व्यापम पर चर्चा के मौके पर लोकतंत्र में निराशा की बात

संपादकीय
9 जुलाई 2015

बरसों से खबरों और अदालतों में चले आ रहे मध्यप्रदेश के व्यापम घोटाले पर आज एक बड़ा फैसला हुआ जब सुप्रीम कोर्ट ने घोटाले और इससे जुड़े हुए मौतों के तमाम मामलों की जांच सीबीआई को दे दी। इससे अदालतों के बाहर बरसों से चली आ रही राजनीतिक बहस भी कुछ समय के लिए थमेगी, और देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी के सिर पर एक और बहुत बड़ा बोझ आज से आ गया है। लेकिन इस जांच का नतीजा चाहे जो निकले, इस मौके पर कई सवाल दुबारा उठाने की जरूरत है। 
व्यापम का पूरा घोटाला सरकारी नौकरियां दिलवाने में रिश्वतखोरी और रिश्वत लेकर निजी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले करवाने जैसे मामलों का रहा है। इसमें हजारों नौकरियां और हजारों दाखिले हुए, और मध्यप्रदेश के राजभवन में राज्यपाल के बेटे पर रिश्वत लेने का आरोप लगा, और दर्जनों मौतें हुईं, जिनमें इस बेटे की मौत शामिल है। लेकिन एक बुनियादी सवाल यह है कि जब सरकारी बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोग, संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोग ऐसे संगठित और व्यापक भ्रष्टाचार मेंं लगे हुए रहें, तो लोकतंत्र कहां जाएगा? अदालतें तो मुजरिमों से जूझने के लिए बनी हैं, अब अगर अदालतों को इसी से जूझना पड़ेगा कि सरकार में बैठे लोग कैसे भ्रष्टाचार करते हैं, और उसकी जांच अदालतों को अपनी निगरानी में करवानी पड़े, तो यह मध्यप्रदेश का व्यापम घोटाला हो, या छत्तीसगढ़ का नान घोटाला, क्या जांच एजेंसियां और अदालतें इसीलिए बनी हैं कि वे सरकार के भ्रष्टाचार की जांच और उस पर मुकदमे में ही अपना दम तोड़ दें? लोकतंत्र की यह नौबत बहुत भयानक है जब इस देश की अदालतों में सबसे बड़े मुजरिम सत्ता के सबसे ताकतवर लोग की हैं, और जांच एजेंसियों पर इन्हीं मुजरिमों का इतना दबाव है कि अदालतों को अपनी निगरानी में जांच करवानी पड़ रही है। 
यह पूरा सिलसिला लोकतंत्र को इसलिए तबाह कर रहा है कि संसद और सरकार से यह उम्मीद नहीं की जाती है कि वे दोनों अदालत पर अपने कुकर्मों का बोझ बढ़ाती जाएं। संसद में लोग सवाल पूछने के लिए पैसे मांगें, रिश्वत लें, और वोट देने के लिए नोट लें, और फिर संसदीय विशेषाधिकार की आड़ में छुपकर अदालतों से लुकाछिपी खेलें, तो फिर लोकतंत्र में बच ही क्या गया? इसी तरह जब राजभवन संगठित रिश्वतखोरी में लग जाए, और राज्यपाल आरोपियों की फेहरिस्त में दस नंबरी आरोपी रहें, और इस पर भी वे राजभवन के सिंहासन के पीछे छुपने को अपना विशेषाधिकार मानें, तो ऐसे राज्यपाल को शर्म से डूब मरना चाहिए, वे मध्यप्रदेश व्यापम घोटाले की शायद 50वीं मौत हो सकते हैं। सरकार के मंत्री जेल पहुंच चुके हैं, बड़े-बड़े अफसर जेल पहुंच चुके हैं, उमा भारती जैसी केन्द्रीय मंत्री की सिफारिशों की लिस्ट तैर रही है, और उमा भारती मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पर तिरछा वार करते घूम रही हैं, तो यह राजनीति के पतन की एक नई गहराई है। 
हम यहां अपनी एक पुरानी सिफारिश फिर दुहराना चाहेंगे कि भारतीय दंड संहिता में फेरबदल करके यह इंतजाम करना चाहिए कि किसी जुर्म के लिए सजा जुर्म की गंभीरता से तो तय हो ही, इससे भी तय हो कि उसे करने वाला व्यक्ति कितने बड़े ओहदे पर बैठा हुआ है। अगर कोई पटवारी दो लाख की रिश्वत पर चार साल की कैद पाए, तो उतनी ही रिश्वत पर एक मंत्री को दस बरस की कैद होनी चाहिए, और राज्यपाल को उम्रकैद होनी चाहिए, बिना किसी रियायत वाली। जब तक ताकतवर कुर्सियों पर बैठे मुजरिमों के लिए अधिक कड़ी और खास सजा का इंतजाम नहीं होगा, तब तक भारतीय लोकतंत्र में खास दर्जा पाए हुए लोग अपनी सरकारी, संसदीय, या अदालती, संवैधानिक ताकत का बेजा इस्तेमाल करके जुर्म बढ़ाते चलेंगे, और जांच एजेंसियां दम तोड़ती जाएंगी।
 पूरे देश में आज सत्ता की ताकत से जुर्म करने का सिलसिला जिस तरह बढ़ा हुआ है, उससे लोगों के मन में लोकतंत्र के लिए आस्था खत्म हो चुकी है। आम जनता के मन की हिकारत कहीं मवालियों के लिए हिमायत बनकर सामने आती है, तो कहीं नक्सलियों के लिए। आज देश के अधिकतर आम लोगों का यह मानना है कि इस लोकतंत्र में आम नागरिकों को कोई इंसाफ नहीं मिल सकता। और यही निराशा, यही हताशा लोगों के बीच नक्सलियों को पैर जमाने में मदद करती है। लोग अब बात-बात में यह कहते हैं कि इससे तो अंग्रेजों का जमाना बेहतर था, या लोग यह भी कहते हैं कि नक्सली जंगलों से निकलकर आकर, राजधानियों में ऐसे भ्रष्ट लोगों को निपटाकर क्यों नहीं जाते? यह सोच लोकतांत्रिक सोच से हिंसा की तरफ बेबसी में बढ़ती हुई सोच है। आज ताकत की जगहों पर बैठे हुए लोगों को यह सोचना है कि जिस दिन नक्सली जैसे लोग शहरों में भी होने लगे, राजधानियों में भी होने लगे, उस दिन हिन्दी फिल्मों में सत्ता के खिलाफ होती हिंसा भारत में सचमुच ही सड़कों पर देखने मिलने लगेगी। 

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