जख्मी और दुखी परिवार से हेमा के गैरजरूरी तर्क

संपादकीय
8 जुलाई 2015

हेमामालिनी ने सड़क हादसे के जख्मों से उबरते ही जो पहला बयान दिया है उसमें हादसे में मारी गई बच्ची के जख्मी पिता को लेकर कहा है कि उनकी गाड़ी सड़क पर ट्रैफिक नियमों के खिलाफ चल रही थी और अगर नियम माने गए होते, तो यह हादसा नहीं होता। इसके पहले राजस्थान के इस सड़क हादसे के बाद से हेमामालिनी इस बात को लेकर लगातार आलोचना की शिकार हो रही हैं कि सड़क दुर्घटना में जख्मों के बाद वे दूसरी कार में बैठकर जयपुर के बड़े निजी अस्पताल चली गईं, जहां उनका इलाज-ऑपरेशन हुआ, लेकिन उन्होंने छोटी सी कार में सवार बच्ची के जख्मी होने पर भी उसे अस्पताल ले जाना जरूरी नहीं समझा, और उसे काफी देर बाद किसी दूसरी गाड़ी से सरकारी अस्पताल ले जाया गया, और उसकी मौत हो गई। 
एक बड़ी गाड़ी और एक छोटी गाड़ी के बीच हुई टक्कर में स्वाभाविक सहानुभूति छोटी गाड़ी की तरफ रहती है। एक बड़ी फिल्मी अभिनेत्री, और भाजपा की सांसद की कार से जब एक आम परिवार की टक्कर होती है, तो स्वाभाविक सहानुभूति आम परिवार के साथ होती है। और ऐसा सिर्फ हादसों में ही नहीं होता, खेल के मुकाबलों में भी होता है कि गरीब देश की टीम, कमजोर टीम, अधिक सहानुभूति और समर्थन पाती है। इस बात पर लंबी बहस हो सकती है कि हेमामालिनी को उस जख्मी बच्ची को भी साथ अस्पताल ले जाना था। लेकिन उनकी जो तस्वीरें मीडिया में आई हैं, नाक टूटी हुई, चेहरे और माथे पर जख्म, खून बहता हुआ, और वैसी हालत में अगर उनको किसी दूसरी कार में अस्पताल ले जाया जा रहा है, तो हो सकता है कि उन्हें उतना होश और उतनी समझ बाकी हों कि वे दूसरे जख्मियों की तरफ देख पातीं। लेकिन यह भी हो सकता है कि वैसी हालत में वे कुछ और सोचने के लायक न बची हों, और अपने खुद के अस्पताल पहुंचने की ही बात उन्हें सूझी हो। इसलिए वैसी नौबत में एक जख्मी महिला पर कोई तोहमत लगाने के बजाय हम उसे संदेह का लाभ देना बेहतर समझेंगे, कि अपने खुद के लहू के बाद उनकी सोचने की ताकत कम पड़ गई होगी। अब यह भी समझने की जरूरत है कि छोटी गाड़ी के लोगों को भी ट्रैफिक के नियम का ध्यान रखना चाहिए, और छोटी गाड़ी की वजह से वे किसी रियायत के हकदार नहीं बन पाते। हम इस एक मामले को लेकर यह बात नहीं कह रहे हैं, क्योंकि इसमें जांच अभी बाकी है, और हम खासे दूर बैठे हुए हैं। लेकिन हम सतह पर तैरती जानकारी को देखकर यह कह रहे हैं। सड़कों पर ट्रैफिक इतना तेज रफ्तार हो चुका है कि जो लोग जरा सी चूक करते हैं, वे बहुत सा लहू गंवा बैठते हैं, और कई बार जान भी गंवा देते हैं। 
लेकिन जो बात हेमामालिनी ने कही है, क्या उस बात को कहे बिना भी काम चल सकता था? जिस परिवार ने बच्ची खोई है, और बाकी परिवार ने जख्म पाए हैं, उनके साथ किसी तरह की बहस या वाद-विवाद से कोई अच्छी तस्वीर नहीं बनती। और अब बहस के लिए यह मान भी लें कि मरने वाली बच्ची के परिवार ने सड़क पर कोई चूक की थी, जिसकी वजह से यह टक्कर हुई, तो भी उसके सवालों का, उसके आरोपों का जवाब न देकर हेमामालिनी शायद अधिक बड़ी बनतीं, इस जवाब के बाद अब उनकी तस्वीर कुछ और खराब हुई है। लोगों को यह समझना चाहिए कि दूसरे इंसानों की जिंदगी में कई मौके ऐसे नाजुक होते हैं कि उस वक्त उनके साथ नरमी से पेश आना चाहिए। जो बात हेमामालिनी ने कही है, वह अगर सच भी है तो यह बात किसी और के मुंह से कही जा सकती थी, और यह तस्वीर पेश की जा सकती थी कि किस तरह हेमामालिनी की कार गलती पर नहीं थी। लेकिन जुबानी जमाखर्च से बहुत से लोग बच नहीं पाते हैं। जब कोई तकलीफ से गुजरते रहते हैं तब भी उनके साथ एक निहायत गैरजरूरी बहस में पडऩा संवेदनहीनता का नमूना है। लोगों को जख्मी लोगों से गैरजरूरी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए, और जिस परिवार ने एक मासूम बच्ची खोई है, उससे तो बिल्कुल भी नहीं। 

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