर्जनों लोग त्यौहारों पर, या तीर्थस्थानों पर इस तरह से मारे जाते हैं। लेकिन भारत अकेली ऐसी जगह नहीं है। हज का इंतजाम करने वाले सउदी अरब में सरकार एक हाथ में है, लेकिन वहां भी भगदड़ में एक बार में सैकड़ों लोगों के मरने का मामला दर्ज हो चुका है। 
और यह धर्म से अधिक भीड़ की बात है, दुनिया के सभ्य देशों में भीड़ भी कम रहती है, और लोग सभ्य भी रहते हैं। हिन्दुस्तान जैसे देश में जहां भीड़ रहती है, वहां धर्म रहे या न रहे, उस भीड़ में मौजूद सिरों के अलग-अलग दिमाग काम करना बंद कर देते हैं, और लोग एक भीड़ की तरह बर्ताव करने लगते हैं। ऐसा राजनीतिक रैलियों में भी होता है, किसी सम्प्रदाय या जाति के कार्यक्रमों में भी होता है, और ट्रेन के सफर में कई बार यह देखने में आता है कि वर्दीधारी फौजी भी कानून अपने हाथ में लेकर बाकी लोगों के खिलाफ जुर्म करने पर उतारू हो जाते हैं। जो लोग आम जुबान में अधिक बदकिस्मत होते हैं, उन्हें ट्रेन के सफर में किसी बारात वाले डिब्बे में सीट मिलती है, और पूरा सफर, अंग्रेजी के सफर (तकलीफ और फजीहत) में तब्दील हो जाता है। 
यह लोकतंत्र के विकसित होने का एक सुबूत होता है कि लोग सार्वजनिक जगहों पर अपनी जिम्मेदारियों और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करते हैं। भारत के अधिकतर मौकों पर लोग अपने अधिकारों और दूसरों की जिम्मेदारियों के लिए एकदम चौकन्ना रहते हैं, और ऐसे में ही भगदड़ की मौतें होती हैं, लोग हिंसा करते हैं, और कानून की धज्जियां उड़ा दी जाती हैं। जिन लोगों ने दुनिया के सभ्य देश देखे हैं, उनको यह मलाल होता है कि वे असभ्य देशों में क्यों पैदा हुए हैं? और भारत तो उन देशों में से है जहां पर हिन्दू धर्म का यह दावा है कि यहां पर देवता भी जन्म लेने को तरसते हैं। यह हमारी कमसमझ से परे की बात है कि किस तरह के देवता यहां जन्म लेने को तरसते होंगे? यह जरूर हो सकता है कि हर देवता को यहां जितने भक्त नसीब होते हैं, गिनती में उतने भक्त दुनिया के कम ही देशों में, कम ही देवताओं को मिलते होंगे। इस एक वजह के अलावा और कोई वजह हमें दिखती नहीं है, और इस देश के अधिकतर तीर्थस्थानों को देखें, तो वहां पर गंदगी, अराजकता, पंडों जैसे लोगों की गुंडागर्दी इस कदर हावी है, लोग गंगा तक को इतनी मैली कर चुके हैं, कि अब शायद वह कभी भी साफ नहीं हो पाएगी, और ऐसे देश में नदियों में डुबकी लगाने को लोग ऐसे टूट पड़ते हैं कि चाहे जान चली जाए, पर पहली डुबकी नसीब हो। और आम लोगों के साथ-साथ साधुओं के अखाड़ों में भी इस बात को लेकर तलवारें खिंचती हैं कि पहले कौन सा अखाड़ा शाही स्नान करेगा। 
भारत में कई तबकों को अपनी संस्कृति को लेकर बड़ा घमंड है, लेकिन आज इस देश में उसी संस्कृति के पालन और प्रदर्शन को लेकर जिस तरह की असभ्य हिंसा दिखाई जाती है, वह तो ऐसी किसी असली या काल्पनिक संस्कृति को भी बदनाम करने के सिवाय कुछ नहीं करती। हम ऐसे हादसों के लिए सरकार के खिलाफ लिखने की एक सीमा मानते हैं। जब दसियों लाख लोगों की भीड़ नियम-कायदे तोडऩे पर आमादा हो, हिंसा पर आमादा हो, जानलेवा हड़बड़ी में पड़ी हो, तो उनको काबू करने के लिए कोई भी सरकार फौज तो तैनात कर नहीं सकती। लोगों के बीच लोकतंत्र, न्याय, सभ्यता, नियम-कायदे, और दूसरों का सम्मान रातों-रात नहीं आ सकता। इस देश की राजनीतिक, धार्मिक, और सामाजिक ताकतों ने जिस तरह से लोगों को अराजक बनाया है, उसके चलते ऐसी तबाही आती रहेगी। लेकिन लाशों की गिनती कम होने पर या न होने पर जिस तरह की अराजकता देश में रोजाना कदम-कदम पर  खड़ी होती है, उसकी तो गिनती भी नहीं होती। यह तस्वीर किसी भी सभ्य देश में नहीं खप सकती, और हिन्दुस्तान में आस्था के नाम पर सब कुछ खप जाता है। 

स्कूली पढ़ाई के बाद बच्चों को एक बरस राहत की सोचें

13 जुलाई 2015
संपादकीय

इन दिनों चारों तरफ इम्तिहान और कॉलेजों में दाखिले की मारामारी चल रही है। कई नतीजे आ चुके हैं, बहुत से दाखिले हो चुके हैं, और हिन्दुस्तानी छात्र-छात्राएं अब भी सड़कों पर भटक रहे हैं। अच्छे कॉलेजों में दाखिला अच्छा-खासा मुश्किल काम है। और जो देश के सबसे अच्छे कॉलेज हैं, वहां पर दाखिला और भी मुश्किल। जो कॉलेज ऐसे हैं जहां नगद भुगतान करके सीट खरीदी जा सकती है, वहां पर साल के इन कुछ महीनों में खरबों का कारोबार हो जाता है, और एक-एक कॉलेज करोड़ों रूपए कमाने में कामयाब हो जाते हैं। 
लेकिन अपने आसपास के परिवारों और उनके बच्चों को देखकर दस-बीस बरस लगातार यह लगते आ रहा है कि कॉलेजों में दाखिला जिंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान बना लेने के पहले ये परिवार अपने बच्चों को दुनिया की एक झलक भी नहीं दिखा पाते। भारत के आम मां-बाप से लेकर खास तबके के अधिकतर लोगों तक भी बच्चों को मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, कानून, और सीए जैसी गिनी-चुनी पढ़ाई में डालकर खुश हो लेते हैं कि उनके बच्चे सही राह पर चले गए हैं। लेकिन दुनिया के विकसित देशों को देखें, तो भारत की इन लोकप्रिय आधा दर्जन डिग्रियों से परे सैकड़ों ऐसी पढ़ाईयां हैं, जो लोगों को दूर-दूर तक पहुंचाती है, और जहां लोग अपनी पसंद और अपने हुनर में खूबी हासिल करते हैं। 
हिन्दुस्तान में अधिकतर मां-बाप अपने बच्चों के हिस्से का यह फैसला खुद करते हैं कि उनको क्या पढऩा है। और चूंकि इम्तिहान की तैयारी से लेकर कॉलेज में लगने वाले भुगतान तक हर काम में मां-बाप की जरूरत है, इसलिए भी, और पारिवारिक सम्मान भी बनाए रखने के लिए अधिकतर बच्चे अपने मां-बाप की बात को मान भी लेते हैं। मान लेने के पीछे एक दूसरी वजह यह भी है कि उन्होंने खुद ने दुनिया को बहुत कम देखा है। स्कूल से बाहर निकलने तक अब वे इन आधा दर्जन पाठ्यक्रमों से परे वे दुनिया के बाकी रोजगार, कामकाज, और उसके लिए जरूरी या गैरजरूरी पढ़ाई या ट्रेनिंग के बारे में बहुत ही कम जान पाते हैं। नतीजा यह निकलता है कि इन बच्चों के सामने स्कूल से बाहर आने तक कुल आधा दर्जन सुरंगें रहती हैं जिनमें से किसी एक को छांटकर उसमें घुसने की आजादी उनको रहती है। 
आज होना यह चाहिए कि सरकार, समाज, और परिवार, इन सबकी तरफ से बच्चों को स्कूल के आखिरी बरसों में दुनिया के बारे में इतनी जानकारी देनी चाहिए कि उनके पास स्कूल के बाद क्या-क्या विकल्प हैं। आज मां-बाप अपने घरेलू कारोबार को देखकर यह तय करते हैं कि किस बच्चे को क्या पढ़ाना, क्या बनाना ठीक रहेगा। बहुत से मां-बाप अपनी खुद की स्कूल-कॉलेज के वक्त की अपूरित इच्छाओं को लेकर अपने बच्चों पर उनका टोकरा लाद देते हैं कि हम तो डॉक्टर बन नहीं पाए थे, हम चाहते हैं कि तुम डॉक्टर बनो। फिर आसपास के लोगों और समाज, अपने वर्ग और अपने परिवार के बाकी बच्चों को देखते हुए लोगों के मन में यह रहता है कि उनके बच्चे ऐसी पढ़ाई करें जिससे कुनबे का नाम भी रौशन हो। ऐसी सोच कम मां-बाप रखते हैं कि बच्चे ऐसे पढ़ाई करें जिससे उनके भीतर की प्रतिभा और निखरे, और उनकी रौशनी से दुनिया रौशन हो। मां-बाप की सोच अपने कुनबे के नाम को रौशन करने से परे नहीं जा पाती। इसलिए जिन बच्चों की दिलचस्पी गणित पढऩे में है, या कि संगीत सीखने में है, उन्हें डॉक्टरी में धकेल दिया जाता है, जो बच्चे अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ फोटोग्राफी करना चाहते हैं, उन्हें इंजीनियर बना दिया जाता है। ऐसा ही सिलसिला सभी तरह के बच्चों के साथ, कम से कम अधिकतर बच्चों के साथ तो चलता ही है। और जब वे पढ़ाई के बरस पूरे करके 20-25 बरस की उम्र पार कर लेते हैं, उनके पास पढ़ाई में गंवाने के लिए और बरस नहीं रहते हैं, तब उन्हें समझ आता है कि वे एक नापसंद विषय की पढ़ाई करते रहे हैं। 
यूरोप के विकसित देशों में जो जिम्मेदार समाज होता है, वहां पर बच्चों को स्कूल के बाद एक बरस का वक्त खाली गुजारने कहा जाता है, ताकि वे देश-दुनिया घूम सकें, देख सकें, और अब तक की पढ़ाई से परे बाकी दुनिया में अपने लिए मौजूद संभावनाओं पर सोच सकें। ऐसे एक बरस का योगदान किसी भी बच्चे की जिंदगी में किसी भी दूसरे बरस के मुकाबले अधिक हो सकता है। लेकिन हिन्दुस्तानी सोच ऐसे एक बरस को बर्बाद करना कहेगी, और यह मानकर चलेगी कि इसके बाद बच्चे बर्बाद ही हो जाएंगे। ऐसा देश कभी भी अपने लोगों की पूरी संभावनाओं को हासिल नहीं कर सकता। यह चर्चा हम इसलिए छेड़ रहे हैं कि कुछ लोग स्कूलों के बाद बच्चों को एक बरस देखने, समझने, और सोचने-विचारने के लिए देने का हौसला जुटा सकें।