दामाद, कोई कांग्रेस का, तो कोई भाजपा का भी...

संपादकीय
18 जुलाई 2015
केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली के गुजर चुके ससुर की जन्म शताब्दी के मौके पर जम्मू में हुए एक स्मृति-समारोह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस बात की चर्चा की, कि स्व. गिरधारी लाल डोगरा ने अपने जीते जी कभी अपने दामाद (जेटली) को आगे नहीं बढ़ाया, और जेटली अपने दम पर आगे बढ़े। इसके बाद मोदी ने कुछ हल्के अंदाज में कहा कि आजकल दामाद कैसे-कैसे काम करते हैं। उनकी इस बात को कांग्रेस पार्टी ने अपने दामाद रॉबर्ट वाड्रा से जोड़कर लिया, और मोदी पर जवाबी हमले किए। मोदी के साथ-साथ कांग्रेस ने अटल बिहारी वाजपेयी के दत्तक-दामाद रंजन भट्टाचार्य पर भी हमले किए, जिनका नाम अटलजी के प्रधानमंत्री रहते हुए कई किस्म के सौदों के सिलसिले में लिया जाता था, और जो प्रधानमंत्री के अधिकृत परिवार का दर्जा प्राप्त करके देश-विदेश में उनके साथ साये की तरह रहा करते थे। 
अब अगर यह भी मान लिया जाए कि मोदी का हमला सिर्फ रॉबर्ट वाड्रा पर नहीं था, और रंजन भट्टाचार्य पर भी था, तो भी उसमें कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए। गुजरात दंगों के बाद मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुए, प्रधानमंत्री की हैसियत से अटल बिहारी वाजपेयी ने चाहे दबी-छुपी जुबान से ही सही, मोदी को राजधर्म की याद दिलाई थी। वे मोदी को हटाने की ताकत, या हौसला, जुटा नहीं पाए थे, लेकिन उनकी तकलीफ कई लोगों ने बाद में इधर-उधर लिखी थी। इसलिए अगर कांग्रेस के दामाद के साथ-साथ भाजपा के इस चर्चित दत्तक-दामाद की याद भी अगर लोगों को आ जाए, तो भी उसमें मोदी का कोई निजी नुकसान नहीं है। मोदी अपने परिवार से परे और दूर हैं, न उनकी कोई दत्तक-पुत्री है, न कोई दत्तक-दामाद, और न ही मोदी पर कोई परिवारवाद की तोहमत लगा सकते हैं। साथ-साथ यह भी याद रखने की जरूरत है कि भाजपा के भीतर साल भर पहले तक जो मोदी की सबसे ताकतवर प्रतिद्वंदी मानी जाती थीं, वे सुषमा स्वराज भी आज अपने पति और पुत्री के ललित मोदी से पेशेवर रिश्तों, और उसके बाद भारत सरकार की तरफ से इस भगोड़े पर मेहरबानी की तोहमत झेल रही हैं, और यह नौबत मोदी के लिए किसी निजी परेशानी की नहीं है। फिर यह भी याद रखने की जरूरत है कि राजस्थान की भाजपा-मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जिस तरह ललित मोदी की कंपनी से अपने बेटे की कंपनी के लिए करोड़ों की रियायत पाने के आरोप झेल रही हैं, वह नौबत भी मोदी के लिए बुरी नहीं है, क्योंकि जब मोदी प्रधानमंत्री बन रहे थे, तो वसुंधरा के तीखे तेवर सामने आए थे, क्योंकि उनके बेटे को मंत्री नहीं बनाया गया था, और राजस्थान से जिसे मंत्री बनाया गया था, वसुंधरा उसके खिलाफ थीं। ऐसे में उन्होंने अपनी नाखुशी जाहिर की थी। आज मोदी को बिना कुछ किए भाजपा के भीतर के अपने इन लोगों से हिसाब चुकता करने का मौका मिल रहा है। एक तीसरा नाम मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का है जिन्होंने लोकसभा चुनाव प्रचार के वक्त शुरू में तो मोदी की तस्वीरें भी पोस्टरों और होर्डिंग पर नहीं लगने दी थीं, और अब व्यापम घोटाले को लेकर शिवराज सुप्रीम कोर्ट से लेकर सीबीआई तक उलझे हुए हैं, और मोदी से जरा भी अलग चलने वाले, और आज मुसीबत में फंसने वाले वे तीसरे सत्तारूढ़ भाजपा नेता हैं। 
भाजपा के भीतर मोदी बाकी लोगों से बिल्कुल अलग, बिना संतान वाले, और बिना दामाद या समधी वाले, ऐसे नेता हैं, जिनका खुद का परिवार प्रधानमंत्री पद की महिमा से परे, आम जिंदगी की एक मिसाल की तरह रहता है। इसलिए वे इस तरह की बातें करके भी, भाजपा के और नेताओं के लिए परेशानी चाहे खड़ी करें, उन्हें निजी रूप से ऐसा कहने का नैतिक हक तो है ही। लेकिन एक सवाल यह भी है कि अटल-राज के बाद रंजन भट्टाचार्य के कामों को लेकर दस बरस में यूपीए सरकार ने क्या जांच-पड़ताल की? और मोदी सरकार का, हरियाणा और राजस्थान की भाजपा सरकारों का एक बरस पूरा होने पर भी रॉबर्ट वाड्रा के जमीनों के उन चर्चित मामलों पर इन सरकारों ने क्या किया जिनको कि मोदी आज तक मुद्दा बना रहे हैं? क्या कांग्रेस और भाजपा एक-दूसरे के खिलाफ महज जुबानी जंग करने पर भरोसा रखती हैं, और एक-दूसरे के दामाद को तकलीफ से परे रखती हैं? लोगों को याद है कि चौथाई सदी से बोफोर्स की महज चर्चा ही चर्चा चल रही है, एनडीए की पिछली सरकार ने भी कुछ नहीं किया, और आज की सरकार भी बोफोर्स की अब तक की आधी-पूरी जांच का कुछ नहीं कर पा रही है। फिलहाल दामादों के कामकाज चटपटी खबर देकर मीडिया को भुखमरी से बचाने का काम ही कर रहे हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें