मौजूदा ट्रैफिक नियम तो लागू नहीं और कड़े करने की तैयारी बेमतलब, मोदी को राज्यों में कोई सुनेगा?

27 जुलाई 2015
संपादकीय

भारत में सड़क दुर्घटना में मौतों के आंकड़े दुनिया में सबसे अधिक हैं, महज गिनती में नहीं, बल्कि आबादी के अनुपात में भी सड़कों पर भारत में सबसे ज्यादा मौतें होती हैं। कल प्रधानमंत्री मोदी ने रेडियो पर प्रसारित अपने मन की बात में सड़क हादसों को लेकर फिक्र जाहिर की और कहा कि किस तरह हर मिनट भारत की सड़क पर हर चार मिनट में एक मौत हो रही है, और मरने वाले लोगों में 15 से 25 बरस उम्र के नौजवान लड़के सबसे अधिक हैं। उन्होंने दुपहिया या चारपहिया चलाने वाले लोगों के सुरक्षा नियमों पर जोर देने की अपील परिवार के लोगों से भी की है। उन्होंने यह भी कहा कि कड़े सुरक्षा नियमों के साथ नया सड़क कानून लाने की तैयारी चल रही है। और इसके साथ-साथ वे कुछ प्रमुख सड़कों के लिए एक ऐसे बिना नगद भुगतान दुर्घटना-इलाज की योजना लाने वाले हैं कि घायलों को तुरंत मदद मिल सके। 
मोदी की इन बातों को लेकर हम छत्तीसगढ़ जैसे राज्य की सरकार को याद दिलाना चाहते हैं कि हेलमेट और कारों के लिए सीट बेल्ट के नियम तो आज भी लागू हैं, और आज भी इनको न मानने वालों पर जुर्माने का इंतजाम है। और जब आज इन्हीं नियमों को सरकार लागू कराने में कोई दिलचस्पी नहीं ले रही है, हर कुछ घंटों में छत्तीसगढ़ की सड़कों पर दुर्घटना-मौत हो रही है, तो फिर और अधिक कड़े नियम आ जाने से क्या फर्क पड़ेगा? सरकारें नियम-कानून को अधिक कड़ा बनाकर खुश हो लेती हैं कि उन्होंने कड़ी सजा या बड़े जुर्माने का इंतजाम कर दिया है, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अमल न होने वाले कड़े कानून के मुकाबले अमल में आने वाले मामूली कानून का असर अधिक होता है। मोदी की कही बात, और उनकी जाहिर की गई फिक्र बेमतलब है अगर भारत के राज्य मौजूदा या आने वाले ट्रैफिक नियमों को लागू न करें। भारत के संघीय ढांचे में ट्रैफिक नियम लागू करना राज्य सरकारों का काम है, और प्रधानमंत्री एक मसीहाई अंदाज में नसीहत तो दे सकते हैं, सड़क किनारे खड़े होकर चालान सिर्फ दिल्ली में काट सकते हैं, जहां पर कि पुलिस उनके मातहत है। 
हम छत्तीसगढ़ के संदर्भ में बार-बार इस बात को लिखते आए हैं कि यहां पर एम्बुलेंस के इंतजाम में जितना जोर लगाया गया है, उसके साथ-साथ अगर हेलमेट और सीट बेल्ट के नियम कड़ाई से लागू करने में उतना ही जोर लगाया जाता, तो एम्बुलेंस की जरूरत भी कम पड़ती, और हर बरस सैकड़ों या हजारों ऐसी जिंदगियां बचतीं, जो कि आनन-फानन पहुंचने वाली एम्बुलेंस भी नहीं बचा पातीं। इस राज्य में मुख्यमंत्री खुद सड़क पर हेलमेट लगाकर दुपहिया चला चुके हैं, लेकिन पुलिस किसी मौसमी बुखार की तरह कभी-कभी नियम लागू करने में गर्मी दिखाती हैं, और बाकी वक्त उसका उत्साह खत्म हो जाता है। सरकारों का, बीमा कंपनियों का, और लोगों का खुद का, इतना बड़ा खर्च दुर्घटना के बाद के इलाज में होता है कि उसकी गिनती मुश्किल है। और यह इलाज भी उन्हीं लोगों का हो पाता है जो कि हादसों में सड़क पर ही मर नहीं जाते। बहुत से बचे हुए लोग जिंदगी भर के लिए टूटे-फूटे बदन को लेकर अपनी जिंदगी को कोसते रह जाते हैं, और उनकी गिनती दुर्घटना-मौतों में भी नहीं होती। 
राज्य सरकारों को यह चाहिए कि ट्रैफिक के नियमों को कड़ाई से लागू करे, जनता तो सरकारी कड़ाई के बिना अपनी पूरी गैरजिम्मेदारी का मजा लेते चलती है, और उसे जिम्मेदार बनाना सरकार की एक बुनियादी जिम्मेदारी है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पिछले बरस जब हेलमेट को लेकर कड़ाई हुई, तो कम से कम आधे सिरों पर हेलमेट दिखने लगे थे। वह कड़ाई खत्म हुई तो लोगों को लगा कि सिर पर से खतरा खत्म हो गया है, और नियम सरकार के खुद के सिर को बचाने के लिए है। हमने राजस्थान की राजधानी जयपुर में देखा हुआ है कि किस तरह घूंघट और घाघरे वाली महिलाएं भी दुपहिये के पीछे बैठने पर हेलमेट लगाती ही हैं। 
हमारा यह मानना है कि जनकल्याणकारी लोकतंत्र में जितनी जिम्मेदारी लोगों की अपने सिरों को बचाने की है, उतनी ही जिम्मेदारी सरकार की भी है कि वह अपनी जिम्मेदारी के सिर पर हेलमेट लगाकर उस जिम्मेदारी को बचाए, और उसका इस्तेमाल करे। हेलमेट और सीट बेल्ट किसी भी सभ्य और जागरूक समाज की अपनी जिम्मेदारी भी होना चाहिए, और उससे बचने की कोशिश करने वालों को सार्वजनिक सड़कों पर रहने का कोई हक नहीं है। सरकार को इन नियमों को सौ फीसदी कड़ाई से लागू करना चाहिए, और आगे जाकर जनता इस बात के लिए सरकार की वाहवाही ही करेगी। इसके पहले कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सड़क के नियम-कानून और अधिक कड़े करें, राज्य सरकारों को मौजूदा कानूनों को कड़ाई, गंभीरता, और ईमानदारी से लागू करना चाहिए, वरना दिल्ली के मसीहा की नसीहत अनसुनी करने की तोहमत राज्य सरकारों पर लगना तय है। 

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