व्यापम घोटाला, सीबीआई जांच इंसाफ का नफा, या नुकसान?

7 जुलाई 2015
संपादकीय

मध्यप्रदेश व्यापम घोटाले को लेकर लगातार सीबीआई जांच की मांग की जा रही थी, और अब कुछ मिनट पहले वहां के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने घोषणा की है कि वे हाईकोर्ट से अनुरोध करेंगे कि सीबीआई जांच करवाई जाए। अभी हाईकोर्ट एक विशेष जांच दल बनवाकर अपनी निगरानी में इसकी जांच करवा रहा था, और इससे जुड़े हुए दर्जनों लोग अब तक रहस्यमय तरीके से हत्या और आत्महत्या के शिकार हो चुके हैं। लेकिन यह समझने की जरूरत है कि सीबीआई जांच के फैसले से अब क्या होगा? अब तक राज्य की पुलिस की एक अदालत द्वारा छांटी गई टीम, अदालत द्वारा छांटे गए रिटायर्ड बड़े पुलिस अफसरों की निगरानी में यह जांच करवा रहे थे। इन रिटायर्ड अफसरों में छत्तीसगढ़ में काम कर चुके आईपीएस विजय रमन भी शामिल थे। अब अगर राज्य सरकार के अनुरोध पर हाईकोर्ट यह मामला सीबीआई को देती है, तो हो सकता है कि अदालत इसकी निगरानी बंद कर दे, और सीबीआई को स्वतंत्र रूप से जांच करने दे। अगर ऐसा होता है तो उसका क्या मतलब निकलेगा? अभी हम यह भी अंदाज नहीं लगा पा रहे हैं कि कांगे्रस के भीतर से व्यापम घोटाले की सीबीआई जांच की मांग पंजा छाप कांगे्रसी कर रहे थे, या कि कमल छाप कांगे्रसी।
अभी कल ही केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने व्यापम घोटाले पर शिवराज सिंह को अखबार के पन्ने के आकार की क्लीनचिट दी है। इसके बाद सीबीआई के समझने को अधिक कुछ नहीं बचता है। लोगों को यह भी याद होगा कि छत्तीसगढ़ में ही जग्गी हत्याकांड को लेकर सीबीआई के एक अफसर पर गवाहों को दबाने-धमकाने के आरोप लगे थे। छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने सीबीआई को प्रधानमंत्री का थाना कहा था। ऐसी कोई वजह नहीं है कि यूपीए के वक्त सीबीआई जैसे राजनीतिक दबाव में रहती रही होगी, आज दबाव उससे कुछ कम होगा। ऐसे में अदालत की निगरानी वाला विशेष जांच दल हो सकता है कि सीबीआई के मुकाबले अधिक निष्पक्षता और ईमानदारी से जांच कर रह हो। और हो सकता है कि सीबीआई इस मामले को केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा अगुवाई की सरकार के दबाव में कमजोर कर दे। अभी पिछले एक पखवाड़े से कई ऐसी खबरें आ चुकी हैं कि केंद्र के मातहत काम करने वाले एनआईए लगातार हिंदू-आतंक वाले मामलों को अदालत में कमजोर करने में लगी हुई है।
हमने काफी पहले एक सुझाव दिया था कि जिस तरह चुनाव आयोग या सीएजी को सरकार के काबू से बाहर का एक संवैधानिक दर्जा दिया गया है, उसी तरह एक राष्ट्रीय जांच संगठन ऐसा बनना चाहिए जो कि सत्ता से जुड़े हुए राज्य और केंद्र के भ्रष्टाचार के बड़े मामलों की जांच खुद होकर शुरू कर दे। जिस तरह आज लोकायुक्त कई मामलों को खुद होकर उठा सकते हैं, उसी तरह एक राष्ट्रीय जांच संगठन खुद होकर या लोगों के भेजे हुए मामलों में से कुछ किस्म के मामलों की जांच शुरू करे। और इसमें काम करने के लिए देश भर के अलग-अलग प्रदेशों से आए हुए पुलिस अफसर छांटे जाएं, जो कि किसी एक पार्टी या सरकार के दबाव से परे रहें। यह संस्था सीबीआई की तरह केंद्र सरकार का थाना न रहे, बल्कि चुनाव आयोग की तरह स्वतंत्र काम करे।
ऐसा जरूरी इसलिए हो गया है कि भारतीय लोकतंत्र में ऊंची सत्ता से जुड़े हुए भ्रष्टाचार और बाकी किस्म के जुर्म इतने अधिक हो गए हैं कि बरसों तक मामले मुकदमा चलाने की इजाजत में लटके रहते हैं, और उसके बाद बरसों तक राज्य और केंद्र की जांच एजेंसियों के बीच, एक अदालत से दूसरी अदालत तक घूमते रहते हैं। ऐसे में एक संवैधानिक जांच एजेंसी इतनी बड़ी, और ताकतवर रहनी चाहिए कि वह देश-प्रदेश की सत्ता से जुड़े मामलों को एक निर्णायक अंत तक पहुंचा सके। भ्रष्टाचार के मामलों को नेताओं के मातहत चलने वाली सरकारों के मातहत चलने वाली जांच एजेंसियों के भरोसे छोडऩे का मतलब नहीं है। ऐसे जांच पांच-दस फीसदी नतीजे भी नहीं दे पाएगी। इसलिए देश को एक अलग जांच-संगठन चाहिए ही चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें