नारायण मूर्ति की बात पर सोचने की जरूरत है

संपादकीय
17 जुलाई 2015
भारत की एक सबसे प्रतिष्ठित कंपनी, इंफोसिस, के सह-संस्थापक एन.आर. नारायण मूर्ति ने अभी एक विज्ञान-समारोह के मंच से कहा कि भारत ने ऐसा एक भी आविष्कार नहीं किया है जो पूरी दुनिया में घर-घर तक जाना जाता हो। वे बेंगलुरू में भारतीय विज्ञान संस्थान के दीक्षांत समारोह में बोल रहे थे। यह संस्थान देश के सबसे प्रमुख विज्ञान-शिक्षा केन्द्र के रूप में जाना जाता है। नारायण मूर्ति का कहना था कि भारतीय शैक्षणिक संस्थान असरदार शोध करने में नाकामयाब रहे। उनकी बात पर वैज्ञानिकों की मिली-जुली प्रतिक्रिया है, कुछ का कहना है कि भारत में खोज तो महत्वपूर्ण हुई हैं लेकिन खोज को प्रयोगशाला से समाज और बाजार तक ले जाने के तरीके भारत में विकसित नहीं हैं। कुछ वैज्ञानिकों ने कहा कि भारत के ही वैज्ञानिक अमरीका जैसे देशों में जाकर बेहतर काम कर पाते हैं जहां पर खोज को लोगों तक पहुंचाने के बेहतर तरीके हैं।
नारायण मूर्ति के कहे एक-एक शब्द का विश्लेषण हम नहीं कर रहे लेकिन जो मुद्दा उन्होंने छेड़ा है वह अब और गंभीर इसलिए हो गया है कि अब भारत के कुछ उग्र राष्ट्रवादी संगठन लगातार इस प्रचार में लगे हैं कि किस तरह दुनिया की बहुत सी बड़ी खोजें भारत में हुई हैं और पौराणिक काल में ही भारत में कौन-कौन से आविष्कार हो चुके थे, राम किस तरह पुष्पक विमान से यात्रा करके अयोध्या लौटे थे। लोग कुछ झूठों को इतनी अधिक बार दुहरा चुके हैं कि अब शायद वे खुद भी उन पर भरोसा करने लगे हैं।
किसी भी देश, संस्था, या व्यक्ति के आगे बढऩे का रास्ता अपनी असलियत को जानने, और मानने, के बाद ही शुरू होता है। आगे बढऩे की जरूरत उन्हीं लोगों को हो सकती है, जो झूठे अहंकार और पाखंडी गौरव में न जीते हों। लेकिन जिन लोगों के उग्र राष्ट्रवाद के चलते, धार्मिक अहंकार के चलते लोग यह मानने को ही तैयार न हों कि इतिहास में कभी कोई उनसे भी बेहतर रहा हो, वैसा समाज आगे बढऩे की अपनी संभावनाएं खो बैठता है। भारत में कुछ ताकतें अपनी कार के पीछे देखने वाले बैक व्यू मिरर की जगह एक पौराणिक फिल्म चलाते हैं, और खुद भी उस कहानी पर फिदा रहते हैं, और चाहते हैं कि बाकी लोग भी उस पर भरोसा करें। कार के बैक व्यू मिरर में मनपसंद फीचर फिल्म देखने वाले सामने मंजिल तक नहीं पहुंच पाते।
दूसरी बात यह कि मोदी सरकार आने के बाद देश के सबसे ऊंचे दर्जे के शैक्षणिक संस्थानों में जिस तरह की राजनीतिक दखल बढ़ गई है, उससे इन संस्थानों की मौलिकता और संभावनाएं खत्म होना शुरू हो गया है। भारत जैसे विशाल और विविधताओं वाले देश में अगर एक धर्म को संगठनों की पसंद ही ओहदों के लिए लोग तय करेगी, तो ऐसे संस्थानों का योगदान नीचे गिरने लगेगा, शुरू हो चुका है।
आज दुनिया के जिन देशों के मुकाबिले भारत आविष्कार से लेकर निर्माण तक में आगे बढऩा चाहता है, उन देशों से आज भारत कुछ समझने को भी तैयार नहीं है। चीन में किसी ने अपने इतिहास को लेकर कोई झूठा दावा किया हो यह सुनाई भी नहीं पड़ता, और अमरीका की तो सारी उपलब्धि ही हर रंग, धर्म, नस्ल को बराबरी से बढ़ावा देने और प्रतिभा को बढ़ावा देने पर टिकी हुई है। भारत इन दोनों को कोशिश करके अपने से दूर रखते चल रहा है।
हम समय-समय पर और बातों को भी लिखते आए हैं कि किस तरह भारत में नौजवान पीढ़ी के प्यार-मोहब्बत से लेकर उसकी शादी तक में साम्प्रदायिक-जातीय दखल इस देश की नौजवान पीढ़ी को कुचलकर रख दे रही है। ऐसे ही लोगों को अमरीका में जाकर आजादी की सांस मिलती है और वे बेहतर काम करते हैं।
भारत को जो लोग मुगलों के हमले के पहले के दौर में ले जाना चाहते हैं, वे इस देश की संभावनाओं को भी उन्हीं पिछली सदियों में ले जाकर पटकेंगे।

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