सुषमा, वसुंधरा, और मोदी अनदेखी कब तक संभव?

23 जून 2015
संपादकीय
अभी कुछ समय पहले तक भारत के गृह सचिव रहे, और आज के भाजपा सांसद आरके सिंह ने ललित मोदी विवाद पर कहा है कि वह एक भगोड़ा है, और उसकी मदद करना जुर्म है। उन्होंने बड़े साफ-साफ शब्दों में कहा-मैं एक बार नहीं दस बार बोलूंगा की भगोड़े की मदद करना गलत है। 
देश के एक पूर्व गृह सचिव की तरफ से आया यह बयान बहुत मायने इसलिए रखता है कि यह देश के नियमों और ललित मोदी के कानूनी दर्जे को समझने वाले एक आदमी का बयान है, महज राजनीतिक बयानबाजी नहीं है। और इसके साथ ही भारतीय जनता पार्टी के भीतर के मतभेद और उभरकर सामने आए हैं। मोदी सरकार के भीतर मंत्रियों के बीच के मतभेद, और भाजपा के नेताओं के बीच के मतभेद अब सामने सतह पर हैं, और शिवसेना जैसी गठबंधन की साथी पार्टी ने भी कल खुलकर यह सवाल किया है कि लाल कृष्ण अडवानी ने आपातकाल की याद किस संदर्भ में की है, उनका इशारा किस तरफ है, यह साफ होना चाहिए। अडवानी ने न सिर्फ आपातकाल की चर्चा की, बल्कि किसी एक व्यक्ति की एकाधिकारवादी लीडरशिप के खतरे भी गिनाए। आज मोदीराज में अडवानी की जो स्थिति है, वह किसी से छुपी हुई नहीं है, और उनकी यह बात किसके लिए कही गई है, वह भी किसी से छुपा नहीं है। और भाजपा के भीतर नरेन्द्र मोदी से तिरछे-तिरछे चलने वाले लोगों में से दो लोग, सुषमा स्वराज, और वसुंधरा राजे आज अपने खुद के किए हुए को लेकर किस तरह की कानूनी परेशानी में हैं, यह बात आज पूर्व गृह सचिव के इस ताजा बयान से साफ है।
हम यह भी नहीं मानते कि लोकतंत्र में किसी देश में एक सरकार या एक पार्टी के भीतर मतभेद कभी पूरी तरह से खत्म हो सकते हैं। ऐसा होना ठीक भी नहीं है, और ये मतभेद ही संस्था के भीतर लोकतंत्र को कायम रखते हैं, और तानाशाही के खतरों को घटाते हैं। इसलिए आज मोदी की तरफ इशारा करने वाले पोस्टर अगर संजय जोशी के समर्थक लगाते हैं, या अडवानी आलोचना की बात करते हैं, तो उससे मोदी नाम का तूफान संभलकर कुछ देखने को मजबूर भी होता है। अब सवाल यह उठता है कि सुषमा और वसुंधरा ने ललित मोदी के लिए कानून से परे जाकर जो किया है, उसे देखते हुए नरेन्द्र मोदी किस तरह और कब तक इसे बर्दाश्त करेंगे, और बिना कार्रवाई के रखेंगे? उन्होंने विदेशों से कालाधन वापिस लाने की जो बातें कही थीं, वे ललित मोदी जैसे आर्थिक अपराधों के आरोपी की मदद के बाद खोखली साबित हो गई हैं। यह मदद प्रधानमंत्री ने खुद चाहे न की हो, उनकी विदेश मंत्री ने जिस तरह से पारिवारिक और निजी संबंधों के चलते सरकार की तरफ से यह असाधारण, पूरी तरह से नाजायज, और शायद जुर्म के दर्जे की यह मदद की है, वह अनदेखाी के लायक नहीं है। नरेन्द्र मोदी को आगे न सिर्फ चुनावी मोर्चो पर, संसद में भी जवाब देना होगा, और उन्हीं की पार्टी की इन दो महिलाओं ने उनको बेजवाब कर छोड़ा है। आने वाले दिनों में मोदी सरकार और भाजपा के भीतर की राजनीति किन लोगों को बाहर करती है, यह देखना दिलचस्प होगा।

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