मप्र व्यापम घोटाले में चलता मौतों का भयानक सिलसिला

संपादकीय
5 जुलाई 2015

मध्यप्रदेश में सरकारी रोजगार के एक बड़े घोटाले में आए दिन जिस तरह से उससे जुड़े हुए आरोपी, गवाह, या उसके शिकार लगातार मर रहे हैं, वह एक भयानक नौबत है। कल इसी मामले की रिपोर्टिंग करने के लिए दिल्ली से मध्यप्रदेश आए हुए एक प्रमुख समाचार टीवी चैनल के नौजवान रिपोर्टर की मौत हो गई, और उधर दिल्ली में एक होटल में ठहरे हुए मध्यप्रदेश के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज के डीन की भी मौत दरवाजा खोलने पर पता लगी। ये डीन भी व्यापम नाम से चर्चित इस घोटाले की जांच से जुड़े हुए थे। अब तक दो-चार दर्जन लोगों की मौत संदिग्ध हालत में हुई है, और जिस तरह कल की तारीख में दो मौतें अलग-अलग जगहों पर हुई हैं, वैसी ही मौतें पिछले महीने भी एक ही दिन, एक ही वक्त दो अलग-अलग शहरों में इस मामले से जुड़े दो लोगों की हुई थी। इससे जुड़ी एक दूसरी बात यह है कि हाईकोर्ट की निगरानी में एक विशेष जांच दल प्रदेश के इस सबसे व्यापक भ्रष्टाचार-जुर्म की जांच कर रहा है, और कल ही उसके एक अफसर ने कहा है कि मध्यप्रदेश के राज्यपाल के पद से हटते ही इस मामले में उनको गिरफ्तार किया जाएगा। आज राज्यपाल के पद की संवैधानिक रियायतों के चलते राज्यपाल गिरफ्तारी से लुका-छिपी का खेल खेल रहे हैं, और इसी मामले में अभियुक्त बनाए गए उनके बेटे की कुछ हफ्ते पहले संदिग्ध हालत में घर पर ही मौत हुई थी। 
यह पूरा सिलसिला स्वाभाविक नहीं है। ऐसा हो नहीं सकता कि सत्ता से जुड़े हुए बड़े-बड़े दिग्गज जहां पर सरकारी नौकरियां बेचने के धंधे में लगे हुए हों, वहां पर दर्जनों लोग एक के बाद एक मारे जाएं, न आरोपी बचें, न गवाह बचें। और यह सब भी तब हो रहा है जब भोपाल गैस त्रासदी के बाद सबसे अधिक सुर्खियां बटोरने वाला मध्यप्रदेश का यह मामला सत्ता के हर तबके पर कालिख पोतने वाला हो चुका है, और हाईकोर्ट अपनी निगरानी में, अपने पसंद के रिटायर्ड पुलिस अफसर ढूंढकर, उनके निर्देश पर जांच करवा रहा है। यह राज्य सरकार के लिए एक बड़ी शर्मनाक बात है कि आज जब एक-एक सरकारी नौकरी के लिए दसियों हजार बेरोजगार लड़के-लड़कियां अर्जी देते हैं, तब इन नौकरियों को इस तरह खुले में नीलाम करने का एक संगठित अपराध बरसों से चलते रहा, इसमें गिरफ्तार होकर जेल पहुंचे, बड़े-बड़े अफसर गिरफ्तार होकर जेल पहुंचे, राजभवन इस जुर्म में शामिल पाया गया, और राज्यपाल का बेटा फरारी की हालत में एक अभियुक्त का दर्जा पाकर संदिग्ध मौत का शिकार हुआ। राज्यपाल खुद जिस तरह अपनी संवैधानिक रियायतों को इस्तेमाल एक जुर्म की सजा से बचने के लिए, अदालती कटघरे में पहुंचने से बचने के लिए कर रहे हैं, वह एकदम ही शर्मनाक बात है, और इसी एक बात को लेकर हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट ऐसे संवैधानिक संशोधन की सिफारिश करे कि अभियुक्त राज्यपाल को संवैधानिक छूट हासिल न हो। 
यह मौका बाकी तमाम जांच का तो है ही, राज्यपाल को तुरंत ही बर्खास्त किया जाना चाहिए, और गिरफ्तार करके एक आम अभियुक्त की तरह कटघरे में खड़ा करना चाहिए। यह इस देश के खास कहे जाने वाले लोगों की बेशर्मी है कि वे जेल जाने की नौबत आने पर भी पुलिस से सलामी लेते, राष्ट्रगान बजवाते, राजभवनों पर कायम रहते हैं, और अपने आपको जनता की नजरों में मुजरिम के साथ-साथ बेशर्म भी साबित करते हैं। लोकतंत्र में ऐसे किसी रियायत की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए कि खास कुर्सियों पर बैठे लोग आम मुजरिमों जैसे जुर्म करें, और उन पर मुकदमा भी न चल सके। यह जुर्म मामूली जुर्म नहीं है, सैकड़ों और हजारों नौकरियों को बेच खाने का जुर्म है, और इसमें सजा एक मिसाल बननी चाहिए। मध्यप्रदेश को ऐसे राज्यपाल के खिलाफ एक बड़ा जन आंंदोलन करना चाहिए, और ऐसे राज्यपाल का सार्वजनिक और सामाजिक बहिष्कार भी करना चाहिए। विधानसभा में विपक्ष के सदस्यों को चाहिए कि ऐसे राज्यपाल के साथ एक छत के नीचे न रहें। 
अब यह हाईकोर्ट को देखना है कि इस मामले की सुनवाई इस रफ्तार से हो जाए कि कुछ अभियुक्त सजा पाने तक जिंदा रह पाएं, कुछ गवाह आखिर तक गवाही देने के लिए बच जाएं। असामयिक और अस्वाभाविक मौतों की रफ्तार तो ऐसी है कि अदालत में फैसले के दिन शायद जज अकेला बचे। 

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