लोकतंत्र में संसदीय सदन का विकल्प नहीं, गंभीर काम हो

संपादकीय
24 जुलाई 2015

संसद और छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश जैसी विधानसभाओं के सत्र एक-एक मुद्दे को लेकर खत्म होते दिख रहे हैं। संसद में जैसी कि आशंका थी, सुषमा स्वराज के मामले पर कांग्रेस ऐसी अड़ी हुई है कि वह इस्तीफे से कम पर तैयार नहीं दिख रही, दूसरी तरफ मध्यप्रदेश विधानसभा में व्यापम का मुद्दा है ही, और छत्तीसगढ़ में नान का मुद्दा है, और आज इस वक्त अविश्वास प्रस्ताव पर बहस चल रही है। इन तीनों ही सदनों में सरकार के कुछ ऐसे काम होंगे जिन पर विपक्ष को पैनी और बारीक बहस करनी थी, लेकिन आज भ्रष्टाचार और सरकारी अपराध के मुद्दों पर सत्र खत्म होते दिख रहा है। संसद से विधानसभाओं तक जहां भी किसी विधेयक या संशोधन का मामला होगा, वह या तो टल जाएगा, या फिर हड़बड़ी में बिना किसी विचार-विमर्श के, महज बहुमत या ध्वनिमत से पारित कर दिया जाएगा। नतीजा यह होगा कि ऐसे संशोधन या नए कानून जब लागू होंगे, तब जाकर उनकी खामियां और कमियां सामने आएंगी। 
भारतीय राजनीति में केन्द्र से लेकर राज्य तक कांग्रेस और भाजपा के बीच सांप-नेवले जैसे संबंध हो गए हैं। जब केन्द्र में यूपीए की सरकार थी, तो प्रमुख विपक्षी दल की हैसियत से भाजपा ने यही काम किया था, और अधिक बरस नहीं हुए हैं, जब सुषमा स्वराज ने यह सार्वजनिक बयान दिया था कि अगर सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनेंगी, तो वे सिर मुंडा लेंगी। ऐसी नफरत के जवाब में आज कांग्रेस अगर सुषमा के इस्तीफे पर अड़ी हुई है, कि देश के एक भगोड़े को मदद करने वाली सुषमा को इस्तीफा देना चाहिए, तो इसे कांग्रेस की ज्यादती भी नहीं कहा जा सकता। सोनिया गांधी से इतनी व्यक्तिगत नफरत उजागर करके सुषमा स्वराज ने लोकतंत्र के लिए भी हिकारत दिखाई थी, और भारत के संविधान के लिए भी। और आज सुषमा और उनकी पार्टी की सरकार को यह चाहिए कि अगर वे सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने के खिलाफ थीं, तो उनको संविधान संशोधन पेश करके विदेशी मूल के लोगों को प्रधानमंत्री पद से रोकने का कानून बनाना चाहिए। 
दरअसल राजनीति में आंख फोडऩे का जवाब आंख फोडऩे से दिया जाता है, और नफरत का जवाब नफरत से। इसलिए आज अगर सुषमा स्वराज के मुद्दे पर संसद चल नहीं पा रही है, तो इसके पीछे सुषमा की वह नफरत भरी बात भी है, और ललित मोदी के मुद्दे पर उनका कानून-विरोधी आचरण भी है। सुषमा स्वराज ने जो किया है वह इस्तीफे से कम के लायक नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शायद सुषमा की अधिक फजीहत का मौका खड़ा कर रहे हैं। ऐसे विवादों पर पहले बहुत से इस्तीफे होते आए हैं। लेकिन हमारा मकसद आज यहां इस मुद्दे पर चर्चा नहीं है, बल्कि यह बात करना है कि संसद और विधानसभाओं को विरोध और प्रदर्शन का मंच बनाना कितना गलत है, और उससे लोकतंत्र का कितना दीर्घकालीन नुकसान हो रहा है। विरोध करने वाले लोग चाहे वे कल भाजपा वाले रहे हों, और आज चाहे वे कांग्रेस वाले हों, वे इस बात को अनदेखा कर रहे हैं कि इस देश में विरोध-प्रदर्शन के मौके तो बहुत से हो सकते हैं, और जगहों के विकल्प भी हो सकते हैं, लेकिन संसद और विधानसभाओं के कोई विकल्प नहीं हैं। और संसदीय सदन सबसे अधिक तो विपक्ष के ही काम के रहते हैं, क्योंकि वहां पर ही विपक्ष सरकार को घेर सकता है। इस मौके को खोकर विपक्ष जब सिर्फ प्रदर्शन या विरोध पर अड़े रहता है, तो वह जनता से जुड़े हुए बहुत से मुद्दों को उठाने का मौका भी खो बैठता है। हमारा अनुभव यह रहा है कि संसद हो या विधानसभा, केन्द्र और राज्य सरकारों के लिए यह बात सबसे सहूलियत की होती है कि सत्र का बहुत सा वक्त विरोध में खत्म हो जाए, और सख्त सवालों का सामना ही न करना पड़े। बहुत से सवालों को मौका नहीं मिलता, और अधिकतर सवालों के लिखित जवाब पर बात खत्म हो जाती है। ऐसी भी संभावना है कि संसद और विधानसभाओं के सत्र वक्त के पहले खत्म कर दिए जाएं। यह भी लोकतंत्र का बड़ा नुकसान होगा। 
हमारा तो यह मानना है कि विपक्ष को सदन के एक-एक मिनट का बहुत ही पैना इस्तेमाल करना चाहिए, और सरकार को घेरकर उससे जवाब-तलब करना चाहिए। विरोध करने का तरीका तो यह होना चाहिए कि रोज अधिक से अधिक समय तक सत्र को चलाया जाए, अधिक से अधिक बहस की जाए, मुद्दे उठाए जाएं, और सत्र के दिन घटाने का विरोध किया जाए। जिस तरह जापानी कारखानों में कर्मचारी विरोध करने के लिए जरूरत से अधिक उत्पादन करके मैनेजमेंट के लिए दिक्कत खड़ी कर देते हैं, उसी तरह भारत की संसदीय व्यवस्था में विपक्ष को सत्र को अधिक से अधिक लंबा करवाकर, उसके मिनट-मिनट का जनहित में इस्तेमाल करना चाहिए। अपने संसदीय विशेषाधिकार को सिर्फ नारों और बहिर्गमन में खर्च करके विपक्ष सिर्फ जनता के प्रति अपनी जवाबदेही का नुकसान करता है। सत्ता में कोई भी पार्टी हो, विपक्ष में कोई भी हो, सदन का इस्तेमाल कड़ाई से संसदीय काम के लिए होना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में संसदीय-सदन का कोई विकल्प नहीं है।

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