लोकतंत्र के गठबंधनों में घरेलू आलोचक इतने बुरे भी नहीं

संपादकीय
12 जुलाई 2015

भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक दूसरी अंतरराष्ट्रीय बैठक के दौरान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मुलाकात में दोनों देशों के बीच के कुछ मुद्दों पर बात की। इसके बाद की बड़ी खबर यह निकली कि अगले बरस नरेन्द्र मोदी पाकिस्तान जाने का शरीफ का न्यौता मंजूर कर चुके हैं। इस पर एनडीए में भाजपा की सहयोगी शिवसेना ने कड़ी प्रतिक्रिया की, और पाकिस्तान को लेकर शिवसेना का रूख नया नहीं है। लेकिन इसके साथ-साथ इस बार की एनडीए सरकार और महाराष्ट्र की राज्य सरकार बनते समय भाजपा और शिवसेना के बीच जो तनातनी हुई, और शिवसेना के मुखिया उद्धव ठाकरे को जिस तरह नीचा देखना पड़ा, उसे देखते हुए तब से लेकर अब तक शिवसेना केन्द्र सरकार और राज्य सरकार में भागीदारी के बावजूद एक कटु आलोचक बनी हुई है। उसने अनगिनत मुद्दों पर मोदी से लेकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडऩवीस तक की बड़ी आलोचना की है, और अपने अखबार सामना में तमाम मुद्दों पर बहुत खुलकर असहमति लिखी है, जिनमें से कई संपादकीय हमने भी इसी पन्ने पर लेख के रूप में छापे भी हैं। यह शायद पहला मौका है जब शिवसेना के इस अखबार में छपे हुए विचार लगातार समाचार बन रहे हैं। 
महाराष्ट्र के एक और बड़े नेता एनसीपी के प्रमुख शरद पवार ने यह कहा है कि शिवसेना इतनी ही असहमत है तो उसे एनडीए छोड़ देना चाहिए। बहुत से लोगों को पवार का यह तर्क सही लग सकता है, लेकिन हमारा मानना है कि एक सत्तारूढ़ गठबंधन के साथियों के बीच में असहमति की एक जगह होनी चाहिए, और मुद्दों पर ऐसी असहमति को एक लोकतांत्रिक विचार-मंथन अधिक मानना चाहिए, बागी तेवर कम मानना चाहिए। वैसे भी सत्तारूढ़ कोई भी गठबंधन विचारधाराओं का संपूर्ण विलय नहीं होता है, और भागीदारों के बीच अपनी खुद की नीतियों और अपने खुद के सिद्धांतों पर बने रहने की एक संभावना हमेशा ही रहती है। फिर गठबंधन से परे भी अगर देखें तो हाल के बरसों में सबसे बड़ी घरेलू-असहमति की मिसाल राहुल गांधी ने पेश की थी, जब उन्होंने अपने ही प्रधानमंत्री के मंत्रिमंडल में लिया गया फैसला दिल्ली प्रेस क्लब में फाड़कर फेंक दिया था, और मंत्रिमंडल को अपना कहा हुआ वापिस निगलना पड़ा था। इससे बड़ी असहमति और क्या हो सकती है? और यह वही मंत्रिमंडल था जिसमें मनमोहन सिंह के मातहत शरद पवार एक मंत्री थे, और उनकी पार्टी उस समय केन्द्र की यूपीए सरकार के साथ-साथ महाराष्ट्र में भी राज्य सरकार में कांग्रेस के साथ गठबंधन में थी। 
हम घरेलू असहमति को, और ऐसी वैचारिक असहमति के सार्वजनिक बयानों को भी गलत नहीं मानते। लोकतंत्र किसी सीलबंद कोठरी में किए जाने वाला गोपनीय काम नहीं होता। और विचार-मंथन के लिए सहमति-असहमति का सिलसिला चलते रहना चाहिए, और यह न तो नई बात है, और न ही भाजपा-शिवसेना के बीच की बात है। घर के भीतर की असहमति बाहर की असहमति के मुकाबले अधिक महत्वपूर्ण और असरदार इसलिए होती है कि उससे घर को सुधारने का एक मौका भी मिलता है। अगर देश और प्रदेशों में सत्तारूढ़ पार्टियां असहमति को जगह दें, तो उनके खुद के गलत काम कम होने लगेंगे। सत्ता अपने साथ कई तरह के खतरे लेकर आती है, और नरेन्द्र मोदी जैसी संपूर्ण-सत्ता परले दर्जे का खतरा लेकर आती है। राजनीति के बारे में एक पुरानी बात है- पॉवर करप्ट्स, एंड एब्सोल्यूट पॉवर करप्ट्स एब्सोल्यूटली...।
हम नवाज शरीफ से नरेन्द्र मोदी की बातचीत के हिमायती हैं, और कांग्रेस से लेकर शिवसेना तक जिन लोगों ने भी इस बातचीत की आलोचना की है, हम उससे असहमत हैं। दिक्कत यह है कि यही नरेन्द्र मोदी यूपीए के खिलाफ सबसे बड़े प्रचारक बने हुए पाकिस्तान के खिलाफ जितने तरह की बातें चुनावी मंच से कर चुके हैं, जितने तरह के वायदे और दावे कर चुके हैं, उनको निभाना किसी भी लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री के लिए मुमकिन नहीं होता। एक व्यक्ति से परे में एक दल विपक्ष में रहते हुए जितने तरह की आक्रामक या हिंसक बातें करता है, उतने तरह की हमलावर बातों को निभाना एक सत्तारूढ़ दल के लिए मुमकिन नहीं होता। इसलिए मोदी सरकार और भाजपा को आज कांग्रेस से लेकर शिवसेना तक बहुत सी पार्टियां यह याद दिला रही हैं कि कल तक वे पाकिस्तान के कितने सिर काटकर लाने की मुनादी करते थे, और किस तरह आज हिन्दुस्तानियों के ही सिर अधिक कट रहे हैं, किस तरह मोदी सरकार आने के बाद सरहद पर पाकिस्तान के हमले कई गुना बढ़ गए हैं। इन बातों से सरकार में बैठी भाजपा को भी सबक लेना चाहिए, और उन पार्टियों को भी सबक लेना चाहिए जो कल देश को चलाने का मौका पा सकती हैं। फिलहाल भाजपा को अपने इस घरेलू आलोचक को बर्दाश्त करना होगा, और बहुत से मुद्दों पर उसकी राय सुनना-मानना बेहतर भी होगा, उसकी पाकिस्तान-नीति को छोड़कर।

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