सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की आस्था और पोशाक पर कही बात बड़ी फिक्र खड़ी करती है...

संपादकीय
25 जुलाई 2015

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एच.एल. दत्तू ने कल एक याचिका पर बहस के दौरान मुस्लिम समुदाय की तरफ से खड़े एक वकील से कहा कि परीक्षा के दौरान सिर पर स्कार्फ बांधने या पूरी बाहों के कपड़े पहनने की जिद धार्मिक आस्था नहीं बल्कि अहंकार है। वे सीबीएसई द्वारा आयोजित ऑल इंडिया प्री-मेडिकल टेस्ट के लिए लागू नए नियमों के खिलाफ एक अपील पर सुनवाई कर रहेे थे। सीबीएसई ने नकल से बचने के लिए नियम लागू किए हैं कि कोई भी परीक्षार्थी सिर पर स्कार्फ नहीं बांधेंगे या टोपी नहीं लगाएंगे। इसके साथ ही पूरी बाहों के कपड़ों पर भी रोक लगाई गई है। बहुत सी मुस्लिम छात्राएं अपनी धार्मिक-सामाजिक मान्यताओं के तहत बालों को स्कार्फ से ढांककर रखती हैं, और बाहें खुली नहीं रखती हैं। उनकी तरफ से एक छात्र संगठन ने अदालत में सीबीएसई के इस नियम के खिलाफ अपील की थी, और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली एक बेंच ने इसके खिलाफ रूख दिखाया। 
जस्टिस एच.एल. दत्तू ने मुस्लिम समुदाय की छात्राओं की तरफ से खड़े वकील के इस तर्क को खारिज किया कि यह उनकी (मुस्लिम छात्राओं की) का अनिवार्य धार्मिक रिवाज है, और उन्हें इसका पालन करना होता है। हमारी धार्मिक आस्था में हमें सिर ढांककर रखना होता है। इस पर जज का कहना था कि यह और कुछ नहीं सिर्फ एक अहंकार की बात है। आस्था कपड़ों से जुड़ी हुई नहीं होती। तीन घंटे सीबीएसई के नियमों के हिसाब से कपड़े पहने जा सकते हैं, और इतनी छोटी-छोटी बातों के लिए अदालत नहीं आना चाहिए। 
आज चूंकि यह इम्तिहान हो ही रहा है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब इस पर तो और कुछ नहीं हो सकता, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के रूख का विश्लेषण जरूर किया जाना चाहिए। कल की अदालती कार्रवाई में सिर्फ मुस्लिमों रिवाजों को लेकर बात हुई, इसलिए यह बात सामने नहीं आई कि कोई छात्र अगर पगड़ी लगाकर पहुंचेंगे, तो उनके लिए सीबीएसई का क्या नियम है? क्योंकि कुछ हफ्ते पहले आए सीबीएसई के इस नए ड्रेस कोड में पगड़ी का कोई जिक्र नहीं किया गया है, लेकिन क्या जस्टिस दत्तू अपनी इस बात को पगड़ी के बारे में भी कह रहे थे? सुप्रीम कोर्ट जब किसी बात पर कुछ बोलता है, तो उसका कहा हुआ या उसका आदेश तब तक कानून का दर्जा रखता है जब तक कि उसके खिलाफ संसद कोई कानून न बना दे। अदालत की कही हुई बातों की मिसाल भी दी जाती है, और मातहत अदालतें जजों की जुबानी बातों को भी मार्गदर्शक मान लेती हैं। इसलिए जस्टिस दत्तू की बातों से एक फिक्र खड़ी होती है। 
लोगों को याद होगा कि जस्टिस दत्तू ने ही कुछ महीने पहले देश के उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों की एक बैठक ईसाईयों के एक त्यौहार, गुड फ्राईडे, पर बुलाई थी, और जब एक वकील ने इस पर आपत्ति की, तो उन्होंने आपत्ति खारिज कर दी, और वे अपने फैसले पर कायम रहे। कुछ ही महीनों के भीतर एक दूसरे अल्पसंख्यक तबके को लेकर जस्टिस दत्तू का यह रूख सामने आया है। इन दोनों बातों को मिलाकर देखे बिना हम नहीं रह पा रहे हैं। कल का उनका अदालती रूख जरा भी न्यायसंगत नहीं था। अल्पसंख्यकों को अपनी पोशाक को लेकर अपनी धार्मिक मान्यताओं को मानने की आजादी है। इसके खिलाफ यूरोप के कुछ देशों में नियम बदले जा रहे हैं, लेकिन भारत में धार्मिक आजादी के अलग पैमाने लागू हैं। सिखों को भारत में अपनी पगड़ी को लेकर कई तरह की छूट मिली हुई हैं, जिनमें हेलमेट की छूट भी है, फौजी टोपी की छूट भी है, सुरक्षा जांच में भी छूट है, और स्कूल की पोशाक में भी छूट है। हम सिखों की पगड़ी और मुस्लिम लड़कियों की हिजाब के बीच धार्मिक अधिकारों में कोई फर्क नहीं देखते। यह तो इम्तिहान का इंतजाम करने वाले सीबीएसई की सोच की बात है कि वह नकल रोकने के लिए किस तरह की जांच करेगी। लेकिन नकल रोकने के नाम पर हिजाब पहनने वाली लड़कियों का हिजाब उतरवा देना, या जिनको पूरी बाहों के कपड़ों की आदत है, उन्हें आधी बांह की कपड़े पहनने पर मजबूर करना, बुनियादी हक के खिलाफ है। सीबीएसई आसानी से यह काम कर सकती थी कि उसके पोशाक-नियमों में छूट चाहने वाले लोग परीक्षा केन्द्र पर घंटे भर पहले पहुंचें। जिन लड़कियों को इन रिवाजों की आदत है, उनको ठीक इम्तिहान के समय इनसे दूर करना उनके साथ ज्यादती होगी, और इससे उनके प्रदर्शन पर फर्क भी पड़ सकता है। 
हम जस्टिस दत्तू की इस बात से पूरी तरह असहमत हैं कि आस्था कपड़ों से जुड़ी हुई नहीं रहती। इसी देश में क्या कोई किसी साधू या साध्वी को किसी रंग के कपड़े पहनने से रोक सकते हैं? क्या कोई नागा साधुओं को जबर्दस्ती कपड़े पहना सकते हैं? जबकि देश में कोई और इन धार्मिक लोगों की तरह कपड़े उतारकर रहे, तो उसे  यही अदालत जेल भेज देगी। तो क्या साधुओं का यह नॉन-ड्रेस-कोड उनकी धार्मिक आस्था की वजह से कानूनी रियायत नहीं पाता है? क्या कोई किसी की दाढ़ी-चोटी काटने पर मजबूर कर सकते हैं? क्या बुर्का पहनने वाली किसी महिला, या पगड़ी पहनने वाले किसी सिख को उनके ये कपड़े पहनने से रोका जा सकता है? आज दुनिया में अगर किसी देश में धार्मिक आस्था पोशाक से सबसे अधिक विविधता से जुड़ी हुई है, तो वह भारत ही है। सुप्रीम कोर्ट को लोगों के धार्मिक रीति-रिवाज खारिज करने के पहले यह सोचना चाहिए था कि क्या वह ऐसा ही आस्थाहीन रूख सभी धर्मों के लिए अख्तियार कर सकता है? 
एक के बाद दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यक तबके की भावनाओं को लेकर भारत की सबसे बड़ी अदालत के सबसे बड़े जज का यह रूख फिक्र खड़ी करता है, और हम इसे एक तय बात मानते हैं कि अल्पसंख्यक समुदाय का भरोसा ऐसे जज से उठ सकता है। 

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